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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 208, कुल 408 में से

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पृष्ठ 208

हेमचन्द्र कानूनगो एक अति भद्रेश सज्जन थे। जब जेल में आए होंगे तब
वह अवश्य जवान रहे होंगे। लेकिन जिस दिन मैंने प्रथम बार अण्डमन की जेल
में क़दम रखा था उस दिन जब मैने दूर से हेमचन्द्र को एक स्टूल पर बैठे देखा
उस दिन का दृश्य मैं कभी नहीं भूल सकता। दाढ़ी के बाल आधे से ज्यादा सफ़ेद
हो गए हैं, छाती तक बाल लटक रहे हैं, आंख में चश्मा है और रंग गंदुमी। मैं
यह सोचने लगा कि भारत के स्वाधीनता संग्राम में इन सज्जन ने अपने बाल
सफेद कर लिये, सालों से जेल में पड़े हुए हैं, मुखमंडल चिन्तनशील गम्भीरता-
मंडित दिखाई दे रहा है, एकाग्र चित्त से कोई किताब पढ़ रहे हैं।
कालेपानी में आकर एक नवीन युवक दत्तचित्त होकर उन्हें इस तरह से
टकटकी लगाकर देख रहा है, हेमचन्द्र को इस बात की कोई ख़बर नही। अपने
देश से सहस्रों मील की दूरी पर समुद्र-परिवेष्टित एक छोटे-से टापू के कारागार
में एक प्रौढ़ के साथ एक नौजवान का इस परिस्थिति मे मिलना आज भी मुझे
याद है। ये वही हेमचन्द्र हैं जो अपनी जायदाद बेचकर फ्रांस चले गये थे बम
इत्यादि बनाना सीखने के लिए। जिस समय हेमचन्द्र इस वैप्लविक मनोवृत्ति
को लेकर फ्रांस गए थे उस समय भारत के राष्ट्रीय क्षेत्र में किसी नेता ने भी
यह कल्पना नहीं कर पाई थी कि भारत के नौजवानों में देश को स्वाधीन करने
की इतनी प्रबल आग्रहपूर्ण क्रांतिकारी भावनाएं तीव्र रूप से फैल रही हैं।
आज वही हेमचन्द्र बारह साल जेल-जीवन व्यतीत करने के बाद घर वापस
जा रहे हैं। घर में उनके स्त्री है एवं एक पुत्र। बारह साल मे अण्डमन मे उन्होने
जितनी पुस्तकें एकत्रित की थी अपने पुत्र के लिए आज वे सब पुस्तकें अपने साथ
लिये जा रहे हैं। जो युवक काले पानी मे कदम रखते ही उनको देखकर दंग रह
गया था, आज मुक्ति पाने के दिन जहाज़ मे वे उसके ही पास आकर मित्र की
तरह खडे हुए हैं और भविष्य की आशा और आकाक्षाओं की बातें पूछ रहे है।
दिन यो ही बीत गया। आज जहाज़ पर आखिरी रात थी। हम सब
मातृभूमि के क़रीब आ गए हैं। बहुवांछित तटभूमि अभी दिखलाई नही दी है।
सम्भव है, कल दिखलाई दे। जहाज़ मे बिजली की बत्तियां काफ़ी जल रही थी।
चारों दिशाओ में अंधकार छा रहा था। आकाश मे नक्षत्र चमक रहे थे। क्षितिज
स्पष्ट रूप से दिखाई नही दे रहा था। अनन्त गगन-मण्डल अतल समुद्र मे समा
गया था। या यों कहिए कि सीमाहीन समुद्र असीम गगन मे समा गया था। इस
असीमता के बीच में जल के बुदबुदों की तरह हमारा जहाज़ समुद्र की लहरों के
ऊपर भासमान था। तारो की वजह से अधकार समुद्र के बीच भयानक मालूम हो
रहा था। मैं डेक पर रेलिग के किनारे खड़ा था। नीचे समुद्र की लहरें उमड रही
थी। अगर जहाज़ पर बिजली की बत्तियां न होती तो नीचेकी लहरें बिलकुल न
दिखाई देती लेकिन बिजली की बत्तियो की रोशनी के कारण नीचे लहरों का
भीषण रूप मैंने देखा। यह दृश्य भी भूलना सम्भव नही। भयानां भय भीषणं
भीषणानाम् इस श्लोक की पंक्तियां सुनी ही थी। अब यह दृश्य आँखों देखने