बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकालेपानी से विदाई / 207
का अवसर आया। छोटी-सी बत्ती के सहारे गहन अंधकार ने मानो आँखों के
सामने रूप ग्रहण किया हो। अंधकार का भी रूप होता है, यह पहले-पहल ही
अनुभव किया। लहरें उमड़ रही हैं, लेकिन वह पानी नहीं मालूम हो रहा है।
यदि हम अचानक पानी में गिर पड़ें तो किस अनिर्देश्य अज्ञात कराल लोक में
जा पहुँचेंगे इसका कोई ठीक-ठिकाना नहीं है। काल की कराल छाया मानो उन
लहरों के रूप में उमड़ रही है। अंधकार को भी देखा जा सकता है। जिन्होंने
देखा है वे ही स्वीकार कर सकते हैं, दूसरे नहीं।
सम्भव है रात को किसी समय पाइलट हमारे जहाज में सवार हो गया हो।
प्रातःकाल सुदूर में एक रेखा की तरह स्वदेश भूमि को देख पाता था, ऐसा मुझे
ख्याल है। नदी और समुद्र के संगम-स्थल को किस समय मैंने पार किया था,
यह मुझे ठीक याद नहीं। अभी भी समुद्र था या नदी आ गई थी, मैं इसको भी
ठीक नहीं कह सकता था।
चौथे दिन समुद्री पक्षियों को समुद्र में मछली का शिकार करते हुए देखा।
एकाध बार मछलियों को भी थोड़ी दूर तक उड़ते हुए देखा था। ये समुद्री पक्षी
जिन्हें अंग्रेजी में सीराल्जं कहते हैं, अण्डमन टापू से दो सौ मील की दूरी तक
दिखाई दिए, और इधर भी भारत की तटभूमि से सौ मील की दूरी पर दिखाई
दिए होंगे। अब मुझे ठीक-ठीक याद नहीं है लेकिन जहाँ तक मैं स्मरण कर सकता
हूँ, ये समुद्री पक्षी बीच समुद्र में नहीं दिखाई दिए थे। यूरोपियन पुरुष और
स्त्रियाँ इन पक्षियों के खाने के लिए कुछ फेंक दिया करते थे। समुद्री पक्षी इसलिए
जहाज के आस-पास खूब उड़ा करते थे। इन साहबों की बदौलत इन पक्षियों
की लीलाएं देखकर हम भी आनन्द-उपभोग करते थे।
हेमचन्द्र ने कहा कि हम लोग रात में गंगासागर संगम पार कर चुके हैं।
प्रातःकाल में भी बहुत दूर पर जो क्षीण रेखा दिखाई दे रही थी, इसमें सन्देह
है कि यथार्थ में वह रेखा तटभूमि की द्योतक थी या नहीं। हम लोगों में
बात छिड़ी कि जाने कितने दिनों में हममें जहाज चलाने वाले आदमी पाइलट
इत्यादि पैदा होंगे। जितना दिन चढ़ता गया उतनी ही तटभूमि की रेखा निकट-
वर्ती होती गई। वह दृश्य बड़ा मनोहर था। अब स्पष्ट रूप से तटभूमि दिखलाई
देने लगी थी, लेकिन इधर पानी का प्रसार समुद्रवत् ही था। एक तरफ जल
का अनन्त प्रसार, दूसरी तरफ तटभूमि का इंगित; यह सान्त और अनन्त का
सम्मेलन बहुत ही हृदयग्राही होता है। केवल अनन्त से हमारा काम नहीं चलता
और न केवल सान्त से ही हम तुष्ट रह सकते हैं। अनन्त समुद्र में भी आसमान
व जहाज मेरे साथी थे; जहाज के निवासी भी साथी थे, सम्भव है इसलिए वहाँ
पर सान्त और अनन्त का मिलन रहा। लेकिन निरे अनन्त में जी घबरा जाता
है। सम्भव है मुझमें अभी भी वासनाएं प्रबल हैं इसलिए अभी केवल अनन्त से
जी घबराता है। एक दफा श्री रामकृष्ण परमहंस ने स्वामी विवेकानन्द को कुछ
अनुभव कराया था। स्वामी विवेकानन्द घबराकर कहने लगे, "अभी मेरे माता-