बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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इस अनन्त दिशा को पार करने की अदम्य चेष्टा कर रहा है और दूसरी तरफ ज्योति-
पुंज की गति से भी यह प्रतीत होता था कि अनन्त के साथ शान्त का मिलन है।
और हम नितान्त दिशाहीन होकर भटक नहीं रहे हैं।
सूर्य का उदय अब प्रत्यक्ष हो रहा था। अर्धगोलाकार ज्योतिपुंज समुद्र के
ऊपर दिखाई दे रहा है। लेकित स्थल देश में सूर्यास्त के समय जैसे मनोहर रूप
में अवर्णनीय लालित्य के साथ सूर्य दिखाई देता है, समुद्र के बीच सूर्योदय के
समय वह लालित्य न था। उस दिन आकाश में एकदम मेघ न थे। सम्भव है,
इसीलिए सूर्य की किरणों से कोई रंग बिखर नहीं रहा था। समुद्र के बीच सूर्यो-
दय के समय एकमात्र विचित्र बात हम लोगों ने यह देखी थी कि अचानक वह
ज्योतिर्पिंड जो अभी तक वृत्ताकार पानी के ऊपर दिखाई दे रहा था, मानो
एकाएक पानी से कूदकर अलग हो गया और आकाश में सूर्य के रूप में दिखाई
देने लगा। इस विचित्र कूदने को छोड़कर समुद्र में सूर्योदय के वक्त और कोई
ऑब्जैक्टिव ब्यूटी हम लोगों ने नहीं दिख पाई। कुछ ने तो कहा कि यही समुद्र
में सूर्योदय की ब्यूटी है। वृथा तीन घंटे बरबाद हुए।
हम सब अपनी जगह पर चले आए और हँसी-दिल्लगी में वक्त बिताने लगे।
खाने-पीने की कोई खास चीज तो मिलने को थी नहीं और न पल्ले पैसा ही था।
आकाश की तरफ या क्षितिज की तरफ देखने से यह पता नहीं चलता था
कि हमारा जहाज़ किसी तरफ अग्रसर हो रहा है या नहीं। लेकिन नीचे पानी
की तरफ देखने से प्रतीत होता था कि किसी अज्ञात दिशा की तरफ हमारा
जहाज़ आगे बढ़ रहा है। अनन्त समुद्र में एकमात्र अपने ही जहाज़ को पानी के
ऊपर तैरते देखकर जैसे एक ओर अनन्त का अर्थ अनुभव करते थे, वैसे ही दूसरी
ओर मेरे मन मे एक असहायता की भावना एक प्रकार की अव्यक्त आशंका की
सृष्टि करती थी। मै जहाज़ के पीछे की तरफ चला गया। उस निर्जन स्थान में
अकेले खड़े होकर मैं देखता था कि कैसे हमारा जहाज़ अथाह समुद्र पर तुच्छ-
सा विक्षोभ पैदा करके समुद्र पर पानी का रास्ता बनाता चला जा रहा है। मन
में आया कि यदि हम गिर जाएँ तो क्या कोई सहायता हमें मिल सकती है !
थोड़ी देर में फिर वही बात याद आई कि मेरा जीवन तो समाप्त हो चुका था,
मेरी इस नई जिन्दगी पर मेरा क्या अधिकार है ? दिवा-स्वप्न देखने लगा। क्या
फिर देश-सेवा के कार्य मे निर्भीकता के साथ अपने जीवन को लगा पाऊँगा ?
मुझे याद आया कि मेरी माता विधवा है और मैं आज तक किसी भी प्रकार से
जननी को लौकिक दृष्टि से सुखी नहीं कर पाया। क्या अब लौटकर अपनी माता
के लिए कुछ कर पाऊँगा ? अब तो माताजी शादी के लिए अवश्य कहेंगी। शादी
मैं अवश्य करूँगा, लेकिन शादी करने के बाद क्या मैं फिर त्याग के रास्ते को ग्रहण
कर सकूँगा ? इन्ही सब भावनाओ मे मैं तल्लीन था। जब मैंने एकाएक सिर
उठाया तो देखा कि हेमचन्द्र मेरे पास खड़े हुए हैं। उनके आग्रह करने से मैंने
अपने मन की सब बातें बताईं।