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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

172 / बन्दी जीवन
मृत देह की यथोचित क्रिया करने को भी लोग कैसे जुटेंगे, यह समझ में न आता
था। सन् 1918 में विप्लवियों की अवस्था ऐसी ही शोचनीय हो गई थी। किन्तु
नलिनी इस बेवक से भी मरे नहीं। मृत्यु और भी महनीय रूप में दिखाई देने के
लिए उस समय तक ढाका में प्रतीक्षा कर रही थी। चंगे होकर नलिनी बुझते
विप्लव दीप का भार लेकर फिर ढाका में आ रहे। नलिनी और तारिणी मजूमदार
एक ही मकान में रहते थे। सन् 1918 की 15 जून को भोर के समय पुलिस ने
फिर नलिनी का मकान घेर लिया। फिर दोनों ओर से गोली चली। तारिणी के
अंगों में बहुत गोलियां लगने से वे वहीं मरकर गिर पड़े। नलिनी ने गोली खाकर
भी भागने की चेष्टा की, परन्तु फिर बन्दूक की गोली से घायल होकर उनका
शरीर भी जमीन पर लोटने लगा।
विप्लववादी नलिनी घायल अवस्था में अस्पताल में लेटाये हुए हैं—पुलिस
नाम-धाम लेने में व्यग्र है,—डाइंग-डिक्लेरेशन—मरते समय का इजहार, मांगती
है।
मृत्यु-शय्या पर लेटे हुए घायल विप्लववादी असह्य यन्त्रणा सहते हुए मृत्यु
की प्रतीक्षा में हैं। ऐसे समय साधारण व्यक्ति अपने को छिपा नहीं सकता, वरन्
इच्छा होती है कि उसके कार्यों को देशवासी भली भांति जान जाएँ। जिनके
लिए वह मरता है वे जान जाएँ कि किस प्रकार वह दूसरों के लिए प्राण दे गया,
साधारण मनुष्य की यही इच्छा होती है। किन्तु विप्लववादियों की अपने को
छिपाने की शैली साधारण नहीं होती। शिक्षा और साधना के बिना आत्मगोपन
का वैसा सामर्थ्य आता ही नहीं। मृत्यु के समय भी इच्छा नहीं है, कोई उन्हें
जान जाए, या कोई उनका 'मूल्य' समझ ले—कोई मैसेज (सन्देश) नही है¹—
'Unwept, unhonoured, unsung' ही वह जाना चाहता है! वह नहीं चाहता
कोई उस पर आंसू बहाये, कोई उसका नाम याद करे, कोई भी उसका गीत
गाए! —इसलिए मृत्यु-शय्या पर पड़े विप्लववादी के क्षीण कण्ठ से उत्तर
निकला, 'Don't disturb please, let me die peacefully', 'तंग न करो
भाई, मुझे शान्ति से मरने दो।'
पुलिस ने अनेक प्रकार से बात निकालने की चेष्टा की—कहा नाम तो
बताओ—घर कहाँ है? किन्तु उसका वह एक ही उत्तर था, "don't disturb
please, let me die peacefully—कृपा कर और तंग न करो भाई, शान्ति से
मरने दो।"
इस प्रकार जो मृत्यु को महिमामय बना सकते थे, इस प्रकार जिन्होंने आत्म-
गोपन करना सीखा था, उनकी कहानी पर देशवासियों ने क्या कभी गौर करके

  1. इस प्रसंग में असहयोग के दिन की याद आ जाती है, जब प्रत्येक छोटे-बड़े नेता चार दिन
    की हवालात होने पर भी कॉलमों लम्बे 'मैसेज' अखबारों में भेजना अपना पहला कर्त्तव्य
    समझते थे।

देखा है ? वे लोग जीवन की सब आशा-प्रतीक्षा अपूर्ण रखकर संसार से एकदम
निश्चिन्त हो गए हैं। प्रतिष्ठा की रत्ती-भर भी कामना उन्होंने नहीं रखी। मृत्यु
के दरवाजे पर पहुँचकर, जहाँ कोई बात खुल जाने का डर नहीं, वहाँ भी ख्याति
का निषेध करके वे शान्ति से मरते हैं। वे अपने कर्म से यदि किसी को तृप्त करना
चाहते हैं तो अपने ही अन्तरारमा को, इसीलिए किसी और से कुछ भी अपेक्षा न
रखकर शान्ति से मरना चाहते हैं। संसार की किसी चीज की भी चाह नहीं है, वे
केवल देने के ही धनी हैं।
इन सब विप्लवियों को न जाने क्या कहकर पुकारना चाहिए ? शायद ये
पागल थे, या शायद ये भ्रान्त निर्बोध बालक थे, क्योंकि हमारे इस अभागे देश के
अभिज्ञ नेता और राजनीति-विशारद विचक्षण पंडित इन्हें इन्हीं शब्दों से पुकारते
रहे हैं।
इन विप्लवियों का सबसे बड़ा दोष, जान पड़ता है, यही था कि ये अपने
उद्देश्य-साधन में कृतकार्य नही हो सके। मास के बाद मास और बरस के बाद
बरस विप्लव के लिए अनथक परिश्रम करने के बाद भी ये केवल एक बड़ी व्यर्थता
का ही उपार्जन कर सके ? जिस पथ का अन्तिम परिणाम केवल व्यर्थता हो वह
पथ क्या भ्रान्त नही है ? इस व्यर्थता का कुछ भी मूल्य है ? भारत के अभिज्ञ
नेता और विचक्षण समालोचक विप्लवियों से ऐसे ही प्रश्न प्रायः करते रहे
हैं।
व्यर्थता के एक ही पहलू पर हमारा ध्यान जाता है; किन्तु इस व्यर्थता की
आड़ में जगत् की श्रेष्ठ सम्पद् किस प्रकार अपने को छिपाए रहती है, विफलताओं
के द्वारा किस प्रकार शक्ति का संचार होते-होते एक दिन इस व्यर्थता के बीच
सार्थकता आकर दर्शन देती है, विफलता और पराजय के निराशा-वेदना पूर्ण
अवसाद के समय में इन सब बातों को हम में से बहुत-से हृदयंगम नही कर पाते।
सभी समाजों में, सभी समयों मे विप्लवी लोगों पर समाज के विज्ञ और अभिज्ञ
लोग हँसते और लांछन लगाते रहे हैं। इसका कारण यही है कि प्रायः सभी देशों
के सभी विप्लवियों की पहली चेष्टाएं व्यर्थ हुई हैं, और समाज के विज्ञ और
अभिज्ञ लोग इसी व्यर्थता के माप से ही सब विषयों पर विचार करते रहे हैं। उसी
नियम से भारत के विप्लववादी भी विज्ञ और अभिज्ञ लोगों के मत में भ्रान्त-पथ
के यात्री हैं। और इन समालोचकों में से जो बड़े ही प्रवीण और होशियार हैं वे
इन विप्लवियों को 'ईडियट' (बुद्धू, पागल) कहने में भी संकोच नही करते।
भारत की लब्धप्रतिष्ठ मासिक पत्रिका 'मॉडर्न रिव्यू' के विचक्षण सम्पादक ने
विप्लवियों को निर्देश करके कहा था कि 'यदि भारत में कुछ भी लोग सशस्त्र
विप्लववादी हैं तो भारतवासियों को निश्चय से अपनी बुद्धि-विवेचना पर सन्देह
करना होगा।'
विप्लवियो और समालोचको मे भेद यही है कि विप्लवी लोगों की अपने
आदर्श पर अटूट श्रद्धा है, इसीलिए उन्होने अद्भुत निष्ठा के साथ अपने आदर्श

बनारस षड्यन्त्र अभियोग, आजीवन कारावास एवं कालापानी (अण्डमान) प्रस्थान

174 / बन्दी जीवन
की ओर जानेवाले पथ पर चलते हुए जीवन बिताया है, और इन समालोचक
लोगों ने आराम-चौकी पर बैठकर समालोचना करने को ही जीवन का पेशा बना
डाला है और बहुतों का तो यह समालोचना करना ही जीविका अर्जन करने
का मुख्य अवलम्ब हो गया है। जीविका कमाने के लिए अनेक बातों का हिसाब
करके चलना होता है, किन्तु इस प्रकार हिसाब करके चलने से हमेशा सत्य की
मर्यादा को अटूट रखना शायद सम्भव नहीं होता। इस सबके अलावा विप्लवियों
में और इन सारे समालोचकों में एक और भी बड़ा भेद है, विप्लवियों के नजदीक
जो चीज़ 'Faith' (श्रद्धा) है; समालोचकों के लिए वह केवल 'Opinion
(सम्मति) है। यह 'सम्मति' प्रायः सफलता का मोह पार नहीं कर सकती; इसी-
लिए फलाफल पर निर्भर होकर ही बहुधा 'सम्मति' बनती है। किन्तु जो लोग
इतिहास-स्रष्टा के आसन पर बैठते हैं वे इस 'सम्मति' की परवाह नही करते;
वे निष्ठावान् और श्रद्धा-सम्पन्न व्यक्ति होते हैं। विफलता उन्हें श्रद्धा-भ्रष्ट
नही कर पाती। इसी कारण इतिहास मे वे चिरस्मरणीय हो जाते हैं; इसी से
ये श्रद्धा-सम्पन्न व्यक्ति ही जगत् में कुछ स्थायी काम कर जाने मे समर्थ होते
हैं।
भारत के विप्लववादी भी ऐसे ही श्रद्धा-सम्पन्न व्यक्ति थे। भारत के इन
विप्लवियों की ओर निर्देश करके ही प्रसिद्ध कानून-वेत्ता बैरिस्टर नार्टन साहब
ने एक बार कहा था, "ये सब विप्लवी अपने अभीष्ट साधन मे कृतकार्य नही हो
पाते, इसी कारण आज वे सरकार के अपराधी हैं, किन्तु यदि ये अपने उद्देश्य को
सफल कर सकते तो फिर यही संसार मे स्वदेश-भक्त, वीर तथा साधक कहकर
पूजे जाते।"
भारतीय विप्लवियों ने जो मार्ग ग्रहण किया था उस मार्ग से ही भारत की
मुक्ति होगी कि नहीं, कौन कह सकता है ! शायद उन्होंने उल्टा ही रास्ता ग्रहण
किया हो; किन्तु उनके साथ हमारा मत नही मिलता, इसी कारण तो उन्हें
'ईडियट' (बुद्धू) कहना उचित नहीं है। न जाने संसार के सभ्य लोगों में भारत-
वासियों के मान-इज्जत की इन विप्लवियों के द्वारा अधिक रक्षा हुई है अथवा
इनके विरोधी समालोचकों की युक्तियों के ज़ोर पर ! तो भी यह बात तो हम
जानते हैं कि गत साठ बरसों तक जब रूसी विप्लववादियों के सभी प्रयास निष्फल
हुए थे, जब प्रबल प्रतापी आस्ट्रिया की राजशक्ति के विरुद्ध इटली के मुट्ठी-भर
विप्लववादियों ने पहले-पहल सिर उठाया था, तब इन देशों के विप्लववादियों को भी
ऐसे ही व्यंग्य और गालियां सहनी पड़ती थीं। साठ बरस के अनथक परिश्रम के बाद,
अनेक बाधाओं और व्यर्थताओं में से गुज़रकर सारे जगत् की उपेक्षा और प्रति-
कूलता को सहकर आज रूसी विप्लववादियों की आशा सफल होने जा रही है।
प्रायः चालीस बरस की कशमकश के बाद, कितने त्याग, कितने कष्ट और कितनी
अशान्तियों को लांघकर इटली ने स्वाधीनता पाई थी। किन्तु जो इस मुक्ति-पथ
के प्रथम यात्री थे उन्हें उनकी पहली विप्लव चेष्टाओं के व्यर्थ होने के दिन

परिणाम / 175

कितनी निन्दाएँ सहन न करनी पड़ी थीं ! इस प्रसंग में आइरिश वीर टी०
मेक्सिवनी की चिरस्मरणीय बात याद आती है—“Any man who tells you
that an act of armed resistance---even if offered by ten men
only — even if offered by men armed with stones — any men
who tell you that such an act of resistance is premature, impr-
udent, or dangerous, any and every such man should be
atonce spurned and spat at, for remark you this and recoll-
ect that somewher and somehow and by somebody a beginn-
ing must be made and that the first act of resistance is always
and must be ever premature, imprudent and dangerous.” अर्थात्
“कोई आदमी जो तुम्हें यह कहे कि एक सशस्त्र मुकाबला—चाहे दस आदमी ही
ऐसा मुकाबला करें—चाहे उन आदमियों के पास पत्थरों के सिवाय और कोई
हथियार न हो—कोई आदमी जो तुम्हें कहे कि ऐसा मुकाबला अपरिपक्व है,
अक्लमन्दी का काम नहीं है या खतरनाक है; प्रत्येक ऐसा आदमी लात खाने
लायक और मुंह पर थूका जाने लायक है। क्योंकि यह बात समझ लो और याद
रखो कि कहीं-न-कहीं, किसी-न-किसी तरह और किसी-न-किसी को मुकाबले का
आरम्भ करना होगा और मुकाबले का पहला काम हमेशा अपरिपक्व और
खतरनाक होता है और होना ही चाहिए।”
मैंने अपनी शक्ति के अनुसार इन विप्लवियों का एक संक्षिप्त क्रमबद्ध
इतिहास लिखने की चेष्टा की है। किन्तु इतिहास का प्राणहोता है—जजमेण्ट—
निर्णय। इस जजमेण्ट (निर्णय) के बिना इतिहास खाली घटना-पंजिका (chr-
onicle of events) रह जाता है। इसी से मैं वक़्त-ब-वक़्त घटनाएं छोड़कर
और अनेक बातों को भी ले आया हूँ और विप्लवियों की मैंने प्रशंसा की है, इससे
कोई यह न समझे कि मैं विप्लववाद का प्रचार करता हूँ। मैं कहना चाहता हूँ कि
उनके साथ हमारा मतभेद रहने पर भी उनके चरित्र-बल को हम अस्वीकार
नहीं कर सकते। किन्ही के साथ मतभेद रहने से ही उनसे घृणा करना या उनको
गाली-गलोज करना तो अभीष्ट नहीं है, और विप्लवियों के विरोधी अंग्रेज़ राज्या-
धिकारियों ने भी इनके चरित्र की भरपूर प्रशंसा की है, इससे वे (अंग्रेज़) भी
सचमुच विप्लववादी नहीं हो गए।
इतिहास लिखने बैठा हूँ, इसी से भारतीय विप्लवियों को भारतवासी
किस दृष्टि से देखते थे, क्यों इस दृष्टि से देखते थे, और उन्हें किस दृष्टि से
देखना उचित है? इन सब विषयों की भी आलोचना कर गया हूँ। विप्लवियों
ने सचमुच पागलपन किया था कि नहीं, यह नहीं जानता हूँ, तो भी उनके
पागलपन की बात सुनकर रवि बाबू की एक कविता के कुछ पद याद आते
हैं—

176 / बन्दी जीवन
“कोन आलोते प्रानेर प्रदीप
ज्वालिए तुमि धराय आस¹
साधक ओगो प्रेमिक ओगो
पागल ओगो धराय आस।”
“हे साधक, हे प्रेमिक, हे पागल, तुम इस भूमि पर आते हो—किस ज्योति
से प्राणों के प्रदीप को जलाकर तुम इस भूमि पर आते हो !’”²

  1. उच्चारण—आसो।
  2. इस अध्याय के कुछ अंश नलिनी बाबू के ‘विप्लववाद’, ‘आत्मशक्ति’ में प्रकाशित,
    गोपेन्द्रलाल राय के एक लेख और ‘शंख’ मे प्रकाशित ‘नलिनी वाक्चि’ की कहानी से
    लिए गए है। —लेखक

7
विप्लव का प्रयास व्यर्थ क्यों हुश्रा ?
भारतीय विप्लवियों के सभी प्रयास क्यो व्यर्थ हुए। यह जानने के लिए
पहले यह समझ लेना होगा कि वे चाहते क्या थे ? उनका उद्देश्य भली भाँति
समझे बिना यह जानना भी कठिन होगा कि वे कहाँ तक विफल हुए कहाँ तक
नही, और उनकी इस विफलता का कारण क्या था । इसीलिए उनकी इस
व्यर्थता का कारण खोजने से पहले उनका उद्देश्य क्या था इस विषय की कुछ
आलोचना करना आवश्यक है ।
भारतीय विप्लववादियो का उद्देश्य क्या था, इस विषय पर कहने को इतनी
बातें हैं कि यहाँ पर उनकी पूरी आलोचना सम्भव नही है, कारण कि यह आलो-
चना करने के लिए भारत के राष्ट्रक्षेत्र मे इस विप्लव के आविर्भाव से आरम्भ
कर उनकी क्रमिक परिणति के इतिहास की भी आलोचना करना आवश्यक हो
जाता है, और इस प्रकार यह आलोचना इतनी बड़ी हो जाएगी कि हम आलोच्य
विषय से बहुत दूर जा पड़ेंगे । इसीलिए इन सब आलोचनाओं को किसी और
समय करने की इच्छा है। इस समय केवल अपना विषय समझाने के लिए जितनी
आलोचना आवश्यक प्रतीत होती है, उतनी ही करूँगा।
भारतीय विप्लव दल के बीच चाहे कितने ही मतभेद क्यो न रहे हों, परन्तु
इस विषय मे सभी सम्पूर्णतः एकमत थे कि भारत को अक्षुण्ण स्वाधीनता प्राप्त
करनी ही होगी, अर्थात् भारत-भिन्न कोई भी जाति भारत के भले-बुरे की
विचारकर्त्ता होकर भारत के मगल के लिए भारत के किसी भी काम मे हस्तक्षेप
न कर सके—भारत के लिए किस प्रकार की शासन-प्रणाली सबसे अधिक मंगल-
कारी होगी इस विषय के विचारकर्त्ता और परिचालक भारतवासी ही हों ।
भारत का सामाजिक आदर्श क्या होगा, भारत मे सामाजिक समस्या का समाधान
किस प्रकार करना सबसे अधिक मगलजनक होगा, भारतेतर राष्ट्रों के साथ
भारत किस प्रकार का सम्बन्ध-सूत्र स्थापित करेगा, भारत के व्यवसाय-वाणिज्य
को किस प्रकार परिचालित करने से भारत का और जगत् का मगल होगा, इन
सब बातो को भारतवासी ही जैसा ठीक समझें वैसा ही हो, और किसी भी

178 / बन्दी जीवन
राष्ट्र का उसमें कोई हाथ न रहे—यही थी भारतीय विप्लवियों की दुराकांक्षा !
भारत की यह स्वाधीनता ब्रिटिश साम्राज्य के बीच रहकर किसी तरह भी
अक्षुण्ण नहीं रह सकती, बालक जिस प्रकार निःसंशय रूप से अपने माता-पिता
को पहचानता है, भारत के विप्लवी भी यह बात उसी प्रकार निःसंशय रूप से
जानते थे। इसी से भारतीय विप्लवियों की सब चेष्टाओं की जड़ में यह बात थी
कि भारत को इस प्रकार शक्ति सामर्थ्य-सम्पन्न कर दिया जाय जिससे वह
भारत-भिन्न सभी जातियों के हाथ से सब प्रकार से छुटकारा पा सके। इस
भारतेतर राष्ट्रों के समूह में अंग्रेज़ अपवाद नहीं हैं, वरन् साक्षात् रूप से इन
अंग्रेजों के साथ ही पहला संघर्ष आरम्भ होता है। कारण कि अंग्रेजों का ही
साक्षात् रूप से भारत की सब अभिलाषा-आकांक्षाओं और भारत के सब उद्यमों
के साथ घनिष्ठ रूप से संसर्ग है और वे लोग यह समझते थे कि भारत को इस
प्रकार स्वाधीन करने का सबसे मुख्य उपाय है, भारत की क्षात्र शक्ति को
जागृत कर देना—इस क्षात्र शक्ति के आदर्श को ही केन्द्र बनाकर हमारे विप्ल-
वियों ने अपनी सर्व कर्म-प्रचेष्टा को नियन्त्रित किया था। महात्मा गांधी का
भारत के राष्ट्र-क्षेत्र में आविर्भाव होने से बहुत पहले से ही हमारे विप्लवियों
को इस क्षात्र आदर्श और ब्राह्मण्य आदर्श के विषय में बहुत आलोचनाएँ और द्वंद्व
करने पड़े हैं। उन दार्शनिक आदर्शों का विचार और विश्लेषण करने की जगह
यहाँ नहीं है, समय और सुयोग मिलने पर किसी और जगह वह करने की
इच्छा है। तो भी, संक्षेप से यहाँ इस सम्बन्ध में केवल दो-चार बातें कह देना
बुरा न होगा। यथार्थ बात तो यह है कि ब्राह्मण्य आदर्श और क्षात्र आदर्श
में, सच-मच कहें तो, कोई भेद नहीं है, क्योंकि ब्राह्मण्य आदर्श की अंतिम
परिणति जहाँ होती है, क्षात्र आदर्श की भी अन्तिम परिणति ठीक वही होती
है। अर्थात् क्षत्रिय धर्मावलम्बी पुरुष जब प्रकृति-ज्ञान का अवलम्बन करके जीवन
को नियन्त्रित करते हैं तब उसका जो फल होता है, ब्राह्मण भावापन्न पुरुष भी
वैसे ही प्रकृति ज्ञान का अवलम्बन लेकर जीवन बिताएँ, तो उसका भी वही एक
ही फल होता है। अर्थात् यह जगत् ब्रह्म का ही प्रकाश है, और ब्रह्म ही कभी
सगुण और कभी निर्गुण रूप में अपना प्रकाश करते हैं, यह विश्व ब्रह्माण्ड जो नित्य
नये-नये रूपों में परिवर्तित होता है वह भी उसी ब्रह्म का ही सगुण प्रकाश है,
और जो अनिर्वचनीय है, जो मुंह से प्रकट नहीं किया जाता, जहाँ जाकर मन-बुद्धि
धक्का खाकर प्रवेश करने में असमर्थ होकर वापस लौट आते हैं, जिसे किसी भी
विशेषण से विशेषित नहीं किया जा सकता, अर्थात् जो ब्रह्म का ही निर्गुण स्वरूप
है—उस निर्गुण और सगुण ब्रह्म में यथार्थ में कोई भेद नहीं है, उस ज्ञान की
उपलब्धि करना ही ब्राह्मण्य और क्षात्र आदर्श का अन्तिम लक्ष्य रहा है। वेदान्त
के इस आदर्श का अनुसरण करें तो ब्राह्मण्य और क्षात्र धर्म में सचमुच कोई भेद
नहीं रहता, किन्तु वेदान्त के इस धर्म को सब लोग स्वीकार नहीं करते; भारत
के सब सम्प्रदाय यह बात नहीं मानते कि ब्रह्म का सगुण स्वरूप सम्भव है। वे

विप्लव का प्रयास व्यर्थ क्यों हुआ ? / 179.

कहते है, गुणातीत ब्रह्म का रूप-भेद सम्भव नही है, ब्रह्म ही एकमात्र वस्तु है,
और सभी अनित्य है, ब्रह्म के सिवाय और किसी वस्तु का यथार्थ रूप मे कोई
अस्तित्व नही है—आपातत. उनका होना प्रतीत होता है, पर वह भ्रममात्र है,
यही ब्रह्म माया है । यह माया कहाँ से आई और इस माया का स्वरूप क्या है ?
इस सम्बन्ध मे वे कहते है कि वह कहा नही जाता, वह अनिर्वचनीय है,—इसी से
वे ससार को भी अनित्य कहते है और इसी से उनके जीवन का श्रेष्ठ आदर्श रहा
है इस संसार को त्यागकर, ससार के रास्ते से दूर जाकर निर्जन मे, वन मे,
पर्वत मे, गुफा मे रहकर अर्थात् सन्यास लेकर तपस्या करना, भगवान् की
आराधना करना । ब्राह्मणो द्वारा परिचालित हिन्दू समाज का यही सनातन और
सर्वश्रेष्ठ आदर्श रहा है यह बहुतो की धारणा है, इस आदर्श को ही जो मानव-
समाज के सम्मुख श्रेष्ठ आसन पर प्रतिष्ठित करना चाहते है, वे ब्राह्मण्य धर्म के
पक्षपाती है, इसी आदर्श का मैने ब्राह्मण्य धर्म कहकर उल्लेख किया है। और
क्षात्र धर्म कहने से मेरा प्रयोजन उस आदर्श से है, जिस आदर्श मे इस नित्य नूतन
परिवर्तनशील जीव-जगत् को मिथ्या माया कहकर उड़ा नही दिया जाता, जिस
आदर्श मे इस जीव-जगत् को इस ससार को निर्गुण ब्रह्म से अभिन्न समझा जाता
है, जिस आदर्श की प्राप्ति के लिए इस ससार की अवहेलना न करके, इसका
त्याग न करके, इस ससार के भले-बुरे को, इष्ट-अनिष्ट को, हिंसा-अहिंसा को,
राग-द्वेष को समतुल्य समझकर इस भीषण सग्रामस्थल मे रहकर ही ब्रह्म ही
जीव-जगत् हुए है और इस जीव-जगत् मे जो कुछ भला या बुरा है वह सभी ब्रह्म
का ही स्वरूप है, इस सत्य की उपलब्धि करने के लिए सासारिक कर्म मे लिप्त
रहकर ही अर्थात् सासारिक कर्म के साथ ज्ञानयोग को युक्त करके, कर्मयोग के
पथ मे जो साधन करना होता है, उसको ही मै क्षात्र धर्म कहकर पुकारता हूँ ।
इन दोनो आदर्शों मे सचमुच तीव्र द्वंद्व रहा है। एक का आदर्श है बुद्ध और दूसरे
का आदर्श वही कुरुक्षेत्र के श्रीकृष्ण, एक का आदर्श है श्री चैतन्य और दूसरे का
आदर्श गुरु गोविन्द । एक के आदर्श का अनुसरण करने पर इस ससार को अनित्य
माया-ज्ञान कहकर इसकी अवज्ञा और अवहेलना करनी होती है और दूसरे
के आदर्श की प्राप्ति करने के लिए इस ससार को नित्य नये-नये रूपो मे सजाकर
पूजना होता है, युग-युग मे सृष्टि की उद्दाम प्रेरणा से उस संसार को तोड-फोडकर,
चूर-चूरकर फिर नये सिरे से गढकर खडा करना होता है। कभी ज्ञान के आलोक
मे जगत को उद्भासित करके, कभी खड्ग की धार से रक्त का स्रोत बहाकर,
पृथ्वी को रंगकर, कभी प्रेम के प्रवाह मे धरित्री सुन्दरी को स्नान करा के,
संसार के सौन्दर्य को अद्भुत कारीगरी के साथ विविध आभाओ मे अनेक रंगों
मे रंगीन, स्निग्ध और उज्ज्वल करके विस्मयकर बना डालना होता है ।
आदर्शों का यह सब द्वंद्व केवल वाक्चातुरी अथवा भाषा का द्वंद्व ही न था,
इस दल मे जिन्होने जिस आदर्श को श्रेष्ठ समझा, उन्होने उसी आदर्श के पीछे
सारा जीवन व्यतीत किया; इस प्रकार कितनो ने ही घर-बार छोड़कर सन्यास

180 / बन्दी जीवन

का आश्रय लिया और अनेकों ने तिल-तिल करके पूर्ण रूप से अपने परिवारवालों
और राज्याधिकारियों द्वारा अनेक कष्ट भोगते हुए जीवन के भोग-विलास को
तुच्छ समझकर विपत्ति के बीच ही जीवन बिता दिया। जो भी हो, विप्लवियों
ने वर्तमान काल में छात्र आदर्श को ही श्रेष्ठ आसन दिया था। इसी से इस
छात्र आदर्श का ही वे भारत के जनसाधारण में प्रचार करने का प्रयास करते
रहे।
इस प्रकार से विप्लवी लोग भारत के गरीब-से-गरीब जनसाधारण तक को
ही समझते थे, किन्तु किस प्रकार ये गरीब-से-गरीब जनसाधारण तक अपनी
अभिलाषाएँ व्यक्त करेंगे और किस प्रकार सचमुच ही इन जनसाधारण की
अभिलाषाएँ अक्षुण्ण रह सकेंगी, देश के समाज में धनी और निर्धनों के बीच,
जमींदारों और उनकी रैयत के बीच, धनी व्यवसायपतियों और कुली-मज़दूरों के
बीच, देशी और विदेशी व्यवसायपतियों के बीच परस्पर जो अनेक स्वार्थों के
द्वंद्व उपस्थित हो गए हैं, और इन विरुद्ध स्वार्थों के संघर्ष के कारण जगत् में जो
अनेक प्रकार की अशान्ति, अनेक प्रकार के वैषम्य, अनेक अत्याचारों, यन्त्रणाओं
और अनेक भीषण रक्तपातों की सृष्टि हो रही है, इन सब द्वंद्वों को कैसे सुलझाना
होगा, और यथार्थ विप्लवी होने पर राष्ट्र के समान समाज को भी चूर-चूर कर
नये सिरे से गढ़ना होगा, ये सब बातें भारत के विप्लवी लोग भली भाँति हृदयंगम
नहीं कर पाए, और इन सब समस्याओं की ओर ध्यान देते हुए भारत के भावी
राष्ट्र को सच ही किसी विशेष रूप में गढ़ना होगा, यह बात भी उन्होंने गम्भीर
चिन्तन के साथ नहीं सोची थी। वे सोचते थे कि ये सब बातें स्वाधीनता पाने
के बाद देखी जाएँगी। तो भी अधिकांश विप्लवियों का यही मत था कि भारत
की राष्ट्र-शासन-पद्धति की नींव गणतन्त्र के आदर्श पर ही स्थापित होगी। इस
व्यापार में अधिकांश विप्लवी राजा के लिए कोई स्थान नहीं रखते थे। अधिकांश
इसलिए कहता हूँ कि इनमें ऐसे भी कुछ व्यक्ति थे जो सोचते थे कि यदि भारत
के कोई स्वाधीन कहलानेवाले राजा भारत के इस स्वाधीनता समर में प्राण और
मन से योग दें तो उन्हें भारत का राज्यासन दिया जा सकता है, और उस दशा
में भारत का राष्ट्र संगठन इंग्लैंड की पार्लियामेंट के अनुसार गठित होगा।
महाराष्ट्र में 'अभिनव भारत' नामक गुप्त समिति की ओर से, 'Choose oh
Indian Princes," (अर्थात् भारत के राजाओ, अपना रास्ता चुन लो) शीर्षक
की एक छोटी-सी पुस्तिका का गुप्त रूप से प्रचार किया गया था, उसमें बड़ौदा
के राजा गायकवाड़ का स्पष्ट रूप से उल्लेख करके ही उपर्युक्त भाव का प्रचार
किया गया था। पंजाब के सिखों में से अनेकों की इच्छा थी कि भारत में फिर
खालसा राज्य स्थापित किया जाय। फिर विप्लवियों में से अधिकांश हिन्दू ही
थे, इसलिए उनके बीच किसी-किसी के दिल में यह इच्छा गुप्त रूप से थी कि
भारत के स्वाधीन होने के माने हिन्दू राज्य की पुनः स्थापना के होंगे। किन्तु
क्रमशः यह भाव बिलकुल लुप्त हो जाता है, और अन्त में यद्यपि वे मुख्यतः

विप्लव का प्रयास व्यर्थ क्यों हुआ ? / 181
हिन्दुओं के स्वावलम्बन के ऊपर ही भरोसा करके अपने कार्य में आगे बढ़ते थे,
तो भी स्वाधीन भारत की कल्पना में भारत की किसी भी जाति को उन्होंने
दूसरी जाति के अधीन कर रखने का संकल्प नहीं रखा, अर्थात् भारत की
स्वाधीनता के लिए भले ही हिन्दू मुख्यतः परिश्रम करें तो भी स्वाधीन भारत
में प्रत्येक जाति का समान अधिकार रहेगा अर्थात् प्रत्येक जाति का स्वार्थ
अक्षुण्ण रहेगा, यही था भारतीय विप्लवियों का राजनैतिक आदर्श ।
हमारे देश के प्रायः सभी लोग एक सुर मे कहते रहे हैं कि भारत का
विप्लव-प्रयास बिलकुल ही व्यर्थ हुआ है, और इस प्रकार उसका व्यर्थ होना ही
अवश्यम्भावी था । वे कहते हैं, वर्तमान युग में नवीन वैज्ञानिक उन्नति के कारण
किसी भी राजशक्ति के विरुद्ध कोई प्रजा सामरिक शक्ति की सहायता से विप्लव
नहीं कर सकती, और वे सोचते हैं, कि अंग्रेजों के समान शत्रु को सामरिक
शक्ति की सहायता से हराकर स्वाधीनता पाने की कल्पना करना भी निरा
पागलपन है, इसी से वे भारत के विप्लवियों को पागल और अविवेकी अथवा
निर्बोध समझते थे और समझते हैं।—अवश्य ही, इन सब समालोचकों की बाते
यदि सत्य हैं तो भारत को चिरकाल तक पराधीन ही रहना है, कारण कि पूर्ण
स्वाधीनता पाने का और कोई रास्ता भी ये समालोचक लोग दिखा नहीं सके,
और इस आधुनिक युग में भी रूस और जर्मनी के विप्लव दलों ने प्रबल राज-
शक्ति को हरा दिया है, यह बात न मानने का भी तो कोई चारा नहीं है; इसी
से यह कहना, जान पड़ता है, युक्तिसंगत न होगा कि वर्तमान युग में कोई भी
प्रजा शक्ति सुप्रतिष्ठित राज शक्ति को विप्लव के रास्ते से सामरिक शक्ति की
सहायता से हरा नहीं सकेगी, और भारत के विप्लव दल के साथ रूस और
जर्मन के विप्लव दलों की तुलना करने से एक बात विशेष रूप से हमारे ध्यान
में आती है कि जर्मन और रूसी विप्लवियों को अपने ही लोगों के विरुद्ध अस्त्र
धारण करने पड़े थे, परन्तु किसी विदेशी राज शक्ति के साथ लड़ाई हो तो सारे
स्वदेशवासियों की सहानुभूति और सहायता पाने की यथेष्ठ संभावना रहती है।
इसी से विदेशी राज शक्ति के विरुद्ध विप्लव करना सिविल वार (गृह युद्ध)
करने की अपेक्षा अनेक अंशों में सहज है । तो भी यह बात तो सच है कि भारत
का विप्लव प्रयास व्यर्थ हुआ और रूसियों और जर्मनों के विप्लव प्रयास सफल
हुए हैं। यह बात सच भले ही है, किन्तु इस व्यर्थता के कारण के विषय में ही तो
अनेकों के साथ मेरा मतभेद है, और यहाँ मैं इस कारण का ही अनुसंधान कर
रहा हूँ। भारतीयों को सचमुच विप्लव के पथ में जाना चाहिए कि नहीं, इसकी
मैं कोई आलोचना नहीं कर रहा हूँ, यहाँ पर तो केवल अपने विरुद्ध पक्षवालो
की प्रधान युक्ति का ही विश्लेषण कर दिखाने की तनिक-सी चेष्टा की है। एक
बात पाठक मन में रखें कि मैं अतीत की बातों की आलोचना कर रहा हूँ और
अतीत की आलोचना करना ही इतिहास लिखते समय ठीक है, इसी से भविष्य
में क्या होगा अथवा क्या होना उचित है यह मेरा आलोच्य विषय नहीं है। अस्तु,

182 / बन्दी जीवन
जो भी हो, जो हम कह रहे थे उसी पर फिर आ जाएँ, हम कह रहे थे कि भार-
तोयों का विप्लव प्रयास व्यर्थ क्यों हुआ ?
अनेक लोग कहते हैं कि उपयुक्त समय नही आया था इसी कारण भारतीयों
का विप्लव प्रयास व्यर्थ हुआ, अर्थात् विप्लव प्रयास को सफल करने के लिए जो
परिस्थिति अपेक्षित है वह परिस्थिति भारत में अब भी नही है, भारत के जन-
साधारण सचमुच विप्लव करना नही चाहते, इसीलिए विप्लव का प्रयास व्यर्थ
हुआ । भारतवासी सचमुच स्वाधीनता नही चाहते, पराधीनता की ज्वाला को
सच ही अनुभव नही करते, इसी से वे विप्लव पथ में अग्रसर नही होते; बहुतों के
मत मे विप्लवियों के असफल होने का यही सर्व-प्रधान कारण है ।
किन्तु भारतवासी सच ही स्वाधीनता नही चाहते, पराधीनता की ज्वाला
का अनुभव नही करते, यह तो मैं नही मानता, किन्तु उस स्वाधीनता को पाने
के लिए जिस त्याग, जिस वीरता की आवश्यकता होती है, भारतवासियों में उन
सब गुणो का एकदम अभाव है, यह बात न मानने का भी तो कोई चारा नही
है । किन्तु जो लोग यह कहते है कि देश के अशिक्षित जन साधारण (Mass) ने
इस विप्लवान्दोलन मे योग नही दिया इसी कारण विप्लव का प्रयास व्यर्थ हुआ
उनकी बात भी मुझे ठीक नही मालूम होती—कारण कि विप्लवियों ने कभी
किसी भी दिन प्रकट या गुप्त रूप से देश के किसानो अथवा कुली-मजदूरों को
इस विप्लवान्दोलन मे भाग लेने के लिए पुकारा ही नही, देश के शिक्षित लोगो ने
जब जिस रूप मे जन-साधारण (Mass) को पुकारा है, जन-साधारण ने अनेक
त्याग करके भी बहुधा इस पुकार का उत्तर दिया है । देश के शिक्षित लोग अपने
कर्तव्य को समझ लेने पर भी जो काम नही कर सकते, देश के अशिक्षित जन-
साधारण अनेक बार अपनी सहज बुद्धि से वह काम अनायास ही कर डालते है ।
अवश्य अशिक्षित जनता कर्तव्य की खातिर बहुत दिन तक त्याग अथवा कष्ट
स्वीकार नही कर सकती, इसी से अशिक्षित जनता के खयाल पर निर्भर करके
कोई भी बडा या स्थायी कार्य करना सम्भव नही ।
ओर जो लोग यह कहते है कि देश के अधिकांश लोग अशिक्षित हैं, इसीलिए
भी विप्लव का प्रयास सार्थक नही होता, और जब तक देश के अधिकांश लोग
शिक्षित नही होते, तब तक विप्लव का प्रयास व्यर्थ होगा ही, इनसे मै रूस का
दृष्टान्त दिखाकर कह सकता हूँ कि विप्लव प्रयास की सार्थकता अथवा व्यर्थता
देश के लोगो के लिखना-पढ़ना जानने न जानने पर निर्भर नही करती ।
तो फिर भारत का विप्लव प्रयास व्यर्थ क्यों हुआ ? किन्तु सच ही क्या
भारतीय विप्लवियों का इतना त्याग, इतना अद्भुत साहस सब एकदम व्यर्थ ही
हुआ है ? इन्होंने कितने ही कष्ट सहे, कितनी ही विषम विपत्तियों के बीच ऐसी
निष्ठा के साथ अविचलित रहे, कितनी ही दुर्घटनाओं के तीव्र आघात, कितने ही
विश्वासघातकों के निर्दय व्यवहार और कितनी ही पराजयों की मर्मपीड़ा सहकर
ऐसी दुर्दमनीय दृढ़ता के साथ वे बार-बार अपने संकल्प की साधना में अग्रसर

विप्लव का प्रयास व्यर्थ क्यों हुआ ? / 183
रहे, यह सब क्या सच ही एकदम व्यर्थ हो गया ! क्षात्र शक्ति के आदर्श ने क्या
देश में कुछ भी प्रतिष्ठा नहीं पाई ? मरने का डर क्या भारतवासियों के मन से
कुछ भी दूर नही हुआ ? देश के अन्यान्य प्रकाश्य आन्दोलनों पर विप्लव आन्दोलन
क्या किसी तरह का भी प्रभाव नही डाल पाया ? वर्ल्ड पॉलिटिक्स (विश्व की
राजनीति) पर, संसार के सभ्य देशों में क्या भारत का यह विप्लवान्दोलन कुछ
भी छाया नही डाल सका ? अथवा इस विप्लवान्दोलन के कारण भारत का
गौरव जगत् की सभा में कुछ भी नही बढ़ा ? इस सम्बन्ध में हार्वर्ड विश्वविद्यालय
के प्रोफेसर ऐसर लिखित 'पैन-जर्मनिजम', बर्न हार्डी कृत 'जर्मनी एण्ड दि नेक्स्ट
वार' इत्यादि ग्रन्थों की ओर ध्यान देने का पाठकों से अनुरोध करता हूँ—इससे
वे मेरी बात का तात्पर्य बहुत-कुछ हृदयंगम कर सकेंगे ।
बहुत लोग कहते हैं कि विप्लवियों के कार्यों के कारण मंगल की अपेक्षा
अमंगल ही अधिक हुआ, अंग्रेज सरकार को इन विप्लवियों के कारण ही प्रजा-
पीड़न का अधिक सुयोग मिल गया है, इसी से नित्य नये-नये कठोर-से-कठोर
क़ानूनों के सहारे भारत के वैध खुले आन्दोलनो मे भी अंग्रेज सरकार अनेक
प्रकार से बाधाएँ डाल पाई है। पर सच बात कहें तो वैध प्रकाश्य आन्दोलन का
दमन होने के बाद से ही विप्लव का कार्य-कलाप प्रकाशित होने लगा है, और
रोलट कमेटी की सिडीशन रिपोर्ट मे अग्रेजो ने कदाचित् अनजान मे ही इस
प्रकार सब विषयों की आलोचना की है जिससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि विप्लवियों
के प्रत्येक उद्योग के कारण ही बारी-बारी अंग्रेज़ों ने भारत को राजनैतिक
अधिकार दिए हैं।
यह बात भी अवश्य ही बहुत लोग स्वीकार करते हैं कि भारत को जो कुछ
सामान्य राजनैतिक अधिकार मिले है वे मुख्यतः भारत के इन दृढ़चित्त विप्लवियों
के प्रयास से ही मिले हैं।
खैर, जो भी हो, विप्लवियो ने जो चाहा था वह तो नही हो पाया ; विप्लवी
देश को स्वाधीन करना चाहते थे, सो वे कर नही सके, विप्लवियों की मुख्य चेष्टा
व्यर्थ हुई ।
मैं समझता हूँ, चिन्तनशील प्रतिभावान् उपयुक्त नेता का अभाव ही इस
व्यर्थता का सबसे बड़ा कारण था। रूस या जर्मनी के विप्लव दल के बीच ऐसे
बहुत व्यक्ति हैं या थे, जो संसार के श्रेष्ठ चिन्तनशील व्यक्तियों मे आसन पाने
योग्य थे, किन्तु भारतीय विप्लव दल में ऐसे कोई भी चिन्तनशील शक्तिमान्
व्यक्ति न थे जिन्हें ठीक थिंकर (विचारक) कहा जा सके, इसी से भारतीय
विप्लव दल अपना प्रचार-कार्य, कहना चाहिए, कुछ भी नही कर पाया और
इसीलिए इस विप्लव दल का प्रभाव वैसा नही दिखाई दिया जैसा होना चाहिए
था। यह भले ही सच है कि भारत के इस विप्लववाद के अन्दर विवेकानन्द का
ज्वलन्त आदर्श वर्तमान था और भारतीय विप्लवियों में से अधिकांश इसी महा-
पुरुष की प्रेरणा से अनुप्राणित थे किन्तु विवेकानन्द के समान कोई भी प्रतिभा-

184 / बन्दी जीवन
सम्पन्न व्यक्ति साक्षात् रूप से इस विप्लव दल में न थे। श्री अरविन्द घोष और
लाला हरदयाल यदि अन्त तक इस दल में रहते तो जान पड़ता है, कि विप्लव
दल का यह दैन्य बहुत कुछ दूर हो जाता, किन्तु वे भी अन्त में इस दल को छोड़
गए। इन्हीं अरविन्द के प्रसंग में मेरे एक परिचित व्यक्ति मुझसे एक प्रसिद्ध
कविता के कुछ एक पद कहा करते थे, यहाँ उन्हें उद्धृत करने का लोभ नही रोक
सकता हूँ—
He is gone to the mountain
And he is lost to the forest;
The spring is dried in the fountian.
When the need was the sosest.
इस प्रकार के चिन्तनशील प्रतिभावान् पुरुषों की बात छोड़ भी दें, तो इस
विप्लव दल में किसी बड़े साहित्यिक, किसी बड़े समाचार पत्रों के लेखक अथवा
किसी बड़े कवि ने भी योग नही दिया। एक तरह से कह सकते हैं, कि इस विप्लव
दल में इण्टलैकचुअल्स (intellectuals) नहीं थे और इस प्रकार के लोगों का
विशेष अभाव था, इसी कारण यह विप्लव दल प्रचार कार्य की ओर प्रायः
उदासीन ही रहा। जो कुछ गुप्त पत्रिकाएँ आदि बीच-बीच में प्रचारित होती
थीं, वे केवल सामयिक उत्तेजनापूर्ण प्रतिहिंसा के उच्छ्वास से भरी होती थी, इन
सब लेखों में विचारशीलता का कोई भी परिचय नहीं पाया जाता, जीवन का
कोई नया आदर्श इनसे प्रकट नही होता। भारत के साहित्य में इनका कोई स्थान
नहीं रहेगा, इसमें कोई सन्देह नहीं। भारतीय विप्लवी किसी स्थायी साहित्य की
सृष्टि नहीं करसके। इस प्रकार विप्लव दल का प्रयास व्यर्थ होना ही था। — तो
भी विप्लवान्दोलन के इस प्रथम युग में वारीन्द्र और उपेन्द्र द्वारा परिचालित
'युगान्तर' पत्रिका ने इस तरफ बहुत काम किया था। इस युगान्तर पत्रिका का
अद्भुत प्रभाव आज भी हम देखते हैं। इसी से वारीन्द्र एक दिन गर्व के साथ
अण्डमन में कहते थे, "जो पथ मैं एक बार दिखा आया हूँ, बंगाल आज भी उसी
एक पथ का अनुसरण किए चलता है, कोई भी नया पथ निकालने की और
किसी ने क्षमता न दिखाई; छिः!"
इसके सिवाय यह विप्लव दल प्रकाश्य रूप से अपनी कोई भी कार्यधारा नहीं
चला सका। इस विप्लव दल में ऐसे कोई भी नेता न थे जो प्रकाश्य आन्दोलन
में भाग लेकर तिलक अथवा गांधी के समान मर्यादा के अधिकारी हो सकते।
इसी से यह विप्लवान्दोलन जन-साधारण से क्रमशः अलग होकर एक संकीर्ण
दायरे की सीमा में बन्द हो जाता है। इस प्रकार प्रकाश्य आन्दोलन के नेता न
हो सकने पर देश की अशिक्षित जनता को अपने आदर्श की ओर नहीं लाया जा
सकता, यह बात भी विप्लव दल के नेता लोग शायद भली भाँति नहीं समझ
सके, या शायद उनके बीच ऐसे उपयुक्त आदमियों का अभाव था इसी कारण
वे बाध्य होकर इस विषय में उदासीन रहे। विप्लव दल में उपयुक्त नेता का

विप्लव का प्रयास व्यर्थ क्यों हुआ ? / 185

अभाव होने से ही भारत के दूसरे राजनैतिक दलों के नेता अनेक बार इस
विप्लव दल को अनेक प्रकार से एक्सप्लायट करते (ठगते) रहे हैं। जो हो,
उससे देश की कोई विशेष क्षति तो भले ही नही हुई, किन्तु विप्लव दल की
दीनता उससे विशेष रूप से प्रकट होती है।
इसके अलावा और जिन सब कारणों से यह विप्लव का प्रयास व्यर्थ
हुआ उनका, 'बन्दी जीवन' मे अनेक जगह प्रसंगानुसार उल्लेख कर आए हैं, यहाँ
उन सब बातों को दुहराने की आवश्यकता नहीं।
किन्तु इस विप्लवान्दोलन के विफल होने के बाद भारत के अनेक विप्लवियो
ने अच्छे कृतित्व का परिचय दिया है। जिन सब गुमनाम युवकों को यहाँ कोई
पूछता भी न था, यहाँ तक कि विप्लव दल में भी जो नेतृत्व नहीं पा सके; देश के
लोग जिन्हें अर्धशिक्षित या साधारण रूप से [शिक्षित कहते थे, विदेश के कार्यक्षेत्र
में उन्हीं युवकों की अनेक प्रकार से अपनी शक्ति का पारचय देने की कहानियाँ
सुनी जाती हैं। सभ्य जगत् मे आज उनका स्थान हमारे देश के विख्यात
नेताओं की अपेक्षा अधिक भले ही न हो, कम नहीं है। लाजपत के समान
नेताओं की अपेक्षा भी इस विप्लव दल के नेताओं ने विदेश में अधिक सम्मान
पाया है, यह बात भी सुनने मे आई है। ऐसा होने का कारण है, इन युवकों ने
संसार के श्रेष्ठ नेताओं के संस्पर्श में आने पर अथवा विदेश की स्वाधीन आबहवा
के संस्पर्श में आने पर देखा है कि उनका वही पुराना गुप्त संकीर्ण पथ ही एक
मात्र पथ नहीं है, और उन्होंने जब नये मार्गों में कदम रखा, तब वह अन्दर की
प्रसुप्त शक्ति अवसर और सुयोग पाकर पूर्ण रूप से विकास पा उठी।
इन सब विदेश-प्रवासी विप्लवियों के जीवन से यह भी जाना जाता है कि
विप्लव दल मे सच ही ऐसे अनेक गुमनाम युवक थे जिनके विषय में हमारे देश-
वासी शायद अब भी कुछ विशेष नहीं जानते –और जो अवकाश और सुयोग
पाने पर शायद एक दिन संसार के श्रेष्ठ विचारकों के साथ एक आसन पर बैठने
लायक हो सकते हैं। पुस्तक पढ़ने या परीक्षाएँ पास करने से ही तो विचारशील
नही हुआ जाता, पुस्तक पढ़ना एक बात है और विचारक (Thinker) होना
दूसरी बात। जगत् के एक श्रेष्ठ विचारक मनीषी हर्बर्ट स्पेन्सर तो मातृभाषा
और फ्रामीसी भाषा के सिवाय और कोई भी भाषा न जानते थे, और ऐसे अनेक
पण्डित हैं जो बहुत भाषाओं के सचमुच पण्डित हैं, किन्तु वे तो हर्बर्ट स्पेन्सर के
समान नहीं हैं। हमारे देश में अनेक लोग थे जो विवेकानन्द की अपेक्षा अधिक
पण्डित थे, किन्तु विवेकानन्द के समान विचारक और कितने हुए हैं? जगत् के
अनेक विचारशील कवियों और दार्शनिकों की जीवन-कथा देखने से यह बात
समझी जा सकती है कि पाण्डित्य और विचारशीलता एक वस्तु नहीं।
'पेड़ जैसे नहीं जानता कि कब उसके फूल फूट निकलेंगे, पक्षी, जैसे नही
जानता कि ठीक कब उसे गाना गाने की चाह होगी। प्राणों की समूची शक्ति में
से उनका उद्यम जागता है, इसलिए उन्हें जैसे सोच-विचार कर इरादा नहीं

186 / बन्दी जीवन
बनाना पड़ता।' उसी प्रकार जो विचारशील हैं, भावुक हैं, जो सचमुच ही
प्रतिभावान् थिंकर्स (विचारक) हैं वे पण्डित हुए बिना भी पोथी पढ़ने या परीक्षाएँ
पास करने में वैसी योग्यता दिखाए बिना भी संसार के अनेक अद्भुत विस्मय-
जनक रहस्यों की घोषणा कर सकते हैं।
विप्लवियों के कार्यकलाप को बहुत लोग पागलपन कहते हैं। वे कहते हैं,
दिमाग़ में कुछ खराबी हुए बिना कोई विप्लव दल में योग नहीं दे सकता।—
विप्लवियों के अन्दर सुनते हैं, सुबुद्धि का—अक्लमन्दी का विशेष अभाव है—
किन्तु रविबाबू ने कहा है,—'सुबुद्धि नाम का पदार्थ मर्त्यलोक में पाया जाता है,
किन्तु ऊँचे दर्जे का जो खालिस पागलपन है वह देवलोक की वस्तु है। इसी से
जान पड़ता है कि सुबुद्धि की गढ़ी हुई चीजें टूट-फूट पड़ती हैं। और पागलपन
जिन चीजों को उड़ाकर लाता है वे बीज की तरह जंगलों के जंगल उगा डालती
हैं।'

तृतीय खंड
सन् 1920 के बाद उत्तर भारत में विप्लववादी आन्दोलन

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1
रिहाई की सूचना
वह दिन आज भी मुझे खूब याद है। जाड़े का मौसम था, और था सन्
1920 का फरवरी महीना। मैं सेल्यूलर जेल के अस्पताल मेंबीमार पड़ा था। एक
क़ैदी-अफ़सर ने आकर मुझे इत्तिला दी कि जेलर साहब आपको दफ्तर में बुला
रहे हैं। सुनते ही सिर से पैर तक आग लग गई। फिर वही बात, फिर वही
दृश्य, फिर वही झगडे की नौबत दिखाई देने लगी। क्योंकि पोर्ट ब्लेयर की सेल्यूलर
जेल में प्रायः ऐसा हुआ करता था कि जेल के अधिकारीगण, क़ैदी-अफ़सर
से लेकर जेलर और सुपरिटेण्डेण्ट तक, वहाँ के राजनैतिक बन्दियों को मौका-
बेमौका, जायज-नाजायज तरीकों से तंग करना चाहते थे। और ऐसे अवसरों
पर जेल के अधिकारीगणों के साथ राजबन्दियों का खूब झगड़ा हो जाता था।
कभी-कभी इन झगड़ो के परिणाम में राजबन्दियों की मृत्यु तक हो गई है। ये
सब बातें अण्डमन के जेल-जीवन के अन्तर्गत आती हैं। लेकिन ये सब बातें किसी
दूसरे स्थान पर लिखने की इच्छा है। यहाँ इतना ही कह देना पर्याप्त है कि मेरे
समय में, और मेरे अण्डमन जाने के पहले भी, उच्च पदस्थ राजकर्मचारियों की
प्रेरणा से ही अण्डमन के जेल अधिकारी राजबन्दियों से इस प्रकार कठोर व्यव-
हार करते थे। इसलिए जब उस क़ैदी अफ़सर ने आकर मुझे जेलर साहब का
हुक्म सुनाया और यह कहा कि जेलर साहब आपको दफ्तर में बुला रहे हैं तो मेरे
मन में स्वतः ही एक विरोध की भावना पैदा हो गई कि मैं तो अस्पताल की
चारपाई पर बीमार पड़ा हूँ फिर भी, इस हालत में भी, जेलर साहब मुझे दफ्तर
में बुला रहे है। फ़ौरन ही मुझे यह ख्याल हुआ कि मुझे अपमानित और तंग
करने के लिए ही जेलर ने ऐसा हुक्म दिया है। यदि मैं नहीं जाता हूँ तो जेलर से
झगडा होता है, और यदि जाता हूँ तो मेरा अपमान होता है; और यदि झगड़े
को बचाने के लिए मैं इस अपमान को भी सह लेता हूँ तो मैं अपने मित्रों की दृष्टि
में गिर जाता हूँ। क्षण-भर के लिए इन सब भावनाओं ने मेरे मन में एक कठिन
समस्या पैदा कर दी। लेकिन उसी क्षण मैंने इन समस्याओं की मीमांसा भी कर
ली। मैंने उस क़ैदी अफ़सर से कहा कि मैं बहुत कमजोर हूँ दफ्तर नहीं जा

190 / बन्दी जीवन
सकता । वह क़ैदी चला गया, लेकिन थोड़ी ही देर में फिर वापस आया और कहा
कि बहुत जरूरी काम है, जेलर साहब आपको दफ्तर में ही बुला रहे हैं। यह सुन-
कर मुझे बड़ी चिन्ता हुई । तरह-तरह के खयाल दौड़ने लगे; कहीं ऐसा तो नहीं
हुआ कि कोई मेरी लिखी हुई गुप्त चिट्ठी पकड़ा गई हो या कोई नया झगड़ा तो
नहीं खड़ा हो गया । बात क्या है कि मैं अस्पताल में बीमार पड़ा हूँ फिर भी
दफ्तर में ही बुलाने पर इस क़दर ज़ोर है। लेकिन मुझे ज्यादा सोचने का मौका
न था । उस दिन मुझे बुखार न था, और न मैं इतना कमजोर ही था कि दफ्तर
तक जा न सकता। ऐसे अवसरों पर घर में तो यह सवाल ही नहीं पैदा होता कि
आवश्यकता पड़ने पर बिस्तर से उठकर किसी से मिलने जाएँ या न जाएँ। यहाँ
तो आत्म-सम्मान का सवाल था। असली बात तो यह थी कि एक राजबन्दी को
बीमार अवस्था में कैसे कोई जेलर दफ्तर बुला सकता है।' अब तो झगड़े की
नौबत साफ नज़र आई, परन्तु मैंने सोचकर निश्चित किया कि झगड़ा नही करना
चाहिए। क्योंकि अभी थोड़े ही दिन पहले काफ़ी झगड़ा हो चुका था। अतः मैं
जितना दुर्बल था उससे कही अधिक दुर्बल बनकर धीरे-धीरे जेलर के दफ्तर
की ओर चल पड़ा । जब जेलर के सामने पहुँचा तो उसने बड़ी प्रसन्नतापूर्वक
दोस्ताने के तौर पर आदर के साथ अपनी कुर्सी के पास एक बेंच पर बैठने को कहा !
मैं तो एक तूफान का इन्तज़ार कर रहा था। यह दृश्य देखकर कुछ चकित्-सा
रह गया । और अभी बैठा भी न था कि जेलर एकाएक कहने लगा, “Cheer up
man, you are released”—‘‘क्या सुस्त हो यार मौज करो, अब तो तुम छूट
गए।” मुझे इस अवसर पर यह संवाद सुनने की आशा न थी यद्यपि मुझे यह
दृढ़ विश्वास था कि थोड़े ही दिनों के अन्दर छूट अवश्य जाऊँगा । 18 अगस्त
सन् 1916 को मैं कालेपानी पहुँचा था। उस दिन से ही मैं सदा यह कहा करता
था कि अपने अट्ठाइसवें साल की अवस्था में मैं अवश्य छूट जाऊँगा । ऐसी
कोई शक्ति नही है जो उस निश्चित समय के बाद भी मुझे जेल में रख सके ।
उस समय कालेपानी में कोई ऐसा राजबन्दी न था जो इस बात को न जानता
हो और जिसने इस बात को लेकर मेरी हँसी न उड़ाई हो । मेरे इस दृढ़
विश्वास के मूल में भृगुसंहिता की एक भविष्यवाणी थी जिसके बारे में अन्य स्थान
पर कुछ लिखूँगा। महायुद्ध शान्त हो जाने के बाद जब मामूली क़ैदियों को तो
बहुत-कुछ माफ़ी दे दी गई थी और राजबन्दियों में से कुछ से यह कहा गया था
कि साल पीछे एक महीने की माफ़ी तुम लोगों की क़ैद में की गई, तब तो अवश्य
मेरे मन में कुछ नाउम्मीदी-सी आ गई थी। इस अवस्था में जेलर ने मुझे मुक्ति
का संवाद सुनाया। लेकिन यह संवाद सुनकर मेरे मन में कुछ विशेष उल्लास
नहीं पैदा हुआ क्योंकि मुझे कुछ ऐसा प्रतीत हुआ कि छूटना तो मुझे था ही, जो
अवश्य होना था वही तो हुआ मानो यह कोई असाधारण बात न थी। इसलिए
मैंने बहुत शान्तिपूर्वक अपनी मुक्ति का संवाद सुना। मेरे इस अस्वाभाविक
शान्त भाव को देखकर जेलर ने कहा, “What is the matter with you

रिहाई की सूचना / 191
young man ? It seems you do not want to go home. Cheer-up
man you are released"—"अरे ! तुम्हें हो क्या गया है ? मालूम पड़ता
हैं कि तुम घर नहीं जाना चाहते । बात क्या है ? तुम खुश क्यों नहीं हो रहे हो ?
मौज करो, अब तो तुम छूट गए।" मैं मुस्कराने लगा । मैं अपने स्थान पर वापस
चला आया । धीरे-धीरे मुक्ति पाने का उल्लास मेरे मन में बढ़ता गया । अस्प-
ताल में जिस जगह मैं रहता था उसके नीचे ही एक नम्बर की बैरक का आँगन
था । इस आँगन में वीरेन्द्र, उपेन्द्र, हेमचन्द्र इत्यादि प्रसिद्ध पुराने क्रान्तिकारी
स्वयं अपना भोजन बनाया करते थे । भारतवर्ष में जो सर्वप्रथम क्रान्तिकारी
षड्यन्त्र का मुकदमा चला था उसी मानिकतल्ला बम केस में इन सबने
आजीवन कालेपानी की सजा पाई थी । कुछ दिन अण्डमन में रहने के बाद मुसी-
बत उठाते-उठाते ये लोग दुर्बल चित्त हो गए थे । मेरे सामने कालेपानी मे राज-
बन्दियों के माथ जेल-अधिकारियों के जितने संघर्ष हुए और उसके परिणामतः
जितनी भूख-हड़तालें एवं काम बन्द रखने की हड़तालें हुईं उनमें से किसी में भी
इन लोगों ने किसी प्रकार का भाग नहीं लिया था, बल्कि मेरी नज़रों मे ये
लोग जेल-अधिकारियों के विश्वासपात्र बन गये थे । इनकी धारणा थी कि
इन सब हड़तालो में भाग न लेने से एवं जेल-अधिकारियों के पक्ष मे रहने से
सम्भव है, छूटने में बहुत-कुछ सहायता मिले । इसलिए इन लोगों ने अन्य
राजबन्दियों के विरुद्ध जाकर हमेशा जेल-अधिकारियों का ही पक्ष लिया था ।
इन सब बानो से राजत्रन्दियों की श्रद्धा इनकी तरफ से हट गई थी । इधर
ये लोग भी यह ममझते थे कि जेल-अधिकारियों से हमेशा संघर्ष करने का
परिणाम क्या होता है । यह इन दूमरे राजबन्दियों को तभी मालूम पडेगा ऐन
वक़्त पर, जब उनकी रिहाई के प्रश्न पर विचार करने का अवसर आएगा ।
परन्तु मैने तो जिस दिन मे कालेपानी मे कदम रखा था, उमी दिन से लेकर
मुक्ति पाने के दिन तक हमेशा जेल-अधिकारियों के खिलाफ़ राजबन्दियों का
पक्ष ही अपनी सामर्थ्य के अनुसार ग्रहण किया था। इसलिए जब मुक्ति का
आनन्दप्रद समाचार मुझे मिला तो मेरे दिल में सर्वप्रथम यही इच्छा हुई कि इन
दूरदेश सावधान राजबन्दियों को जाकर अपनी मुक्ति की बात सुनाऊँ और यह
समझा दूँ कि राजनीति के मार्ग में दूरदेश और सावधान रहने से ही हमेशा लाभ
नहीं होता है । मन में यही भाव भरे हुए, जेलर के पास से लौटकर मैं सीधा
बरामदे में आकर खड़ा हो गया और उपेन्द्रनाथ को बुलाकर अपनी मुक्ति की
बात सुनाई । उपेन्द्रनाथ आए, मेरी बात सुनी, मुझे बधाई दी या न दी, मुस्कुरा-
राहट की रेखा चेहरे पर आई भी न थी कि उन्होंने सिर नीचा कर लिया और
मुँह लटकाकर वापम लौट गए । मैं अपनी चारपाई पर लौट आया । आज साढ़े
अठारह वर्ष के बाद मुझे यह याद नहीं है कि चारपाई पर आकर मैंने क्या सोचा
और उस समय मेरे दिल पर क्या गुजरी । इतना अवश्य याद है कि मैं मुक्ति
का संवाद पाकर चंचल नहीं हुआ था । केवल एक भावना सर्वोपरि मुझे विकल