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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 192, कुल 408 में से

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पृष्ठ 192

190 / बन्दी जीवन
सकता । वह क़ैदी चला गया, लेकिन थोड़ी ही देर में फिर वापस आया और कहा
कि बहुत जरूरी काम है, जेलर साहब आपको दफ्तर में ही बुला रहे हैं। यह सुन-
कर मुझे बड़ी चिन्ता हुई । तरह-तरह के खयाल दौड़ने लगे; कहीं ऐसा तो नहीं
हुआ कि कोई मेरी लिखी हुई गुप्त चिट्ठी पकड़ा गई हो या कोई नया झगड़ा तो
नहीं खड़ा हो गया । बात क्या है कि मैं अस्पताल में बीमार पड़ा हूँ फिर भी
दफ्तर में ही बुलाने पर इस क़दर ज़ोर है। लेकिन मुझे ज्यादा सोचने का मौका
न था । उस दिन मुझे बुखार न था, और न मैं इतना कमजोर ही था कि दफ्तर
तक जा न सकता। ऐसे अवसरों पर घर में तो यह सवाल ही नहीं पैदा होता कि
आवश्यकता पड़ने पर बिस्तर से उठकर किसी से मिलने जाएँ या न जाएँ। यहाँ
तो आत्म-सम्मान का सवाल था। असली बात तो यह थी कि एक राजबन्दी को
बीमार अवस्था में कैसे कोई जेलर दफ्तर बुला सकता है।' अब तो झगड़े की
नौबत साफ नज़र आई, परन्तु मैंने सोचकर निश्चित किया कि झगड़ा नही करना
चाहिए। क्योंकि अभी थोड़े ही दिन पहले काफ़ी झगड़ा हो चुका था। अतः मैं
जितना दुर्बल था उससे कही अधिक दुर्बल बनकर धीरे-धीरे जेलर के दफ्तर
की ओर चल पड़ा । जब जेलर के सामने पहुँचा तो उसने बड़ी प्रसन्नतापूर्वक
दोस्ताने के तौर पर आदर के साथ अपनी कुर्सी के पास एक बेंच पर बैठने को कहा !
मैं तो एक तूफान का इन्तज़ार कर रहा था। यह दृश्य देखकर कुछ चकित्-सा
रह गया । और अभी बैठा भी न था कि जेलर एकाएक कहने लगा, “Cheer up
man, you are released”—‘‘क्या सुस्त हो यार मौज करो, अब तो तुम छूट
गए।” मुझे इस अवसर पर यह संवाद सुनने की आशा न थी यद्यपि मुझे यह
दृढ़ विश्वास था कि थोड़े ही दिनों के अन्दर छूट अवश्य जाऊँगा । 18 अगस्त
सन् 1916 को मैं कालेपानी पहुँचा था। उस दिन से ही मैं सदा यह कहा करता
था कि अपने अट्ठाइसवें साल की अवस्था में मैं अवश्य छूट जाऊँगा । ऐसी
कोई शक्ति नही है जो उस निश्चित समय के बाद भी मुझे जेल में रख सके ।
उस समय कालेपानी में कोई ऐसा राजबन्दी न था जो इस बात को न जानता
हो और जिसने इस बात को लेकर मेरी हँसी न उड़ाई हो । मेरे इस दृढ़
विश्वास के मूल में भृगुसंहिता की एक भविष्यवाणी थी जिसके बारे में अन्य स्थान
पर कुछ लिखूँगा। महायुद्ध शान्त हो जाने के बाद जब मामूली क़ैदियों को तो
बहुत-कुछ माफ़ी दे दी गई थी और राजबन्दियों में से कुछ से यह कहा गया था
कि साल पीछे एक महीने की माफ़ी तुम लोगों की क़ैद में की गई, तब तो अवश्य
मेरे मन में कुछ नाउम्मीदी-सी आ गई थी। इस अवस्था में जेलर ने मुझे मुक्ति
का संवाद सुनाया। लेकिन यह संवाद सुनकर मेरे मन में कुछ विशेष उल्लास
नहीं पैदा हुआ क्योंकि मुझे कुछ ऐसा प्रतीत हुआ कि छूटना तो मुझे था ही, जो
अवश्य होना था वही तो हुआ मानो यह कोई असाधारण बात न थी। इसलिए
मैंने बहुत शान्तिपूर्वक अपनी मुक्ति का संवाद सुना। मेरे इस अस्वाभाविक
शान्त भाव को देखकर जेलर ने कहा, “What is the matter with you