बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरिहाई की सूचना / 191
young man ? It seems you do not want to go home. Cheer-up
man you are released"—"अरे ! तुम्हें हो क्या गया है ? मालूम पड़ता
हैं कि तुम घर नहीं जाना चाहते । बात क्या है ? तुम खुश क्यों नहीं हो रहे हो ?
मौज करो, अब तो तुम छूट गए।" मैं मुस्कराने लगा । मैं अपने स्थान पर वापस
चला आया । धीरे-धीरे मुक्ति पाने का उल्लास मेरे मन में बढ़ता गया । अस्प-
ताल में जिस जगह मैं रहता था उसके नीचे ही एक नम्बर की बैरक का आँगन
था । इस आँगन में वीरेन्द्र, उपेन्द्र, हेमचन्द्र इत्यादि प्रसिद्ध पुराने क्रान्तिकारी
स्वयं अपना भोजन बनाया करते थे । भारतवर्ष में जो सर्वप्रथम क्रान्तिकारी
षड्यन्त्र का मुकदमा चला था उसी मानिकतल्ला बम केस में इन सबने
आजीवन कालेपानी की सजा पाई थी । कुछ दिन अण्डमन में रहने के बाद मुसी-
बत उठाते-उठाते ये लोग दुर्बल चित्त हो गए थे । मेरे सामने कालेपानी मे राज-
बन्दियों के माथ जेल-अधिकारियों के जितने संघर्ष हुए और उसके परिणामतः
जितनी भूख-हड़तालें एवं काम बन्द रखने की हड़तालें हुईं उनमें से किसी में भी
इन लोगों ने किसी प्रकार का भाग नहीं लिया था, बल्कि मेरी नज़रों मे ये
लोग जेल-अधिकारियों के विश्वासपात्र बन गये थे । इनकी धारणा थी कि
इन सब हड़तालो में भाग न लेने से एवं जेल-अधिकारियों के पक्ष मे रहने से
सम्भव है, छूटने में बहुत-कुछ सहायता मिले । इसलिए इन लोगों ने अन्य
राजबन्दियों के विरुद्ध जाकर हमेशा जेल-अधिकारियों का ही पक्ष लिया था ।
इन सब बानो से राजत्रन्दियों की श्रद्धा इनकी तरफ से हट गई थी । इधर
ये लोग भी यह ममझते थे कि जेल-अधिकारियों से हमेशा संघर्ष करने का
परिणाम क्या होता है । यह इन दूमरे राजबन्दियों को तभी मालूम पडेगा ऐन
वक़्त पर, जब उनकी रिहाई के प्रश्न पर विचार करने का अवसर आएगा ।
परन्तु मैने तो जिस दिन मे कालेपानी मे कदम रखा था, उमी दिन से लेकर
मुक्ति पाने के दिन तक हमेशा जेल-अधिकारियों के खिलाफ़ राजबन्दियों का
पक्ष ही अपनी सामर्थ्य के अनुसार ग्रहण किया था। इसलिए जब मुक्ति का
आनन्दप्रद समाचार मुझे मिला तो मेरे दिल में सर्वप्रथम यही इच्छा हुई कि इन
दूरदेश सावधान राजबन्दियों को जाकर अपनी मुक्ति की बात सुनाऊँ और यह
समझा दूँ कि राजनीति के मार्ग में दूरदेश और सावधान रहने से ही हमेशा लाभ
नहीं होता है । मन में यही भाव भरे हुए, जेलर के पास से लौटकर मैं सीधा
बरामदे में आकर खड़ा हो गया और उपेन्द्रनाथ को बुलाकर अपनी मुक्ति की
बात सुनाई । उपेन्द्रनाथ आए, मेरी बात सुनी, मुझे बधाई दी या न दी, मुस्कुरा-
राहट की रेखा चेहरे पर आई भी न थी कि उन्होंने सिर नीचा कर लिया और
मुँह लटकाकर वापम लौट गए । मैं अपनी चारपाई पर लौट आया । आज साढ़े
अठारह वर्ष के बाद मुझे यह याद नहीं है कि चारपाई पर आकर मैंने क्या सोचा
और उस समय मेरे दिल पर क्या गुजरी । इतना अवश्य याद है कि मैं मुक्ति
का संवाद पाकर चंचल नहीं हुआ था । केवल एक भावना सर्वोपरि मुझे विकल