बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविप्लव का प्रयास व्यर्थ क्यों हुआ ? / 185
अभाव होने से ही भारत के दूसरे राजनैतिक दलों के नेता अनेक बार इस
विप्लव दल को अनेक प्रकार से एक्सप्लायट करते (ठगते) रहे हैं। जो हो,
उससे देश की कोई विशेष क्षति तो भले ही नही हुई, किन्तु विप्लव दल की
दीनता उससे विशेष रूप से प्रकट होती है।
इसके अलावा और जिन सब कारणों से यह विप्लव का प्रयास व्यर्थ
हुआ उनका, 'बन्दी जीवन' मे अनेक जगह प्रसंगानुसार उल्लेख कर आए हैं, यहाँ
उन सब बातों को दुहराने की आवश्यकता नहीं।
किन्तु इस विप्लवान्दोलन के विफल होने के बाद भारत के अनेक विप्लवियो
ने अच्छे कृतित्व का परिचय दिया है। जिन सब गुमनाम युवकों को यहाँ कोई
पूछता भी न था, यहाँ तक कि विप्लव दल में भी जो नेतृत्व नहीं पा सके; देश के
लोग जिन्हें अर्धशिक्षित या साधारण रूप से [शिक्षित कहते थे, विदेश के कार्यक्षेत्र
में उन्हीं युवकों की अनेक प्रकार से अपनी शक्ति का पारचय देने की कहानियाँ
सुनी जाती हैं। सभ्य जगत् मे आज उनका स्थान हमारे देश के विख्यात
नेताओं की अपेक्षा अधिक भले ही न हो, कम नहीं है। लाजपत के समान
नेताओं की अपेक्षा भी इस विप्लव दल के नेताओं ने विदेश में अधिक सम्मान
पाया है, यह बात भी सुनने मे आई है। ऐसा होने का कारण है, इन युवकों ने
संसार के श्रेष्ठ नेताओं के संस्पर्श में आने पर अथवा विदेश की स्वाधीन आबहवा
के संस्पर्श में आने पर देखा है कि उनका वही पुराना गुप्त संकीर्ण पथ ही एक
मात्र पथ नहीं है, और उन्होंने जब नये मार्गों में कदम रखा, तब वह अन्दर की
प्रसुप्त शक्ति अवसर और सुयोग पाकर पूर्ण रूप से विकास पा उठी।
इन सब विदेश-प्रवासी विप्लवियों के जीवन से यह भी जाना जाता है कि
विप्लव दल मे सच ही ऐसे अनेक गुमनाम युवक थे जिनके विषय में हमारे देश-
वासी शायद अब भी कुछ विशेष नहीं जानते –और जो अवकाश और सुयोग
पाने पर शायद एक दिन संसार के श्रेष्ठ विचारकों के साथ एक आसन पर बैठने
लायक हो सकते हैं। पुस्तक पढ़ने या परीक्षाएँ पास करने से ही तो विचारशील
नही हुआ जाता, पुस्तक पढ़ना एक बात है और विचारक (Thinker) होना
दूसरी बात। जगत् के एक श्रेष्ठ विचारक मनीषी हर्बर्ट स्पेन्सर तो मातृभाषा
और फ्रामीसी भाषा के सिवाय और कोई भी भाषा न जानते थे, और ऐसे अनेक
पण्डित हैं जो बहुत भाषाओं के सचमुच पण्डित हैं, किन्तु वे तो हर्बर्ट स्पेन्सर के
समान नहीं हैं। हमारे देश में अनेक लोग थे जो विवेकानन्द की अपेक्षा अधिक
पण्डित थे, किन्तु विवेकानन्द के समान विचारक और कितने हुए हैं? जगत् के
अनेक विचारशील कवियों और दार्शनिकों की जीवन-कथा देखने से यह बात
समझी जा सकती है कि पाण्डित्य और विचारशीलता एक वस्तु नहीं।
'पेड़ जैसे नहीं जानता कि कब उसके फूल फूट निकलेंगे, पक्षी, जैसे नही
जानता कि ठीक कब उसे गाना गाने की चाह होगी। प्राणों की समूची शक्ति में
से उनका उद्यम जागता है, इसलिए उन्हें जैसे सोच-विचार कर इरादा नहीं