बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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सम्पन्न व्यक्ति साक्षात् रूप से इस विप्लव दल में न थे। श्री अरविन्द घोष और
लाला हरदयाल यदि अन्त तक इस दल में रहते तो जान पड़ता है, कि विप्लव
दल का यह दैन्य बहुत कुछ दूर हो जाता, किन्तु वे भी अन्त में इस दल को छोड़
गए। इन्हीं अरविन्द के प्रसंग में मेरे एक परिचित व्यक्ति मुझसे एक प्रसिद्ध
कविता के कुछ एक पद कहा करते थे, यहाँ उन्हें उद्धृत करने का लोभ नही रोक
सकता हूँ—
He is gone to the mountain
And he is lost to the forest;
The spring is dried in the fountian.
When the need was the sosest.
इस प्रकार के चिन्तनशील प्रतिभावान् पुरुषों की बात छोड़ भी दें, तो इस
विप्लव दल में किसी बड़े साहित्यिक, किसी बड़े समाचार पत्रों के लेखक अथवा
किसी बड़े कवि ने भी योग नही दिया। एक तरह से कह सकते हैं, कि इस विप्लव
दल में इण्टलैकचुअल्स (intellectuals) नहीं थे और इस प्रकार के लोगों का
विशेष अभाव था, इसी कारण यह विप्लव दल प्रचार कार्य की ओर प्रायः
उदासीन ही रहा। जो कुछ गुप्त पत्रिकाएँ आदि बीच-बीच में प्रचारित होती
थीं, वे केवल सामयिक उत्तेजनापूर्ण प्रतिहिंसा के उच्छ्वास से भरी होती थी, इन
सब लेखों में विचारशीलता का कोई भी परिचय नहीं पाया जाता, जीवन का
कोई नया आदर्श इनसे प्रकट नही होता। भारत के साहित्य में इनका कोई स्थान
नहीं रहेगा, इसमें कोई सन्देह नहीं। भारतीय विप्लवी किसी स्थायी साहित्य की
सृष्टि नहीं करसके। इस प्रकार विप्लव दल का प्रयास व्यर्थ होना ही था। — तो
भी विप्लवान्दोलन के इस प्रथम युग में वारीन्द्र और उपेन्द्र द्वारा परिचालित
'युगान्तर' पत्रिका ने इस तरफ बहुत काम किया था। इस युगान्तर पत्रिका का
अद्भुत प्रभाव आज भी हम देखते हैं। इसी से वारीन्द्र एक दिन गर्व के साथ
अण्डमन में कहते थे, "जो पथ मैं एक बार दिखा आया हूँ, बंगाल आज भी उसी
एक पथ का अनुसरण किए चलता है, कोई भी नया पथ निकालने की और
किसी ने क्षमता न दिखाई; छिः!"
इसके सिवाय यह विप्लव दल प्रकाश्य रूप से अपनी कोई भी कार्यधारा नहीं
चला सका। इस विप्लव दल में ऐसे कोई भी नेता न थे जो प्रकाश्य आन्दोलन
में भाग लेकर तिलक अथवा गांधी के समान मर्यादा के अधिकारी हो सकते।
इसी से यह विप्लवान्दोलन जन-साधारण से क्रमशः अलग होकर एक संकीर्ण
दायरे की सीमा में बन्द हो जाता है। इस प्रकार प्रकाश्य आन्दोलन के नेता न
हो सकने पर देश की अशिक्षित जनता को अपने आदर्श की ओर नहीं लाया जा
सकता, यह बात भी विप्लव दल के नेता लोग शायद भली भाँति नहीं समझ
सके, या शायद उनके बीच ऐसे उपयुक्त आदमियों का अभाव था इसी कारण
वे बाध्य होकर इस विषय में उदासीन रहे। विप्लव दल में उपयुक्त नेता का