बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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रिहाई की सूचना
वह दिन आज भी मुझे खूब याद है। जाड़े का मौसम था, और था सन्
1920 का फरवरी महीना। मैं सेल्यूलर जेल के अस्पताल मेंबीमार पड़ा था। एक
क़ैदी-अफ़सर ने आकर मुझे इत्तिला दी कि जेलर साहब आपको दफ्तर में बुला
रहे हैं। सुनते ही सिर से पैर तक आग लग गई। फिर वही बात, फिर वही
दृश्य, फिर वही झगडे की नौबत दिखाई देने लगी। क्योंकि पोर्ट ब्लेयर की सेल्यूलर
जेल में प्रायः ऐसा हुआ करता था कि जेल के अधिकारीगण, क़ैदी-अफ़सर
से लेकर जेलर और सुपरिटेण्डेण्ट तक, वहाँ के राजनैतिक बन्दियों को मौका-
बेमौका, जायज-नाजायज तरीकों से तंग करना चाहते थे। और ऐसे अवसरों
पर जेल के अधिकारीगणों के साथ राजबन्दियों का खूब झगड़ा हो जाता था।
कभी-कभी इन झगड़ो के परिणाम में राजबन्दियों की मृत्यु तक हो गई है। ये
सब बातें अण्डमन के जेल-जीवन के अन्तर्गत आती हैं। लेकिन ये सब बातें किसी
दूसरे स्थान पर लिखने की इच्छा है। यहाँ इतना ही कह देना पर्याप्त है कि मेरे
समय में, और मेरे अण्डमन जाने के पहले भी, उच्च पदस्थ राजकर्मचारियों की
प्रेरणा से ही अण्डमन के जेल अधिकारी राजबन्दियों से इस प्रकार कठोर व्यव-
हार करते थे। इसलिए जब उस क़ैदी अफ़सर ने आकर मुझे जेलर साहब का
हुक्म सुनाया और यह कहा कि जेलर साहब आपको दफ्तर में बुला रहे हैं तो मेरे
मन में स्वतः ही एक विरोध की भावना पैदा हो गई कि मैं तो अस्पताल की
चारपाई पर बीमार पड़ा हूँ फिर भी, इस हालत में भी, जेलर साहब मुझे दफ्तर
में बुला रहे है। फ़ौरन ही मुझे यह ख्याल हुआ कि मुझे अपमानित और तंग
करने के लिए ही जेलर ने ऐसा हुक्म दिया है। यदि मैं नहीं जाता हूँ तो जेलर से
झगडा होता है, और यदि जाता हूँ तो मेरा अपमान होता है; और यदि झगड़े
को बचाने के लिए मैं इस अपमान को भी सह लेता हूँ तो मैं अपने मित्रों की दृष्टि
में गिर जाता हूँ। क्षण-भर के लिए इन सब भावनाओं ने मेरे मन में एक कठिन
समस्या पैदा कर दी। लेकिन उसी क्षण मैंने इन समस्याओं की मीमांसा भी कर
ली। मैंने उस क़ैदी अफ़सर से कहा कि मैं बहुत कमजोर हूँ दफ्तर नहीं जा