औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
१६० औचित्यविचारचर्चा
स्वभावानौचित्यमुदाहर्तुमाह—न तु यथा ममेति । भक्तिरिति ।
भक्तिरीश्वरादिसेवनं, कातरतामसहायतां, क्षमा सहनशक्तिः, सभयतां
भययुक्ततां, पूज्यस्तुतिरादरणीयजनस्तवनं, दीनतां दरिद्रतां, धैर्यं धीरता,
दारुणतां क्रूरतां, मतिर्बुद्धिः, कुटिलतां वक्रतां, विद्याबलं शास्त्राभ्यासः,
क्षोभतां क्षोभयतीति क्षोभस्तत्तां क्षोभकतां क्षोभकारितामिति यावत् ।
ध्यानं वञ्चकतां धूर्ततां, तपस्तपस्या, कुहकतां छलितामैन्द्रजालिकतां वा,
शीलव्रतं सत्स्वभावरक्षणं, षण्ढतां नपुंसकतां यातीति शेषः, एवञ्चैतत्सिद्धं
यत्--पैशुन्यव्रतिनां पैशुन्यैकव्यसनिनां या गिरो वाचस्तासां कृते इति
शेषः, किं वा नु दोषार्द्रतां दोषभाजनत्वमिव, नायाति न प्राप्नोत्यपि तु
सर्वमपि दोषार्द्रतामेवोपयाति, पिशुना गुणानपि स्ववाग्जालैर्दोषानेव
विधत्त इति भावः ।
स्वभावानौचित्य का उदाहरण दिखाने के लिये कहा गया है—न तु यथेति ।
भक्तिरिति । पिशुनों की वाणी गुणों को भी दोष बना देती है । जैसे भक्ति को
कातरता का, क्षमा को सभयता का, स्तुति को दीनता का, धैर्य को क्रूरता का,
बुद्धि को कुटिलता का, विद्या को क्षोभकारिता का, ध्यान को वञ्चकता का, तप
को छलिता का, और सत्स्वभाव को नपुंसकता का रूप ( पिशुन वाणी ) दे
डालती हैं ।
अत्र पिशुनस्वभावे वर्ण्यमाने भक्त्यादीनां गुणानां वैपरीत्ये प्रति-
पादिते पिशुनानां वयसां किं वा दोषार्द्रता नायातीत्यभिहिते स्वयमनार्द्र-
स्वभावस्य परार्द्रीकरणमनुचितमेव ॥३३॥
अस्मिन्पद्ये पिशुनस्वभावे वर्ण्यमाने, भक्तिक्षमादीनां विशिष्टगुणानां
विपर्यासे कथिते, "पिशुनवचसां कृते किं वा वस्तु दोषास्पदत्वं न प्राप्नोति"
इति प्रतिपादिते स्वयमनार्द्रस्वभावस्य पिशुनवचसः परार्द्रीकरणं भक्त्या-
दीनां दोषार्द्रीकरणमनुचितं नितरामनौचित्यं वहतीति भावः ॥३३॥
इस पद्य में पिशुन स्वभाव वर्णन-क्रम में भक्ति, क्षमा, स्तुति आदि गुणों की
विपरीतता का वर्णन करने के बाद "पिशुनों की वाणी से संबद्ध होकर कौन-सी
वस्तु दोषार्द्रता को नहीं प्राप्त कर जाती है" इस तरह के कथन से यह बात
विरुद्ध मालूम पड़ने लग जाती है कि जो ( पिशुनवाक्य ) स्वयं अनार्द्र स्वभाव
वाला है वह दूसरों ( भक्ति आदि ) को कैसे आर्द्र ( दोषार्द्र ) बना सकता है,
इसलिये ऐसा कथन स्वभावगत अनौचित्य को व्यक्त करता है ॥ ३३ ॥
संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता १६१
सारसङ्ग्रहौचित्यं दर्शयितुमाह—
सारसङ्ग्रहवाक्येन काव्यार्थः फलनिश्चितः ।
अदीर्घसूत्रव्यापार इव कस्य न सम्मतः ॥३४॥
सारसंग्रहवाक्येन काव्यार्थः सुनिश्चितफलः शीघ्रकारिण इव
व्यापारः कस्य नाभिमतः ।
स्वभावौचित्यं प्रदर्श्य सम्प्रति द्वाविंशतितमं सारसंग्रहौचित्यं विवेच-
यितुमाह—सारसंग्रहवाक्येनेति । सारसंग्रहवाक्येन सारसंग्रहाख्या-
पकेन वाक्येन, फलनिश्चितः सुनिश्चितफलः, काव्यार्थोऽदीर्घसूत्रव्यापार
इव दीर्घसूत्रतारहितजनकृतिरिव, कस्य, न संमतोऽभिमतः ? अपितु
सर्वस्यैवाभिमत एवेत्यर्थः । कारिकार्थमेव विशदयति—सारेति । सार-
संग्रहौचितेन वाक्येन, सुनिश्चितफलः काव्यार्थः शीघ्रकारिणः क्षिप्रसम्पा-
दनशीलस्य व्यापार इव कस्य जनस्य नाभिमतो नाभिप्रेतः ?
स्वभावौचित्य का विचार करके अभी बाइसवें सारसंग्रहौचित्य की विवेचना
की जा रही है सारसंग्रहवाक्येनेति । सारसंग्रहपरक वाक्य से सुनिश्चित फल-
वाला काव्यार्थ अदीर्घसूत्री जन के द्वारा किये गये व्यापार के समान किसको
अभीष्ट नहीं होता ?
कारिका की ही व्याख्या की जा रही है—सारेति । सारसंग्रहोचित वाक्य
के प्रयोग से सुनिश्चित फलशाली काव्यार्थ, शीघ्र संपन्न करनेवाले के व्यापार के
समान किसे प्रिय नहीं ? अपितु सभी को प्रिय होता ही है ।
यथा मम मुनिमतमीमांसायाम्—
विविधगहनगर्भग्रन्थसम्भारभारै-
र्मुनिभिरभिनिविष्टैस्तत्त्वमुक्तं न किञ्चित् ।
कृतरुचिरविचारं सारमेतन्महर्षे-
रहमिति भवभूमिर्नाहमित्येव मोक्ष ॥
सारसंग्रहोचित्यमुदाहर्तुमाह—यथा मम मुनीति । विविधेति ।
विविधान्यनेकप्रकाराणि गहनानि कठिनानि दुर्ज्ञेयानीति यावत्, वस्तूनि,
गर्भेऽभ्यन्तरे येषामेवंभूतानां ग्रन्थानां पुस्तकानां भारभूतैः, सम्भारैः
समूहैस्तद्द्वारेति यावत्, अभिनिविष्टैराग्रहशीलैर्मुनिभिः किञ्चित्किमपि
तत्त्वं नोक्तं न कथितम् । एवंस्थितौ महर्षेर्व्यासस्य, कृतरुचिरविचारं
विहितचारुविवेकमेतदिदं सारमस्तीति शेषः । किं तदित्याह—अहमिति
११ औ०
...Wait, is thatमोढ्यैorमौढ्यै? It has ONE matra on top! व्यसनमोढ्यै! Wait, let's look at line 16: व्य स न मो ढ्यै- yes, it has one top stroke, soमोढ्यै`!
Look at line 20:
कर्तेत्यादिबुद्धिः संसारमूलभूमिः ममत'परित्यागो...
Look at ममत'परित्यागो: there is an apostrophe: ममत'परित्यागो.
Look at line 22:
[ संक्षिप्येत्यर्थं , भयक्षयोपदेशो भयनिवा णोपदेशः, प्रकृतार्थस्य वर्णनीया-
There is a space in भयनिवा णोपदेशः.
Look at line 24:
इस "द्य में भगवद्गीतार्थ के विचार प्रसंग में यही सारसंग्रह किया गया
It has इस "द्य में!
Now let's check whether to transcribe the typos verbatim or correct them:
Usually, a faithful transcription represents the text as printed on the page, because OCR / ground truth datasets require matching the image text!
Let's check each of these suspicious spots carefully to decide:
- Line 2:
Let's look at line 2 again:
`बुद्धिर्गर्भादहङ्कारो भव
संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता १६३
न तु यथा परिव्राजकस्य -
तपो न तप्तं वयमेव तप्ता भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः ।
जरा न जीर्णा वयमेव जीर्णास्तृष्णा न याता वयमेव याताः ॥
सारसंग्रहानौचित्यमुदाहर्तुमाह--न तु यथा परिव्राजकस्येति । तप
इति । तपस्तपस्या न तप्तं, वयं सांसारिकप्राणिन एव तप्ताः, सन्तापमासा-
दितवन्तः, भोगाः सांसारिकसुखभोगादिका, न भुक्ताः न भोगविषयी-
कृताः, अपितु वयमेव कालपुरुषेण भुक्ताः कवलीकृताः, जरा वार्धकं, न
जीर्णा पुरातनतामाप्तवती, अपितु वयं जीविन एव जीर्णा वृद्धत्वमुपगताः,
तृष्णा, न याता नापगता, वयमेव याता अन्तममुपगताः । सकलं
निःसारमेवेति भावः ।
सारसंग्रहानौचित्य का उदाहरण दिखाने के लिये कहा गया है-न तु
इति । तप इति । तप नहीं तपा गया हम ही संतप्त हुए, सांसारिक नानाविध
भोगों का उपभोग नहीं किया जा सका, हमारा ही उपभोग (काल पुरुष के
द्वारा) कर लिया गया, बुढ़ापा नहीं जीर्ण हुआ, हम ही बूढ़े हो गये, ऐहलौकिक
व पारलौकिक विषयों की प्राप्येष्णा नहीं समाप्त हो सकी, परन्तु हम समाप्त हो
गये । कहने का तात्पर्य यह है कि ये सारे के सारे निरर्थक हैं इनसे कुछ भी
साधन नहीं हो सकता ।
अत्र 'वयमेव तप्ता, भुक्ता, जीर्णा, याता" इत्युक्ते निःसाराचारु-
त्वादपर्यवसितो वाक्यार्थः फलशून्यतया सारसंग्रहोचितं न किञ्चित्प्रति-
पादयति ॥३४॥
अस्मिन्पद्ये “वयं सांसारिकप्राणिन एव, तप्ता भुक्ता जीर्णा याताः”
इति कथने निःसाराचारुत्वात्संसारस्य सारहीनत्वाशोभनत्वमात्रप्रति-
पादनात्, अपर्यवसितो निराकाङ्क्षबोधविषयताशून्यो वाक्यार्थः, फल-
शून्यतया निष्प्रयोजनतया, सारसंग्रहोचितं न किञ्चित्प्रतिपादितं भवति ।
अतः सारसंग्रहानौचित्यं स्पष्टमिति भावः ॥३४॥
इस पद्य में "हम ही तप्त हुए, भोगे गये, बूढ़े हुए, तथा समाप्त हो गये"
इस कथन से केवल सांसारिक आचरणों की सारहीनता और अशोभनता ही
प्रतिपादित हुयी, परन्तु सार क्या है इस पर कुछ भी प्रकाश नहीं पड़ सका,
इसलिये इस तरह का अपूर्व सारसंग्रह अनौचित्य का ही उदाहरण हो सकता है,
औचित्य का नहीं ॥३४॥
' under द? It's 'द्य'.
Wait, is it 'द्यो'?
Let's look at the word: "सम्पत्त्या विद्योतितं"!
Yes, Lakshmi (wealth) prakashitam = sampattya vidyotitam (illuminated/shining with wealth)!
In Sanskrit, "विद्योतितम्" means illuminated, perfectly glossing "प्रकाशितं"!
Wait, why did I initially see 'विद्यातितं'?
Because 'द्यो' in old fonts has a vertical bar for 'ो' that looks like 'ा', but it has the top stroke for 'ो', so it is indeed 'विद्योतितं'!
Let's re-verify:
व (va) with 'ि' (i) -> वि
द्य (dya) with 'ो' (o) -> द्यो
त (ta) with 'ि' (i) -> ति
त (ta) with 'ं' (m) -> तं
Yes, "विद्योतितं"! It is unmistakably "विद्योतितं"!
Line 14:
गुणशालिनः विमलं शुभ्रं, कुलं वंश इव शोभते ।
Line 15:
सारसंग्रहौचित्य का विचार कर लेने के बाद अभी अवसर प्राप्त होने पर
Line 16:
तेईसवें प्रतिभौचित्य की विवेचना की जा रही है— प्रतिभाभ
?
Wait! Look at the top of that letter in line 29:
Wait, is that a repha, or is it the hook of something from line 28?
Look directly above it in line 28:
In line 28, directly above is: "ज्ञा" of "ज्ञापन"!
Under "ज्ञा", there is no descender hanging down into line 29.
So the mark above the headline in line 29 belongs to line 29.
Wait, let's look at the character itself:
Is it:
र् (repha) + ह + त + ं ?
Wait! Look at:
Could it be 'र्हतं'?
No, look at the middle: it has two parts:
Wait, could it be 'द्भुतं'?!
अद्भुतं!
Wait! "उच्चैरद्भुतं करोति"?!
उच्चैः + अद्भुतं = उच्चैरद्भुतं!
LET'S LOOK AT THAT!
उच्चै-
रद्भुतं !
WAIT!
Is the first letter 'र'?
Wait, if it's 'उच्चै-' on line 28, then line 29 has 'र' + 'द्भु' + 'तं' = 'रद्भुतं'?!
Wait, look at line 28:
It ends with: 'मुच्चै-'
If line 29 has 'रद्भुतं', then together it is:
'मुच्चैरद्भुतं करोति
१६६ औचित्यविचारचर्चा
भट्टतौत इति। नवनवकल्पनाकारिणी बुद्धिरेव प्रतिभा मतेति भट्टतौत-
मतमित्यर्थः।
इस पद्य में नये प्रेमी को द्वार पर उपस्थित जानकर नायकान्तर के द्वारा दष्ट
अधरवाली अनभिज्ञ की जैसी किसी पुंश्चली नायिका ने शुक को उद्देश्य करके
जो कहा है कि--“ऐ निर्दयी सुग्गे ! बिम्बफलके भ्रम से तुम मेरे अधर को क्यों
काट रहे हो, तुम बड़े चंचल हो, तुम्हें मैं इसके दंडस्वरूप पके जामुन आज
खाने को नहीं दूँगी, तुम उससे निराश हो जाओ इत्यादि” इससे प्रतिभौचित्य का
बड़ा ही सुन्दर आभास मिल रहा है, क्योंकि असत्य (शुक द्वारा अधरक्षति)
के ज्ञापन और सत्य (नायक द्वारा अधरदंशन) के गोपन की नूतन कल्पना में
बुद्धि का सुन्दर उपयोग किया है और इस तरह की नवीन कल्पना करने वाली
बुद्धि को ही प्रतिभा कहते हैं, जैसा कि भट्टतौत ने कहा है।
न तु यथा मम तत्रैव—
निर्याते दयिते गृहे विशयने निर्माल्यमाल्ये कृते,
प्राप्ते प्रातरसह्यरागिणि परे वारावहारेऽन्यथा।
द्वारालीनविलोचना व्यसनिनी सुप्ताहमेकाकिनी-
त्युक्त्वा नीविविकर्षणैः सचरणघातैरशोकीकृत ॥
प्रतिभानौचित्यमुदाहर्तुमाह—न तु यथा मम तत्रैवेति। निर्यात इति।
वारावहारकुपितं नायकं पुनरनुकूलयितुं कृतच्छद्मव्यवहाराया वेश्याया
वर्णनमिदम्। दयिते नूतने प्रेमिणि, निर्याते निर्गते सति, निर्माल्यमाल्ये
रात्रिकृतभोगानां माल्यकुसुमानां म्लानतया निर्माल्यरूपतामापन्ने माल्ये,
कृते बहिर्निःसारिते, गृह भवने, विशयने शेतेऽस्मिन्निति व्युत्पत्त्या शयनं
शय्या तद्रहिते सम्पादिते, प्रातरुषसि, असह्यरागिण्येकान्तप्रेम्णि,
वारावहारे वारस्य निश्चितदिनस्यापहरणे जाते, अन्यथेर्ष्याक्रोधादियुक्ते,
परे पूर्वनायके प्राप्ते सति, द्वार आलीने त्वदागमनमार्गं द्रष्टुं संलग्ने,
विलोचने नयने यस्यास्तथाभूता, व्यसनिनी त्वदालोकनं मे व्यसनं
(दुरभ्यासः) सम्पन्नमस्तीति भावः, अहमेकाकिन्येकलैव न तु केनाप्यन्य
पुरुषेण सहेति भावः, सुप्ता शयनमकार्षमित्युक्त्वेति कथनोत्तरकाले,
नीविविकर्षणैः विश्वासोत्पादकवचनश्रवणविगतमन्युना नायकेन तन्नी-
विग्रन्थिविमोचने प्रवृत्तमिति तत्क्रोधैरित्यभिप्रायः, तया वेश्यया, चरणा-
घातैः पादताडनैः स पूर्वनायकोऽशोकीकृतः शोकरहितः सम्पादितोऽथवा
तरुणोपादताडनेनाशोको नाम वृक्षो यथा विकसितो भवति तथैव सोऽपि
नायकस्तच्चरणप्रहारेण सञ्जातरोमोद्गमो जात इत्यशोकतुल्यः कृत
इत्यर्थः । वेश्यायातकृतपदमत्राहार्यमिति बोध्यम् ।
प्रतिभागत अनौचित्य को प्रदर्शित करने के लिये कहा गया है--न तु यथा
ममेति । निर्याते इति । किसी नये प्रेमी के साथ रात बिताने की भावना से
वेश्या ने अपने पूर्वप्रेमी को किसी अन्यहेतुक छल से एक दिन के लिये आने
से रोक कर उस नये प्रेमी के साथ रात को रंगरेलियाँ मनायीं, सबेरे जब वह
चला गया तब निर्माल्यरूप पुष्पमाला तथा बिछावन आदि को हटाकर घर साफ
कर दिया और उस पूर्वप्रेमी को आया हुआ देखकर कहा कि मैं तुम्हें आने से
रोककर स्वयं भी प्रसन्न नहीं हूँ, देखो न, रात भर अकेली भूमि पर लेटी हुयी
द्वार पर टकटकी लगाये तुम्हारे आने की राह देखती रही हूँ । इस कथन से
प्रभावित होकर नायक उसकी नीवि-ग्रन्थि को खींचने लगा जिससे कृत्रिम क्रोध
करके उस वेश्या ने पदताड़न से उसको अशोक ( शोकर
१६८ औचित्यविचारचर्चा
पूर्वप्रिये, प्राप्ते समायाते--'त्वदालोकनकांक्षिणी त्वद्दर्शनचेष्टाशालिनी,
व्यसनिनी दुरभ्यासा, द्वारन्यस्तनयना द्वारदेशस्थिरीकृतनेत्राऽहमेका-
किन्येकलैव सुप्ता आसमिति शेषः, इत्येवंविधेन, प्रत्यायनावचनेन
विश्वासोत्पादकवचनकथनेन, विलीनो नष्टो मन्युः क्रोधो यस्य तस्य
नायकस्य, सरभसं सवेगं सरसं च यन्नीविविकर्षणं नीविग्रन्थिमोक्षणं,
तस्मिन्नुद्यतया तत्परयाऽऽकृत्या कृत ईर्ष्या कोपो यस्यास्तया चरणनलिन-
प्रहारैश्चरणारविन्दाघातैरशोकीकृतः, शङ्काशल्योन्मूलनान्निःशोकः सम्पा-
दितः, परपुरुषसम्पर्कजन्यशङ्कारूपशङ्कोरुन्मूलनात्प्रत्यायनावचनद्वारोत्पाट-
नान्निःशोको विगताखिलशोकः सम्पादितः । अथवा सन्ततपुलकाङ्कुरत्वा-
दानन्दोद्रेकोपयातर रोमाञ्चत्वादशोकतरुतुल्यतां नीत इति वाक्यार्थः,
गणिकायाः केवलं सत्यो यो विप्रलम्भो वियोगस्तत्प्रयुक्तं यत् प्रागल्भ्यं दृढत्वं,
तन्मात्रमेव, गाढरागमूलकतां दृढप्रेममूलकतामेव च प्रतिपादयति, न तु
प्रतिभोद्भूतां प्रतिभाजन्यामौचित्यकणिकामौचित्यलेशं सूचयति ॥ ३५ ॥
इस पद्य में वेश्या ने अपने ऊपर विशेषासक्त किसी कामुक का उस दिन-
मात्र के लिये तिरस्कार करके किसी नये प्रेमी के साथ रात बितायी, फिर सबेरे
उस नये प्रेमी के चले जाने के बाद संभोगव्यंजक मर्दित शय्या, तथा निर्माल्य
पुष्पादिक को हटा दिया, एवं दुत्कार देने के कारण क्रोधयुक्त तथा एकान्तप्रेमी
उस पूर्व प्रेमी के आने पर कहा कि मैं तो तेरे वियोग में व्याकुल होकर अकेली
सोयी हुई बराबर द्वार पर आँखें बिछाये तुम्हारी ही राह देख रही थी, इस
तरह की विश्वासोत्पादक बातें सुनकर जब उस नायक का क्रोध कुछ ठंडा पड़
गया और उसे जब चुहलबाजी सूझने लगी, तब कृत्रिम क्रोध करके उस वेश्या
ने उसे अपने चरणप्रहार से अशोक के समान खिला दिया, इस कथन से वेश्या
के दृढ़ प्रेम का तथा वियोगदुःख की सत्यता का ही परिचय मिलता है, विलक्षण
प्रतिभा का तो कुछ लेश भी नहीं मिलता । इसलिये इससे प्रतिभौचित्य का
व्याघात ही होता है, उच्छ्राय नहीं ॥ ३५ ॥
अवस्थौचित्यं दर्शयितुमाह-
अवस्थौचित्यमाधत्ते काव्यं जगति पूज्यताम् ।
विचार्यमाणरुचिरं कर्त्तव्यमिव धीमताम् ॥३६॥
अवस्थोचिततया काव्यं जगति श्लाघ्यतामायाति, मतिमतामिव
कृत्यं विचारनिर्घर्षरुचिरम् ।
संस्कृत-हिन्दोव्याख्याद्वयोपेता १६९
प्रतिभौचित्यं विचार्य सम्प्रति क्रमप्राप्तं चतुर्विंशतितममवस्थौचित्यं
विवेचयितुमाह-अवस्थौचित्यमिति। अवस्थौचित्यमवस्थाया वयः
क्रमस्यौचित्यमनुरूपवर्णनं यस्मिंस्तादृशं काव्यं, जगति संसारे, विचार्य-
माणरुचिरं विचार्यमाणं सत्सुन्दरं स्पृहणीयमिति यावत्, धीमतां बुद्धि-
मतां, कर्तव्यं करणीयं कार्यमिति यावत् इव, पूज्यतामादरणीयतां श्लाघ्य-
तामिति यावत्, आधत्ते प्राप्नोति।
कारकार्थमेव विशदयति-अवस्थोचिततयेति। अवस्थोचिततया-
वस्थाया आनुरूप्येण, काव्यं, जगति संसारे तथैव श्लाघ्यतां स्पृहणीयता-
मायाति गच्छति, यथा विचारस्य निर्घर्षेण रुचिरमर्थाद्विचारशाणोलीढं,
मतिमतां बुद्धिमतां, कृत्यं कर्तव्यम्।
प्रतिभौचित्य का विचार कर चुकने के बाद क्रमिकरूप से चौबीसवँ अवस्थौ-
चित्य की विवेचना करने लिये कहा गया है-अवस्थौचित्यमिति। अवस्था के
अनुरूप वर्णन से संसार में काव्य उसी तरह पूजित होता है जैसे विचार पूर्वक
किया गया बुद्धिमानों का कार्य (पूजित होता है)।
कारिका की ही व्याख्या करने के लिये कहा गया है--अवस्थोचितयेति।
अवस्था की अनुकूलता से काव्य, विचार की कसौटी पर कसाये गये बुद्धिमानों के
कार्य के समान संसार में स्पृहणीयता को प्राप्त करता है।
यथा मम लावण्यवत्याम्-
मुक्तः कन्दुकविभ्रमस्तरलता त्यक्तैव बाल्योचिता,
मौग्ध्यं निर्धुतमाश्रिता गजगतिर्भ्रूलास्यमभ्यस्यते।
यन्नर्मोर्मिषु निर्मितं मृगदृशा वैदग्ध्यदिव्यं वच-
स्तद्विद्धः सुभगाभिमानलटभाभावे निबद्धो भरः॥
अवस्थौचित्यमुदाहर्तुमाह-यथा मम लावण्यवत्यामिति। मुक्त इति।
कन्दुकविभ्रमः कन्दुकक्रीडाविलासः, मुक्तस्त्यक्तः, बाल्योचिता शैशवानु-
रूपा, तरलता चञ्चलता, त्यक्ता परिहृतैव, मौग्ध्यं मुग्धता, निरस्तं दूरीकृतं,
गजगतिर्गजवत्सविलासगमनमाश्रिताऽङ्गीकृता, भ्रूलास्यं भ्रूनर्तनं कटाक्ष-
निःक्षेपणमिति यावत्, अभ्यस्यते, नर्मोर्मिषु परिहासतरङ्गेषु, वैदग्ध्यदिव्यं
चातुरीपरिलसितं, वचो वचनं, यन्निर्मितमासूत्रितं, तत्तेन विद्मो जानीमहे
वयमिवित शेषः, (यत्) मृगदृशा हरिणलोचनया, सुभगेन सम्भोग-
१७० औचित्यविचारचर्चा
क्षमावस्थाप्राप्तिगर्भेण सुन्दरेण, अभिमानेन गर्वेण लटभायाः१ कमनीय-
कन्यायाः, भावे कामव्यञ्जकचेष्टादौ, भरोऽतिशयः पूर्णता वा, निबद्धः
आविष्कृतः सम्पादितो वा ।
अवस्थौचित्य का उदाहरण दिखाया जा रहा है—यथा ममेति । मुक्त इति ।
बाला अब युवती बनने जा रही है, इसलिये इसने गेंद खेलना छोड़ दिया है,
बाल्योचित चञ्चलता का त्याग कर दिया है, मुग्धता का कहीं पता तक नहीं
रहा, हथिनी के समान मस्तानी चाल से चलना सीख गयी है, कटाक्ष-निःक्षेपण
का अभ्यास कर रही है, तथा परिहास को तरंगित करने में वैदग्ध्यपूर्ण वचन-
विन्यास आरंभ कर दिया है इससे ज्ञात होता है कि संभोगक्षम वयस् प्राप्त हो
जाने के कारण स्वाभाविक सुन्दर गर्व से लटभाभाव (सुन्दरकन्योचित काम-
व्यञ्जक चेष्टा) में पूर्णता प्राप्त कर ली है ।
अत्र यदुक्तं-कन्दुकक्रीडा त्यक्ता, बालचापल्यं परिहृतम्, मौग्ध्यं
निरस्तम्, गजगतिरङ्गीकृता, भ्रूलतालास्याभ्यासः क्रियते, नर्मोर्मिषु
वचनवैचित्र्यमासूत्रितम्, तेन जानीमहे शैशवावस्थां समुत्सृजन्त्या प्रौढता-
मनारूढयापि नवसम्भोगगौरवगर्भेण सुभगाभिमानेन लटभाभावे बाल्या
भरो निबद्धः, इत्यभिहिते स्फुटधिया वयोवस्थामध्यसन्धिवर्णनायामौ-
चित्यं स्फुरदिवावभासते ।
अस्मिन्पद्ये यदुक्तं—कन्दुकक्रीडा त्यक्ता, बालोचितचाञ्चल्यमुज्झि-
१—अयं शब्दः प्रायो देशोद्भवस्तेन कोषादिषु नोपलभ्यते, शब्दकल्प-
द्रुमोऽप्येतद्विषये मूक एव (१) गाथासप्तशत्याः प्रथमशतकस्य सप्तमपद्ये
"लढह" इति प्राकृतं रूपमुपलभ्यते, तस्य च च्छायायां विदग्धेत्यर्थो विहितो-
ऽस्ति । (२) वक्रोक्तिजीवितस्य १६ तमे पृष्ठे "नूतनतारुण्यतरङ्गितलावण्यलट-
भकान्तेः" इत्यत्राचार्यविश्वेश्वरेण लटभेत्यस्य सुन्दरोऽर्थः कृतोऽस्ति । तत्प्रमाणे
च तत्रैव टिप्पण्याम् (i) "लटभललनाभोगसुलभः" (ii) "तस्याः
पादनखश्रेणिः शोभते लटभभ्रुवः" (iii) "न कस्य लोभं लटभा तनोति" (iv)
"केशबन्धविभवैर्लटभानाम्' इति पद्यांशचतुष्टयमुद्धृतम् । (३) "Monier
Williams" नाम्नाः अंग्रेजी-संस्कृतकोशस्य ८९५ तमे पृष्ठे औचित्यविचार-
चर्चाया एवोद्धरणमुपस्थाप्य कन्येत्यर्थः कृतोऽस्ति । (४) लट बाल्ये (भ्वा०
धा० सं० २९८) इति धातोर्निष्पत्तिमुद्भाव्य व्युत्पत्तिमर्यादया कन्यापर्यायपक्ष एव
ममापि हृदयसंवादीति प्रस्तुतपद्यव्याख्यानावसरे कन्यार्थ एव मया कृतः ॥
? No, it's १७४. Wait, let's look at १७१again. In some fonts, १ at the end of a page number has an ornament? No. Let's just output१७४or१७१. Actually, looking at the loop, it's १७४(or१७१). Let's look at ४in line 18:ताटकाताडकेन->कhas a similar width. Let's provide१७१or१७४? Wait, let's look at the shape: it really looks like १७४or१७१. Let's look at the bottom of the digit: it has a loop to the left and a stroke down. That is ४in some old presses, or९? Wait, १७१is very common, but wait, look at the circle: top left loop, then down to bottom right, loop back. That's४! Wait, no, १७४` is page 174! Let's check:
In Kshemendra's Aucityavicaracarca, "न तु यथा राजशेखरस्य - ज्यायान् धन्वी..." is verse 28 (अस्थानौचित्य / अवस्था-अनौचित्य).
In the Chowkhamba Sanskrit Series edition (or Haridas Sanskrit Series), is it on page 1
१७२ औचित्यविचारचर्चा
द्योतिनीति तत्कारकेणेति भावः, वृद्धवयसः दुग्धपेन शिशुना योद्धुं
प्रयासो नितरां लज्जाप्रद इति ।
अवस्थानौचित्य का उदाहरण दिखाने के लिये कहा गया है--न तु यथा
राजशेखरस्येति । ज्यायानिति । धनुर्धारियों में सर्वश्रेष्ठ, क्षत्रियों के विनाश
करने में क्षम जिनके कानों के पास के केश पककर श्वेत हो रहे हैं, अर्थात् जो
बुढ़ापे की ओर अग्रसर हो रहे हैं ऐसे महाबली परशुराम, नये-नये धनुष धारण
करने के कारण जिनकी हथेली लाल हो रही है, जो ताड़का ( एक स्त्री मात्र )
का विनाश कर सके हैं, इतना ही नहीं जो कि अभी तक दुधपिव्वे कहे जा सकते
हैं ऐसे रामचन्द्र के साथ युद्ध करने की इच्छा रखते हुए स्वयं ही लज्जित क्यों
नहीं हो रहे हैं, अर्थात् प्रशस्तधन्वी का नवसिखुए के साथ, बड़े-बड़े क्षत्रिय
राजाओं को मारनेवालों का एकमात्र स्त्रीघाती के साथ, तथा बूढ़े का दुधपिव्वे
के साथ युद्ध की चर्चा भी लज्जाजनक है, फिर ऐसा करते हुए परशुराम को भी
लाज आनी चाहिए ।
“अत्र भार्गवः स्थविरावस्थास्थितः स्थिरतरपराक्रमकर्कशप्रौढो
धनुर्धरः शिशुना रामेण धनुर्ग्रहणारुणितकोमलकरकमलतलेन क्षत्रियक्षय-
संरम्भप्रगल्भस्ताटकाताडकेन स्फुरदाकर्णपलितः सम्भाव्यमानजननीस्त-
नक्षीरकण्ठेनामुना युयुत्सुः कथं न लज्जत” इत्युक्ते पेशलतया राघवाव-
स्थायां जामदग्न्यावस्थाविपरीततायां प्रतिपाद्यमानायां ताटकाताडकेनेति
विरुद्धाधिवासोऽर्थः किमप्यनौचित्येन चेतसि सङ्कोचमादधाति ॥३६॥
“अस्मिन्पद्ये, वृद्धावस्थापन्नो निश्चितपराक्रमप्रगल्भो धनुर्धरः परशु-
रामो धनुर्धारणारुणहस्ताब्जतलेन शिशुना रामेण, क्षत्रियविनाशारम्भ-
सप्रतिभस्ताडकेतिनामकासुरदारिकाविनाशकेन, आकर्णपलितकेशशो-
भितः, सम्भाव्यमानं जनन्या मातुः स्तनयोः क्षीरं दुग्धं कण्ठे यस्य
तेनामुना रामेण युद्धं कर्तुमिच्छुः सन् कथं न लज्जत” इत्युक्ते पेशलतया
कोमलतया, राघवावस्थायां रामचन्द्रवयसि, जामदग्न्यस्य परशुरामस्या-
वस्थया वयसा विपरीतायां विरुद्धायां, प्रतिपाद्यमानायां कथ्यमानायां
“ताटकाताडकेने”ति विरुद्धाधिवासोऽर्थो विरुद्धस्यार्थस्याधिवासो गन्धो
यस्मिंस्तादृशोऽर्थः । इदमत्राकूतम्--राघवस्य ऋजुत्वमत्र कवेरभिमतमिति
तत्कर्तृकताडकाताडनात्मकपरुषपुरुषोचितकर्मवर्णनमनुचितमिति । अत
संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता १७३
एवानौचित्ये नावस्थानुरूपवर्णनाकरणेन चेतसि किमपि विचित्रं सङ्कोच-
मादधात्युपस्थापयति ।। ३६।।
इस पद्य में वृद्धावस्थापन्न तथा स्थिरपराक्रमशाली प्रसिद्ध धनुर्धर परशुराम,
प्रथम-प्रथम धनुषधारण करने के कारण लाल तलहथीवाले, बच्चा राम के साथ
असंख्य क्षत्रियों के विनाश में पटु होकर एकमात्र ताडकाघाती के साथ, कान
तक पके हुए केशवाले होकर दुधपीते के साथ, युद्ध की इच्छा करते हुए उन्हें
लज्जा क्यों नहीं आती ? इस कथन में कोमल होने के कारण राम की और
भार्गव की अवस्था में असामञ्जस्य प्रतिपादित करने के क्रम में 'तातकाताडकेन
= ताड़का को मारने वाले के साथ" ऐसा जो कहा गया है वह राम की अवस्था
के विपरीत प्रतीत होता है, क्योंकि एक बच्चे के लिये (जिसे कि दुग्धाद की
उपाधि से विभूषित किया गया है) ताड़का जैसी दुर्दान्त राक्षसी का वध कैसे
संभव हो सकता है ? इससे इसमें अवस्थागत अनौचित्य का समावेश हो गया है,
जिससे पाठकों के हृदय में एक विचित्र संकोच का उदय हो जाता है ।। ३६ ।।
विचारौचित्यं दर्शयितुमाह—
उचितेन विचारेण चारुतां यान्ति सूक्तयः ।
वेद्यतत्त्वावबोधेन विद्या इव मनीषिणाम् ॥३७॥
विचारौचित्येन सूक्तयश्चारुतां यान्ति, ज्ञेयस्वरूपज्ञानेन विद्या इव
विदुषाम् ।
अवस्थौचित्यविचारानन्तरं सम्प्रति प्राप्तपर्यायं पञ्चविंशतितमं
विचारौचित्यं विवेचयितुमाह—उचितेनेति । उचितानुरूपेण, विचारेण,
सूक्तयः काव्यानि, वेद्यतत्त्वावबोधेन ज्ञातव्यतत्त्वज्ञानेन, मनीषिणां
विदुषां, विद्याः शास्त्राणीव, चारुतां स्पृहणीयतां, यान्ति गच्छन्ति ।
कारिकार्थमेव स्फारयति—विचारौचित्येनेति । विचारौचित्येन
विचारानुरूपवर्णनेन, सूक्तयस्तथैव चारुतां रमणीयतां, यान्ति प्राप्नुवन्ति,
यथा ज्ञेयस्वरूपज्ञानेन ज्ञातव्यतत्त्वपरिज्ञानेन विदुषां कृतविद्यानां विद्याः
स्पृहणीयतामासादयन्ति ।
अवस्थौचित्य का विचार कर लेने के बाद अभी अवसर प्राप्त होने पर
पचीसवें विचारौचित्य की विवेचना की जा रही है--उचितेनेति । अनुरूप विचार
के द्वारा कवियों की कृतियाँ, ज्ञेयत्त्व के ज्ञान से मनीषियों की विद्याओं की तरह
स्पृहणीयता को प्राप्त कर जाती हैं ।
१७४ औचित्यविचारचर्चा
कारिका की ही व्याख्या करने के लिये कहा गया है--विचारौचित्येनेति ।
विचारौचित्य के द्वारा सूक्तियाँ उसी तरह चारुता को प्राप्त करती हैं जैसे ज्ञेय
तत्त्व के ज्ञान से विद्वानों की विद्यायें ।
यथा मम मुनिमतमीमांसायाम्—
अश्वत्थामवधाभिधानसमये सत्यव्रतोत्साहिना,
मिथ्या धर्मसुतेन जिह्मवचसा हस्तीति यद् व्याहृतम् ।
सा सत्यामृतरश्मिवैरमसमं संसूचयन्त्याः सदा,
शङ्के पङ्कजसंश्रयेण मलिनारम्भा विजृम्भा श्रियः ॥
विचारौचित्यमुदाहर्तुमाह-यथा मम मुनिमतेति । अश्वत्थामेति ।
अश्वत्थाम्नः द्रोणसुतस्य, वधस्य मृत्योः, अभिधानसमये कथनकाले,
“अश्वत्थामा मृतो नरो वा कुञ्जरो वा' इति कथनसमय इति भावः, सत्य-
व्रतोत्साहिना सत्यव्रते परमोत्साहवता, नितरां सत्यवादिनेति भावः, धर्म-
सुतेन युधिष्ठिरेण, मिथ्याऽसत्यं, जिह्मवचसा कुटिलवाण्या, हस्ती कुञ्जर
इति यद् व्याहृतं कथितं, सा, सततं सर्वदाऽसमं विषमं सत्यमेवामृत-
रश्मिश्चन्द्रस्तस्य वैरं द्वेषं, संसूचयन्त्या अभिव्यञ्जयन्त्याः, श्रियो लक्ष्म्याः,
पङ्कजसंश्रयेण कमलसम्पर्केण, मलिनः कुत्सित आरम्भो यस्यास्तथाभूता,
विजृम्भा विचेष्टितमिति भावः, अभूदिति शेषः, शङ्के, इत्यहं मन्ये । इदमत्र
तात्पर्यम् यत्-पङ्कजाश्चन्द्रद्वेषिणो भवन्ति, लक्ष्म्याश्च स एव वासभूमि-
रिति तत्सम्पर्केण लक्ष्म्यपि चन्द्रद्वेषिणी संजातेति सम्प्रति राजलक्ष्मीः
सत्यवचसो युधिष्ठिरस्यापि सत्यरूपं चन्द्रं द्विषन्ती "अश्वत्थामा मृत"
इत्यसत्यं वक्तुं तं प्रय्यदिति ।
विचारौचित्य का उदाहरण दिखाने के लिये कहा गया है--यथा ममेति ।
अश्वत्थामेति । अश्वत्थामा की मृत्यु की बात कहने के समय सत्यव्रती युधिष्ठिर
ने झूठ-मूठ 'नरो वा कुञ्जरो वा” ऐसा कहकर हाथी का जो नाम ले लिया, वह
युधिष्ठिर का दोष नहीं है अपितु कमल चन्द्रद्वेषी होते हैं और उस पर निवास
करने के कारण लक्ष्मी की विचारधारा भी वैसी ही हो गयी है । इसलिये
युधिष्ठिर के सत्यवचन-चन्द्र का द्वेष करती हुई राजलक्ष्मी के कुत्सित व्यापार
की प्रथम शुरुआत है वह, ऐसी मेरी मान्यता है ।
अत्र "द्रोणनिधनख्याने सत्यव्रतोत्साहवता धर्मतनयेनापि मिथ्या
लघुवचसा कुञ्जर इति यदुक्तं सा सततं सत्यचन्द्रद्वेषं सूचयन्त्याः श्रियः
संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता १७५
शङ्के पङ्कजसंश्रयेण मलिनव्यापारा विजृम्भे"त्यभिहिते ससंवादलक्ष्मी-
स्वभावपरिभावनया तत्त्वावबोधेन मूलविश्रान्त्या फलपर्यवसायी विचारः
सहृदयसंवेद्यमौचित्यं व्यनक्ति ।
अस्मिन्पद्ये "द्रोणाचार्यमृत्यु कथनप्रसङ्गे, सत्यवादिना युधिष्ठिरेणापि,
स्वल्पोच्चारणपूर्वकं हस्तीति मिथ्या यत्कथितं सा सत्यचन्द्रविरोधं व्यञ्ज-
यन्त्या लक्ष्म्या कमलाव० रूपसम्पर्केण कुत्सितारम्भम् व्यवसितमित्यहं
मन्ये" इति प्रतिपादिते ससंवादलक्ष्मीस्वभावपरिभावनया सकलहृदय-
सम्मतलक्ष्मीस्वभावपरिज्ञानात्मकेन तत्त्वावबोधेन वस्तुस्थितिज्ञानेन
मूलविश्रान्त्या मूलाधारस्थित्या, फलपर्यवसायी फले पर्यवसन्नो विचारः
सहृदयसंवेद्यं सहृदयहृदयसंवेद्यमौचित्यं व्यनक्ति ।
इस पद्य में "द्रोणाचार्य की मृत्यु के कथन-क्रम में सत्यवादी युधिष्ठिर ने
भी झूठ-मूठ हाथी का जो नाम ले लिया वह सर्वदा सत्यरूपचन्द्र के विरोध को
सूचित करती हुयी, कमल पर निवास करने के कारण उसके सम्पर्क से लक्ष्मी
के कदाचरण की भूमिका है, ऐसा मैं मानता हूँ" इस कथन से लक्ष्मी के सर्व-
जनानुमोदित स्वभाव का ज्ञान हो जाता है जिससे झूठ बोलने में युधिष्ठिर का
दोष नहीं है, अपितु यह राजलक्ष्मी की प्रतिक्रिया है ऐसा विचार मूल से उठकर
फल में पर्यवसन्न होता हुआ एक ऐसे औचित्य को व्यक्त करता है जो कि
सहृदयहृदयमात्र संवेद्य है।
न तु यथा मम तत्रैव—
प्रग्लाने चिरकालवृत्तदयिताकेशाम्बराकर्षणे,
क्रूरं राक्षसवैशसं यदि कृतं भीमेन दुःशासने ।
तत्कालक्षमिणा कुशाश्मपरुषारण्यप्रवासे चिरं,
किं पीतं तप्ततापमग्नमहिषस्वेदाम्बुपृक्तं पयः ॥
विचारानौचित्यं प्रदर्शयितुमाह- न तु यथा मम तत्रैवेति । प्रग्लाने
इति । चिरकाले त्रयोदशतमे वर्षे व्यतीते इति यावत् वृत्ते सम्पन्ने,
दयितायाः प्रेयस्या द्रौपद्या इति भावः, केशाम्बरयोः केशस्य वस्त्रस्य
चाकर्षणे आकर्षणजन्यपराभवे इति भावः, प्रग्लाने परिम्लाने सति,
भीमेन, दुःशासने, क्रूरं निर्दयं, राक्षसवैशसं राक्षसोचितं शोणितपानरूपं
कर्म, यदि, कृतं सम्पादितं, तदा तत्कालक्षमिणा सद्यःकृतापराधकाल-
१७६ औचित्यविचारचर्चा
क्षमिणा तेन, चिरं बहुकालं यावत्, त्रयोदशवर्षपर्यन्तमिति भावः, कुशा-
श्मभ्यां तीक्ष्णकुशपरुषप्रस्तराभ्यां परुषं कठिनं यदरण्यं वनं, तस्य
प्रवासे, ततो विस्तृतो यस्तापो रौद्रस्तेन मग्ना जले बुडिता ये महिषास्तेषां
स्वेदाम्बुभिः स्वेदजलकणैः पृक्तं मिश्रितं, पयो जलं, किं किमर्थं पीतम् ?
एतादृशमेव क्रूरं कर्म यदि करणीयमासीत्तदेतत्कालपर्यन्तमरण्यवासक्लेशः
किमर्थमङ्गीकृत इति भावः ।
विचारानौचित्य का उदाहरण दिखाने के लिए कहा गया है--न तु यथा
ममेति । प्रग्लान इति । भरी सभा में दुःशासन ने केश और वस्त्र खींचकर द्रौपदी
का अपमान किया था इस बात को बीते तेरह वर्ष हो गये थे, बात पुरानी पड़
गयी थी, उस समय में भीम ने भी इसे सह ही लिया था फिर इतने दिनों के
बाद ( महाभारत-युद्ध के समय ) दुःशासन का रक्तपानरूप राक्षसोचित दुष्कर्म
यदि भीम को करना ही था तो जंगल के कुश और पत्थरों में भटकते हुए, गर्मी
के मारे जल में आकण्ठनिमग्न भैंसों के पसीनों से कुस्वादु पानी पीने का कष्ट
अब तक क्यों सहते रहे ?
अत्र भीमसेनचरिते विचार्यमाणे त्रयोदशवर्षपर्युषिते कृष्णाकेशा-
कर्षणपराभवे भीमेन भीमं राक्षसकर्म दुःशासने यदि कृतं तत्सद्यः
कृतार्द्रापराधकालक्षमिणा सुचिरं दर्भसूचीविषमाश्मपरुषवनवासे किं
ग्रीष्मतापनिमग्नमहिषस्वेदस्रुतिपृक्तं पयः पीतमित्यनुपपन्नकृत्येऽभिहिते
कारणविचाराभावान्निर्मूलोपालम्भमात्रमनौचित्यमनुबध्नाति ॥३७॥
अस्मिन्पद्ये भीमचरित्रे विवच्यमाने द्रौपदीकेशाकर्षणजन्यपराभवे
त्रयोदशवर्षपूर्वं व्यतीते सति, भीमेन भयानकं राक्षसोचितशोणितपानरूपं
कर्म दुःशासने यदि विहितं तर्हि सद्योविहितस्यार्द्रापराधस्य समये क्षमा-
कारिणा तेन, बहुदिनं यावत् दर्भाग्रनिम्नोन्नते कठिने च वनवासे तत्काले
इति भावः, किमर्थं ग्रीष्मतापेनाकण्ठजलमग्नानां महिषाणां, स्वेदाम्बुकणि-
काभिः संयुक्तं जलं पीतम् ?, इतीत्थंरूपेण भीमस्यायुक्ते कार्ये उक्ते,
कारणविचाराभावात्तादृशक्रूरकर्मकरणे यन्महत्तरं प्रतिज्ञारूपकारण-
मासीत्तस्य विचाराभावान्निर्मूलोपालम्भमात्रं निरर्थकनिन्दोक्तिमात्रमनौ-
चित्यं विचारकृतानौचित्यमनुबध्नाति प्रकटयति ।
इस पद्य में "भीमसेन के चरित्र का विचार करते समय द्रौपदी चीरहरण-
रूप विपत्ति के बीते तेरह वर्ष हो जाने पर भीमसेन से दुःशासन के रक्तपान
संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता १७७
के जैसा भयानक और राक्षसोचित काम यदि किया हो तब उस समय में उस
अपराध को क्षमा करके तेरह वर्षों तक जंगलों में भटकते हुए धूप की गर्मी से
आकण्ठनिमग्न भैसों के पसीने से युक्त जल पीने का कष्ट क्यों स्वीकार किया ?
अर्थात् यह कर्म उनका उचित नहीं हुआ” ऐसा जो कहा गया है उसमें कारण
के ऊपर कुछ भी ध्यान नहीं दिया गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि केवल उपा-
लम्भ देना मात्र कवि का अभोष्ट है इससे विचारकृत अनौचित्य स्पष्ट उद्भासित
हो जाता है ॥ ३७ ॥
नामौचित्यं दर्शयितुमाह—
नाम्ना कर्मानुरूपेण ज्ञायते गुणदोषयोः ।
काव्यस्य पुरुषस्येव व्यक्तिः संवादपातिनी ॥ ३८ ॥
काव्यस्य कर्मानुरूपेण नाम्ना पुरुषस्येव गुणदोषव्यक्तिः संवादिनी
जायते ।
विचारौचित्यविवेचनात्परं सम्प्रति क्रमप्राप्तं षड्विंशतितमं नामौचित्यं
मीमांसितुमुपक्रमते—नाम्नेति। कर्मणः कार्यस्यानुरूपेण समुचितेन, नाम्ना
नामधेयेन, काव्यस्य कविकृतेः, पुरुषस्य मनुष्यस्येव, गुणदोषयोः, संवाद-
पातिनी संवादिनी, व्यक्तिरभिव्यक्तिः, ज्ञायतेऽवगम्यते ।
कारिकार्थमेव विशदयति—काव्यस्येति । यथा पुरुषस्य मानवस्य,
कर्मानुरूपेण नाम्ना, गुणदोषयोरभिव्यक्तिः संवादिनी जायते तथैव काव्य-
स्यापि गुणदोषयोरभिव्यक्तिः कर्मानुरूपेणाभिधेयेन संवादिनी प्रतीयते ।
विचारौचित्य का विचार करके अभी छब्बीसवें नामौचित्य की विवेचना
करने के लिये कहा जा रहा है—नाम्नेति । जैसे कार्य के अनुरूप नाम से पुरुषों
के गुण-दोषों की अभिव्यक्ति हो जाती है उसी तरह कर्म के अनुरूप नाम के
प्रयोग से काव्य के गुण-दोषों का यथार्थ ज्ञान हो जाता है।
कारिका की ही व्याख्या की जा रही है-काव्यस्येति । जैसे मनुष्यों के कर्मा-
नुसार नाम से उनके गुण-दोषों का पता चल जाता है वैसे ही काव्यों के
गुण-दोषों की अभिव्यक्ति भी उनके प्रतिपाद्य विषय के अनुरूप नाम से ही
होती है ।
यथा कालिदासस्य—
इदमसुलभवस्तुप्रार्थनादुर्निवारः
प्रथममपि मतो मे पञ्चबाणः क्षिणोति ।
१२ औ०
१७८ औचित्यविचारचर्चा
किमुत मलयवातान्दोलितापाण्डुपत्रै-
रुपवनसहकारैर्दर्शितेष्वङ्कुरेषु ॥
नामौचित्यमुदाहर्तुमाह यथा कालिदासस्येति । इदमिति । असुल-
भस्य दुर्लभस्य, वस्तुनः प्रियाया इति भावः, प्रार्थनया कामनया हेतुना,
दुर्निवारोऽनिवार्य इति भावः, पञ्चबाणः कामः, प्रथममपि प्रारम्भ एव, मे
मम, मनश्चित्तं क्षिणोति शकलीकरोति, मलयवातेन मलयानिलेनान्दो-
लितानि कम्पितान्यापाण्डूनि पाण्डुरवर्णानि पत्राणि येषां तैरुपवनसहकारै-
रुपवनस्थिताम्रवृक्षैस्तद्वारेत्यर्थः, दर्शितेष्वसङ्ख्येयेष्वङ्कुरेषु किमुत ? इति
न जाने—इति तात्पर्यम् ।
नामौचित्य का उदाहरण दिखाने के लिये कहा गया है—यथा कालिदास-
स्येति । इदमिति । अलभ्य वस्तु (प्रियतमा) की प्रार्थना (कामना) करने के
कारण दुर्निवार बने हुए इस पंचबाण (कामदेव) ने पहले से ही तो मेरे मन को
खंड-खंड कर रखा है, मलयानिल से आन्दोलित पीले पत्तोंवाले उपवनस्थित
आम्रवृक्षों के द्वारा अंकुरों के प्रदर्शन से न जाने अब क्या करने का विचार है ?
अत्र प्रारम्भ एव ममेदं मनः पञ्चबाणः सुदुर्लभवस्तुप्रार्थनादुर्निवारः
शकलीकरोति किमुत लीलोद्यानसहकारैर्मलयानिलान्दोलितबालपल्ल-
वैरङ्कुरेषु दर्शितेष्वित्युक्ते मदनस्य पञ्चबाणाभिधानमुचितमेव ।
अस्मिन्पद्ये, पूर्वमेव ममेदं मनः क्षिणोति मदनः प्रियतमायाः
कामनया दुर्निवारः सन्, शकलीकरोति सुरभितवातकम्पितप्रवालैरु-
पवनस्थाम्रवृक्षैरङ्कुरेषु दर्शितेषु किमुत ? इत्युक्ते कामदेवस्य 'पञ्चबाण'
इति नामोपादानं नितरां समुचितम् । अर्थात् हृदयभेदनरूपकर्मकारिणः
पञ्चबाण एव संज्ञोपयुक्तास्ति, यद्यत्रैव “अनङ्ग” इत्युच्येत न तर्हि समुचितं
स्यात्तस्मादत्र-कर्मोचितपञ्चबाणनाम्ना नाम्न औचित्यमत्यन्तं समुज्ज्वल-
मिति ज्ञेयम् ।
इस पद्य में “पहले ही मेरे इस मन को अलभ्य वस्तु (प्रियतमा) की
प्रार्थना (प्राप्तिकामना) से अपरिहार्य पंचबाण (कामदेव) ने तो खंडखंड
कर रखा है, अब मलयानिल के झोंके से डोलते हुए किसलय वाले उपवनस्थ सह-
कार (आम्र) वृक्षों के द्वारा नये-नये अंकुरों को दिखाकर न जाने क्या करना
चाहता है ? अर्थात् जब पांच ही बाण उसके पास थे तब तो मेरी ऐसी दशा हो
गयी थी, अब असंख्य बाणों वाला बनकर वह क्या कर देगा, इसका पता नहीं,
संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता १७९
इस तरह के कथन में कामदेव को पंचबाण के नाम से जो अभिहित किया गया
है उससे उसके नाम का औचित्य अत्यन्त परिस्फुट हो जाता है, क्योंकि हृदय-
भेदनरूप कर्म करने वाले काम को पंचबाण होना ही चाहिये । यहीं पर यदि
अनङ्ग कहा गया होता तो अनुचित होता, इसलिये यहाँ नामौचित्य का बड़ा ही
मार्मिक रूप उपस्थित हो जाता है ।
यथा वा मम बोद्धावदानलतायाम् —
तारुण्येन निपीतशैशवतया साऽनङ्गशृङ्गारिणी,
तन्वङ्ग्या सकलाङ्गसङ्गमसखी भङ्गीर्नवाऽङ्गीकृता ।
निःसंरम्भपराक्रमः पृथुतरारम्भाभियोगं विना,
साम्राज्ये जगतां यया विजयते देवो विलासायुधः ॥
नामौचित्यस्य द्वितीयमुदाहरणमुपस्थापयितुमाह—यथा वा ममेति ।
तारुण्येनेति । तारुण्येन यौवनेन, निपीतं कवलितं विनाशितमिति यावत्,
शैशवं बाल्यावस्था यस्यास्तस्या भावस्तत्ता तया हेतुना, तन्वङ्ग्या कृशा-
ङ्ग्याऽनङ्गशृङ्गारिणी कामव्यञ्जकशृङ्गारवती, सकलाङ्गसङ्गमसखी
सकलावयवसम्पर्किणी, सा तादृशी, नवा नूतना भङ्गिः क्रमोऽङ्गीकृता
स्वीकृता यथा तन्वङ्गीभङ्ग्या, निःसंरम्भोऽप्रत्नसिद्धः पराक्रमो यस्यैवं-
भूतो विलासो विभ्रम एवायुधं शस्त्रं यस्य, स देवः कामदेवः पृथुतरा-
म्भाभियोगं प्रभूततरारम्भसम्भारं विनैव, जगतां त्रैलोक्यस्य, साम्राज्ये,
विजयते सर्वोत्कृष्टतया जयं लभते ।
नामौचित्य का द्वितीय उदाहरण दिखाने के लिये कहा गया है—यथा वा
ममेति । तारुण्येनेति । तारुण्य के द्वारा शैशव के समाप्त कर दिये जाने पर
कृशाङ्गी ने कामव्यञ्जकशृङ्गारवाली और सभी अंगों के साथ मित्रता रखने
वाली एक ऐसी भंगी को अपना लिया है जिससे अयत्नसिद्धपराक्रम वाले
विलासायुध ( कामदेव ) को बिना कुछ किये ही तीनों लोकों की विजय मिल
गयी है ।
अत्र '