औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता १७७
के जैसा भयानक और राक्षसोचित काम यदि किया हो तब उस समय में उस
अपराध को क्षमा करके तेरह वर्षों तक जंगलों में भटकते हुए धूप की गर्मी से
आकण्ठनिमग्न भैसों के पसीने से युक्त जल पीने का कष्ट क्यों स्वीकार किया ?
अर्थात् यह कर्म उनका उचित नहीं हुआ” ऐसा जो कहा गया है उसमें कारण
के ऊपर कुछ भी ध्यान नहीं दिया गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि केवल उपा-
लम्भ देना मात्र कवि का अभोष्ट है इससे विचारकृत अनौचित्य स्पष्ट उद्भासित
हो जाता है ॥ ३७ ॥
नामौचित्यं दर्शयितुमाह—
नाम्ना कर्मानुरूपेण ज्ञायते गुणदोषयोः ।
काव्यस्य पुरुषस्येव व्यक्तिः संवादपातिनी ॥ ३८ ॥
काव्यस्य कर्मानुरूपेण नाम्ना पुरुषस्येव गुणदोषव्यक्तिः संवादिनी
जायते ।
विचारौचित्यविवेचनात्परं सम्प्रति क्रमप्राप्तं षड्विंशतितमं नामौचित्यं
मीमांसितुमुपक्रमते—नाम्नेति। कर्मणः कार्यस्यानुरूपेण समुचितेन, नाम्ना
नामधेयेन, काव्यस्य कविकृतेः, पुरुषस्य मनुष्यस्येव, गुणदोषयोः, संवाद-
पातिनी संवादिनी, व्यक्तिरभिव्यक्तिः, ज्ञायतेऽवगम्यते ।
कारिकार्थमेव विशदयति—काव्यस्येति । यथा पुरुषस्य मानवस्य,
कर्मानुरूपेण नाम्ना, गुणदोषयोरभिव्यक्तिः संवादिनी जायते तथैव काव्य-
स्यापि गुणदोषयोरभिव्यक्तिः कर्मानुरूपेणाभिधेयेन संवादिनी प्रतीयते ।
विचारौचित्य का विचार करके अभी छब्बीसवें नामौचित्य की विवेचना
करने के लिये कहा जा रहा है—नाम्नेति । जैसे कार्य के अनुरूप नाम से पुरुषों
के गुण-दोषों की अभिव्यक्ति हो जाती है उसी तरह कर्म के अनुरूप नाम के
प्रयोग से काव्य के गुण-दोषों का यथार्थ ज्ञान हो जाता है।
कारिका की ही व्याख्या की जा रही है-काव्यस्येति । जैसे मनुष्यों के कर्मा-
नुसार नाम से उनके गुण-दोषों का पता चल जाता है वैसे ही काव्यों के
गुण-दोषों की अभिव्यक्ति भी उनके प्रतिपाद्य विषय के अनुरूप नाम से ही
होती है ।
यथा कालिदासस्य—
इदमसुलभवस्तुप्रार्थनादुर्निवारः
प्रथममपि मतो मे पञ्चबाणः क्षिणोति ।
१२ औ०