औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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भट्टतौत इति। नवनवकल्पनाकारिणी बुद्धिरेव प्रतिभा मतेति भट्टतौत-
मतमित्यर्थः।
इस पद्य में नये प्रेमी को द्वार पर उपस्थित जानकर नायकान्तर के द्वारा दष्ट
अधरवाली अनभिज्ञ की जैसी किसी पुंश्चली नायिका ने शुक को उद्देश्य करके
जो कहा है कि--“ऐ निर्दयी सुग्गे ! बिम्बफलके भ्रम से तुम मेरे अधर को क्यों
काट रहे हो, तुम बड़े चंचल हो, तुम्हें मैं इसके दंडस्वरूप पके जामुन आज
खाने को नहीं दूँगी, तुम उससे निराश हो जाओ इत्यादि” इससे प्रतिभौचित्य का
बड़ा ही सुन्दर आभास मिल रहा है, क्योंकि असत्य (शुक द्वारा अधरक्षति)
के ज्ञापन और सत्य (नायक द्वारा अधरदंशन) के गोपन की नूतन कल्पना में
बुद्धि का सुन्दर उपयोग किया है और इस तरह की नवीन कल्पना करने वाली
बुद्धि को ही प्रतिभा कहते हैं, जैसा कि भट्टतौत ने कहा है।
न तु यथा मम तत्रैव—
निर्याते दयिते गृहे विशयने निर्माल्यमाल्ये कृते,
प्राप्ते प्रातरसह्यरागिणि परे वारावहारेऽन्यथा।
द्वारालीनविलोचना व्यसनिनी सुप्ताहमेकाकिनी-
त्युक्त्वा नीविविकर्षणैः सचरणघातैरशोकीकृत ॥
प्रतिभानौचित्यमुदाहर्तुमाह—न तु यथा मम तत्रैवेति। निर्यात इति।
वारावहारकुपितं नायकं पुनरनुकूलयितुं कृतच्छद्मव्यवहाराया वेश्याया
वर्णनमिदम्। दयिते नूतने प्रेमिणि, निर्याते निर्गते सति, निर्माल्यमाल्ये
रात्रिकृतभोगानां माल्यकुसुमानां म्लानतया निर्माल्यरूपतामापन्ने माल्ये,
कृते बहिर्निःसारिते, गृह भवने, विशयने शेतेऽस्मिन्निति व्युत्पत्त्या शयनं
शय्या तद्रहिते सम्पादिते, प्रातरुषसि, असह्यरागिण्येकान्तप्रेम्णि,
वारावहारे वारस्य निश्चितदिनस्यापहरणे जाते, अन्यथेर्ष्याक्रोधादियुक्ते,
परे पूर्वनायके प्राप्ते सति, द्वार आलीने त्वदागमनमार्गं द्रष्टुं संलग्ने,
विलोचने नयने यस्यास्तथाभूता, व्यसनिनी त्वदालोकनं मे व्यसनं
(दुरभ्यासः) सम्पन्नमस्तीति भावः, अहमेकाकिन्येकलैव न तु केनाप्यन्य
पुरुषेण सहेति भावः, सुप्ता शयनमकार्षमित्युक्त्वेति कथनोत्तरकाले,
नीविविकर्षणैः विश्वासोत्पादकवचनश्रवणविगतमन्युना नायकेन तन्नी-
विग्रन्थिविमोचने प्रवृत्तमिति तत्क्रोधैरित्यभिप्रायः, तया वेश्यया, चरणा-
घातैः पादताडनैः स पूर्वनायकोऽशोकीकृतः शोकरहितः सम्पादितोऽथवा