औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
पृष्ठ 233, कुल 256 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता १७३
एवानौचित्ये नावस्थानुरूपवर्णनाकरणेन चेतसि किमपि विचित्रं सङ्कोच-
मादधात्युपस्थापयति ।। ३६।।
इस पद्य में वृद्धावस्थापन्न तथा स्थिरपराक्रमशाली प्रसिद्ध धनुर्धर परशुराम,
प्रथम-प्रथम धनुषधारण करने के कारण लाल तलहथीवाले, बच्चा राम के साथ
असंख्य क्षत्रियों के विनाश में पटु होकर एकमात्र ताडकाघाती के साथ, कान
तक पके हुए केशवाले होकर दुधपीते के साथ, युद्ध की इच्छा करते हुए उन्हें
लज्जा क्यों नहीं आती ? इस कथन में कोमल होने के कारण राम की और
भार्गव की अवस्था में असामञ्जस्य प्रतिपादित करने के क्रम में 'तातकाताडकेन
= ताड़का को मारने वाले के साथ" ऐसा जो कहा गया है वह राम की अवस्था
के विपरीत प्रतीत होता है, क्योंकि एक बच्चे के लिये (जिसे कि दुग्धाद की
उपाधि से विभूषित किया गया है) ताड़का जैसी दुर्दान्त राक्षसी का वध कैसे
संभव हो सकता है ? इससे इसमें अवस्थागत अनौचित्य का समावेश हो गया है,
जिससे पाठकों के हृदय में एक विचित्र संकोच का उदय हो जाता है ।। ३६ ।।
विचारौचित्यं दर्शयितुमाह—
उचितेन विचारेण चारुतां यान्ति सूक्तयः ।
वेद्यतत्त्वावबोधेन विद्या इव मनीषिणाम् ॥३७॥
विचारौचित्येन सूक्तयश्चारुतां यान्ति, ज्ञेयस्वरूपज्ञानेन विद्या इव
विदुषाम् ।
अवस्थौचित्यविचारानन्तरं सम्प्रति प्राप्तपर्यायं पञ्चविंशतितमं
विचारौचित्यं विवेचयितुमाह—उचितेनेति । उचितानुरूपेण, विचारेण,
सूक्तयः काव्यानि, वेद्यतत्त्वावबोधेन ज्ञातव्यतत्त्वज्ञानेन, मनीषिणां
विदुषां, विद्याः शास्त्राणीव, चारुतां स्पृहणीयतां, यान्ति गच्छन्ति ।
कारिकार्थमेव स्फारयति—विचारौचित्येनेति । विचारौचित्येन
विचारानुरूपवर्णनेन, सूक्तयस्तथैव चारुतां रमणीयतां, यान्ति प्राप्नुवन्ति,
यथा ज्ञेयस्वरूपज्ञानेन ज्ञातव्यतत्त्वपरिज्ञानेन विदुषां कृतविद्यानां विद्याः
स्पृहणीयतामासादयन्ति ।
अवस्थौचित्य का विचार कर लेने के बाद अभी अवसर प्राप्त होने पर
पचीसवें विचारौचित्य की विवेचना की जा रही है--उचितेनेति । अनुरूप विचार
के द्वारा कवियों की कृतियाँ, ज्ञेयत्त्व के ज्ञान से मनीषियों की विद्याओं की तरह
स्पृहणीयता को प्राप्त कर जाती हैं ।