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सर्वकोश
औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 227, कुल 256 में से

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पृष्ठ 227

तरुणोपादताडनेनाशोको नाम वृक्षो यथा विकसितो भवति तथैव सोऽपि
नायकस्तच्चरणप्रहारेण सञ्जातरोमोद्गमो जात इत्यशोकतुल्यः कृत
इत्यर्थः । वेश्यायातकृतपदमत्राहार्यमिति बोध्यम् ।
प्रतिभागत अनौचित्य को प्रदर्शित करने के लिये कहा गया है--न तु यथा
ममेति । निर्याते इति । किसी नये प्रेमी के साथ रात बिताने की भावना से
वेश्या ने अपने पूर्वप्रेमी को किसी अन्यहेतुक छल से एक दिन के लिये आने
से रोक कर उस नये प्रेमी के साथ रात को रंगरेलियाँ मनायीं, सबेरे जब वह
चला गया तब निर्माल्यरूप पुष्पमाला तथा बिछावन आदि को हटाकर घर साफ
कर दिया और उस पूर्वप्रेमी को आया हुआ देखकर कहा कि मैं तुम्हें आने से
रोककर स्वयं भी प्रसन्न नहीं हूँ, देखो न, रात भर अकेली भूमि पर लेटी हुयी
द्वार पर टकटकी लगाये तुम्हारे आने की राह देखती रही हूँ । इस कथन से
प्रभावित होकर नायक उसकी नीवि-ग्रन्थि को खींचने लगा जिससे कृत्रिम क्रोध
करके उस वेश्या ने पदताड़न से उसको अशोक ( शोकर