औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
पृष्ठ 223, कुल 256 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता १६३
न तु यथा परिव्राजकस्य -
तपो न तप्तं वयमेव तप्ता भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः ।
जरा न जीर्णा वयमेव जीर्णास्तृष्णा न याता वयमेव याताः ॥
सारसंग्रहानौचित्यमुदाहर्तुमाह--न तु यथा परिव्राजकस्येति । तप
इति । तपस्तपस्या न तप्तं, वयं सांसारिकप्राणिन एव तप्ताः, सन्तापमासा-
दितवन्तः, भोगाः सांसारिकसुखभोगादिका, न भुक्ताः न भोगविषयी-
कृताः, अपितु वयमेव कालपुरुषेण भुक्ताः कवलीकृताः, जरा वार्धकं, न
जीर्णा पुरातनतामाप्तवती, अपितु वयं जीविन एव जीर्णा वृद्धत्वमुपगताः,
तृष्णा, न याता नापगता, वयमेव याता अन्तममुपगताः । सकलं
निःसारमेवेति भावः ।
सारसंग्रहानौचित्य का उदाहरण दिखाने के लिये कहा गया है-न तु
इति । तप इति । तप नहीं तपा गया हम ही संतप्त हुए, सांसारिक नानाविध
भोगों का उपभोग नहीं किया जा सका, हमारा ही उपभोग (काल पुरुष के
द्वारा) कर लिया गया, बुढ़ापा नहीं जीर्ण हुआ, हम ही बूढ़े हो गये, ऐहलौकिक
व पारलौकिक विषयों की प्राप्येष्णा नहीं समाप्त हो सकी, परन्तु हम समाप्त हो
गये । कहने का तात्पर्य यह है कि ये सारे के सारे निरर्थक हैं इनसे कुछ भी
साधन नहीं हो सकता ।
अत्र 'वयमेव तप्ता, भुक्ता, जीर्णा, याता" इत्युक्ते निःसाराचारु-
त्वादपर्यवसितो वाक्यार्थः फलशून्यतया सारसंग्रहोचितं न किञ्चित्प्रति-
पादयति ॥३४॥
अस्मिन्पद्ये “वयं सांसारिकप्राणिन एव, तप्ता भुक्ता जीर्णा याताः”
इति कथने निःसाराचारुत्वात्संसारस्य सारहीनत्वाशोभनत्वमात्रप्रति-
पादनात्, अपर्यवसितो निराकाङ्क्षबोधविषयताशून्यो वाक्यार्थः, फल-
शून्यतया निष्प्रयोजनतया, सारसंग्रहोचितं न किञ्चित्प्रतिपादितं भवति ।
अतः सारसंग्रहानौचित्यं स्पष्टमिति भावः ॥३४॥
इस पद्य में "हम ही तप्त हुए, भोगे गये, बूढ़े हुए, तथा समाप्त हो गये"
इस कथन से केवल सांसारिक आचरणों की सारहीनता और अशोभनता ही
प्रतिपादित हुयी, परन्तु सार क्या है इस पर कुछ भी प्रकाश नहीं पड़ सका,
इसलिये इस तरह का अपूर्व सारसंग्रह अनौचित्य का ही उदाहरण हो सकता है,
औचित्य का नहीं ॥३४॥