औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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पूर्वप्रिये, प्राप्ते समायाते--'त्वदालोकनकांक्षिणी त्वद्दर्शनचेष्टाशालिनी,
व्यसनिनी दुरभ्यासा, द्वारन्यस्तनयना द्वारदेशस्थिरीकृतनेत्राऽहमेका-
किन्येकलैव सुप्ता आसमिति शेषः, इत्येवंविधेन, प्रत्यायनावचनेन
विश्वासोत्पादकवचनकथनेन, विलीनो नष्टो मन्युः क्रोधो यस्य तस्य
नायकस्य, सरभसं सवेगं सरसं च यन्नीविविकर्षणं नीविग्रन्थिमोक्षणं,
तस्मिन्नुद्यतया तत्परयाऽऽकृत्या कृत ईर्ष्या कोपो यस्यास्तया चरणनलिन-
प्रहारैश्चरणारविन्दाघातैरशोकीकृतः, शङ्काशल्योन्मूलनान्निःशोकः सम्पा-
दितः, परपुरुषसम्पर्कजन्यशङ्कारूपशङ्कोरुन्मूलनात्प्रत्यायनावचनद्वारोत्पाट-
नान्निःशोको विगताखिलशोकः सम्पादितः । अथवा सन्ततपुलकाङ्कुरत्वा-
दानन्दोद्रेकोपयातर रोमाञ्चत्वादशोकतरुतुल्यतां नीत इति वाक्यार्थः,
गणिकायाः केवलं सत्यो यो विप्रलम्भो वियोगस्तत्प्रयुक्तं यत् प्रागल्भ्यं दृढत्वं,
तन्मात्रमेव, गाढरागमूलकतां दृढप्रेममूलकतामेव च प्रतिपादयति, न तु
प्रतिभोद्भूतां प्रतिभाजन्यामौचित्यकणिकामौचित्यलेशं सूचयति ॥ ३५ ॥
इस पद्य में वेश्या ने अपने ऊपर विशेषासक्त किसी कामुक का उस दिन-
मात्र के लिये तिरस्कार करके किसी नये प्रेमी के साथ रात बितायी, फिर सबेरे
उस नये प्रेमी के चले जाने के बाद संभोगव्यंजक मर्दित शय्या, तथा निर्माल्य
पुष्पादिक को हटा दिया, एवं दुत्कार देने के कारण क्रोधयुक्त तथा एकान्तप्रेमी
उस पूर्व प्रेमी के आने पर कहा कि मैं तो तेरे वियोग में व्याकुल होकर अकेली
सोयी हुई बराबर द्वार पर आँखें बिछाये तुम्हारी ही राह देख रही थी, इस
तरह की विश्वासोत्पादक बातें सुनकर जब उस नायक का क्रोध कुछ ठंडा पड़
गया और उसे जब चुहलबाजी सूझने लगी, तब कृत्रिम क्रोध करके उस वेश्या
ने उसे अपने चरणप्रहार से अशोक के समान खिला दिया, इस कथन से वेश्या
के दृढ़ प्रेम का तथा वियोगदुःख की सत्यता का ही परिचय मिलता है, विलक्षण
प्रतिभा का तो कुछ लेश भी नहीं मिलता । इसलिये इससे प्रतिभौचित्य का
व्याघात ही होता है, उच्छ्राय नहीं ॥ ३५ ॥
अवस्थौचित्यं दर्शयितुमाह-
अवस्थौचित्यमाधत्ते काव्यं जगति पूज्यताम् ।
विचार्यमाणरुचिरं कर्त्तव्यमिव धीमताम् ॥३६॥
अवस्थोचिततया काव्यं जगति श्लाघ्यतामायाति, मतिमतामिव
कृत्यं विचारनिर्घर्षरुचिरम् ।