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सर्वकोश
औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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पृष्ठ 232

१७२ औचित्यविचारचर्चा
द्योतिनीति तत्कारकेणेति भावः, वृद्धवयसः दुग्धपेन शिशुना योद्धुं
प्रयासो नितरां लज्जाप्रद इति ।
अवस्थानौचित्य का उदाहरण दिखाने के लिये कहा गया है--न तु यथा
राजशेखरस्येति । ज्यायानिति । धनुर्धारियों में सर्वश्रेष्ठ, क्षत्रियों के विनाश
करने में क्षम जिनके कानों के पास के केश पककर श्वेत हो रहे हैं, अर्थात् जो
बुढ़ापे की ओर अग्रसर हो रहे हैं ऐसे महाबली परशुराम, नये-नये धनुष धारण
करने के कारण जिनकी हथेली लाल हो रही है, जो ताड़का ( एक स्त्री मात्र )
का विनाश कर सके हैं, इतना ही नहीं जो कि अभी तक दुधपिव्वे कहे जा सकते
हैं ऐसे रामचन्द्र के साथ युद्ध करने की इच्छा रखते हुए स्वयं ही लज्जित क्यों
नहीं हो रहे हैं, अर्थात् प्रशस्तधन्वी का नवसिखुए के साथ, बड़े-बड़े क्षत्रिय
राजाओं को मारनेवालों का एकमात्र स्त्रीघाती के साथ, तथा बूढ़े का दुधपिव्वे
के साथ युद्ध की चर्चा भी लज्जाजनक है, फिर ऐसा करते हुए परशुराम को भी
लाज आनी चाहिए ।
“अत्र भार्गवः स्थविरावस्थास्थितः स्थिरतरपराक्रमकर्कशप्रौढो
धनुर्धरः शिशुना रामेण धनुर्ग्रहणारुणितकोमलकरकमलतलेन क्षत्रियक्षय-
संरम्भप्रगल्भस्ताटकाताडकेन स्फुरदाकर्णपलितः सम्भाव्यमानजननीस्त-
नक्षीरकण्ठेनामुना युयुत्सुः कथं न लज्जत” इत्युक्ते पेशलतया राघवाव-
स्थायां जामदग्न्यावस्थाविपरीततायां प्रतिपाद्यमानायां ताटकाताडकेनेति
विरुद्धाधिवासोऽर्थः किमप्यनौचित्येन चेतसि सङ्कोचमादधाति ॥३६॥
“अस्मिन्पद्ये, वृद्धावस्थापन्नो निश्चितपराक्रमप्रगल्भो धनुर्धरः परशु-
रामो धनुर्धारणारुणहस्ताब्जतलेन शिशुना रामेण, क्षत्रियविनाशारम्भ-
सप्रतिभस्ताडकेतिनामकासुरदारिकाविनाशकेन, आकर्णपलितकेशशो-
भितः, सम्भाव्यमानं जनन्या मातुः स्तनयोः क्षीरं दुग्धं कण्ठे यस्य
तेनामुना रामेण युद्धं कर्तुमिच्छुः सन् कथं न लज्जत” इत्युक्ते पेशलतया
कोमलतया, राघवावस्थायां रामचन्द्रवयसि, जामदग्न्यस्य परशुरामस्या-
वस्थया वयसा विपरीतायां विरुद्धायां, प्रतिपाद्यमानायां कथ्यमानायां
“ताटकाताडकेने”ति विरुद्धाधिवासोऽर्थो विरुद्धस्यार्थस्याधिवासो गन्धो
यस्मिंस्तादृशोऽर्थः । इदमत्राकूतम्--राघवस्य ऋजुत्वमत्र कवेरभिमतमिति
तत्कर्तृकताडकाताडनात्मकपरुषपुरुषोचितकर्मवर्णनमनुचितमिति । अत