औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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स्वभावानौचित्यमुदाहर्तुमाह—न तु यथा ममेति । भक्तिरिति ।
भक्तिरीश्वरादिसेवनं, कातरतामसहायतां, क्षमा सहनशक्तिः, सभयतां
भययुक्ततां, पूज्यस्तुतिरादरणीयजनस्तवनं, दीनतां दरिद्रतां, धैर्यं धीरता,
दारुणतां क्रूरतां, मतिर्बुद्धिः, कुटिलतां वक्रतां, विद्याबलं शास्त्राभ्यासः,
क्षोभतां क्षोभयतीति क्षोभस्तत्तां क्षोभकतां क्षोभकारितामिति यावत् ।
ध्यानं वञ्चकतां धूर्ततां, तपस्तपस्या, कुहकतां छलितामैन्द्रजालिकतां वा,
शीलव्रतं सत्स्वभावरक्षणं, षण्ढतां नपुंसकतां यातीति शेषः, एवञ्चैतत्सिद्धं
यत्--पैशुन्यव्रतिनां पैशुन्यैकव्यसनिनां या गिरो वाचस्तासां कृते इति
शेषः, किं वा नु दोषार्द्रतां दोषभाजनत्वमिव, नायाति न प्राप्नोत्यपि तु
सर्वमपि दोषार्द्रतामेवोपयाति, पिशुना गुणानपि स्ववाग्जालैर्दोषानेव
विधत्त इति भावः ।
स्वभावानौचित्य का उदाहरण दिखाने के लिये कहा गया है—न तु यथेति ।
भक्तिरिति । पिशुनों की वाणी गुणों को भी दोष बना देती है । जैसे भक्ति को
कातरता का, क्षमा को सभयता का, स्तुति को दीनता का, धैर्य को क्रूरता का,
बुद्धि को कुटिलता का, विद्या को क्षोभकारिता का, ध्यान को वञ्चकता का, तप
को छलिता का, और सत्स्वभाव को नपुंसकता का रूप ( पिशुन वाणी ) दे
डालती हैं ।
अत्र पिशुनस्वभावे वर्ण्यमाने भक्त्यादीनां गुणानां वैपरीत्ये प्रति-
पादिते पिशुनानां वयसां किं वा दोषार्द्रता नायातीत्यभिहिते स्वयमनार्द्र-
स्वभावस्य परार्द्रीकरणमनुचितमेव ॥३३॥
अस्मिन्पद्ये पिशुनस्वभावे वर्ण्यमाने, भक्तिक्षमादीनां विशिष्टगुणानां
विपर्यासे कथिते, "पिशुनवचसां कृते किं वा वस्तु दोषास्पदत्वं न प्राप्नोति"
इति प्रतिपादिते स्वयमनार्द्रस्वभावस्य पिशुनवचसः परार्द्रीकरणं भक्त्या-
दीनां दोषार्द्रीकरणमनुचितं नितरामनौचित्यं वहतीति भावः ॥३३॥
इस पद्य में पिशुन स्वभाव वर्णन-क्रम में भक्ति, क्षमा, स्तुति आदि गुणों की
विपरीतता का वर्णन करने के बाद "पिशुनों की वाणी से संबद्ध होकर कौन-सी
वस्तु दोषार्द्रता को नहीं प्राप्त कर जाती है" इस तरह के कथन से यह बात
विरुद्ध मालूम पड़ने लग जाती है कि जो ( पिशुनवाक्य ) स्वयं अनार्द्र स्वभाव
वाला है वह दूसरों ( भक्ति आदि ) को कैसे आर्द्र ( दोषार्द्र ) बना सकता है,
इसलिये ऐसा कथन स्वभावगत अनौचित्य को व्यक्त करता है ॥ ३३ ॥