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आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

इति स्वभावहेतुः, तद्रूपत्वमात्रानुबन्धित्वाद् योग्यतायाः । तत-
श्चास्ति किञ्चित् कार्यं यत्र बीजत्वेन बीजमुपयुज्यत इति ।
बीजानुभव एवासाधारणं कार्यं यत्र बीजत्वं प्रयोजकं, तच्च
सर्वस्मादेव बीजाद्भवतीति किमनुपपन्नम् इति चेत्, न, यौगिक-
तदनुभवस्य तदन्तरेणाप्युपपत्तेः । लौकिक इति चेत्, न, सत्यमेतत्,
न त्विदमवश्यं सर्वस्माद्बीजाद्भवति इन्द्रियादिप्रत्यासत्तेरसदात-
नत्वात् असार्वत्रिकत्वाच्च । ततश्च योग्यमपि सहकार्यसन्निधानान्न¹
करोतीत्यर्थसिद्धम् ।
कार्यान्तरमेवातीन्द्रियं सर्वबीजाव्यभिचारि भविष्यतीति चेत्,
तन्न तावदुपादेयम्, अमूर्तस्य मूर्तानुपादेयत्वात्, परिदृश्यमान-

व्याप्य है। इसलिये कोई कार्य अवश्य है, जिसमें बीजत्वरूपसे बीज
उपयोगी है।
यदि कहो कि 'बीजका अनुभव ही वह विशेष कार्य है, जिसमें
बीजत्व प्रयोजक है, क्योंकि वह सभी बीजोंमें होता है, ऐसा माननेमें
क्या हानि है"? तो वह ठीक नहीं है। क्योंकि योगबलसे होने वाला
अनुभव बीजके बिना भी हो जाता है। यदि “अनुभवका मानी
लौकिक अर्थात् हमलोगोंका अनुभव लो, जो बीजकी उपस्थितिमे ही हो
सकता है" तो यह ठीक है, किन्तु यह लौकिक अनुभव भी तो सभी
बीजसे अवश्य नहीं होता। क्योंकि अनुभवके लिये बीजके साथ इन्द्रि-
यका संयोग जरूरी है और वह संयोग सदा सब बीजोंसे है नहीं। अतः
जब जिस बीजके साथ इन्द्रियसन्निकर्ष नहीं हुआ, उस बीजसे तो
अनुभव भी पैदा नहीं हुआ। इससे यह स्वतः सिद्ध हो गया कि कार्यके
योग्य भी कारण सहकारीके अभावमें कार्य नहीं करता है। इससे भी
बीजका स्थिरत्व ही सिद्ध होता है न कि क्षणिकत्व।
यदि "सब बीजसे पैदा होने वाला कोई दूसरा ही कार्य होगा जो
अतीन्द्रिय होगा" ऐसा कहो तो वह कार्य उपादेय (बीजका ही एक

१. सन्निधेर्न—२ पृ० पा०

३६ आत्मतत्त्वविवेके
मूर्तघटिततया¹ मूर्तान्तरस्य तद्देशस्यानुपपत्तेः । नापि सहकार्यं,
मिथः सहकारिणामव्यभिचारानुपपत्तेः ।
अपि चैवं सति प्रयोजकस्वभावो नान्वयव्यतिरेकगोचरः,
तद्गोचरस्तु न प्रयोजकः । दृश्यं च कार्यजातमदृश्येनैव स्वभावेन
क्रियते, दृश्येन त्वदृश्यमेवेति, सोऽयं यो ध्रुवाणीत्यस्य विषयः ।
अथवा व्यतिरेकेण प्रयोगः—विवादाध्यासितं बीजं सहकारि
परिणाम ) नहीं कहा जा सकता है । क्योकि यदि उस कार्यको अमूर्त
मानो तो वह मूर्तिहीन कार्य मूर्तिमान बीजका परिणाम नहीं हो सकता
है । यदि उसे मूर्त मानो तो ठीक नहीं, क्योंकि उस बीजसे जहा तुम्हारे
मतानुसार दृश्यमान मूर्त्तिधारी अग्रिम बीज पैदा होता है, उसी देशमे
दूसरा मूर्त कार्य नहीं उत्पन्न हो सकता है । कारण, एक ही स्थानपर
दो मूर्त्त रह नहीं सकते ।
वह कार्य बीजका सहकार्य भी नहीं कहा जा सकता । अर्थात् 'यह
कार्य बीजका परिणामरूप तो नहीं है, पर-तु इस ढङ्गका कार्य है, जिसमे
सहकारी सहित बीज निमित्त है” यह भी नहीं कह सकते हो क्योंकि
बीजको सहकारियोंका योग सदा प्राप्त ही रहेगा—यह नियम नहीं है ।
इसलिये सहकारियोंकी अनुपस्थितिकी हालतमे वही बीज उस कार्यको
नहीं भी करेगा । इस प्रकार भी बीजका स्थिरत्व ही सिद्ध होता है,
न कि क्षणिकत्व ।
इसके अतिरिक्त तुम्हारे कथनानुसार कार्यका प्रयोजक जो कुर्वद्रूपत्व-
स्वभाव है, वह कारणताका निश्चय कराने वाले अन्वय व्यतिरेक का विषय
नहीं है, और जो बीजत्व अन्वय-व्यतिरेकका विषय है, वह तो प्रयोजक
नहीं है । तथा जो दृश्य कार्य अङ्कुर है, उसे अदृश्य कुर्वद्रूपत्वसे ही
किया मानते हो और दृश्य बीजत्वसे तो अतीन्द्रिय ही कार्यकी उत्पत्ति
मानते हो । इस तरह तो यह—'योऽध्रुवाणि परित्यज्य अध्रुवाणि निषेवते ।
ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति, अध्रुवं नष्टमेव हि” इस उक्तिका विषय बन गया ।
१. मूर्तप्रतिहततया—१ पृ० पा०

क्षणभङ्गवादः ३७
वैकल्यप्रयुक्ताङ्कुरादि कार्यवैकल्यं, तदुत्पत्तिनिश्चयविषयीभूतबीज-
जातीयत्वात् । यत् पुनः सहकारिवैकल्यप्रयुक्ताङ्कुरादिकार्य-
वैकल्यं न भवति, न तदेवम्भूतबीजजातीयं, यथा शिला-
शकलमिति ।
न च किमुक्तमाध्यव्यावृत्तेरुक्तसाधनव्यावृत्तिरुदाहृतात्, किं
वा परम्परयापि तथाविध¹ प्रभवसामर्थ्यविरहादिति व्यतिरेक-
सन्देह इति वाच्यम्, प्रागेव शङ्काबीजस्य निराकृतत्वादिति ।
स्यादेतत् । मा भूत सामर्थ्यासामर्थ्यलक्षणविरुद्धधर्म-
अथवा व्यतिरेकी-अनुमानका प्रयोग किया जाता है । जैसे—
“विवादका विषय कुशूलस्थ बीज सहकारियोंके अभावके कारण ही अङ्कुर
आदि कार्य नहीं करता है । क्योंकि कार्यकारणभावनिश्चयका विषयीभूत
जो क्षेत्रस्थ बीज है, उसी जातिका यह भी है । अर्थात् जिस बीजसे
तुम भी अङ्कुरकी उत्पत्ति मानते हो, उसी बीजजातिका कुशूलस्थ बीज
भी है । किन्तु जो सहकारीके कारण अङ्कुरादि कार्य नहीं करने वाला
नहीं है, बल्कि हमेशा ही अङ्कुर करनेमे असमर्थ है, वह अङ्कुर जन्माने
वाले क्षेत्रस्थ बाजकी जातिका भी नहीं है, जैसे शिलाखण्ड ।
ऐसी आशङ्का नहीं कर सकते कि “शिलाखण्डमे जो तथाकथित
बीज-जातीयत्वका अभाव है, क्या वह तथाकथित साध्यके ही नहीं रहने-
के कारण है ? या परम्परासे भी अङ्कुर न जन्मा सकनेके कारण है ?
अतः यहाँ व्यतिरेक व्याप्ति भी सन्दिग्ध है ।” क्योंकि पहले ही शङ्काका
बीज मिटा दिया गया है । अर्थात् सभी बीज जब अङ्कुरके प्रति प्रयो-
जक सिद्ध किये जा चुके हैं, तब यह ठीक ही है कि कोई बीज यदि
अंकुर नहीं करता है तो वह केवल सहकारीके न जुटनेके कारण ही ।
शिलाखण्ड तो हमेशा ही अङ्कुरमे असमर्थ है, इसलिये वह बीज जातिसे
भी पृथक् है ।
अस्तु, “सामर्थ्य और असामर्थ्यरूप विरुद्ध धर्मोंका एक जगह
१. तथाभूत—१ पु० पा०

३८ आत्मतत्त्वविवेके
संसर्गः१, अस्तु बीजत्वमेव प्रयोजकं, भवतु च सहकारिसमवधाने
सति तद्धेतुस्वभावत्वं भावस्य, तथा च तदसन्निधानेऽकरणमप्यु-
पद्यताम् । तथापि तज्जातीयमात्र एवेयं व्यवस्था न त्वेकस्यां
व्यक्तौ, करणाकरणलक्षणविरुद्धधर्मसंसर्गस्य प्रत्यक्षसिद्धतया तत्र
दुर्वारत्वादिति चेत्, न, विरोधस्वरूपानवधारणात्२ ।
स खलु धर्मयोः परस्पराभावरूपत्वं वा स्यान्नित्यत्वानित्यत्व-
वत्, धर्मिणि तदापादकत्वं वा शीतोष्णवत्, तद्वत्ता वा दण्डित्व-
कुण्डलित्ववत् ।
संसर्ग मत हो, अंकुरके प्रति प्रयोजक भी बीजत्वसामान्य ही होवे,
सहकारियोंका योग होनेपर भाववस्तुका कर्तृत्व-स्वभाव भी रहे, तथा
सहकारियोंके अभावमें न करना भी सही होवे, तो भी यह व्यवस्था
बीजजातिमात्रके लिये ही हो सकती है, न कि एक व्यक्तिके लिये ।
क्योंकि आपके मतानुसार बखारेमे रहनेसे लेकर खेतमें जाने तक जो
एक बीज है, उसीमे करना और न करनारूप विरुद्ध धर्मोका संसर्ग
रूप दोष प्रत्यक्षसिद्ध होनेसे अनिवार्य है" ऐसा कहना भी ठीक नहीं
है । क्योंकि करण और अकरणमे किस प्रकारका विरोध है, इसीका
निश्चय नहीं हो सकता है ।
क्योंकि क्या यह विरोध करण और अकरणरूप धर्मोंका परस्परका
अभावरूप होना है ? जैसा कि नित्यत्वका अभावरूप अनित्यत्व और
अनित्यत्व का अभावरूप नित्यत्व है, तथा वे परस्परमे विरोधी है ।
अथवा धर्मीमे परस्परके अभावका आक्षेप करनारूप विरोध है ? जैसा
कि शीतत्व जलमें रहता हुआ उसमे उष्णत्वाभावका आक्षेप कर देता है
और उष्णत्व अग्निमे रहता हुआ उसमे शीतत्वाभाव का आक्षेप कर देता
है । या एकमे रहते हुए भी परस्पर भेदरूप विरोध है ? जैसा कि
एक ही पुरुषमें दण्डित्व और कुण्डलित्व दोनों रहते हैं पर दण्डित्व
और कुण्डलित्व आपसमें एक दूसरे से भिन्न हैं ।
१ धर्मद्वयस्य—१ पु० पा० २. अनवबोधात्—१ पु० पा०

क्षणभङ्गवादः ३९
न प्रथमः, निर्विशेषणस्यासिद्धत्वात् १। यावत्सत्त्वं किञ्चित्-
करणात्, सविशेषणस्य तु विरोधसिद्धावपि अध्यासानुपपत्तेः।
यदा यदकरणं हि तदा तत्करणस्याभावो नत्वन्यदा तत्कर-
णस्य, न चैतयो२रेकधर्मिसमावेशमातिष्ठामहे।
न द्वितीयः, भावाभावव्यतिरिक्तयोः करणाकरणयोरसिद्धेः।
व्यापारापरव्यपदेशसहकारिभावाभावौ हि करणाकरणे कार्यभावा-
भावौ वेति।
अतिरेकसिद्धावपि स्वकाल एव स्वाभावप्रतिक्षेपवत् अकर-
णाभावमाक्षिपेत् करणं, न त्वन्यदा, न हि यो यदा नास्ति स
इनमें प्रथम पक्ष ठीक नहीं है। क्योंकि करण और अकरण
परस्परका अभावरूप भलेही होवें, पर बिना विशेषणके सामान्यतः
अकरणत्व बीजमें असिद्ध है। क्योंकि जितने सत्पदार्थ हैं, सब
अवश्य कुछ करते हैं। इसलिये बीजमें करण और अकरण एक कालमें
कहां रहा कि विरोध हो।
यदा तदारूप कालात्मक विशेषणके सहित करण-अकरणमें विरोध
रहनेपर भी उनका एक जगह समावेश नहीं हो सकता है। क्योंकि
जब जो नहीं करता है, तभी उसमें करणका अभाव है, न कि अन्य
कालमें, अर्थात् करनेके समयमे भी। हम तो 'जब करना' और 'तभी
न करना' इन दोनों विशेषणसहित विरुद्धधर्मोंका एक धर्मीमें समावेश
मानते नहीं हैं।
दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है। क्योंकि भाव और अभाव के अति-
रिक्त करण और अकरण असिद्ध हैं। क्योंकि अन्तिम व्यापाररूप
सहकारीका भाव ही करण है और उसका अभाव ही अकरण है। अथवा
कार्य होना करण है और कार्य न होना अकरण है। अर्थात् करण और
अकरण परस्पराभाव के आपादक तब होते यदि वे परस्पराभावके
व्याप्य होते।
१. असिद्धेः—१ पु० पा० २. न चानयो—२ पु० पा०

४० आत्मतत्त्वविवेके
तदा स्वाभावं प्रतिषेत्तुमर्हतीति विरोध्यभावं वा आक्षेप्तुम् । तथा
सति न कदापि तन्न स्यात् न वा कदापि तद्विरोधो भवेदिति
“नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः” इत्यायातम्, न वा
विरोधः¹ ।
नन्वेवं सति परिमाणभेदोऽपि कालभेदेन न विरुध्यते, तत्रा-
प्येवं वक्तुं सुकरत्वात्, न, बाधकबलेन तत्र कालभेदस्य विवक्षि-
तत्त्वात् । तथाहि नारब्धद्रव्यैरेव द्रव्यावयवैर्द्रव्यान्तरमारभ्यते
करण-अकरणको सहकारिभावाभावसे अतिरिक्त माननेपर भी, जैसे,
घट अपने कालमे ही घटाभावका विरोध करता है, न कि घटा-
भावके कालमे, वैसे ही करण भी अपने कालमे ही स्वविरोधीभूत
अकरणके अभावका आक्षेप कर सकता या अकरणका विरोध कर
सकता है, न कि अकरणकाल मे भी । ऐसा नहीं होता कि जो जब
नहीं है, तभी वह अपने अभावका विरोध करता हो अथवा अपने
विरोधीके अभावका आक्षेप करता हो । वैसा होनेपर कभी भी उसका
ना नहीं होगा और कभी भी उसके विरोधीको होनेका अवसर नहीं
आयगा । इस तरह यहाँ “नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत ”
इस गीतावचनका विषय उपस्थित हो गया और तुम्हारे क्षणिकवादके
विरुद्ध वस्तुओंका नित्यत्व ही सिद्ध हो गया । एव, अपने कालमे
तथा विरोधीके भी कालमें तुम्हारे कथनानुसार यदि अपने ही रहे
तो सदैव विरोधीका अभाव हो जानेसे कहीं भी विरोध नहीं सिद्ध
हो सकेगा ।
( शङ्का ) जैसे कालभेदसे एकही वस्तुमे करण और अकरण
विरोधी नहीं कहा जाता है, वैसे कालभेदसे एक ही वस्तुमे दीर्घत्व और
ह्रस्वत्वरूप भिन्न परिमाणके रहनेमे भी विरोध नहीं होना चाहिये,
क्योंकि यहाँ भी ऐसा कहा जा सकता है कि “अपने कालमे ही एक
परिमाण अपने विरोधी दूसरे परिमाणका विरोध कर सकता है, नकि
अन्यकाल मे भी”
१. न चाविरोध.—१ पु० पा०

क्षणभङ्गवादः ४१
मूर्तत्वसमानदेशत्वयोरेकदा विरोधात् । तथा चारम्भपक्षे पूर्व-
द्रव्यनिवृत्तिः अनिवृत्तावनारम्भ इति ।
तत्र निवृत्तावाश्रयभेदादेव परिमाणभेदः, अनिवृत्तौ संयोगि-
द्रव्यान्तरानुपचये क्व परिमाणभेदोपलम्भो यो विरोधमावहेत् ।
तदुपचये ^१तु क्व परिमाणान्तरोत्पत्तिः, आश्रयानुत्पत्तेः । अतएव
स्थौल्यातिशयप्रत्ययोऽपि तत्र भ्रान्तः । तस्मात् कालभेदेनापि न
( उत्तर ) यह कहना ठीक नहीं है। क्योंकि बाधकबलसे यहाँ काल-
भेद होनेपर भी दीर्घत्व ह्रस्वत्वमे विरोध ही कहा गया है । अर्थात् एक
ही वस्तु पहले ह्रस्व होकर दीर्घ नहीं हो जाती है, बल्कि पहली वस्तुके
नष्ट हो जानेपर दूसरी ही वस्तु दीर्घ परिमाणवाली पैदा होती है ।
क्योंकि जिन अवयवोंसे पहले द्रव्यका निर्माण हुआ है, उन्हीं अवयवोंमे
दूसरा द्रव्य नहीं बनता है। क्योंकि प्रथम द्रव्यके रहते ही वहां दूसरा
द्रव्य कैसे रह सकता है ? एक समयमे दो मूर्त द्रव्योंके एक जगह
रहनेमे विरोध है। इसलिये नये द्रव्यकी उत्पत्तिपक्षमे पूर्वद्रव्यकी
निवृत्ति माननी पड़ेगी। यदि पूर्वद्रव्यकी निवृत्ति न हो तो नये द्रव्यका
आरम्भ भी नहीं हो सकता है ।
यदि वहां पूर्वद्रव्यकी निवृत्तिके बाद नया द्रव्य दीर्घ परिमाण-
वाला पैदा हुआ, तब तो आश्रयके भेदसे ही परिमाणमे भेद हुआ, न कि
आश्रयद्रव्य पूर्वका ही रहा और परिमाण बदल गया ।
पूर्व द्रव्यकी अनिवृत्तिपक्षमे - अर्थात् पूर्व द्रव्य यदि वैसाका वैसा
बना रहा, उस पक्षमे - वहाँ यदि किसी दूसरे संयोगी द्रव्यका
मेल नहीं हुआ तो परिमाणभेदकी उपलब्धि ही कहाँ होगी, जो कि
विरोध लावे । यदि दूसरे द्रव्यका मेल हुआ, तब भी किसमें परि-
माणभेदकी उत्पत्ति होगी ? क्योकि पूर्वद्रव्यकी निवृत्ति नहीं होनेसे
किसी आश्रयकी उत्पत्ति हुई नहीं, जिसमे वह दूसरा परिमाण पैदा
होवे । इसलिए जहाँ दूसरे संयोगी द्रव्यके मिल जानेसे स्थूलता बढ़ी
हुई सी मालूम पडती है, यहाँ यह स्थूलता प्रतीति भ्रमात्मक है । अतः
१ ऽपचयेऽपि च — १ पु० पा०

४२ आत्मतत्त्वविवेके
परिमाणभेदः एकस्मिन् धर्मिण्युपसंहर्तुं शक्यत इत्यादि पदार्थ-
चिन्ताचतुरैः सह विवेचनीयम् १ ।
अस्तु तर्हि इहापि बाधकं बलं प्रसङ्गतद्विपर्ययोरुक्तत्वादिति
चेत्, न, तयोः सामर्थ्यासामर्थ्यविषयत्वात् तत्र च उक्तत्वात् । स्तां
वा, न तथापि ताभ्यां शक्त्यशक्त्योरविवक्षितकालभेद एव
विरोधः साध्यते तथोपसंहर्तुमशक्यत्वात् । यदा तदेत्युपेक्ष्य
यत् समर्थं तत्करोत्येवेत्युपसंहर्तुं शक्यमिति चेन्न, कालनियमा-
कालभेदसे भी परिमाणभेदका एक धर्मीमे होना नहीं माना जा
सकता है। ये सब बातें पदार्थविचारमे चतुर वैशेषिकोंके साथ
विचारनी चाहिये ।
(शङ्का) यहा भी बाधक बल होवे, क्योंकि बाधकस्वरूप प्रसङ्ग
और विपर्ययको मैं पहले दिखा चुका हूँ ।
(उत्तर) ऐसा कहना ठीक नहीं है। क्योंकि वे प्रसङ्ग और
विपर्यय सामर्थ्य और असामर्थ्य विषयक ही हैं, तथा उनके विषयमे
दूषण भी पहले ही दिखाये जा चुके हैं। अथवा यदि वे प्रसङ्ग-विपर्यय
हों भी, तथापि उनके द्वारा किसी कालविशेषका निवेश किये बिना
करण और अकरणमें विरोध सिद्ध नहीं हो सकता है, क्योंकि वैसा
उपसहार नहीं हो सकता । अर्थात् - कुशूलस्थ दशामे सामर्थ्यहेतुसे
करणका प्रसग करो तो वह हमे भी इष्ट ही है। कारण, आगे चलकर
वह अकुर करता ही है। इसके विपरीत अकरणसे यदि कुशूलस्थ
दशामे बीजमें सामर्थ्यका अभाव सिद्ध करो तो हेतु ही असिद्ध है।
क्योंकि कुशूलस्थबीजमे जो अकरण है, वह करणविरोधी नहीं है।
इसलिए कदाचित् अकरणके कारण कुशूलस्थबीजमे अङ्कुरसामर्थ्यका
अभाव नहीं सिद्ध हो सकता है।
(शङ्का) जब तब इत्यादि कालभेदका निर्देश किये बिना ही 'जो
समर्थ है वह करता ही है' इस प्रकारका उपसंहार हो सकता है।
१. चिन्तनीयम् - ३ पु० पा०

विवक्षायां यत् समर्थं तत्करोत्येवेत्युपसंहर्तुं शक्यमिति चेन्न, काल-
नियमाविवक्षायां यत् समर्थं तत्करोत्येवेति कदाचित् स्यात् । तथा
च संभवविधेरत्यन्तायोगो विरुद्धो न स्वयोगः । नीलं सरोजं
भवत्येवेतिवत् ।
ननु यदसमर्थं प्रथममासीत् तस्य सामर्थ्यं पश्चादपि कुत
आगतम्, प्रथमं समर्थस्य वा पश्चात् कुत्र गतम् । नैतदेवं,
तत्तत्सहकारिमत्तत्तत्कारकत्वं हि सामर्थ्यम्, अतद्वतस्तदन्यवतो
वा तदकर्तृत्वममामर्थ्यम् । इदं चौत्पत्तिकमस्य रूपं, ते च
( उत्तर ) यह भी ठीक नहीं है। कालविशेषका निर्देश किये बिना
'जो समर्थ है वह करता ही है यह बात सदाके लिए नहीं है किन्तु
कदाचित्के लिये है। इस स्थितिमे उस उपसहारका यह स्वरूप हुआ
कि 'जो समर्थ है उसका करना संभव है'। यदि इस संभव-विधिको
किसीके साथ विरोध है तो करणके अत्यन्तिक अयोगके साथ है न कि
सामान्य अयोग के साथ । जैसे 'नील कलम होता ही है' यहाँ नील
कमलकी संभावना बताकर नीलकमलका सर्वथा न होना ( आत्यन्तिक
अभाव ) रोका जाता है, न कि नीलकमलके न होनेको भी रोक देता है ।
क्योंकि नीलकमल नहीं भी होता है ।
( शङ्का ) तो, जो पहले अङ्कुर करनेमें असमर्थ रहा, उसमे पीछे
भी सामर्थ्य कहासे आगयी ? अथवा जो पहले समथ था, उसकी
सामर्थ्य पीछे कहाँ चली गयी ?
( उत्तर ) इस तरहका प्रश्न नहीं कर सकते । क्योंकि यहाँ
सामर्थ्यका अर्थ योग्यता लो, तबतो पहले और पीछे भी वह समर्थ ही है ।
सामर्थ्यपदसे यदि कार्यका करना अर्थ लो, तो उस उस सहकारीसे युक्त
होकर उस उस कार्यको कर देना ही सामर्थ्य है और उस उस सहकारीके
अभावमे अथवा अन्य कार्यके सहकारीके योगमे उस कार्यका न करनाही
असामर्थ्य है । भावोंका यही स्वाभाविक रूप है । और वे सहकारी
अपने उपस्थापक कारणके अधीन होनेसे अनियत कालमे उपस्थित होते
है । इसलिये कार्योंका भी काल अनियत रहता है । अर्थात् सामर्थ्य

सहकारिणः स्वोपसर्पणकारणवशात् भिन्नकाला इत्यर्थात् कार्या-
णामपि भिन्नकालतेति ।
तथाप्येककालस्थ एव भावो जातप्रध्वस्तदा तदा तत्कार्यं
करोतु, उत्पन्नमात्रस्य तत्स्वभावत्वात्, एक देशस्थवदिति चेत्—
सेयमेककालस्थता स्वरूपापेक्षया ? सहकारिसन्निध्यापेक्षया
वा ? आद्ये न किञ्चिदनुपपन्नम्, नित्यानामप्येकरूपत्वात् वर्त-
मानैकस्वभावत्वात् सर्वभावानाम् । तदेव तु क्वचित् सावधि
क्वचिन्निरवधीति विशेषः । सावधित्वेऽपि व्यापारफलप्रवाह-
प्रकर्षाप्रकर्षाभ्यां विशेषः ।
न कहीं जाता है और न कहीं से आता है । किन्तु सहकारीका योग
और वियोग ही सामर्थ्य और असामर्थ्य है । और उस योगका भी
समय अनियत है क्योंकि वह भी उपस्थापक कारणके अधीन है ।
( शङ्का ) तो भी जैसे एक जगह रहता हुआ विषय अपनेसे भिन्न
देशमें आत्माम ज्ञानसुखादिको पैदा करता है वैसे ही किसी एक काल
मे रहकर नष्ट हो जानेवाला क्षणिक पदार्थ भी विभिन्न क्षणोंम कार्य
पैदा कर सकता है क्याकि उसी स्वभाव का वह पैदा होता है ।
( उत्तर ) तो यहाँ एक कालमे रहनेका अभिप्राय अपने कालमें
रहना है ? या सहकारियोंके कालम रहना है ?
यहाँ प्रथमपक्षमे कोई अनुपपत्ति नहीं है । क्योंकि नित्य और
अनित्य सभी स्थिर पदार्थ अपने कालमे ही रहते है । क्याकि अपने
कालमे ही रहना सभी भावोंका स्वभाव है । किंतु यही रहना कहीं
अवधिके साथ है जैसे अनित्योंका । और कहीं बिना अवधिके है,
जैसे नित्या का । सावधि रहनेमे भी व्यापार और फलके प्रवाहका
प्रकर्ष और अप्रकर्षरूप विशेषता होती है । अर्थात् यागसे अपूर्वनामक
एक ऐसा प्रकृष्ट व्यापार पैदा होता है, जिसके प्रभावसे बहुत पहन ही
यागके नष्ट हो जानेपर भी स्वर्गरूप फल उत्पन्न हो जाता है । बीजादिमें
यह प्रकर्ष नहीं है, इसलिये अङ्कुरोत्पत्तिके अव्यवहित पूर्वमें बीजका
रहना आवश्यक है ।

क्षणभङ्गवादः ४५
द्वितीयस्तु स्यादपि यदि तेषां यौगपद्यं भवेत्, क्रमिणस्तु
सहकारिण इत्युक्तम् । सहकारिसहितः स्वभावेन करोतीति
वक्तरि तु जातनष्ट एव करोत्वित्युत्तरप्रसङ्गो निरर्गलशैश-
वस्येत्यलमनेन ।
तस्मात् कार्यस्य स एव कालः, कारणस्य तु स चान्यश्चेति
संबन्धिकालापेक्षया पूर्वकालताव्यवहारः ।
अपि च यदा तदेतिस्थाने यत्र तत्रेति प्रक्षिप्य तयोरेव प्रसङ्ग-
तद्विपर्यययोः को दोषः ?
दूसरा पक्ष तब हो सकता, यदि सभी सहकारी एक कालमें
रहें । किन्तु सहकारी क्रमसे रहने वाले हैं, यह कहा जा चुका है ।
सहकारिसहित होकर स्वयं या अपूर्व आदि व्यापारके द्वारा स्वभावतः
करता है, ऐसा कहने वालेके प्रति तो यह उत्तर उपस्थित करना
कि--पैदा होते ही नष्ट होकर ही (क्षणिक होता हुआ भी) कार्य
करेगा, स्वच्छन्द शिशुता है । अतः इससे बचो । अर्थात् उक्त कथनमें
क्षणिकत्वका अवसर ही नहीं है ।
अतः कार्यका वही [सामग्रीसमवधानका उत्तरवर्ती] काल है और
कारणका तो यथासंभव वह भी है और दूसरा भी है । अर्थात् कोई
कारण सामग्रीके बाद भी बना रहता है और कोई कार्यके पूर्व ही नष्ट
हो जाता है । कार्य और कारणके एक समयमें रहनेपर भी कारणमें
कार्यके प्रति पूर्वकालताका जो व्यवहार होता है, वह कार्यप्रागभावरूप
सम्बन्धीके कालमें उसके नियमतः रहनेके कारण होता है ।
इसके अतिरिक्त कालवाची 'जब और तब' पदोंके स्थानमें देश-
वाची 'जहां और वहां' पदोंका भी निवेश करके यदि वे ही प्रसङ्ग
और विपर्यय उपस्थित किये जाँय तो क्या हानि है ? अर्थात् “जो जब
जहां जिसके प्रति समर्थ है, वह तब वहां उसे करता ही है" ऐसा
नियम मानकर पूछता हूँ कि-खेतमें बोया गया बीज बखारमे
अङ्कुर करनेमें समर्थ है या नहीं ? यहां यदि समर्थ मानो तो क्षेत्रस्थ

४६ आत्मतत्त्वविवेके
न कश्चिदिति चेत, तर्हि देशाद्वैतं वा कारणभेदो वा
आपद्येत ।
आपद्यतां, तदादाय योगाचारनयनगरं प्रवेक्ष्याम इति, न,
हेतुफलभाववादवैरिरणमनपोद्य तत्र प्रवेष्टुमशक्यत्वात् ।
तदपवादे वा सत्त्वाख्यसाधनशस्त्रसंन्यासिनस्तव बहिर्वाद-
संग्रामभूमावपि कुतो भयम् ?
बीज बखारेमे भी अंकुर उत्पन्न करदे, इस प्रकारका प्रसङ्ग और 'नहीं
करता है इसलिये वह उस समय खेतमे अंकुर-जनन समर्थ होता हुआ
भी बखारमे अङ्कुर जनन समर्थ नहीं है' इस प्रकारका विपर्यय तुम्हारे
प्रति भी दिये जा सकते हैं । अर्थात् क्षणिक भी बीज सामर्थ्यासामर्थ्य-
लक्षण विरुद्ध-धर्मके संसर्गसे भिन्न-भिन्न होने लगेगा ।
यदि कहो, इसमें कोई हानि नहीं है, तो सामर्थ्यपक्षमें सब जगह
समानरूपसे कार्य करनेसे देशाद्वैतकी आपत्ति हो जायगी । तथा
असामर्थ्यपक्षमें एक ही क्षणिकबीजमें सामर्थ्य और असामर्थ्यरूप
विरुद्धधर्मों के संसर्गसे पुनः भेदकी आपत्ति आ जायगी ।
( शङ्का ) देशाद्वैत हो जाय, उसे लेकर हम योगाचारमतरूप नगरमें
प्रवेश कर जायेंगे । अर्थात् योगाचारमतानुसार हम भी बाह्य वस्तु नहीं
मानेंगे । अतः क्षेत्र कुशूल आदि सभी देश विज्ञानरूपसे अभिन्न ही
हैं । इस स्थितिमे देशभेद मानकर मेरे प्रति सामर्थ्यासामर्थ्यका
क्षणिकबीजमें आपादन नहीं हो सकता है ।
( उत्तर ) ऐसा कहना भी ठीक नहीं है । क्योंकि कार्यकारण-
भावरूप वैरीको परास्त किये बिना योगाचारमतरूप नगरमें प्रवेश ही
नहीं कर सकते । अर्थात् योगाचारमतमे सब कुछ विज्ञानरूप होनेसे
कार्यकारणका भेद भी मिथ्या मानना होगा । और यही योगाचारनगरमें
प्रवेशका बाधक होगा ।
यदि योगाचारनगरमें प्रवेश पानेके लिये कार्यकारणभावको भी
छोड़ दो तो "यत् सत् तत् क्षणिकम्" इस अनुमानमें क्षणिकत्वसिद्धिका

क्षणभङ्गवादः [४७]

ननु यावत्योऽर्थक्रिया भिन्नदेशास्तावद्भेदं कारणमस्तु को
विरोध इति चेत्, न, तेषामपि प्रत्येकं तत्प्रसङ्गस्य तदवस्थत्वात्।
एवमेकस्य जगति वस्तुतत्त्वस्याऽलाभे साध्वी क्षणभङ्गसाधन-
परिशुद्धिः।
अस्तु तर्हि कश्चिद्दोष एवानयोरिति चेत्, स पुनः कस्मिन्
साध्ये ? किं सामर्थ्यांसामर्थ्ययोः ? किं वा तद्विरुद्धयोः ? किं वा
तद्विरुद्धधर्माध्यासेन भेदे ? आहोस्वित् शक्त्यशक्त्योर्विरोधे ?
साधनभूत सत्त्व-हेतुरूप शस्त्रका भी परित्याग कर देना पड़ेगा। ऐसी
दशामें बाह्यस्थिरत्ववादरूप युद्धस्थलीमे भी तुम्हें क्या भय है ?
अर्थात् क्षणिकत्वसिद्धिके लिये उठाये सत्त्वहेतुरूप शस्त्र गिराकर हार
मान ही गये तो स्थिरत्व ही मान लो, उससे बचनेके लिये योगाचार
मतका स्वीकार क्यों कर रहे हो ?
(शङ्का) जिन जिन भिन्न देशोंमे जितनी अर्थक्रियायें (अंकुरादि
कार्य) होती हैं, बीजरूपकारणके भी उतने भेद माननेमें क्या
विरोध है !
(उत्तर) ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि कारणके उतने भेदोंमे
भी प्रत्येकके लिये उक्त प्रसङ्ग पुनः वैसे ही दिया जा सकता
है। अर्थात् वह प्रत्येक बीज देशान्तरमें भी अंकुरसमर्थ हो तो
देशाद्वैतकी आपत्ति हो जायगी। और अंकुरसमर्थ न हो तो स्वदेशमे
सामर्थ्य और अन्यदेशमे असामर्थ्यरूप विरुद्धधर्मोंका संसर्ग होनेसे
वह प्रत्येक भी भिन्न हो जायगा। इस प्रकार जगत् मे एक वस्तु कोई
रह ही नहीं जायगी। ऐसी दशामे क्षणिकत्व सिद्ध करनेवाले आपके
हेतुओंकी अच्छी विशुद्धता (निर्दोषता) है। अर्थात् जब एक कोई
है नहीं तो किसे पक्ष मानकर क्षणिकत्व सिद्ध करोगे।
यदि पूर्वोक्त देशगर्भित प्रसङ्ग और विपर्य्ययमे किसी दोषको मानो,
तो बताओ, क्या सिद्ध करनेमे वह दोष होगा। क्या, सामर्थ्य और
असामर्थ्य सिद्ध करने में ? या सामर्थ्य और असामर्थ्यरूप विरुद्ध

४८ आत्म. तत्त्व. - १ क
नाद्यः, सर्वत्र सामर्थ्ये हि प्रसह्यकरणात्, सर्वत्राशक्तौ
क्वचिदप्यकरणात् ।
सर्वदेशसमानस्वभावत्वेऽप्यस्य ‘स्वोपादानदेश एव तत्कार्यं
करोतीति, अयमस्य स्वभावः स्वकारणादायातो न नियोग-
पर्यनुयोगानर्हतीति चेत् , तर्हि सर्वकालसमानस्वभावत्वेऽपि तत्त-
त्सहकारिकाल एव^१ करोतीत्ययमस्य स्वभावः स्वकारणादायात
इति किन्न रोचयेः ?
न द्वितीयः, विरुद्धधर्माध्यासेनाप्यभेदे भेदव्यवहारस्य
धर्मों के आरोपसे बीजव्यक्तिमें भेद सिद्ध करने मे ? अथवा करण और
अकरणका विरोध सिद्ध करने मे ?
इनमे प्रथमपक्ष ठीक नहीं है। क्योंकि क्षेत्रस्थ बीजम क्षेत्रमे
अंकुरके प्रति सामर्थ्य और बगारमे अंकुरके प्रति असामर्थ्य ये दा न
माने जाँय तो वह बीज सर्वत्र अंकुर समर्थ ही होगा अथवा सर्वत्र अस-
मर्थ ही होगा। ऐसी दशामे सर्वत्र सामर्थ्य होनेमे उसे बगारमे भी
अंकुर करना बलात् प्राप्त हो जायगा। एवं सर्वत्र असामर्थ्य होनेम
कहीं भी (क्षेत्रमे भो) अंकुर न करना प्रसक्त हो जायगा।
(शङ्का) सब जगह बीजके एक ही स्वभावका होनेपर भी अपने
कार्यके लिये नियत एकदेशमें ही यह कार्यको करता है, इस प्रकार का
बीजका यह स्वभाव अपने कारणसे प्राप्त हुआ है। अत स्वभावके लिये
कोई विधि या निषेध नहीं दिया जा सक्ता है।
(उत्तर) तो उसी प्रकार “सब कालमें अर्थात् खेतमे और बगारमें
भी रहनेकी दशामें बीजके एक स्वभावका होने पर भी उन उन सहका-
रियोंके प्राप्तिकालमें ही यह अङ्कुररूप कार्य करता है। इस प्रकारका
यह बीजका स्वभाव ही है, जो अपने कारणसे इसे प्राप्त है यह बात
क्यों नहीं पसंद करते हो ?
द्वितीय पक्ष भी ठीक नहीं है। क्योंकि विरुद्ध धर्मोका संसर्ग होने
१. लाभ एव — १ पु० पा०

निर्निमित्तकत्वप्रसङ्गात् । अनैकान्तिकश्च हेतुः कालतोऽपि न
भेदं साधयेत् ॥
न तृतीयः, विरोधलक्षणयोगे बाधकसहस्रेणापि विरोध-
स्यापनेतुमशक्यत्वात्, अयोगे वा तदेव चिन्त्यम् । यद्विधाने यस्य
निषेधो यन्निषेधे वा यस्य विधानं तयोरेकत्र धर्मिणि परस्पर-
परिहारस्थिततया विरोधः१, सचेह नास्ति । तद्देशकार्यकारित्वं हि
तद्देशाकार्यकारित्वेन विरुद्धं तद्विधौ तस्य नियमेन निषेधात्, न
पुनर्देशान्तरे तत्कार्याकारित्वेन, तस्यानिषेधात् । न ह्यन्यत्र तद्-
करणमतत्करणं वा तत्र तत्करणस्याभावोऽपि तु तत्र तदकरण-
मिति चेत्---
पर भी यदि अभेद मानो तो विश्वमे भेदव्यवहारका कोई विषय ही नहीं
रह जायगा। साथ ही दैशिक भेदस्थलमे ही व्यभिचारी होनेसे
विरुद्धधर्माध्यासरूप हेतु कालिक भेदको भी नहीं सिद्ध कर सकेगा।
एवं, तीसरा पक्ष भी ठीक नहीं है। क्योंकि विरोधलक्षणका योग
रहनेपर हजारों बाधक भी उस विरोधको नहीं हटा सकते। यदि
विरोधलक्षणका यहाँ अयोग है, तब यही तो विचारणीय है कि
जिसके विधानमे जिसका निषेध हो और जिसके निषेधमे जिसका
विधान हो, उन दोनोंमें एक जगह एक दूसरेको छोड़कर रहनेके कारण
ही विरोध होता है, और वैसा यहाँ नहीं है। क्योंकि उस देशमे कार्य
करनेको उसी देशमे कार्य न करनेके साथ विरोध है। कारण, उस
देशमे कार्यकारित्वके विधानमें उस देशमें कार्याकारित्वका नियमतः
निषेध होता है। न कि देशान्तरमे उस कार्यको न करनेके साथ विरोध
है। कारण, वहाँ देशान्तरमें कार्यकारित्वका निषेध नहीं होता है।
अर्थात् उस देशमे कार्यकारी देशान्तरमे कार्यकारी भी हो सकता है,
इसमें विरोध नहीं है। क्योंकि उससे भिन्न जगहमे उस कार्यको
न करना या उससे भिन्न कार्यका करना उस जगह उस कार्यको
१. परस्परपरीहारावस्थितयोर्विरोध — १ पु० पा०
४

५० आत्मतत्त्वाववेके
हन्तैवम्भूतविरोधलक्षणव्यावृत्तिर्भिन्नकालशक्त्यशक्तयोरपीत्यु-
क्तप्रायं, तत्प्रतिसन्दधीथाः। तस्मात् प्रसङ्गतद्विपर्ययस्थितावपि
असिद्धो विरुद्धधर्माध्यासः।
ननु यदेकदा यत् करोति तद्यावत्सत्त्वं तत्करोत्येव यथा
कश्चिच्छब्दः१ शब्दान्तरमिति प्रसङ्गोऽस्तु। विपर्ययस्तु यदेकदा
यन्न करोति तत् सर्वदैव तन्न करोति यथा शिलाशकलमङ्कुरम्।
न करोति चैकदा कुशलस्थं बीजमङ्कुरमिति चेत्—
तदेतज्जात्यभिप्रायेण वा स्यात् व्यक्त्यभिप्रायेण वा स्यात्।
करनेका विरोधी नहीं है किन्तु उसी जगह उस कार्यको न करना ही
विरोधी है।
तब तो हन्त ! ऐसे विरोधलक्षणका अभाव भिन्नकालमें करण और
अकरणमे भी है। यह पहले ही कह दिया गया है, उसे स्मरण करो।
अर्थात् भिन्नकालमे करण अकरणमे कोई विरोध नहीं है।

क्षणभङ्गवादः ५१
प्रथमे द्वयमपि अनैकान्तिकम्, अनियमदर्शनात् । द्वितीये द्वय-
मप्यन्यथासिद्धम्, एकान्तासामर्थ्यप्रयुक्तत्वादत्यन्ताकरणस्य ।
सामर्थ्ये सति सहकारिसन्निधिप्रयुक्तत्वात् करणनियमस्य ।
एनेन यद्यत्करोति तत्तदुत्पन्नमात्रं यथा कर्म विभागम् । यदुत्प-
न्नमात्रं यन्न करोति तन्न कदाचिदपि यथा शिलाशकलमङ्कुरमिति
निरस्तम् । अत्रापि पूर्ववदनैकान्तान्यथासिद्धी दोषा१विति ।
नापि तृतीयः, कृतकत्त्वानित्यत्वादेरपि२ परस्पराभाववत्त्वामा-
त्रेणैव विरोधप्रसङ्गादिति ।
और विपर्यय दोनोंमें व्यभिचार है । क्योंकि एक ही बीज जातिमे
करना और न करना दोनों ही के देखे जानेसे केवल करने या केवल
न करने का नियम नहीं है ।
जो व्यक्ति एक बार जिसे नहीं करता है वह कभी भी उसे नहीं
करता—इस द्वितीय अभिप्रायमे प्रसङ्ग और विपर्यय दोनों ही अन्यथा-
सिद्ध हैं । क्योंकि एकबार अङ्कुर न करनेवाले प्रस्तरखण्डमे सदा
अङ्कुर न करना उसको अङ्कुरके प्रति स्वाभाविक अयोग्यताके कारण
है । तथा अङ्कुरके प्रति स्वाभाविक योग्यतावाले बीजमें तो कभी अङ्कुरका
करना सहकारियोंकी सन्निधिके कारण और कभी अङ्कुर न करना सह-
कारियोंकी असन्निधिके कारण है ।
इससे—जो जिसे करता है वह उत्पन्न होते ही उसे करता है, जैसे
कर्म ( क्रिया ) उत्पन्न होते ही विभागको । एव जो उत्पन्न होते ही जिसे
नहीं करता वह कभी भी उसे नहीं करता, जैसे शिलाखण्ड अङ्कुरको—
इस प्रकारके प्रसङ्ग और विपर्यय भी खण्डित हो गये । क्योंकि यहाँ भी
पूर्वके समान जातिके अभिप्रायमे व्यभिचार और व्यक्तिके अभिप्रायमें
अन्यथासिद्धिदोष हो जायेंगे ।
“दण्डित्व और कुण्डलित्त्वके समान एक जगह रहते हुए भी
१. अन्यथासिद्धदोषो—२ पु० पा०
२. कृतकत्वानित्यत्वयोरपि—१ पु० पा०

१२ आत्मतत्त्वविवेक
अस्तु तर्हि तस्यैव तेनैव सहकारिणा संबन्धोऽसंबन्धश्चेति
विरोधः, न, विकल्पानुपपत्तेः । तथाहि संबन्धिनः संबन्ध्यन्तरे स्वा-
भावस्वाभाव्यं वा विरुध्येत ? अभावप्रतियोगित्वं वा ? तदैवेति
सहितं वा ? तत्रैवेति सहितं वा ? उभयासहितं वा ? तथैवेति
सहितं वेति ?
न प्रथमः, अनभ्युपगमात् । न द्वितीयः, सत्कार्यप्रतिषेधात् १।
न तृतीयः, प्राक्प्रध्वंसाभावयोर्विद्यमानकालत्वानभ्युपगमात् ।
परस्पर भिन्न होना ही करण और अकरणका विरोध है" यह पूर्वोक्त
तृतीयपक्ष भी ठीक नहीं है । क्योंकि इस प्रकारका विरोध माननेमे
परस्परमे भिन्न होनेमात्रसे कृतकत्व और अनित्यत्वमे भी विरोधका
प्रसङ्ग हो जायगा ।
(शङ्का) तब उसी (बीज) का उसी सहकारीके साथ कभी सम्बन्ध-
का होना और कभी न होना ही विरोध होवे ।
(उत्तर) यह नहीं कह सकते हो, क्योंकि अग्रिम विकल्पोंमे कोई
भी विकल्प नहीं बन सकता है ।
जैसे, क्या दूसरे सम्बन्धीको एक सम्बन्धीका अभावरूप होना
विरुद्ध होगा ? अर्थात् एक सहकारीका दूसरा सहकारी अभावस्वरूप
ही है और भाव और अभावका सम्बन्ध कभी हो नहीं सकता है, यही
विरोध है ? अथवा भावरूप एक सहकारीका दूसरे सहकारीमे
अभावप्रतियोगित्वरूप असमवधान विरुद्ध होगा ? अथवा जिस क्षणमे
अपना समवधान है उसी क्षणमे उसका असमवधान विरुद्ध होगा ?
अथवा जिस जगह समवधान है वहीं असमवधानका होना विरुद्ध
होगा ? अथवा उसी क्षण और उसी देशमें उसका समवधान और
असमवधानका होना विरुद्ध होगा ? अथवा जिस रूपसे समवधान हो
उसी रूपसे असमवधानका होना विरुद्ध होगा ?
इनमे प्रथमपक्ष ठीक नहीं है, क्योंकि एक सम्बन्धीका अभावरूप
दूसरे सम्बन्धीको हम नहीं मानते हैं । दूसरा भी ठीक नहीं है,
१. प्रतिषेधात्—२ पु० पा०

न चतुर्थः, स हि न तावत् स्थितियौगपद्यनियमेन, संबन्धि-
नोरतदसिद्धेः । इत एव तत्सिद्धावितरेतराश्रयत्वं, नियमसिद्धौ
हि विरोधसिद्धिः तत्सिद्धौ च भेदे सति नियमसिद्धिरिति ।
न चान्यतस्तत्सिद्धिरस्तदभावात् अनियतोपसर्पणापसर्पणका-
रणप्रयुक्तत्वाच्च संबन्धासंबन्धयोः । नापि विनाशस्य अहेतुकत्वात्
अयं विरोधोऽर्थात् सिद्ध्यति, तस्याप्यसिद्धेः । ध्रुवभावित्वे तु
पश्यामः । नापि पञ्चमः, न हि तदैव तत्रैव स एव सहकार्यस्ति
नास्ति चेति अभ्युपगच्छामः ।
क्योंकि सत्कार्यवादका तुम्हारे यहाँ निषेध है । अर्थात् सत्कार्यवादमें
ही भावका अभाव नहीं होता है । तीसरा भी नहीं हो सकता है,
क्योंकि केवल प्रागभाव और प्रध्वंसाभाव ही भावके कालमे नहीं माना
जाता है । अत्यन्ताभाव तो देशभेदसे भावकाल मे भी रहता ही है ।
चतुर्थ प्रकारका विरोध भी ठीक नहीं है, क्योंकि उक्त प्रकारका
विरोध तब सिद्ध होता जब कि—सम्बन्धियोंमें एकके सत्ताकालमें
बिना किसी व्यवधानके दूसरेकी अवश्य सत्ता है—ऐसा नियम होता ।
किन्तु यह नियम ही असिद्ध है । यदि ऐसा मानो कि इस विरोधसे ही
यह नियम सिद्ध हो जायगा, तो यहाँ अन्योन्याश्रय दोष आ जायगा ।
क्योकि नियमकी सिद्धि होनेपर विरोधकी सिद्धि होगी और विरोधके
सिद्ध होनेपर धर्मीमे भेद सिद्ध होकर सभी सहकारियों (सन्वन्धियों)
के एक साथ रहनेके नियमकी सिद्धि होगी ।
किसी दूसरे प्रमाणसे भी उक्त नियमकी सिद्धि नहीं हो सकती,
क्योंकि वैसा कोई प्रमाण नहीं है । एवं सहकारियों का परस्पर उप-
सर्पण और अपसर्पण अनियत है और इसी कारण उनमें सम्बन्ध और
असम्बन्ध दोनों ही होते हैं ।
यह भी नहीं हो सकता कि—किसी वस्तुके विनाशमें हेतुकी
अपेक्षा नहीं होनेसे सभी वस्तु क्षणिक होगी, अतः उसमे सम्बन्ध और
असम्बन्धका विरोध स्वतः सिद्ध हो जायगा—क्योंकि बिना हेतुका

५४ आत्मतत्त्वविवेक
ननु समवधानं नाम सहकारिणा धर्मः संयोगो भवद्भिरिष्यते,
स च तेभ्यो व्यतिरिक्तोऽव्याप्यवृत्तिश्चेत्यपि। तथा च स एव
तदैव तत्रैवास्ति नास्ति चेति। अनतिरेके स्थिरवादिनो व्यस्ता-
न्यपि बीजवारिधरणिधामानि तान्येवेति तेभ्योऽपि कार्योत्पत्ति-
प्रसङ्गः। व्याप्यवृत्तित्वे च सर्वत्र रक्तादिदिभ्रमः शब्दादिकार्यो-
त्पत्तिप्रसङ्गश्च। तस्मादसंयुक्तेभ्योऽय एव संयुक्तस्वभावाः पर-
माणवो जाता इत्येव ज्यायः।
विनाश भी असिद्ध है। यदि कहो कि वस्तुओंका विनाश ध्रुव है
इसलिये विनाशमे किसी हेतुकी अपेक्षा नहीं है—तो इसके सम्बन्ध
मे आगे कहेंगे।
एव पाचव प्रकारका विरोध भी नहीं हो सकता है। क्योंकि—
उसी कालमे उसी स्थानमें वही सहकारी है भी और नहीं भी है-ऐसा
हम नहीं मानते हैं।
(शङ्का) समवधानको भी आप सहकारियोंका धर्म और संयोग
रूप मानते हैं और यह भी मानते हैं कि वह समवधान उन
सहकारियोंसे अतिरिक्त और अव्याप्यवृत्ति (एकदेशी) भी है। तब
वही समवधान (संयोग) उसी समय यहीं पर है भी और
नहीं भी है, इस प्रकार विरोध आ जाता है। यदि वह
समवधान सहकारियोंसे अतिरिक्त न हो तो चूँकि स्थिरवादीके मतसे
छिटफुट रहनेवाले भी बीज, पानी, पृथ्वी और प्रकाश वे ही हैं,
इसलिये छिटफुट रहनेकी स्थितिमें भी उनसे अङ्कुररूप कार्यकी
उत्पत्ति होनी चाहिये। यदि संयोगको एकदेशी न मानकर व्याप्यवृत्ति
मानें तो एक भागमे रङ्गका संयोग होनेपर सर्वांशमे लालिमाकी
प्रतीति होनी चाहिये और आकाशके एक भागमें नगाडके संयोगसे
सम्पूर्ण आकाशम शब्दकी उत्पत्ति होनी चाहिये। इसलिये असंयुक्त
परमाणुओंसे दूसरे ही संयुक्त स्वभाववाले परमाणु उत्पन्न होते हैं,
यही मानना समुचित है। अर्थात् परमाणुपुञ्जसे या सहकारिसमूह-
से अतिरिक्त संयोग नहीं है। इस प्रकार क्षणभङ्गवाद सिद्ध हो
जाता है।