आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
DevanagariHindipublished530 पृष्ठ
पृष्ठ 84, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 84इति स्वभावहेतुः, तद्रूपत्वमात्रानुबन्धित्वाद् योग्यतायाः । तत-
व्याप्य है। इसलिये कोई कार्य अवश्य है, जिसमें बीजत्वरूपसे बीज
इति स्वभावहेतुः, तद्रूपत्वमात्रानुबन्धित्वाद् योग्यतायाः । तत-
श्चास्ति किञ्चित् कार्यं यत्र बीजत्वेन बीजमुपयुज्यत इति ।
बीजानुभव एवासाधारणं कार्यं यत्र बीजत्वं प्रयोजकं, तच्च
सर्वस्मादेव बीजाद्भवतीति किमनुपपन्नम् इति चेत्, न, यौगिक-
तदनुभवस्य तदन्तरेणाप्युपपत्तेः । लौकिक इति चेत्, न, सत्यमेतत्,
न त्विदमवश्यं सर्वस्माद्बीजाद्भवति इन्द्रियादिप्रत्यासत्तेरसदात-
नत्वात् असार्वत्रिकत्वाच्च । ततश्च योग्यमपि सहकार्यसन्निधानान्न¹
करोतीत्यर्थसिद्धम् ।
कार्यान्तरमेवातीन्द्रियं सर्वबीजाव्यभिचारि भविष्यतीति चेत्,
तन्न तावदुपादेयम्, अमूर्तस्य मूर्तानुपादेयत्वात्, परिदृश्यमान-
व्याप्य है। इसलिये कोई कार्य अवश्य है, जिसमें बीजत्वरूपसे बीज
उपयोगी है।
यदि कहो कि 'बीजका अनुभव ही वह विशेष कार्य है, जिसमें
बीजत्व प्रयोजक है, क्योंकि वह सभी बीजोंमें होता है, ऐसा माननेमें
क्या हानि है"? तो वह ठीक नहीं है। क्योंकि योगबलसे होने वाला
अनुभव बीजके बिना भी हो जाता है। यदि “अनुभवका मानी
लौकिक अर्थात् हमलोगोंका अनुभव लो, जो बीजकी उपस्थितिमे ही हो
सकता है" तो यह ठीक है, किन्तु यह लौकिक अनुभव भी तो सभी
बीजसे अवश्य नहीं होता। क्योंकि अनुभवके लिये बीजके साथ इन्द्रि-
यका संयोग जरूरी है और वह संयोग सदा सब बीजोंसे है नहीं। अतः
जब जिस बीजके साथ इन्द्रियसन्निकर्ष नहीं हुआ, उस बीजसे तो
अनुभव भी पैदा नहीं हुआ। इससे यह स्वतः सिद्ध हो गया कि कार्यके
योग्य भी कारण सहकारीके अभावमें कार्य नहीं करता है। इससे भी
बीजका स्थिरत्व ही सिद्ध होता है न कि क्षणिकत्व।
यदि "सब बीजसे पैदा होने वाला कोई दूसरा ही कार्य होगा जो
अतीन्द्रिय होगा" ऐसा कहो तो वह कार्य उपादेय (बीजका ही एक
१. सन्निधेर्न—२ पृ० पा०