आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षणभङ्गवादः ३७
वैकल्यप्रयुक्ताङ्कुरादि कार्यवैकल्यं, तदुत्पत्तिनिश्चयविषयीभूतबीज-
जातीयत्वात् । यत् पुनः सहकारिवैकल्यप्रयुक्ताङ्कुरादिकार्य-
वैकल्यं न भवति, न तदेवम्भूतबीजजातीयं, यथा शिला-
शकलमिति ।
न च किमुक्तमाध्यव्यावृत्तेरुक्तसाधनव्यावृत्तिरुदाहृतात्, किं
वा परम्परयापि तथाविध¹ प्रभवसामर्थ्यविरहादिति व्यतिरेक-
सन्देह इति वाच्यम्, प्रागेव शङ्काबीजस्य निराकृतत्वादिति ।
स्यादेतत् । मा भूत सामर्थ्यासामर्थ्यलक्षणविरुद्धधर्म-
अथवा व्यतिरेकी-अनुमानका प्रयोग किया जाता है । जैसे—
“विवादका विषय कुशूलस्थ बीज सहकारियोंके अभावके कारण ही अङ्कुर
आदि कार्य नहीं करता है । क्योंकि कार्यकारणभावनिश्चयका विषयीभूत
जो क्षेत्रस्थ बीज है, उसी जातिका यह भी है । अर्थात् जिस बीजसे
तुम भी अङ्कुरकी उत्पत्ति मानते हो, उसी बीजजातिका कुशूलस्थ बीज
भी है । किन्तु जो सहकारीके कारण अङ्कुरादि कार्य नहीं करने वाला
नहीं है, बल्कि हमेशा ही अङ्कुर करनेमे असमर्थ है, वह अङ्कुर जन्माने
वाले क्षेत्रस्थ बाजकी जातिका भी नहीं है, जैसे शिलाखण्ड ।
ऐसी आशङ्का नहीं कर सकते कि “शिलाखण्डमे जो तथाकथित
बीज-जातीयत्वका अभाव है, क्या वह तथाकथित साध्यके ही नहीं रहने-
के कारण है ? या परम्परासे भी अङ्कुर न जन्मा सकनेके कारण है ?
अतः यहाँ व्यतिरेक व्याप्ति भी सन्दिग्ध है ।” क्योंकि पहले ही शङ्काका
बीज मिटा दिया गया है । अर्थात् सभी बीज जब अङ्कुरके प्रति प्रयो-
जक सिद्ध किये जा चुके हैं, तब यह ठीक ही है कि कोई बीज यदि
अंकुर नहीं करता है तो वह केवल सहकारीके न जुटनेके कारण ही ।
शिलाखण्ड तो हमेशा ही अङ्कुरमे असमर्थ है, इसलिये वह बीज जातिसे
भी पृथक् है ।
अस्तु, “सामर्थ्य और असामर्थ्यरूप विरुद्ध धर्मोंका एक जगह
१. तथाभूत—१ पु० पा०