आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षणभङ्गवादः ३९
न प्रथमः, निर्विशेषणस्यासिद्धत्वात् १। यावत्सत्त्वं किञ्चित्-
करणात्, सविशेषणस्य तु विरोधसिद्धावपि अध्यासानुपपत्तेः।
यदा यदकरणं हि तदा तत्करणस्याभावो नत्वन्यदा तत्कर-
णस्य, न चैतयो२रेकधर्मिसमावेशमातिष्ठामहे।
न द्वितीयः, भावाभावव्यतिरिक्तयोः करणाकरणयोरसिद्धेः।
व्यापारापरव्यपदेशसहकारिभावाभावौ हि करणाकरणे कार्यभावा-
भावौ वेति।
अतिरेकसिद्धावपि स्वकाल एव स्वाभावप्रतिक्षेपवत् अकर-
णाभावमाक्षिपेत् करणं, न त्वन्यदा, न हि यो यदा नास्ति स
इनमें प्रथम पक्ष ठीक नहीं है। क्योंकि करण और अकरण
परस्परका अभावरूप भलेही होवें, पर बिना विशेषणके सामान्यतः
अकरणत्व बीजमें असिद्ध है। क्योंकि जितने सत्पदार्थ हैं, सब
अवश्य कुछ करते हैं। इसलिये बीजमें करण और अकरण एक कालमें
कहां रहा कि विरोध हो।
यदा तदारूप कालात्मक विशेषणके सहित करण-अकरणमें विरोध
रहनेपर भी उनका एक जगह समावेश नहीं हो सकता है। क्योंकि
जब जो नहीं करता है, तभी उसमें करणका अभाव है, न कि अन्य
कालमें, अर्थात् करनेके समयमे भी। हम तो 'जब करना' और 'तभी
न करना' इन दोनों विशेषणसहित विरुद्धधर्मोंका एक धर्मीमें समावेश
मानते नहीं हैं।
दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है। क्योंकि भाव और अभाव के अति-
रिक्त करण और अकरण असिद्ध हैं। क्योंकि अन्तिम व्यापाररूप
सहकारीका भाव ही करण है और उसका अभाव ही अकरण है। अथवा
कार्य होना करण है और कार्य न होना अकरण है। अर्थात् करण और
अकरण परस्पराभाव के आपादक तब होते यदि वे परस्पराभावके
व्याप्य होते।
१. असिद्धेः—१ पु० पा० २. न चानयो—२ पु० पा०