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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 91, कुल 530 में से

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पृष्ठ 91

४२ आत्मतत्त्वविवेके
परिमाणभेदः एकस्मिन् धर्मिण्युपसंहर्तुं शक्यत इत्यादि पदार्थ-
चिन्ताचतुरैः सह विवेचनीयम् १ ।
अस्तु तर्हि इहापि बाधकं बलं प्रसङ्गतद्विपर्ययोरुक्तत्वादिति
चेत्, न, तयोः सामर्थ्यासामर्थ्यविषयत्वात् तत्र च उक्तत्वात् । स्तां
वा, न तथापि ताभ्यां शक्त्यशक्त्योरविवक्षितकालभेद एव
विरोधः साध्यते तथोपसंहर्तुमशक्यत्वात् । यदा तदेत्युपेक्ष्य
यत् समर्थं तत्करोत्येवेत्युपसंहर्तुं शक्यमिति चेन्न, कालनियमा-
कालभेदसे भी परिमाणभेदका एक धर्मीमे होना नहीं माना जा
सकता है। ये सब बातें पदार्थविचारमे चतुर वैशेषिकोंके साथ
विचारनी चाहिये ।
(शङ्का) यहा भी बाधक बल होवे, क्योंकि बाधकस्वरूप प्रसङ्ग
और विपर्ययको मैं पहले दिखा चुका हूँ ।
(उत्तर) ऐसा कहना ठीक नहीं है। क्योंकि वे प्रसङ्ग और
विपर्यय सामर्थ्य और असामर्थ्य विषयक ही हैं, तथा उनके विषयमे
दूषण भी पहले ही दिखाये जा चुके हैं। अथवा यदि वे प्रसङ्ग-विपर्यय
हों भी, तथापि उनके द्वारा किसी कालविशेषका निवेश किये बिना
करण और अकरणमें विरोध सिद्ध नहीं हो सकता है, क्योंकि वैसा
उपसहार नहीं हो सकता । अर्थात् - कुशूलस्थ दशामे सामर्थ्यहेतुसे
करणका प्रसग करो तो वह हमे भी इष्ट ही है। कारण, आगे चलकर
वह अकुर करता ही है। इसके विपरीत अकरणसे यदि कुशूलस्थ
दशामे बीजमें सामर्थ्यका अभाव सिद्ध करो तो हेतु ही असिद्ध है।
क्योंकि कुशूलस्थबीजमे जो अकरण है, वह करणविरोधी नहीं है।
इसलिए कदाचित् अकरणके कारण कुशूलस्थबीजमे अङ्कुरसामर्थ्यका
अभाव नहीं सिद्ध हो सकता है।
(शङ्का) जब तब इत्यादि कालभेदका निर्देश किये बिना ही 'जो
समर्थ है वह करता ही है' इस प्रकारका उपसंहार हो सकता है।
१. चिन्तनीयम् - ३ पु० पा०