आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षणभङ्गवादः ४१
मूर्तत्वसमानदेशत्वयोरेकदा विरोधात् । तथा चारम्भपक्षे पूर्व-
द्रव्यनिवृत्तिः अनिवृत्तावनारम्भ इति ।
तत्र निवृत्तावाश्रयभेदादेव परिमाणभेदः, अनिवृत्तौ संयोगि-
द्रव्यान्तरानुपचये क्व परिमाणभेदोपलम्भो यो विरोधमावहेत् ।
तदुपचये ^१तु क्व परिमाणान्तरोत्पत्तिः, आश्रयानुत्पत्तेः । अतएव
स्थौल्यातिशयप्रत्ययोऽपि तत्र भ्रान्तः । तस्मात् कालभेदेनापि न
( उत्तर ) यह कहना ठीक नहीं है। क्योंकि बाधकबलसे यहाँ काल-
भेद होनेपर भी दीर्घत्व ह्रस्वत्वमे विरोध ही कहा गया है । अर्थात् एक
ही वस्तु पहले ह्रस्व होकर दीर्घ नहीं हो जाती है, बल्कि पहली वस्तुके
नष्ट हो जानेपर दूसरी ही वस्तु दीर्घ परिमाणवाली पैदा होती है ।
क्योंकि जिन अवयवोंसे पहले द्रव्यका निर्माण हुआ है, उन्हीं अवयवोंमे
दूसरा द्रव्य नहीं बनता है। क्योंकि प्रथम द्रव्यके रहते ही वहां दूसरा
द्रव्य कैसे रह सकता है ? एक समयमे दो मूर्त द्रव्योंके एक जगह
रहनेमे विरोध है। इसलिये नये द्रव्यकी उत्पत्तिपक्षमे पूर्वद्रव्यकी
निवृत्ति माननी पड़ेगी। यदि पूर्वद्रव्यकी निवृत्ति न हो तो नये द्रव्यका
आरम्भ भी नहीं हो सकता है ।
यदि वहां पूर्वद्रव्यकी निवृत्तिके बाद नया द्रव्य दीर्घ परिमाण-
वाला पैदा हुआ, तब तो आश्रयके भेदसे ही परिमाणमे भेद हुआ, न कि
आश्रयद्रव्य पूर्वका ही रहा और परिमाण बदल गया ।
पूर्व द्रव्यकी अनिवृत्तिपक्षमे - अर्थात् पूर्व द्रव्य यदि वैसाका वैसा
बना रहा, उस पक्षमे - वहाँ यदि किसी दूसरे संयोगी द्रव्यका
मेल नहीं हुआ तो परिमाणभेदकी उपलब्धि ही कहाँ होगी, जो कि
विरोध लावे । यदि दूसरे द्रव्यका मेल हुआ, तब भी किसमें परि-
माणभेदकी उत्पत्ति होगी ? क्योकि पूर्वद्रव्यकी निवृत्ति नहीं होनेसे
किसी आश्रयकी उत्पत्ति हुई नहीं, जिसमे वह दूसरा परिमाण पैदा
होवे । इसलिए जहाँ दूसरे संयोगी द्रव्यके मिल जानेसे स्थूलता बढ़ी
हुई सी मालूम पडती है, यहाँ यह स्थूलता प्रतीति भ्रमात्मक है । अतः
१ ऽपचयेऽपि च — १ पु० पा०