आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
अनुपलम्भवादः ४४१
वेदस्यार्थोऽनुष्ठीयते निवध्यते च मन्वादिभिः ।
पुरुषाणामपचीयमानशक्तिकत्वाच्च । यथा ह्यश्वमेधराजसूया-
द्यनुष्ठानशक्तेरपचयस्तथाऽध्ययनशक्तेरपि । न च पूर्वमपि नानु-
ष्ठिता एव राजसूयादयः, तदर्थस्य वेदराशेर्वैयर्थ्यप्रसङ्गात् ।
न च नित्यानुमेयवेदसंभवः, वर्णानां नित्यत्वेऽप्यानुपूर्व्याः
पाठाश्रयत्वात् । न चानुपूर्वीशून्यवर्णाः पदं नाम, न चाका-
वर्तमान वेदमें नहीं मिलता है, फिर भी मनु आदि ऋषियोंने अपनी
स्मृतिमें उसका उल्लेख किया है । इससे सिद्ध होता है कि वेदका वह
भाग उच्छिन्न हो चुका है ।
एव पुरुषोंकी अध्ययनशक्ति क्रमशः क्षीण होती देखी जा रही है,
इससे भी सिद्ध होता है कि वेदका ह्रास संभव है । अर्थात् एक व्यक्ति
वेदकी समस्त शाखाओंका अध्ययन करनेमें असमर्थ है, अतः एकके
समान दूसरेके द्वारा भी किसी शाखाका अध्ययन संभव है । इससे
वैदिक शाखाके उच्छेदकी संभावना सिद्ध होती है । क्योंकि जैसे
बहुद्रव्य-साध्य अश्वमेध-राजसूय आदि यज्ञोंकी अनुष्ठानशक्तिका ह्रास
हो गया है ; यह नहीं कह सकते कि—पूर्वकालमें भी राजसूय आदि-
का अनुष्ठान नहीं ही हुआ था—क्योंकि तब उस विषयका प्रतिपादक
वेदसमुदाय व्यर्थ हो जायगा ।
यह नहीं हो सकता कि—होलाकादि-विषयक वेद कभी भी पाठमें
नहीं आये किन्तु पूर्वकालीन स्मृति और आचारके द्वारा उक्त वेदभाग
का अनुमान करके ही तदनुसार मन्वादि-स्मृति या शिष्टाचार बने हैं ।
अर्थात् मन्वादिस्मृति या आचारका आधार सीधे वेद नहीं हैं किन्तु
तद्विषयक वेदके अनुमापक पूर्वकालीन अन्य स्मृति या आचार ही हैं ।
अतः वेद, नित्यानुमेय हैं तथा शाखा-उच्छेदमे कोई प्रमाण नहीं है—
क्योंकि वर्ण भले ही नित्य हों, किन्तु वर्णोंकी आनुपूर्वी ( गकारोत्तर-
अकारोत्तर-णकारोत्तर-अत्त्वादि ) तो पुरुषाधीन पाठ ( उच्चारण ) के
आश्रित होनेसे अनित्य ही है । क्योंकि आनुपूर्वी रहित वर्ण पद नहीं
कहाता । एवं आकाङ्क्षा-योग्यता-और आसत्तिसे युक्त पदसमूहके अलावे
दृष्टायुपेतपदकदम्बादन्यद् वाक्यं नामेति गुरुरपि लघुरेव ।
तस्मात् पुरुषाणामनुष्ठानशक्तिवत् अध्ययनशक्तिरपि युग-
क्रमेणापचीयते, ततो वेदानां शाखोच्छेदः, तदर्थानामन्ष्ठानो-
च्छेदः, वर्णाश्रमाचारव्यवस्थाविप्लवश्चेति ।
अतएव भगवतो व्यासस्य पुरुषशक्त्यपचयमपेक्ष्य वचनानि
“अल्पायुषो ऽल्पसत्त्वा” इत्यादीनि । वेदोच्छेदसवेक्ष्य “प्रति-
मन्वन्तरं चैषा श्रुतिरन्या विधीयते” इत्यादीनि । अनुष्ठानो-
त्सादमवेक्ष्य “दानमेकं कलौ युगे” इत्यादीनि । आचारविप्लव-
मवेक्ष्य “प्रजास्तत्र भविष्यन्ति शिरनोदरपरायणाः” इत्यादीनि ।
तथा च श्रूयमाणा अपि वेदा उच्छेदमुपयास्यन्ति, वेदत्वाद्
वाक्यत्वाद् वा, उच्छिन्नशाखावदिति न्यायात् । यथा चैतत् तथा
आश्रय भी नहीं होता । अतः पूर्वोक्त रीतिसे वेदको नित्यानुमेय
प्रतिपादित करनेवाले गुरु 'प्रभाकर' भी वस्तुत लघु ही हैं ।
इसलिये पुरुषोंकी अनुष्ठान-शक्तिके समान अध्ययनशक्ति भी युग-
क्रमके अनुसार क्षीण होती है और अध्ययन-शक्तिके क्षीण होनेके कारण
वेदकी शाखाओंका उच्छेद, उसके विधियोंके अनुष्ठानका उच्छेद तथा
वर्णाचार एवं आश्रमसम्बन्धी आचारोंकी व्यवस्था भी छिन्न-भिन्न हो
जाती है। इसीलिये पुरुष-शक्तिके ह्रासकी दृष्टिसे भगवान् व्यासके
"अल्पायुषोऽल्पसत्त्वाः" इत्यादि वचन हैं। वेद सम्प्रदायके ह्रासकी
दृष्टिसे "प्रतिमन्वन्तर चैषा श्रुतिरन्या विधीयते" इत्यादि वचन हैं।
अनुष्ठान ह्रासकी दृष्टिसे "दानमेकं कलौ युगे" इत्यादि वचन हैं।
तथा आचारोंके ह्रासकी दृष्टिसे "प्रजास्तत्र भविष्यन्ति शिरनोदर-
परायणाः" इत्यादि वचन हैं।
इस प्रकार जो वेद आज श्रूयमाण (प्रत्यक्ष) हैं, वे भी उच्छिन्न हो
जायेंगे, वेद होनेके कारण या वाक्य होनेके कारण, पूर्वमें उच्छिन्न
वेदकी शाखाओंके समान—यह अनुमान उच्छेदमें प्रमाण है। एवं, जैसे
भविष्यमें वेदोंका उच्छिन्न हो जाना अनुमान-प्रमा...
अनुपलम्भवादः ४४३
पर्वता अपि चूर्णीभविष्यन्ति, पार्थिवत्वात्, घटवत् । समुद्रा अपि
शोषमेष्यन्ति, जलाशयत्वात्, स्थलीपल्वलवत् । सूर्योऽपि निर्वा-
स्यति, तैजसत्वात् प्रदीपवत् । ब्रह्मापि प्रैष्यति, शरीरित्वात्,
अस्मदादिवदित्यागमाविरोधेनानुमीयताम् ।
स्यादेतत्, भविष्यन्नुच्छेदोऽनुमितः । न तु भूतोऽपीति
कुत इति चेत्, यत एव १ उच्छेदानन्तरं पुनः सर्गेण भाव्यम् ।
अन्यथा संसारिणां कृतहानप्रसङ्गात् । न हि विश्वनिर्माणमन्तरेण
भोगज्ञानयोः सम्भवः । न च तेन विना कर्मप्रवाहसंरोधः । ततो
ही-पर्वत भी चूर्ण हो जायेंगे, पार्थिव अर्थात् पृथिवीसमवेत द्रव्य होनेके
कारण, घटके समान । समुद्र भी सूख जायेंगे, जलाशय होनेके कारण,
पोखरोंके समान । सूर्य भी बुझ जायगा, तैजस अर्थात् तेजःसमवेत द्रव्य
होनेके कारण, प्रदीपके समान । तथा ब्रह्मा भी मरेंगे, शरीरधारी होनेके
कारण, हम लोगोंके समान । इस प्रकार आगमानुसार अनुमान कर लें ।
शङ्का—अस्तु, पूर्वोक्त हेतुओंसे कार्य जगत्के भावी उच्छेदका
अनुमान हुआ । किन्तु भूतकालमें भी उच्छेद था, यह कैसे सिद्ध होगा ?
अर्थात् यदप्रवाहके अनादि होनेसे ही वह महाजनपरिगृहीत क्यों न है ?
समाधान—इसलिये कि उच्छेदके बाद पुनः सृष्टि होनी चाहिये ।
अन्यथा संसारियोंके लिये कर्मोंकी हानि अर्थात् निष्फलता हो जायगी ।
तात्पर्य यह है कि वर्तमान सृष्टिमें जो कर्म प्राणियोंने किये हैं, वे
निष्फल हो जायेंगे, यदि भविष्यमें सृष्टि न हो । अतः वर्तमान सृष्टिके
बाद प्रलय होने पर पुनः सृष्टिका होना अनिवार्य है । इसी प्रकार यह
वर्तमान सृष्टि भी पूर्वप्रलयके बाद हुई है तथा उस प्रलयके पूर्वकी
सृष्टि भी उसके पूर्ववर्ती प्रलयके बाद हुई थी । इस प्रकार यह सृष्टि
और प्रलयका प्रवाह अनादि ही सिद्ध है ।
यदि प्रलयके बाद पुनः सृष्टि न हो तो कर्मोंके फलस्वरूप सुखदुःख-
साक्षात्काररूप भोग तथा तत्त्वज्ञान नहीं हो सकेंगे । इस प्रकार कृतहान-
दोषकी प्रसक्ति हो जायगी । एवं भोग और ज्ञान इन दोनोंके असम्भव
१. अत एव यत इति क्वचित् पाठः ।
४५४ आत्मतत्त्वविवेके
यथा भविष्यन् विश्रमर्गं उच्छेदपूर्वकस्तथाऽयमपीति । समय-
नियमस्तु प्राणिनां कर्मवैषम्येऽपि वर्षादिनियमवदुदयास्तनियमवद्
वा द्रष्टव्यः, कर्मणामेवैवंस्वभावत्वात् । एतदर्थमेव हि पुराणेषु
सृष्टिप्रलययोर्दिवसरात्रिव्यवहारः ।
तथापि सर्वप्राणिनाशयौगपद्ये किं प्रमाणमिति चेत्, द्वि-
सप्तभौमभुवनप्रासादभङ्गेऽपि निर्भया एव ग्रामकुटीहट्टविहारिणः १
हो जानेसे कर्मप्रवाहका निरोध भी नहीं हो सकेगा । अर्थात् मुक्ति
भी असम्भव हो जायगी । क्योंकि प्रारब्धकर्मोंका भोगद्वारा ही नाश
होगा तथा अन्य कर्मोंका तत्त्वज्ञानसे । अतः मोक्षोपयोगी भोग और
तत्त्वज्ञानके साधनके लिये प्रलयोत्तर पुन सृष्टि अनिवार्य है ।
यहाँ प्राणियोंके कर्मोंके विपाकका समय यद्यपि भिन्न भिन्न होता है,
फिर भी ब्रह्माकी आयुके सौ वर्ष काल बीतनेपर प्रलय होनेका जो नियम
है, वह तो वर्षाकाल आदिके नियमके समान अथवा सूर्योदय सूर्यास्त
काल (दिन रात) के नियमके समान है, ऐसा जानना चाहिये । अर्थात्
जैसे, वर्षा आदि ऋतुओंके जनक कर्म एक नियत अवधिके बाद ही
वर्षादिकालको उत्पन्न करते हैं, न कि कभी घण्टा प्रहर आदिके बाद
और कभी वर्ष दो वर्ष आदिके बाद । एव जैसे, दिन और रात नियमवत
होती है, वैसे ही सृष्टि और प्रलयके जनक कर्म भी ब्रह्माकी आयुके
हिसाबसे सौ सौ वर्ष बीतने पर ही सृष्टि और प्रलयको नियमवत उत्पन्न
करते रहते हैं । क्योंकि कर्मोंका ही ऐसा स्वभाव है कि सुषुप्ति अवस्था
के समान उन सबोंकी वृत्ति एक साथ निरुद्ध हो जाती है । इसीलिये
पुराणोंमें सृष्टि और प्रलयका दिन और रातके रूपमें व्यवहार किया
गया है ।
यदि कहो कि-कुछ प्राणियोंके कर्मका एकसाथ निरोध और
प्राकट्य भले ही हो किन्तु सभी प्राणियोंका एकसाथ नाश होनेमें क्या
प्रमाण है ? तो चौदह कोठों वाले भुवनरूपी महलके ध्वस्त हो जानेपर
भी गाँवकी कुटिया एवं हट्ट (झापड़ी) में विहार करनेवाले शरीरधारी
१. ग्रामटीहट्टकुटीविहारिण इति २ पु० पा० ।
अनुपलब्धवादः ४४५
शरीरिण इति महती प्रेक्षा । तस्मात् सर्गादिमहाजनमन्वादि-
परिग्रहपूर्वकोऽयमद्याप्यनुवर्तत इति नानवमरदोषावकाशोऽ-
पीति युक्तमुत्पश्यामः ।
तदेवं कथं मन्वादिभिः परिगृह्यन्तां वेदा इति चेत्, आयुर्वेद-
वदाप्तोक्तत्वनिश्चयात् । स एव कुत इति चेत्, अध्यक्षतः, तेषाम-
प्यतीन्द्रियार्थदर्शित्वात् । तादृशां तेषां तत्परिग्रहेण किं प्रयोजन-
मिति चेत्, अस्मद्व्यवहारेणास्मदपत्यादि व्युत्पद्यताम्, तथा च
धर्मसंप्रदायः प्रवर्ततामिति भूतदया स्वाधिकारसम्पादनं च ।
जीव निर्भय ही हैं—यह आपकी अच्छी सूझ है । इसलिये सृष्टिके
आदिमें वेदोंके प्रणयनकालमे ही ईश्वरके द्वारा मनु आदि मानस
महाजन भी उत्पन्न किये गये और उन्हींके द्वारा पहिले वेदोंका परिग्रह
हुआ, जो आजतक चला आ रहा है । अतः "महाजनके अभावमें
महाजनद्वारा परिग्रहका अवसर ही कहाँ है !" इस दोषका भी अवकाश
नहीं है । अत हमारा यह विचार युक्त है ।
यदि कहो कि—सृष्टिके आदिकालमे मनुपभृति महाजन भले ही हों,
फिर भी उस समय उनके द्वारा परिग्रह कैसे हुआ ?—तो इसलिये कि
जैसे आप्तोक्तत्वके निश्चयसे आजकल हम लोग आयुर्वेदका परिग्रह
करते हैं, वैसे ही उस समय मनु आदिने वेदोंमे आप्तोक्तत्वका निश्चय
होनेसे उनका परिग्रह किया । यदि कहो कि—उन्हें वेदोंमें आप्तोक्तत्व-
का निश्चय ही कैसे हुआ ?—तो यही उत्तर है कि "प्रत्यक्षसे"। क्योंकि
वे भी अतीन्द्रिय विषयोंके द्रष्टा थे । यदि पूछो कि—वेदोंके परिग्रहसे
उनका क्या प्रयोजन था ?—तो यही कि हमारे वेदार्थानुष्ठानरूप
व्यवहारसे हमारे पुत्रादि भी परिचित होकर वैसा अनुष्ठान करें और
उनकी देखादेखी अन्य लोग भी वैसा अनुष्ठान करें । इस प्रकार लोकमे
धार्मिक सम्प्रदाय चालू हो-ऐसी भूतानुकम्पा तथा अपने अधिकारका
पालन ही उनका प्रयोजन था । अर्थात् सर्गादिकालमें मन्वादिकने
लोककल्याणकी भावनासे वेदार्थानुष्ठान ( वेदपरिग्रह ) किया । तथा
इसलिये भी वैसा किया कि ईश्वरने ही वेदोंका निर्माण कर उनके परि-
ग्रहार्थ मनु आदिको अधिकारी बनाया था ।
४५६ आत्मतत्त्वविवेके
अथवा सर्गान्तरगृहीतव्याप्तिप्रादुर्भावे सुप्तप्रतिबुद्धवत् पितृत्वे-
नाविप्रलम्भकत्वमुच्चावचभूतनिर्माणदर्शनेन सार्वज्ञयमनुमायाऽऽ-
प्तत्वनिश्चयस्तस्य तेषाम् ।
यद्वा भगवान्नेव सम्प्रदायप्रवर्तनव्यसनव्यग्रः कायसहस्राणि
व्युत्पाद्यव्युत्पादकभावव्यवस्थितानि निर्माय तदातन महाजनं
परिग्राहितवान् नटोपाध्याय इव स्वयं नटित्वेति सर्वं सुस्थम् ।
पक्षत्रयेऽप्यत्र पुराणादिसंवादोऽप्यस्तीति ।
स्यादेतत्, परमेश्वरप्रवर्तितोऽयमेव वेदसंप्रदायः सर्गान्तर-
अथवा सोकर उठे हुए व्यक्तिके समान मन्वादि भी पूर्वसृष्टिमें गृहीत
व्याप्तिका स्मरण कर पितृत्वहेतुसे ईश्वरमे अविप्रलम्भकत्व (अवञ्चकत्व)
का अनुमान करते हैं। तथा अनेक प्रकारके प्राणियोंकी रचना देखकर
उसमें सर्वज्ञत्वका भी अनुमान करते हैं। क्योंकि जो जिसका पिता
होता है, वह उसके प्रति वञ्चक नहीं होता है। अतः ईश्वर भी सबका
पिता होनेके कारण वञ्चक नहीं है। एव सर्वज्ञ ही विविध रचनामे
समर्थ हो सकता है, इसलिये ईश्वर सर्वज्ञ भी है। इस प्रकार अवि
प्रलम्भकत्व और सर्वज्ञत्वका अनुमान होनेके बाद मन्वादिकों को ईश्वर
में आप्तत्वका निश्चय होता है और वे ईश्वर प्रणीत वेदोंका परिग्रह
करते हैं ।
अथवा स्वयं ईश्वर ही धर्मसम्प्रदायके सञ्चालनरूप व्यसनमे व्यस्त
होकर हजारों शरीरको व्युत्पाद्य और व्युत्पादक (शिष्य शिक्षक) के
रूपमे बनाकर (धारणकर) सर्गादिकालीन मन्वादि महाजनोंको वेदोंका
परिग्रह कराया । जैसे, कोई नाट्यविद्या का आचार्य स्वयं नाट्य कर
अन्योंको नाट्यकी शिक्षा देता है । इस प्रकार पूर्वोक्त सम्पूर्ण विषय
सुस्थिर है । इन तीनों ही पक्षोंमे पुराणादिकोंका संवाद भी है । अर्थात्
पुराणोंद्वारा भी इन तीनों पक्षोंकी पुष्टि होती है ।
यदि कहो कि-उक्त रीतियोंसे महाजनद्वारा वेदोंका परिग्रह भले ही
हो, फिर भी परमेश्वरद्वारा, सञ्चालित वर्तमान वेद सम्प्रदाय पूर्वसृष्टिगत
[Header] अनुपलब्धवादः ४४७
वेदापेक्ष एवेति सेश्वरमीमांसापक्षः कपिलपक्षो वा स्यादिति चेत्,
किमर्थं पुनरियम्पेक्षा पूर्ववेदे जगन्नाथस्य ? न तावद् वेदार्थोप-
लम्भाय, नित्यसर्वज्ञत्वात् ।
नापि रचनार्थम्, स्वभावतः सर्वकर्तृतया आदर्शानपेक्ष-
त्वात् । नापि विरोधपरिहारार्थम्, प्रतिपाद्यानां तदनुसन्धान-
वेदके अनुसार ही सञ्चालित हो तो यह एक नया ही सेश्वर मीमांसापक्ष
हो गया, जो ईश्वरको वेदका कर्ता माननेसे सेश्वर हुआ और पूर्व पूर्व
वेदोंकी अपेक्षा करनेसे मीमांसा भी हुआ । अथवा कपिलपक्ष हो गया,
जिसके अनुसार धर्म, विज्ञान, और ऐश्वर्यसे सम्पन्न कपिलमुनिने ही
सुप्त-प्रबुद्धके समान पूर्वसृष्टिगत वेदोंका स्मरणकर वर्तमान सृष्टिके प्रारम्भ
में वेदोंको प्रकाशित किया—तो बताओ कि परमेश्वरको वर्तमान वेद-
सम्प्रदायको सञ्चालित करनेके लिये पूर्ववेदकी क्यों अपेक्षा होगी ? यदि
कहो कि—वैदिक विषयोंके ज्ञानके लिये पूर्ववेदकी अपेक्षा है । अर्थात्
जिन विषयोंका प्रतिपादन वर्तमान वेदद्वारा परमेश्वरको करना है, उन
विषयोंको वह पूर्ववेदसे ही जानता है—तो यह नहीं कह सकते ।
क्योंकि नित्य-सर्वज्ञ होनेके कारण वह स्वयं सम्पूर्ण वेदार्थका ज्ञान
रखता है ।
यदि कहो कि—वर्तमान वेदकी रचनाके लिये आदर्श ( नमूना ) के
रूपमें पूर्ववेदकी अपेक्षा है—तो यह भी नहीं हो सकता । क्योंकि
स्वाभाविकरूपसे ही वह सम्पूर्ण वस्तुओंका कर्ता होनेके कारण किसी
आदर्शकी अपेक्षा नहीं करता है। यदि कहो कि—पूर्ववेदसे वर्तमान
वेदमें विरोध-परिहारके लिये पूर्ववेदकी अपेक्षा है । कारण, पूर्ववेदसे
आजके वेदमें विरोध होनेपर मन्वादिद्वारा परिग्रह होनेमें शिथिलता
आ जायगी—तो यह भी ठीक नहीं है । क्योंकि मनु आदिको पूर्ववेदका
अनुसन्धान ही नहीं होता है, जिसके विरोध-परिहारार्थ परमेश्वरको पूर्व-
वेदकी अपेक्षा हो । यदि सर्वज्ञ होनेके कारण मन्वादिको पूर्ववेदका
अनुसन्धान संभव है, इसलिये उसके साथ विरोध-निवारणार्थ पूर्ववेदके
अनुसार ही परमेश्वरको वर्तमान वेद बनाना पड़ता है—ऐसा मानो, तो
भी सर्वज्ञ होनेसे मनु आदि परमेश्वरकी सर्वज्ञताको भी जानते ही
४४८ आत्मतत्त्वविवेके
विधुरत्वात् । अवैधुर्य्ये वा कर्तुः सार्वश्यविज्ञानादेव समस्तविरोध-
विधूननात् ।
तथापि पूर्वसर्गान्तरवेदव्यवहारोऽपि परमेश्वरस्य गोचर
इति चेत् , कः सन्देहः ? यदि चैतदेव वेदस्य प्रवाहनित्यत्वम् ,
न केवलमेतस्य, किंतु घटादेरपीति न्याय एव दर्शनम् । अन्यथा
मीमांसेति क्व सेश्वरमीमांसेति । तस्मादुक्तरूपः परिग्रहो
नान्यथा संभवतीति प्रतिबन्धसिद्धिः । तथा चाप्तोक्तत्वात्
प्रामाण्यसिद्धिः ।
हैं, उससे ही मनु आदिको समस्त विरोधोंका विधूनन हो जाता है ।
अर्थात् परमेश्वरकी सर्वज्ञताके ज्ञानसे ही मनु आदिको परमेश्वरकृत वेद
में विरोध-बुद्धिका उदय नहीं होता है ।
फिर भी यदि कहो कि—वर्तमान वेदके रचयिता परमेश्वरको पूर्व-
सृष्टिगत वेद-व्यवहारका भी ज्ञान रहता ही है, क्योंकि वह सर्वज्ञ है ।
अत एव यहाँ सेश्वर मीमांसापक्ष ही आता है—तो इसमे क्या सन्देह
है ? क्योंकि यदि इसे ही (वेदनिर्माता ईश्वरको पूर्ववेदका ज्ञान रहनेको
हो) वेदकी प्रवाह नित्यता कहो तो इस प्रकारका प्रवाह-नित्यत्व न
केवल वेदका ही है किन्तु घटादि वस्तुओंका भी है । अतः यह न्याय-
दर्शन ही हुआ । किन्तु यदि इससे भिन्न प्रवाह-नित्यत्व कहो, अर्थात्
जो वेद पूर्वसृष्टिमें था वही इस समयमें भी है, यही प्रवाह-नित्यत्व
है—तो यह शुद्ध मीमांसापक्ष होगा, जिसका खण्डन किया जा
चुका है । इसलिये सेश्वमीमांसानामक अतिरिक्त पक्षका प्रसङ्ग कहाँ
आता है ?
इसलिये मन्वादिकोंद्वारा वेदोंका पूर्वोक्त परिग्रह वेदोंमें आप्तोक्तत्व-
निश्चयके बिना नहीं हो सकता । अतः महाजनपरिग्रह और आप्तोक्तत्व
मे परस्पर व्याप्तिसम्बन्धकी सिद्धि हो जाती है । अर्थात् जो जो महाजन-
परिगृहीत होता है, वह आप्तोक्त होता है । वेद भी मन्वादि महाजनद्वारा
परिगृहीत है, इसलिये वह आप्तोक्त (ईश्वरोक्त) है । तथा आप्तोक्त
होनेके कारण ही वेदोंका प्रामाण्य भी सिद्ध होता है ।
अनुपलम्भवादः ४४९
कथं पुनः सुगताद्यागमेषु नादरश्छान्दसानाम् ? वेदविद्वेषि-
दर्शनान्तःपातिपुरुषप्रणीतत्वादिति मा शङ्किष्ठाः, जिनेन्द्रजग-
दिन्द्रप्रभृतिप्रणीतेष्वप्यादरात् । तत्कस्य हेतोः ? महाजन-
परिगृहीतपूर्वागमाविरुद्धतया तदनुसारित्वात् । कुतस्तर्हि ?
सिद्धप्रामाण्यवेदविरोधात् । कथं तर्हि कतिपयैरपि तत्परिग्रहः ?
अलसभीरुमृदुःषमयजात्यनुरूपधर्मविशेषात्, उदुम्बरगर्तौयतन्तुवाय-
प्रश्न—तो फिर बुद्धादिके आगमोंके प्रति वैदिकोंके अन्दर आदरकी
भावना क्यों नहीं है ?
उत्तर—यहाँ ऐसी आशङ्का मत करो कि—वेदोंके प्रति द्वेषभाव
रखनेवाले नास्तिक-दर्शनोंकी सीमामें आये हुए पुरुषों
(बुद्धादि) के द्वारा निर्मित होनेके कारण सुगतादि प्रणीत
आगमोंके प्रति वैदिकोंमे आदरभाव नहीं है—क्योंकि
जिनेन्द्र-जगदिन्द्र प्रभृति नास्तिकोंद्वारा प्रणीत आगमोंमें भी
वैदिकोंका आदर देखा जाता है ।
प्रश्न—वैसा किस कारण से है ?
उत्तर—वैसा इसलिये है कि महाजनद्वारा परिगृहीत वेदरूप पूर्व-
वर्त्ती आगमसे अविरुद्ध होनेके कारण जिनेन्द्र-जगदिन्द्र
प्रभृतिका आगम वेदानुसारी है । अर्थात् वेदानुकूल होनेके
कारण ही उक्त आगमोंमें वैदिकोंका आदर है, न कि
नास्तिक या आस्तिक नामधारी किसी पुरुषद्वारा प्रणीत
होनेके कारण ।
प्रश्न—तो फिर क्यों बुद्धादिकोंके आगमोंमें भी वैदिकोंके अन्दर
आदरभाव नहीं है ?
उत्तर—उक्त आगमोंमें आदरभाव इसलिये नहीं है कि—जिनका
प्रामाण्य सिद्ध हो चुका है, ऐसे वेदोंसे बुद्धादिके आगम
विरुद्ध हैं ।
प्रश्न—तो फिर क्यों कुछ लोगोंके द्वारा भी बुद्धादिके आगमोंका
परिग्रह किया गया है ?
४५० आत्मतत्त्वविवेके
चेत् । न त्वेवं वेदे, कर्मण्येव निर्भरत्वात् । त्रैवर्णिकबहिष्कृतै-
रनधिकारिभिरनन्यगतिकत्वात् कीर्तिप्रज्ञाकरवत् । न त्वेवं श्रुतौ,
परैः पूज्यानामप्यत्राप्रवेशात् , इतः पतितानामपि परैरुपादानात् ।
भक्ष्यपेयाद्यद्वैतरुचिभिश्च रागात् सरभादिवत् । नत्वेवमा-
म्नाये, तद्विभागव्यवस्थापरत्वात् कुतर्काभ्यासिभिश्च मोहात्
काणादादिवत् । न त्वेवं ब्रह्मणि, आबालभावं प्रवृत्तेः ।
उत्तर—बौद्धादि-आगमोंका ग्रहण वे आलसी और भीरु ही करते
हैं, जिन्हें कष्टमय आश्रमीय भद्रकर्मोंसे द्वेष है। जैसे,
उदुम्बरगर्तनामक देशके निवासी कुविन्दों (जुलाहों) ने
आलस्यवश वैदिककर्मको छोड़कर संसारमोचकागमोंमें
बताये कर्मको गृहीत कर लिया। किन्तु वेदोंके सम्बन्धमें
ऐसी बात नहीं है कि आलसी और भीरु ही उनका ग्रहण
किये हों। क्योंकि कष्टमय कर्ममें ही वेदोंका निर्भर है।
अर्थात् कष्टमय कर्मके ही वे प्रतिपादक हैं।
अथवा त्रैवर्णिकोंसे बहिर्भूत होनेके कारण वैदिककर्मके लिये
अनधिकारी होनेसे अनन्यगत्या कुछ लोगोंने सुगतागमोंका परिग्रह
किया। जैसे, कीर्ति-प्रज्ञाकरप्रभृति बौद्धोंने किया था। ऐसी
अनन्यगति वेदोंके सम्बन्धमे नहीं है। क्योंकि जो दूसरोंके पूज्य हैं,
उनका भी वेदोंमें प्रवेश वर्जित कर दिया गया है। तथा वैदिक सम्प्रदाय
की दृष्टिसे जो पतित हो गये हैं, उन्हें भी बौद्धादि-आगमवाले ग्रहण
कर लेते हैं।
अथवा भक्ष्याभक्ष्य और पेयापेय आदि वस्तुओंके सम्बन्धमे कोई
भेदभाव नहीं चाहनेवाले व्यक्तियोंके द्वारा रागवशात् सौगतादि-आगमों
का ग्रहण किया गया है। जैसे, सरभप्रभृति बौद्धोंने किया है। किन्तु
ऐसी बात वेदोंके सम्बन्धमें नहीं है। क्योंकि भक्ष्य-पेय आदिके विभाग
की व्यवस्था वेदको अभिप्रेत है।
अथवा सत्तर्कको छोडकर जो केवल कुतर्कोंके ही अभ्यस्त हैं, उन्हों-
के द्वारा मोहवश सौगतादि-आगमोंका परिग्रह हुआ है। जैसे, काणा-
अनुपलम्भवाद | ४५१
अविवेकिभिश्च पाषण्डिसंसर्गात् शौण्डिकादिवत् । न त्वेवं
प्रकृते, पित्रादिक्रमेण प्रवर्तनात् । योगाभ्यासाभिमानिभि-
श्चाव्यग्रताभिसन्धेः सुभूत्यादिवत् । न त्वेवं प्रस्तुते, प्रथमस्य
कर्मकाण्ड एव नियोगात् ।
अयोग्यैराजीवनात् सामान्यश्रमणकवत् । न त्वेवं प्रक्रान्ते,
आगन्तुकानामधिकारात् । कुहकवञ्चितैः समीचीनप्रत्ययात्
दीपङ्करसुषिरदर्शिशालिशवत् । न त्वेवं प्रकृते, तदभावात् ।
चार्यप्रभृति बौद्धोंके द्वारा हुआ था। ऐसी बात वेदके सम्बन्धमें नहीं
है। क्योंकि कुतर्काभ्याससे पहले ही बालभाव अर्थात् मोहावस्थासे
उन्मुक्त होते ही वेदपरिग्रहमें प्रवृत्ति होती है।
एव, अज्ञानियोंके द्वारा ही पाखण्डियोंका संसर्ग पाकर सौगतादि-
आगमोंका परिग्रह किया गया है। जैसे, शौण्डिकप्रभृतिने किया था।
वेदके सम्बन्धमें यह बात नहीं है। क्योंकि पित्रादि-परम्परासे ही
वेदमें प्रवृत्ति होती है न कि पाखण्डियोंके संसर्गवशसे ।
एव, योगाभ्यासका मिथ्या अभिमान रखनेवाले व्यक्तियोंके द्वारा
कर्मकाण्डके लिये व्यग्र न होनेके अभिप्रायसे बौद्ध आगमोंका परिग्रह
किया गया है। जैसे सुभूतिप्रभृति बौद्धोंने किया था। किन्तु वेदके
सम्बन्धमें ऐसी बात नहीं है। वैदिक आगमके अनुसार गार्हस्थ्यके
बाद ही योगविधि एवं उपासनाआका उपदेश किया गया है। इसलिये
प्रथम प्रथम अत्यन्त कष्टमय गृहस्थ कर्मोंमें ही नियुक्त किया जाता है।
अथवा अपनी जीविकाके सम्पादनमें स्वयं असमर्थ व्यक्तियोंद्वारा
जीविकाके रूपमें बौद्धागमोंका परिग्रह किया गया है। जैसे, सामान्य
नामक भिक्षुको बौद्धोंने बहुत धन देकर अपने धर्ममें प्रवृत्त करा लिया
था। एसी बात वेदके सम्बन्धमें नहीं है। क्योंकि आगन्तुकोंका
अर्थात् पाखण्डियोंका इसमें अधिकार ही नहीं है।
अथवा ऐन्द्रजालिकोंसे ठगे गये व्यक्तियों भ्रमसे समीचीन (यथार्थ)
समझ कर सुगतादिकोंके आगमोंका ग्रहण कर लिया। जैसे, काठके बने
बहुत छिद्रवाले यन्त्रविशेषमें एक ही दीप रखा हुआ रहता है, किन्तु
४५२ आत्मतत्त्वविवेके
किन्तु महाजनपरिग्रहात् वक्तृप्रामाण्यमनुमाय, आयुर्वेदे नै-
रुज्यकामवदिति ।
किं पुनरमीषां मूलम् ? न ह्येतावन्तो ग्रन्थराशयः पर-
विप्रलम्भनार्थं प्रणीयन्ते, न च विश्वमेव विप्रलभ्यमिति चेत्,
भवतु किञ्चिन्मूलं किमनेन चिन्तितेन ? अतिनिर्वन्धे तु क्षणि-
कनैरात्म्यादिप्रतिपादकानां तर्काभ्यासः । प्रतिपादितं च तथा ।
मूर्खोंको उसके अनेक छिद्रोंसे निकलती हुई प्रभाओमे अनेक दीपोंका
भ्रम हो जाता है। किन्तु वेदके सम्बन्धमें ऐसी बात नहीं है। क्योंकि
वेदका मूलभूत कोई वञ्चक पुरुष नहीं है। अतः सौगतागमोंमें प्रवृत्ति-
के यही सब कारण हैं। किन्तु वैदिक यागादिकोंमें प्रवृत्ति तो—महा-
जन-परिगृहीत होनेके कारण वेद प्रामाणिक वक्ताद्वारा निर्मित है—
ऐसा अनुमान करके ही होती है। जैसे, नीरोगताकी कामना करने
वाला व्यक्ति आयुर्वेदमे उसकी प्रामाणिकताका अनुमान करके प्रवृत्त
होता है।
अस्तु, आलस्यादि कारणवश कुछ व्यक्तियोंद्वारा गृहीत किये गये
इन बौद्ध-आगमोंका फिर मूल क्या है ? अर्थात् कोई वस्तु निर्मूल नहीं
हुआ करती। अतः इनका भी कोई मूल होना चाहिये और समूल
होनेसे ही उन्हें प्रमाण भी मानना उचित है। क्योंकि अत्यन्त कष्ट
उठाकर रची गयी इतनी ग्रन्थराशियाँ केवल दूसरोंको ठगनेके लिए नहीं
बनायी गयीं हैं। यदि ठगना ही लक्ष्य हो, तो भी सम्पूर्ण विश्व नहीं
ठगा जा सकता है। अभिप्राय यह है कि ससारको ठगनेके लिये
बौद्ध-आगमोंकी रचना हुई है, ऐसी बात नहीं कही जा सकती—तो इन
आगमोंका भले ही कुछ मूल हो, उस चिन्तासे क्या प्रयोजन है ?
क्योंकि हमारी इष्टसिद्धि तो हमारे वेदागमोंकी प्रामाण्यसिद्धिसे ही हो
चुकी है। फिर भी बौद्धागमोंके मूलज्ञानार्थ हठ करो तो सुनो—
जो आगम क्षणिकवाद और नैरात्म्य (आत्माका अभाव) वादके
प्रतिपादक हैं, [उनका मूल है कुतर्कोंका अभ्यास। अर्थात् वस्तु यदि
स्थिर होती तो अर्थक्रियामे क्रमयौगपद्यकी उपपत्ति नहीं हो सकती है,
एवं आत्मा यदि हो तो आत्मदर्शी व्यक्ति उस आत्मामें अनुरागवान्
अनुपलम्भवाद' ४५३
शून्यसाकारादिप्रतिपादकानां तु दुरभ्यासः, योगशास्त्रेष्वभ्य-
स्यतः स्वरूपशून्यमिव भाव्यमेकमेवेति प्रतिपादनात् ।
चैत्यचीवरादिप्रतिपादकानां तु स्वस्थितिमभिसन्धाय
दर्शनान्तरस्थितिद्वेषः, स्वस्थितौ प्रमाणमनपेक्ष्य परस्थितौ
विगानात् । ब्रह्मचर्यप्रतिपादकानां तु वेदा एव, न्यायावि-
रुद्धं परतन्त्रोक्तमप्यानुकूल्यप्रसिद्धेर्गृह्यत इति विमर्शात् । मन्त्र-
कोपप्रतिपादकानां तु प्रणवबीजजातयः सर्वसाधारणाः, श्रद्धेय-
होनेके कारण कभी मुक्त नहीं हो सकेगा—इत्यादि कथन कुतर्काभ्यास
ही है । इनका कुतर्कत्व पूर्व प्रकरणमे सिद्ध किया जा चुका है ।
जो आगम 'शून्यवाद' एव 'बाह्यपदार्थ ज्ञानके ही आकारविशेष हैं'
इत्यादि वादके प्रतिपादक हैं, उनका मूल तो दुरभ्यास (दूषित भावना)
है । क्योंकि योगशास्त्रका अभ्यास करते हुए चित्तको बाह्यवस्तुओंसे
पृथक्कर जगत् शून्यताको ही एकमात्र अपनी भावनाका विषय बनाते
हुए किसीने शून्यवादका सिद्धान्त बना डाला ।
जो आगम चैत्य (बौद्धोंका देवताविशेष) वन्दना एव चीवर-
(वस्त्र) परित्यागके प्रतिपादक हैं, उनका तो मूल दिगम्बरोंका अपने
सिद्धान्तके मोहमे अन्यदर्शनके साथ द्वेष ही है। क्योकि चैत्यवन्दन
एव चीवरपरित्यागके सिवाय अन्य कुछ भी मानने योग्य नहीं है—
अपने इस सिद्धान्तमे बिना कुछ प्रमाण दिये ही दूसरोंके सिद्धान्तका
केवल निन्दा करते हैं ।
जो आगम ब्रह्मचर्य, सत्य, अहिंसा आदिके प्रतिपादक हैं, उनका
मूल तो वेद ही है । क्योंकि अपने न्यायसे जो विरुद्ध न हो, ऐसा
परकीय आगममें कहा हुआ भी अपने अनुकूल होनेसे ग्राह्य होता है—
ऐसा विचार कर ब्रह्मचर्य आदिका प्रतिपादन किया गया है । अथवा
ब्रह्मचर्यके प्रतिपादनसे एक भागमें विश्वास उत्पन्न कर उसी दृष्टान्तसे
बौद्धागमोंके सभी भागोंके प्रति विश्वास पैदा करनेके लिये सुगतोंने
ब्रह्मचर्य आदिका प्रतिपादन कर दिया ।
बौद्धोंके जो आगम मन्त्र समुदायके प्रतिपादक हैं, उनका मूल तो
देवतानामाङ्कस्त्वधिकः । श्रद्धापरिगृहीतश्चाकारो देवतेति
हस्तसमालोचः ।
सत्यतपःशालिनां वचनं मन्त्रो, विषयवत्यां चिन्तायां
चित्तस्थैर्यं प्रयोजनम् । कथमन्यथा महर्षीणां शापानुग्रह-
क्षमता; कथं वा चतुर्भुजाष्टभुजाद्यवस्थेति¹ दुरुहादिति ।
हमारे वैदिक-मन्त्रगत प्रणवजातियाँ और उन उन देवताओंके बीज-
मन्त्राक्षर ही हैं, जो सर्वत्र एक रूपसे प्रयुक्त हैं। अर्थात् उन्हें ही
देखकर तदनुसार रूप कल्पनाकर या कहीं साक्षात् उन बीजाक्षरोंको ही
बौद्धोंने अपने मन्त्रोंमें प्रक्षिप्त कर लिया है तथा उन्हींके प्रभावसे बौद्धों
में आदित्यस्तम्भन या प्रतिमाका बोलना आदि शक्ति देखी जाती है।
श्रद्धेय देवताओंके सूर्य आदि नामकी जगह चैत्य आदि भिन्न नामोंका
निर्देश ही उनकी अपनी विशेषता है। चैत्य आदि जिस आकारका
श्रद्धासे ध्यान किया जाय, वही देवता है—यह तो उनकी अपने हाथ
की कल्पनामात्र है। अर्थात् सूर्य आदि देवताओंका अपना अपना रूप
निश्चित होता है। यह नहीं की ध्याताके ध्यानके अनुसार परिवर्तित
होने वाला हो।
यह कहना कि—सत्य और तपस्यासे युक्त व्यक्तियोंका वचन ही
मन्त्र है न कि आस्तिकोंका वेदभाग मन्त्र है। तथा किसी भी आकार-
का चिन्तन करनेपर जो चित्तमे स्थिरता आती है, वही उन देवताओंके
ध्यानका प्रयोजन है। यदि सत्य और तपस्याशील व्यक्तियोंका
वचन मन्त्र नहीं होता तो महर्षियोंमे शाप और वरदानकी क्षमता कैसे
आती। एव ध्यानानुसार यदि देवताका आकार नहीं होता तो चतुर्भुज,
अष्टभुज आदि अवस्थायें देवताकी कैसे होतीं—तो दुरुह (कल्पनातीत)
होनेके कारण यह पक्ष ठीक नहीं है। अर्थात् यदि तपस्वियोंका
वचन ही मन्त्र होता तो अनेक तपस्वियोंके अनेक वचन होनेसे किस
तपस्वीका कौन सा वचन मन्त्र है, यह कल्पना कठिन है। एव यदि
चित्तका स्थैर्यमात्र ही चतुर्भुज आदि अवस्थाओंका उपयोग होता तो
१. दुरुह वात् इति शङ्करमिश्रसम्मतः पाठः ।
अनुपलम्भवादः ४५५
एकविप्रलम्भार्थं वा केनचित् कियदेव प्रणीतं तेनानुष्ठित-
मपरैस्तदनुयायिभिर्गृहीतमन्वष्ठितं व्याख्यातं विवर्धितं चेति
किमनुपपन्नम् ? तस्माद् विरुद्धागमव्युदासेन वेदा एवार्वा-
चीनपुरुषपूर्वकत्वशङ्काव्युदासेन परमेश्वरप्रणीतत्वादेव भूतार्थ-
भागस्याप्रामाण्यशङ्काव्युदासेन प्रमाणमेवेति नियमः ।
कथं चरम इति चेत् ? महाजनपरिग्रहस्य तत्साध्यस्य
वा सर्वज्ञपूर्वकत्वस्य पुरुषदोषाभावस्य वा प्रामाण्यहेतोर्भूतभा-
जिस किसी वस्तुकी चिन्तासे ही चित्त स्थिर हो जा सकता है, फिर
मूर्तिविशेषको देवताके रूपमें कैसे कल्पित कर सकते हैं ?
अथवा यों कहनेमें भी कोई अनुपपत्ति नहीं है कि किसी एकको
ठगनेके लिए किसीने कुछ बना दिया तथा उस वञ्चित व्यक्तिने तदनुसार
अनुष्ठान किया और उसीकी देखादेखी और अनुयायियोंने भी उसे
ग्रहण कर लिया, तदनुसार अनुष्ठान किया, उसकी व्याख्यायें कीं तथा
लोकमें उसे फैला दिया ।
इसलिये वेदविरुद्ध आगमोंके परवञ्चनार्थ बनाये होनेके कारण
अप्रामाणिक होनेसे उनके खण्डितकर दिये जानेसे ही, एवं वेदोंके
आधुनिक पुरुषद्वारा निर्मित होनेकी शङ्काके खण्डित हो जानेसे
परमेश्वरप्रणीत होनेसे ही, तथा वेदके भव्यार्थभाग ( साध्यार्थभाग
अर्थात् क्रियाभाग ) के समान भूतार्थभाग ( सिद्धार्थभाग ) में भी
अप्रामाण्यशङ्काके खण्डित हो जानेसे प्रमाण ही है, ऐसा नियम सिद्ध
हो जाता है । अर्थात् वेद ही प्रमाण है, अन्य नहीं--ऐसा उद्देश्यगत
नियम, तथा ईश्वरप्रणीत होनेसे ही प्रमाण है, अन्य कारणसे नहीं---
ऐसा हेतुगत नियम, तथा वेद प्रमाण ही है, अप्रमाण नहीं--ऐसा
विधेयगत नियम होकर त्रिविध नियम सिद्ध होते हैं ।
यदि पूछो कि - पूर्वके दो नियम भले ही हों, किन्तु अयोगव्यवच्छे-
दार्थक एवकारका प्रयोग कर, वेद प्रमाण ही है—यह अन्तिम नियम
कैसे है ?--तो इसका यही उत्तर है कि महाजनद्वारा परिगृहीत होना
अथवा महाजनपरिग्रहसे सिद्ध सर्वज्ञपूर्वक ( सर्वज्ञप्रणीत ) होना या
पुरुषगत दोषसे रहित होना ही वेदकी प्रामाणिकताका कारण है, जो
व्यार्थभागयोः साधारणत्वात् । किं तस्य फलमिति चेत् ?
स्वार्थप्रतिपादनम् । किं तेन प्रयोजनम् ? यथायथमुपादानं
हानं मोक्षश्च । तत्रानर्थहेतूनां तत्त्वज्ञानाद्धानमर्थहेतूनामुपादा-
नमात्मनो मोक्ष इति ।
कः पुनरयं मोक्षः ? आत्यन्तिकी दुःखनिवृत्तिरात्मनः ।
किमात्यन्तिकत्वम् ? तज्जातीयात्यन्ताभावविशिष्टत्वम् । तेषां-
वेदके भूतार्थभाग और भव्यार्थभाग दोनों में समानरूपसे है । अतः
भव्यार्थभागके समान ही अर्थवादादिरूप भूतार्थभाग भी प्रमाण ही है ।
यदि पूछो कि—भव्यार्थभागका तो प्रवृत्ति या निवृत्ति फल है, किन्तु
भूतार्थभाग (अर्थवादादि भाग) का क्या फल है?—तो यही उत्तर
है कि स्वार्थका प्रतिपादन करना भूतार्थभागका साक्षात् फल है । पुनः
पूछो कि—स्वार्थप्रतिपादनका प्रयोजन क्या है ?—तो यही कि यथा-
योग्य कहीं उपादान (ग्रहण) करना, कहीं परित्याग करना और कहीं
मोक्षप्राप्ति । उनमें जो अनर्थके हेतु हैं, उनके तत्त्वज्ञानसे उनका
परित्याग करना होगा । जो इष्टके साधन हैं, उनके तत्त्वज्ञानसे उनका
ग्रहण होगा तथा आत्माके तत्त्वज्ञानसे मोक्ष होगा । अर्थात् अर्थवाद-
भागके भी परम्परया प्रवृत्ति, निवृत्ति और मोक्ष ही यथायोग्य फल हैं ।
जैसे, "वायुर्वै क्षेपिष्ठा देवता" "तरति ब्रह्महत्यां योऽश्वमेधेन यजेत"
इत्यादिका वायुयागादिमें प्रवृत्ति प्रयोजन है । "अन्धन्तमः प्रविशन्ति
ये के चात्महनो जनाः" इत्यादिका आत्महत्यासे निवृत्ति फल है । तथा
उपनिषद्भागका मोक्ष फल है ।
मोक्षका स्वरूप
प्रश्न—यह मोक्ष क्या वस्तु है ?
उत्तर—आत्मामें दुःखोंकी आत्यन्तिक निवृत्ति ही मोक्ष है ।
प्रश्न—आत्यन्तिक किसे कहते हैं ?
उत्तर—दुःखमात्रका अत्यन्ताभाव होना दुःखकी आत्यन्तिकी
निवृत्ति है ।
प्रश्न—दुःखोंका अत्यन्ताभाव कैसे होता है ?
अनुपलम्भवादः ४५७
मभावः कथम् ? कारणमात्रोच्छेदात् । अपुरुषार्थोऽयमिति
चेत् , न, असत्यस्याकाम्यस्याशक्यस्य दुरन्तस्य तथाभावात् ।
न त्वयं तथा । सत्योऽयम् , प्रमाणसिद्धत्वात् सर्वैरभ्युपगमात् ।
काम्यश्च, दुःखस्य स्वभावहेयत्वात् । सुखार्थं तद्धानमिति चेत्,
न, अतद्धेतुत्वात् ।
व्याप्तेरिति चेत् , न असिद्धेः । न हि दुःखाभावः सुखेन
व्याप्यत इति । सुखं तावत्तेन व्याप्यत इति चेत् , तर्हि सुखे
सत्यवश्यं दुःखाभावो भवेदिति सुखप्रार्थनेति विपरीतापत्तिः ।
नावेद्यत्वादसौ काम्य इति चेत् , न, दुःखार्तानां तद-
उत्तर—दुःखके जितने भी कारण हैं, उनका उच्छेद हो जानेसे
दुःखोका अत्यन्ताभाव हो जाता है और वही मोक्ष है ।
यदि कहो कि—दुःखकी निवृत्ति तो पुरुषार्थ नहीं है—तो ऐसा
नहीं कह सकते । क्योंकि जो असत्य है, अकाम्य है, असाध्य है या
जिसका अन्त ( परिणाम ) दोषमय है, वही अपुरुषार्थ होता है । यह
तो वैसा है नहीं । बल्कि यह प्रमाणसिद्ध होनेसे सत्य है । सभीके
द्वारा अभीष्ट होनेसे काम्य भी है । क्योंकि दुःख स्वभावसे ही सबके
लिये त्याज्य है । यदि कहो कि—दुःख स्वरूपतः त्याज्य नहीं है किन्तु
सुखके लिये उसका त्याग होता है । अर्थात् मुख्यरूपसे सुख ही काम्य
है, दुःखाभाव तो उसका साधन है, इसलिये वह गौणरूपसे काम्य है—
तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि दुःखका त्याग सुखके प्रति हेतु
नहीं है ।
यदि कहो कि—दुःखाभाव और सुखमे परस्पर व्याप्ति होनेसे हेतु
है—तो यह नहीं कह सकते । क्योंकि उनकी परस्पर व्याप्ति ही असिद्ध
है । कारण, दुःखाभाव सुखसे व्याप्त नहीं है । क्योंकि सुषुप्त-अवस्था
में दुःखाभाव रहनेपर भी सुख नहीं रहता है । यदि कहो—दुःखाभाव
सुखसे व्याप्त भले ही न हो किन्तु सुख तो दुःखाभावसे व्याप्त है,
क्योंकि सुख होनेपर दुःखाभाव अवश्य रहता है—तब तो सुख होनेपर
अवश्य ही दुःखाभाव हो जायगा, इसी अभिप्रायसे सुखकी प्रार्थना होगी ।
४५८ आत्मतत्त्वविवेके
भाववेदनमनभिसन्धायैव तज्जिहासादर्शनात् । कथमन्थथा
देहमपि जह्युः । अविवेकिनस्त इति चेत्, किमत्र विवेकेन ?
इष्यमाणतामात्रानुबन्धित्वात् पुरुषार्थत्वस्य, गम्यागम्ययोः
कामवत्¹ । बहुतरानर्थप्रसक्तिशङ्कया शास्त्रमनुकूलयन्तस्त
इतरेभ्यो भिद्यन्ते ?
अपि चैवं कण्टकादिजन्यदुःखनिवृत्तिरपि पुरुषार्थो न
स्यात्, अवेद्यत्वात् । प्रथमं विद्यते तावदसाविति चेत्,
ऐसी स्थितिमे सुख गौण काम्य हो गया और दुःखाभाव ही मुख्यरूपसे
अभीष्ट (काम्य) सिद्ध हो गया । इस प्रकार "सुखके लिये दुःखका
अभाव होता है" इस तुम्हारे पूर्ववचनके विपरीत ही सिद्ध हो गया ।
यदि कहो, दुःखाभावका अनुभव नहीं होता है, इसलिये वह काम्य
नहीं होता—तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि दुःखसे पीड़ित व्यक्ति
दुःखाभाव प्रतीतिकी बिना ख्याल किये ही दुःखसे छुटकारा पानेकी
इच्छा करता है, ऐसा देखा जाता है । यदि उसे दुःखाभावकी अनुभू-
तिकी भी कामना रहती तो विषादिका भक्षण कर क्यों देहको भी छोड़
देना चाहता है ? जब कि अनुभूतिके लिये देह अपेक्षित है । यदि
कहो—वे अविवेकी हैं—तो इसमें विवेकका क्या प्रयोजन है ? इष्य-
माणतामात्रसे ही पुरुषार्थका सम्बन्ध है । अर्थात् जो अभीष्ट है, वही
पुरुषार्थ है । जैसे कामनामक पुरुषार्थ गम्या या अगम्याके विवेककी
अपेक्षा नहीं करता । अर्थात् गम्याकी कामना भी काम है और अगम्या
की कामना भी । हाँ विवेकियोंमें अविवेकियोंसे इतना अन्तर है कि
विवेकी लोग अत्यधिक अनर्थोंकी प्रसक्तिकी आशङ्कासे शास्त्रानुकूल ही
आचरण करते हैं। अर्थात् दुःखसे छुटकारा पानेकी इच्छासे
विषभक्षणादिद्वारा आत्महत्या या कामशान्तिके लिये अगम्यागमन
नहीं करते हैं ।
एवं अनुभूयमानताकी दशामें ही यदि दुःखाभाव पुरुषार्थ माना
जाय तो कण्टकादिसे होनेवाले दुःखकी निवृत्ति भी पुरुषार्थ नहीं होगा ।
क्योंकि उस दुःखनिवृत्तिका सदा अनुभव नहीं होता रहता है ।
१ काममह्ववत् इति २ पु० पा०
तुल्यं मोक्षेऽपि । नाध्यक्षेणेति चेत्, तर्हि दुरितक्षयकामस्य
कर्मानुष्ठानानर्थक्यप्रसङ्गः, तदभावतत्फलाभावयोरप्यनध्यक्ष-
त्वात् । उपलब्धियोग्यतापन्नानिष्टनिवृत्तिरूपत्वादयमदोष-
इति चेत्, तुल्यम् ।
दुःखवत् सुखस्याप्युच्छेदादकाम्योऽयमिति चेत्, न,
तृष्णया दोषतिरस्कारेण प्रवृत्तिवदलंप्रत्ययेन गुणतिरस्कारान्नि-
यदि कहो कि—कण्टक निकल जानेपर प्रथम कालमे दुःखनिवृत्तिका
अनुभव होता है, इसलिये उसके पुरुषार्थ होनेमे कोई बाधा नहीं है।
अर्थात् कदाचित् अनुभूयमान होना ही पुरुषार्थका लक्षण है—तो यह
बात आत्यन्तिकी दुःखनिवृत्तिरूप मोक्षमे भी तुल्य है। अर्थात् शब्द,
अनुमान आदि द्वारा मोक्षकालिक दुःखनिवृत्ति भी अनुभूयमान ही है।
यदि कहो कि—उस दुःखनिवृत्तिका शाब्दबोध या अनुमिति होनेपर भी
साक्षात्कार नहीं होता है, अत वह पुरुषार्थ नहीं हो सकता है—तब तो
पापनाशकी इच्छासे प्रायश्चित्तादि कर्मोंका अनुष्ठान ही अनर्थक हो
जायगा। क्योंकि पापाभाव और पापके फलस्वरूप दुःखके अभावका
भी साक्षात्कार नहीं होता।
यदि कहो कि—प्रायश्चित्त-जन्य दुःखनिवृत्तिके प्रत्यक्षसे उपलब्ध-
मान न होनेपर भी उपलब्धिकी योग्यतासे युक्त दुःखनिवृत्तिरूप होनेसे
यहाँ कोई दोष नहीं है। अर्थात् पुरुषार्थ होनेके लिये उपलब्धि अपे-
क्षित नहीं है, किन्तु उपलब्धिकी योग्यता अपेक्षित है। तथा वह
योग्यता प्रायश्चित्त-जन्य दुःखप्रागभावमे भी है, क्योंकि उसका प्रतियोगी-
भूत दुःख उपलब्धिके योग्य है—तो ऐसी उपलब्धि-योग्यता आत्यन्तिक
दुःखनिवृत्तिरूप मोक्षमें भी तुल्य है।
यदि कहो—दुःखके समान सुखका भी इस पक्षमे उच्छेद हो जाने
से दुःखनिवृत्तिरूप मोक्ष किसीका काम्य नहीं हो सकता—तो ऐसा नहीं
कह सकते। क्योंकि जैसे, अत्युत्कट रागवश अगम्यागमनादिमे दोष
की उपेक्षा कर उसमे अविवेकीकी प्रवृत्ति होती है, वैसे ही सुख-
साधनों में विवेकियोंको अलबुद्धि (अनपेक्षाबुद्धि) होनेसे उनके गुणोंकी
उपेक्षा कर सुख साधनोंसे निवृत्ति भी देखी जाती है। इसमें मधु
४६० आत्मतत्त्वविवेके
वृत्तेरपि दर्शनात् । मधुविषसंपृक्तमन्नमत्रोदाहरणम् । सन्ति
च केचनालंप्रत्ययवन्तः । न च समत्वम्, दुःखस्यैव प्राचुर्यात्,
दुःखे सुखहेत्वननुषङ्गेऽपि सुखे दुःखहेत्वनुषङ्गनियमात् ।
तथाहि न्यायोपार्जितेष्वेव विषयेषु कियती सुखखद्यो-
तिका कियन्ति चार्जनरक्षणादिभिर्दुःखदुर्दिनानि । अन्यायो-
पार्जितेषु यद् भविष्यति तन्मनसापि चिन्तयितुमशक्यम् ।
विदाङ्कुर्वन्तु च सन्तो यदि कण्टकादिजन्येषु दुःखेषु लेशतोऽपि
-सुखानुषङ्गः । अस्ति च स्वर्गादिसुखेष्वपि बहुलो दुःख-
एवं विषसे संपृक्त अन्न उदाहरण है । अर्थात् मधुका लोभी व्यक्ति
-विषसे होने वाले अनिष्टकी उपेक्षा कर उस अन्नको खा लेता है, तथा
मधुका जो लोभी नहीं है, ऐसा व्यक्ति मधुकी मधुरतागुणकी उपेक्षा कर
विषमिश्रित अन्नका परित्याग कर देता है । दुःखरूपी दुर्दिनसे डरे हुए
बहुतसे व्यक्ति हैं, जो उस सुखके प्रति भी विरक्त हैं । तात्पर्य यह है
कि सुखका भी उच्छेद हो जायगा, इस कारण दुःखनिवृत्तिरूप पुरुषार्थमें
अकाम्यत्वका प्रसङ्ग नहीं आयगा ।
साथ ही दुःख और सुखमें कोई समता भी नहीं है । क्योंकि
संसारमे दुःख ही अधिकमात्रामें है । अतः अधिक दुःखोंकी निवृत्ति-
रूप लाभकी मात्रा विशेष है तथा उसके समक्ष स्वल्प सुखका उच्छेदरूप
हानिकी मात्रा बहुत थोड़ी है, इसलिये दुःख-निवृत्ति अवश्य काम्य
होगी । क्योंकि दुःखमे सुखहेतुकी अनुवृत्ति नहीं भी रहती है, किन्तु
प्रत्येक सुखमें दुःखका हेतु अवश्य ही अनुवर्तमान रहता है । जैसे कि
न्यायपूर्वक उपार्जित विषयोंमें ही कितनी सुखरूपी जुगनू भासित होती
है ? और अर्जन एवं रक्षा आदिको लेकर कितने दुःखरूपी दुर्दिनोंका
सामना करना पड़ता है ? अर्थात् न्यायोपार्जित विषयोंमें भी सुखसे
अधिक दुःख ही भोगना पड़ता है । किन्तु जो विषय अन्यायसे उपार्जित
होंगे, उनमें जो भोगना पड़ेगा, उसकी तो मनसे भी कल्पना नहीं की जा
सकती है । सज्जन ही अनुभव करें, यदि कण्टकादिसे होनेवाले दुःखोंमें
-लेशमात्र भी सुखका संसर्ग हो । और स्वर्गादि सुखोंमें भी बहुल-