आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
अनुपलम्भवादः ४०३
न विरोधः । देहस्य क्वचित् कार्यकारकतयाऽधिष्ठाननिय-
मात् । यत्र तु न तत् कारकं तत्रापि तदधिष्ठेयमिति कश्चेत-
नोऽभिदध्यात् ?
द्वितीयेऽपि यः साक्षादधिष्ठातुमशक्तः स साक्षादधिष्ठेयमु-
पादाय तत् प्रयुञ्जीत, न त्वेकस्य साक्षादधिष्ठानायोग्यमन्य-
स्यापि तथेति नियमः, देह एव व्यभिचारात् । तृतीये त्वजागल-
स्तनकल्पः कायो नोपयुक्तांशविवेचने स्वं निवेशयति, यथा
धूममात्रं प्रति तार्णदहनान्वयव्यतिरेकयोरालोकवत्तेति ।
उसके कारक होनेके नाते करता है ? या उससे अन्यकारकोंको प्रयुक्त
करनेके लिये देह-धारण आवश्यक है ? अथवा निजकर्माधीन प्राप्त होने-
मात्रसे कर्ताकेलिये शरीर धारण आवश्यक है ? इनमें प्रथमपक्षमें
मुझे कोई विरोध नहीं है । क्योंकि कहीं कार्यके प्रति देह भी कारक
होता है, अतः वहाँ उसका कर्ताद्वारा अधिष्ठित होना अपेक्षित है ।
जहाँ तो वह (देह) कारक नहीं होता, वहाँ भी वह कर्ताद्वारा अधिष्ठेय
होगा, इसे कौन चेतन व्यक्ति कह सकता है ।
द्वितीयपक्षमे भी जो (मनुष्यादि) साक्षात् (सीधे) कारकोंको
अधिष्ठित करनेमे असमर्थ है, वह सीधे अधिष्ठित किये जाने योग्य देहको
लेकर उन कारकोंको फलोत्पादनके लिये प्रयुक्त करेगा । ऐसा नियम
नहीं है कि जो (कारकसमूह) एक (मनुष्य) के द्वारा साक्षात्
अधिष्ठानके योग्य नहीं है, वह दूसरे (सर्वशक्तिमान् ईश्वर) के द्वारा
भी अधिष्ठेय नहीं है । क्योंकि देहमें ही व्यभिचार हो जाता है।
जैसे चैत्रदेह मैत्रके द्वारा अधिष्ठेय नहीं है, फिर भी वह चैत्रके द्वारा
अधिष्ठेय होता है ।
तृतीयपक्षमें तो बकरीके गलेमें लटकते हुए स्तनके समान देह भी
अपनेको उपयोगिताकोटिके विचारमें नहीं रख सकता है । अर्थात्
कारकोंका व्यापार वैसे ही देहके बिना निरुपयोगी होता है, जैसे
धूममात्रके प्रति तृणजन्य अग्निके अन्वय-व्यतिरेकमें आलोककी सत्ता
उपयोगिताके विचारमें अनपेक्षित है । अर्थात् कारक व्यापारमात्रके
प्रति देह और धूममात्रके प्रति आलोक समानरूपसे अन्यथासिद्ध है ।
४०४ आत्मतत्त्वविवेके
यदि चाकारकस्याप्यतत्प्रयोज ( गद्वार ) कस्यापि १ अवश्य-
मपेक्षा स्यात्, य एव कुलालकायवान् घटस्य कर्ता स एव करभ-
शरीरवानपि दण्डादीन् प्रयुञ्जीत। न खलु स्वकर्मोपात्ततामात्रेण
करभकुम्भकारशरीरयोः कश्चिद् विशेषः। कार्यविशेषे कायविशेषो-
ऽनुपयोगोऽप्यपेक्षणीय इति चेत्, तत्र कार्येऽनुपयुक्तश्चावश्यापेक्षणी-
यश्चेति व्याघातः। अव्याघाते वा कुम्भे कर्तव्ये करभशरीरमप्य-
वश्यमपेक्षणीयमविशेषादिति।
तस्मात् सन्देशवदयःपिण्डवत् २ कारकस्तत्प्रयोजकतयैव ३
शरीराधिष्ठाननियमो न तु शरीरत्वेनैव। न च शरीरस्य सर्वत्र
यदि कारक न होते हुएकी भी या कारकोंका प्रवर्तक न होते हुएकी भी
अवश्य अपेक्षा हो तो जो आत्मा कुलालशरीरधारी होकर घटका कर्त्ता
होता है, वही करभ (हस्तिशावक) शरीरधारी होकर भी दण्डचक्रादि-
का प्रयोजक होवे। क्योंकि स्वकर्मोपार्त्ततामात्रकी दृष्टिसे करभशरीर
और कुम्भकारशरीरमें कोई अन्तर नहीं है।
यदि कहो कि—कार्यविशेषमे शरीरविशेष अनुपयोगी होते हुए भी
अपेक्षणीय है—तो कार्यमे अनुपयुक्त भी है और अपेक्षणीय भी है,
यह कथन वदतोव्याघात है। यदि व्याघातदोष न हो तो घट निर्माण
करनेमे करभ शरीर भी अवश्य अपेक्षणीय होना चाहिये। क्योंकि
अनुपयुक्तताकी दृष्टिसे कुम्भकारशरीर और करभशरीरमे कोई अन्तर
नहीं है।
इसलिये सँडसीके समान या लोह पिण्डके समान कारकके रूपमे
या कारकव्यापारके आश्रयके रूपमे ही शरीरका अधिष्ठान आवश्यक है,
न कि शरीरके ही रूपमें। अर्थात् जिस कार्यमें जो शरीर कारक या
प्रयोजक होता है, उसी कार्यमे शरीर आत्माद्वारा अधिष्ठित होगा।
यही नियम है, न कि शरीर होनेमात्रसे आत्माद्वारा अधिष्ठित होना
१. कस्यापि देहस्येति २ पु० पा० २. अय पिण्डे इति १ पु० पा०
३ कारकप्रयोजकतयैव इति २ पु० पा०
कार्ये कारकत्वं तत्प्रयोजकत्वं वेति। एवं तर्हि न प्रतिनियत-
देहाधिष्ठातृसिद्धिः, अङ्कुरादिकारकाधिष्ठात्राऽपि तत्सिद्धेरिति
चेत्, न, वादान्तरत्वात्।
यदापि तत्प्रस्तावः, तदापि न कार्यमात्रेण कारकाधिष्ठान-
मात्रेण वा तदनुमानम्, ततः कर्तृमात्रसिद्धेः। किन्तु हर्षभय-
शोकस्मितादिलिङ्गैस्तानुन्नीय तैर्भोक्तुरनुमानमिति न किञ्चिदेतत्।
तृतीयेऽपीर्ष्याकषाये चक्षुषी निमील्य न्यायानुसारः श्रूयताम्।
इह जगति नास्त्येव तत् कार्यं नाम, यत् कारकचक्रमवधीर्यात्मा-
आवश्यक है। और यह भी नियम नहीं है कि सभी क्षित्यङ्कुरादि
कार्यमें शरीर कारण या प्रयोजक होवे ही।
यदि कहो कि—ऐसा होनेपर अलग अलग देहोंके अधिष्ठाताकी भी
सिद्धि नहीं हो सकेगी। क्योंकि अङ्कुरादि कारकोंके अधिष्ठाता (ईश्वर)
से घट आदिकी सिद्धि हो जायगी। अर्थात् कुम्भकार आदिकी क्या
आवश्यकता है? ईश्वरसे ही घटादिकार्यका निर्वाह हो जायगा—तो
ऐसा नहीं कह सकते हो। क्योंकि तब यह दूसरा विचार प्रस्तुत हो
गया। अर्थात् मेरा ईश्वर तो सिद्ध ही हो गया और उसे ही सिद्ध करने
के लिये मैं प्रवृत्त हूँ। अतः अभी कुम्भकारको कर्त्ता सिद्ध करनेकी
क्या आवश्यकता है?
फिर भी यदि कुलालको भी कर्त्ता सिद्ध करनेका विचार प्रस्तुत करो तो
भी कार्यमात्रसे या कारकोंके अधिष्ठानमात्रसे कुलालनामधारीका अनुमान
नहीं होता है। क्योंकि उससे तो कर्त्तामात्र सिद्ध होता है। किन्तु
हर्ष, भय, शोक, स्मित आदिके सूचक लिङ्गोंसे हर्षादिका अनुमानकर
पुनः उनके आधारके रूपमें पृथक् पृथक् कुलाल आदिके आत्माकी सिद्धि
होती है। अतः यह दूसरा प्रस्ताव भी कुछ नहीं है।
"विपक्षमें बाधकका होना ही व्याप्ति है" इस तृतीयपक्षमें भी
ईर्ष्यासे कलुषित दृष्टिको हटाकर न्यायका अनुमोदन सुनो। इस संसार-
में कोई भी यह कार्य नहीं है, जो कारकचक्रकी अवहेलना कर अपने
४०६ आत्मतत्त्वविवेके
नचामादयेदित्यविवादम् । तच्च सर्वं चेतनोपहितमर्यादम् ।
अन्यथा तल्लक्षणव्यवस्थानुपपत्तेः ।
तथाहि, आधेयकारकोपहितमर्यादमधिकरणस्य रूपम्,
आधारत्वात् । अपनेयापगन्तृकारकोपहितं च स्वरूपमपादानस्य,
तदवधित्वात् । करणीभूतकर्मोपहितं च रूपं सम्प्रदानस्य,
तदभिप्रेयत्वात् । करणोपहितं च रूपं कर्मणः, तद्व्याप्यत्वात् ।
कर्तृपहितं च रूपं करणस्य, साक्षात् तद्व्यापारविषयत्वात् ।
समस्तकारकोपहितं च रूपं कर्तुः, तत्प्रयोजकत्वात् ।
ज्ञानचिकीर्षाप्रयत्नाधारत्वव्यवस्थितेश्च न चक्रकेतरेतराश्रय-
स्वरूपको प्राप्त कर सके । यह निर्विवाद है । और उन सभी कार्योंकी
मर्यादा अर्थात् स्वरूपव्यवस्था साक्षात् या परम्परया चेतनसे उपहित है ।
अन्यथा उनके लक्षणकी व्यवस्था ही नहीं हो सकेगी । जैसे—कर्ता
और कर्मरूप आधेयभूत-कारकोंसे उपहित है मर्यादा जिसकी, उसे
अधिकरणकारक कहते हैं । क्योंकि यह आधारभूत है । अर्थात्
"कर्तृकर्मव्यवहितामसाक्षाद् धारयन् क्रियाम् । उपकुर्वन् क्रियासिद्धौ
शास्त्रेऽधिकरणं स्मृतम् ।" इस वचनके अनुसार कर्ता और कर्मके द्वारा
वह क्रियाका आश्रय है । अपनेय ( त्याज्य ) भूत वृक्षादि एव अपगन्तृ-
भूत ( छोड़नेवाले ) सार्थादिकारकोंसे उपहित अपादानकारकका स्वरूप
है । क्योंकि त्यागघटकीभूत विभागका यह अवधि है । अर्थात् यहाँ
भी मन कर्त्ता है और उसकी क्रियाका सम्बन्ध अवधिके रूपमें वर्तमान
वृक्षरूप अपादान कारकसे है । कारणरूपताका प्राप्त हुए कर्मसे उपहित
सम्प्रदानकारकका स्वरूप है । क्योंकि दाताका गौ आदि कर्मभूत द्रव्य-
द्रव्यके द्वारा ही साधु ब्राह्मणादि अभिप्रेत हैं । अर्थात् करणीभूत कर्मसे
उपहित सम्प्रदान होता है । कर्म करणसे उपहित होता है, क्योंकि वह
करणव्यापारका विषय होता है । तथा करणका स्वरूप साक्षात् कर्तासे
उपहित होता है । क्योंकि वह साक्षात् कर्ताके व्यापारका विषय होता
है । एव कर्त्ताका स्वरूप समस्त कारकोंसे उपहित ( निरूपणीय ) होता
है । क्योंकि सम्पूर्ण कारकोका प्रयोजक है ।
दोषः। एवं सति कर्तृव्यावृत्तेस्तदुपहितसीमसमस्तकारककार्यो-
त्पत्तिप्रसङ्ग इति स्थूलः प्रमादः।
भवेदेवं, यदि कर्त्रा कारकमात्रस्य व्याप्तिः स्यात्, सैव तु
कुत इति चेत्, कुतः पुनरव्याप्तिः ? न हि षड्भ्योऽन्यत् कर्तृनु-
पहितं कारकमस्ति, न चैषामेव कर्तृप्रधानशून्यं लक्षणमस्ति,
एकैकमपोद्य शेषतः कार्यसम्भावनायां सर्वोपोहसम्भावनाप्रसङ्गात् ।
यहाँ यह नहीं कह सकते कि—साक्षात् कर्तृव्यापारका विषय करण,
करणव्यापारका विषय कर्म, तथा कर्मका प्रयोजक वही कर्ता होता है,
अत चक्रकदोष आ जाता है। एव साक्षात् कर्तृव्यापारका विषय करण
होता है और उस करणका प्रयोजक वही कर्ता होता है, इस प्रकार
अन्योन्याश्रयदोष आ जाता है—क्योंकि उपादानविषयक ज्ञान, चिकीर्षा
और प्रयत्नका आधार होना ही कर्ताका स्वतन्त्र लक्षण होनेसे कर्तृलक्षण-
का निरूपण करणादिकोंके अधीन नहीं है। अतः चक्रक और अन्योन्या-
श्रयदोष नहीं होंगे।
ऐसी स्थितिमे यदि कर्ता न हो तो कर्तासे उपहित मर्यादावाले सम्पूर्ण-
कारकोंकी भी व्यावृत्ति हो जायगी और बिना कारकके ही कार्योंकी
उत्पत्तिका प्रसङ्ग होने लगेगा। यही सकर्तृकत्व और कार्यत्वमे व्याप्तिका
निश्चय करानेवाला विपक्ष बाधक तर्क है। अत कर्ताके बिना कार्यकी
उत्पत्ति माननेवाले पूर्वपक्षीका यह भारी प्रमाद है।
यदि कहो कि—उक्त प्रसङ्ग तब होता जब कि कर्ताके साथ कारक-
मात्रकी व्याप्ति होती, किन्तु वह व्याप्ति ही कैसे है ?—तो फिर अव्याप्ति
भी कैसे है ? क्योंकि कर्तासे उपहित स्वरूपवाले पूर्वोक्त छै कारकोंसे
भिन्न कर्तासे अनुपहित स्वरूपवाला कोई दूसरा कारक है नहीं कि वहीं
सकर्तृकत्व और कार्यत्वकी अव्याप्ति हो जायगी। यह भी नहीं
हो सकता कि—इन्हीं छै कारकोंके अन्तर्गत कुछ कारक कर्तृव्यापारके
अविषय होंगे और उन्हींसे क्षित्यङ्कुरादि कार्यकी उत्पत्ति उपपन्न हो
जायगी—क्योंकि एक एक कारकको छोड़कर भी यदि शेष कारकसे
कार्यकी संभावना की जाय तो उस न्यायसे सभी कारकोंको छोड़ देनेकी
सम्भावना होने लगेगी। एव सम्पूर्ण कारकविशेषोंकी निवृत्ति हो जाने
न च समस्तविशेषापोहे सामान्यस्थितिः, यतः षट्कारकव्यावृत्ता-
वपि कारकमात्रतः कार्यप्रत्याशा स्यात् । एकप्रवृत्तौ तु सर्वप्रवृत्ति-
रप्रत्यूहेति शृङ्खलाबन्धेन व्यवस्थितेः ।
अथ मतं तवैवेयं प्रक्रिया, यस्माकं तु कार्येणानुविहितभावा-
भावं चेतनमचेतनं वा कारणमुच्यते । सहतौ तु सर्वं स्वप्रधानम् ।
पर सामान्यरूपसे भी कारककी स्थिति नहीं रह पायगी, जिसके आधार
पर प्रसिद्ध छः कारकोंकी व्यावृत्ति हो जानेपर भी सामान्यकारकसे कार्य
की आशा की जाय । यदि सामान्य कारककी स्थितिके लिये किसी
एक कारककी प्रवृत्तिका आश्रय लो तो सभी कारकोंकी प्रवृत्ति निर्विघ्न
हो जायगी । क्योंकि कारकत्वधर्म सभी कारकोंमें समान है । इस
प्रकार कारकोंकी परस्पर बँधी हुई शृङ्खलासे विपक्षबाधककी व्यवस्था हो
जाती है ।
यदि मानो कि—उक्त सारी प्रक्रिया तुम्हारे (नैयायिकके) यहाँ ही
है हमारे (बौद्धके) यहाँ तो कार्यके साथ जिसका अन्वय-व्यतिरेक
बँधा हुआ है ऐसा चेतन या अचेतन ही कारण कहा जाता है । जहाँ
तो चेतन-अचेतनका समुदाय कारण होता है वहाँ सबकी अपनी-अपनी
प्रधानता होती है । ऐसा नहीं कि कोई कारक प्रधान (कर्त्ता) होता है
और कोई अप्रधान (अकर्ता) । अर्थात् “स्वव्यापारे च कर्तृत्वं सर्वत्रैवा-
स्ति कारके' इस वचनके अनुसार सभी कारक अपने-अपने व्यापारमें
स्वतन्त्र (कर्ता) हैं । उपादान (समवायि) और इतर (असमवायि
तथा निमित्त) इन तीनोंकी अपेक्षा क्वचित् है अर्थात् नियत नहीं है ।
अभिप्राय यह है कि कार्यकी उत्पत्तिमें सभी कारकोंके समवधानका कोई
नियम नहीं है । जहाँ समवधानके बिना कार्य नहीं होता, वहीं कर्त्ता
आदि कारकोंके समवधानका नियम होता है । तथा वहाँ भी सभी
अपने-अपने व्यापारमें प्रधान होते हैं । कोई प्रधान और कोई
अप्रधान नहीं होता । तथा कर्मत्व, करणत्व आदिका लक्षण भी उक्त
प्रकारका नहीं है । किन्तु व्यापारवान् होते हुए असाधारण कारणको
करण कहते हैं और अत्यन्त क्रियासे उत्पन्न फलशालीको कर्म कहते
हैं इत्यादि—तो ऐसा नहीं हो सकता । क्योंकि वैसा होनेपर बिना
अनुपलम्भवादः ४०९
उपादानेतरव्यवस्था तु कथञ्चिदिति चेत्, न, तथापि निरूपा-
दानत्वप्रसङ्गात् ।
जातिप्रतिनियतहेतुत्वेन तदवश्यमभ्युपेयम्, तस्य प्रमाण-
सिद्धतयाऽपह्नोतुमशक्यत्वादिति चेत्, न, उपादानमात्रस्य तद्धेतुत्वे
निमित्तवैचित्र्येऽप्येकजातीयत्वप्रसङ्गात् । निर्निमित्तं वा प्रसज्येत,
उपादानादेव तथाविधात्तदुपपत्तेः ।
उपादान कारणके भी कार्य होने लगेगा । अर्थात् कर्तृ विशेष और
कार्यविशेषमें अन्वयव्यतिरेकके द्वारा सामान्यतः कर्त्ता और कार्यमें
कार्यकारणभाव सिद्ध हो जाता है । यदि कर्त्ताके बिना भी कोई कार्य
हो तो उपादानकारणके बिना भी कार्य होने लगेगा ।
यदि कहो कि—पृथक् पृथक् जातिके कार्यके प्रति हेतुता नियत होने
के कारण अवश्य ही प्रत्येक कार्यका कोई उपादानकारण मानना होगा ।
क्योंकि प्रमाणद्वारा सिद्ध होनेके कारण उपादानकारणका अपलाप नहीं
किया जा सकता है । अर्थात् कार्य यदि बिना उपादानके होता तो
“पृथिवीजातिका कार्य पृथिवीजातिके समवायिकारण (उपादानकारण)
से ही उत्पन्न होता है” यह व्यवस्था नहीं होती । अतः इस व्यवस्थासे
ही सिद्ध होता है कि प्रत्येक कार्यका कोई उपादान अवश्य होता है—तो
ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि नियतजातिका कार्य उत्पन्न होनेमे
यदि उपादानमात्र प्रयोजक होता तो उपादान एक रहनेपर निमित्तकारण
के विचित्र होनेपर भी कार्यमें विचित्रता नहीं हो सकेगी, बल्कि
उसी जातिका कार्य उत्पन्न होने लगेगा । अर्थात् उपादानमात्रको कार्य-
का प्रयोजक माननेपर निमित्तकारण अकिञ्चित्कर हो जायगा और
दण्ड वेमा आदि निमित्तकी विचित्रता होनेपर भी घटपटादि कार्यों मे
विचित्रता नहीं हो सकेगी और उनमे एक जातीयत्वका प्रसङ्ग हो जायगा ।
यदि निमित्तगत विचित्रताके होनेपर भी उपादानगत विचित्रताको ही
कार्य वैचित्र्यका प्रयोजक मानो तो कार्यमात्र बिना निमित्तके ही
जायगा । क्योंकि उपादानगत वैजात्यसे ही विजातीय कार्यकी उपपत्ति
हो जायगी ।
४१० आत्मतत्त्वविवेके
न किञ्चिदेकमेकस्मात्, सामग्र्याः सर्वसम्भव इति चेत्, कुत
एतत् ? निमित्तसहितस्यैवोपादानस्य प्रत्यक्षानुपलम्भाभ्यां कार-
णत्वावधारणादिति चेत्, न, दृश्यमात्रविषयत्वात्तयोः। दृश्यत्व
तस्य कथञ्चिन्निरस्तमिति चेत्, न, चेतनेऽपि तथा किं न स्या-
दिति। तस्मादुपादाननिमित्तयोर्यथा परस्परसहितयोरेव कार्य-
शक्तिस्तथा चेतनाचेतनयोरपीत्येकनिवृत्तावितरनिवृत्तिप्रसङ्गः।
यदि कहो कि—कोई भी कार्य किसी एक कारणसे नहीं होता किन्तु
सामग्रीसे ही सब कार्य होता है। तथा कारणसामग्रीमे निमित्त भी
समाविष्ट है। अत कार्यमें निनिमित्तत्वका प्रसङ्ग न होगा—तो ऐसा
क्यों है ? यदि कहो कि—ऐसा इसलिये है कि अन्वय व्यतिरेकके
द्वारा निमित्तसहित ही उपादानमें कारणत्वका निश्चय होता है—तो
ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि अन्वयव्यतिरेकका विषय केवल दृश्य
ही निमित्त होगा। अर्थात् अन्वय व्यतिरेकके बलसे दृश्यनिमित्तका
ही उपादानके साथ साहित्य गृहीत होगा, न कि अदृश्य निमित्तका।
अत अदृश्य निमित्तकी दृष्टिसे कार्यमे निर्निमित्तत्वका प्रसङ्ग रह ही
जाता है।
यदि कहो कि—दृश्यमात्रमें अन्वय व्यतिरेक गृहीत होनेपर भी उसके
द्वारा कारणत्वका निश्चय करनेम दृश्यत्व अविवक्षित रहता है। अर्थात्
दृश्यविषयक अ वय व्यतिरेकग्रहसे दृश्य अदृश्य सभी निमित्तोंमें कारण
ताका निश्चय हो जायगा—तो यह नहीं कह सकते। क्योंकि तब
चेतन कर्ताके विषयमे भी दृश्यत्वकी अविवक्षा क्यों न हो ? अर्थात्
सामान्यत चेतनकर्ता और कार्यमें ही कार्यकारणभाव गृहीत होगा। यह
अनिवार्य नहीं है कि कार्यका उत्पादक दृश्य ही कर्ता होगा। अत
क्षित्यङ्कुरादि कार्यका दृश्य कर्ता नहीं होनेसे अदृश्य (ईश्वर) स्वत
सिद्ध हो जाता है।
इसलिए जैसे परस्पर सहित होनेपर ही उपादान और निमित्तमें
कार्य उत्पन्न करनेकी क्षमता होती है, वैसे ही चेतन और अचेतनके
परस्पर सहित होनेपर ही कार्यकी उत्पत्ति हो सकती है, यह भी मानना
पड़ेगा। अत क्षित्यादिकार्यके प्रति एक (चेतनकर्ता) की निवृत्ति
[header] अनुपलम्भवाद ४११
अपि च मृत्पिण्डदण्डादिषु स्वव्यापारे पारतन्त्र्यं तन्निय-
मेनोपलभ्यते । तदिदं दण्डादित्वमात्रानुबद्धं वा स्यात्,
अदृष्टविशेषोपग्रहानुबद्धं वा, अचैतन्यमात्रानुबन्धं वेति निपुणं
निरूपय।
तत्र न प्रथमः, वेमादीनां स्वातन्त्र्यप्रसङ्गात् । तेषां वेमादि-
त्वमात्रानुबद्धमिति चेत्, न, दण्डादीनां स्वातन्त्र्यप्रसङ्गात् । न
चैतत् कार्यविशेषनियतम्, गवाभ्याजनादौ दण्डादीना स्वातन्त्र्य-
प्रसङ्गात् ।
माननेपर इतर (अचेतन परमाणु आदि) की निवृत्तिका भी प्रसङ्ग
होने लगेगा।
परमाणु अदृष्ट आदिके अधिष्ठाताके रूपमें ईश्वरकी सिद्धि
एव, मट्टीका पिण्ड तथा दण्ड आदि कारण अपने व्यापारमें नियमतः
किसी अन्य (चेतन) के अधीन होते हैं, यह नियमपूर्वक देखा जाता है।
अर्थात् वे दूसरेसे अधिष्ठित होकर ही अपना व्यापार करते हैं। तो
क्या ऐसा दण्डत्वादि-जातिके कारण होता है ? अथवा भोक्ताके अदृष्ट-
विशेषसे उपगृहीत होनेके कारण दण्डादिका व्यापार पराधीन है ? या
उनकी अचेतनतामात्रके कारण ऐसा है ? इसे भी अच्छी तरह विचारो।
इनमें प्रथमपक्ष नहीं हो सकता है। क्योंकि दण्डत्वरूपसे यदि
पराधिष्ठेयता (पराधीनता) हो तो दण्डातिरिक्त वेमा आदिमें स्वातन्त्र्यका
प्रसङ्ग हो जायगा। अर्थात् वेमा आदिमें दण्डत्व जातिके नहीं रहनेसे
वेमा अपने व्यापारमें अधिष्ठाता चेतनकी अपेक्षा नहीं करेगा। यदि
उपकरणोंका व्यापार वेमत्वमात्रप्रयुक्त है, ऐसा मानो तो यह भी नहीं हो
सकता। क्योंकि तब वेमत्वधर्मसे रहित होनेके कारण दण्डादि अपने
व्यापारमें स्वतन्त्र होने लगेंगे। अर्थात् दण्डगत व्यापार चेतन
अधिष्ठाताके बिना अपने आप होने लगेगा। यह भी नहीं हो सकता
कि—दण्डादिकी परतन्त्रता घटादि कार्यविशेषसे ही नियत है। अर्थात्
घटादि बनानेमे ही दण्डादि अपने व्यापारमे पराधीन है—क्योंकि तब
गायके हाँकने आदिमें दण्ड स्वतन्त्र होने लगेगा।
४१२ आत्मतत्त्वविवेके
न द्वितीयः, तस्य जातिविशेषनियतत्वे घटार्थमपि तेषां कदा-
चित् स्वातन्त्र्यप्रसङ्गात् । तन्नियतत्वे स एवोच्यताम् । न च
घटपटशकटकटाहादिगतं दण्डवेमवासीसन्दंशादिगतं वा सामान्य-
विशेषमुपलभामहे । अस्त्यसौ यतः शरीरिकर्तृकत्वानुमानमिति
चेत्, न, घटत्वादेरेव तथाभावात् ।
अस्तु वा संस्थानविशेषः, न च स एवात्र निबन्धनम्,
दूसरा पक्ष भी नहीं हो सकता । अर्थात् यह कहना कि—दण्डादिमें
अदृष्टविशेषका सम्बन्ध होनेके कारण घटादि उत्पन्न करनेमें दण्डादिक
ही किसी चेतनसे अधिष्ठित होते हैं । क्षिति-जलादि उत्पन्न करनेमें
तो उनके कारण परमाणु आदि स्वतन्त्र ही हैं । क्योंकि उनमें उस
अदृष्टविशेषका सम्बन्ध नहीं रहता—ठीक नहीं है । क्योंकि वह
अदृष्टविशेषका उपग्रह यदि जातिविशेषसे नियत न हो तो पृथिवी
आदिके समान ही घटादिके लिये भी कभी दण्डादि स्वतन्त्र हो जायगा ।
अर्थात् वही कारण उसी कार्यमें कभी स्वतन्त्र रहेगा और कभी चेतना-
धिष्ठित होगा । यदि अदृष्टविशेषोपग्रह जातिविशेषसे नियत हो तो
उस जातिविशेषको ही बताओ । अर्थात् ऐसी कोई जाति नहीं है ।
क्योंकि दण्ड आदि एक-एकमें रहनेवाली जाति व्यभिचरित है तथा
घट, पट, शकट ( गाड़ी ), कटाह ( कड़ाही ) आदि कार्योंमें एव दण्ड,
वेमा, वासी (बँसुला), सन्दश (सँड़सी) आदि कारणोंमें समान रूपसे
रहनेवाली किसी विशेषजातिकी उपलब्धि नहीं होती है ।
यदि कहो कि—यह विशेष जाति वही है, जिससे शरीरिकर्तृकत्व
का अनुमान होता है । अर्थात् शरीरिकर्तृकत्वका व्याप्यभूत जाति
अवश्य है—तो यह भी नहीं कह सकते । क्योंकि घटत्वादिक ही
शरीरिकर्तृकत्वका अनुमापक (व्याप्य) जाति है । अभिप्राय यह है
कि सम्पूर्ण कार्योंमें ऐसी कोई जाति नहीं है, जिससे सभी कार्य
शरीरिकर्तृक सिद्ध हो सकें । अत घटत्व पटत्व आदि जातियोंके
आधारपर घट-पटादिकार्य ही शरीरिकर्तृक होंगे और पृथिवी-जलादि
कार्य तो अशरीरिकर्तृक ही होंगे ।
अथवा, अवयवोंका सन्निवेशविशेष ही यह अनुगमक धर्म रहे, जो
अनुपलम्भवादः ४१३
तस्याभावेऽपि जलानलादीनां चेतनप्रेर्यत्वदर्शनात् । न च शरीर-
प्रयोज्यं यत् तदेव चेतनप्रेर्यमिति नियमः, शरीरस्यैव स्वातन्त्र्य-
प्रसङ्गादित्युकम् ।
तस्मादचेतनत्वमात्रनिबन्धनमेतद् दण्डादिषु, तथा च पर-
माण्वदृष्टादिष्वपि तस्य भावात् तथाभावो दुर्वारः । तदेतत् कार्यं
कारणवत्तया व्याप्तम्, सा च विपक्षेऽसंभवन्ती स्वव्याप्यमुपोदाय
अङ्कुरादिकोसे व्यावृत्त तथा केवल घटपटादिमे ही रहने वाला हा और
यही शरीरिकर्तृकत्वका अनुमापक हेतु होगा। किन्तु यह नहीं हो
सकता कि—उक्त अवयव सन्निवेशविशेष ही चेतन कर्तृकत्वका भी प्रयो
जक हो—क्योंकि जल अग्नि आदिमे घटपटादिके समान अवयव
संघटन के नहीं रहने पर भी जलादिका चेतनद्वारा सञ्चालित होना
देखा जाता है। अतः उस दृष्टान्तसे घटपटादिके तुल्य अवयवसन्निवेश
नहीं होनेपर भी क्षिति अङ्कुरादिके चेतन (ईश्वर) द्वारा उत्पादित होनेमे
कोई बाधा नहीं है।
यह भी नियम नहीं है कि—जिस वस्तुका प्रयोजक शरीर है वही
चेतनद्वारा सञ्चालित होती है—क्योंकि शरीरका भी प्रयोजक कोई
दूसरा शरीर नहीं होता, इसलिये तब शरीर भी चेतनद्वारा सञ्चालित
नहीं होगा और शरीरके सञ्चालनमे स्वयं शरीर ही स्वतन्त्र हो जायगा।
ऐसी स्थितिमे मृतशरीर भी चेतनकी अपेक्षा नहीं रहनेसे अपने आप
सञ्चालित होने लगेगा। यह बात पूर्वमे कही ही जा चुकी है।
इसलिये दण्डादिमें जो अपना व्यापार करनेमे पराधीनता है, वह
केवल उसकी अचेतनताके कारण है, यह तृतीयपक्ष ही सुसङ्गत है।
इसप्रकार परमाणु अदृष्ट आदिमे भी अचेतनता धर्मके होनेसे उनका
भी व्यापार चेतनपरतन्त्र ही होगा, यह अनिवार्य है। अर्थात् पर-
माणुओंका प्रेरक चेतन ईश्वर ही है, क्योंकि जीवोंम वह सामर्थ्य
नहीं है।
अतः यह सभी कार्य कारणवत्तासे व्याप्त है। अर्थात् जो जो कार्य
है, वह कारणवाला है। तथा वह कारणवत्ता विपक्षभूत अकर्तृक
( —हीन ) वस्तुमें असंभव होती हुई अपने व्याप्यभूत कार्यत्वके साथ
अनुपलम्भवादः ४१५
कर्तव्यो वा ? विपर्ययाविरोधबाधकाभ्याम् । किं बाधकम् ?
अन्वयव्यतिरेकभूयोदर्शनसहायकमाचरन्नुत्तरस्तर्कः ।
स चाऽऽत्माश्रयेतरेतराश्रयचक्रकानवस्थानिष्टप्रसङ्गभेदेन
पञ्चविधोऽपि क्वचिद् व्यभिचारं निराकुर्वाणः क्वचित् तन्नि-
बन्धनमुपाधिमवधुन्वन् सहायीभवतीति फलतो न कश्चिद् विशेषः ।
तदुदाहरणानि चात्रैव यथायथं परिचेयानीति ।
प्रश्न—उक्त लक्षणवाले उपाधिका ज्ञान कैसे होगा ? अथवा उसका
निराकरण ( अभावज्ञान ) कैसे होगा ?
उत्तर—विपर्यय ( विपक्ष ) में अविरोध ( बाधकाभाव ) होनेसे
उपाधिका ज्ञान होता है तथा विपक्षमें बाधक होनेसे अनौ-
पाधिकत्वका ज्ञान होता है ।
प्रश्न—विपक्षमे जिसके होनेसे हेतुमे अनौपाधिकत्वका ज्ञान होता
है, वह बाधक क्या है ?
उत्तर—अन्वयव्याप्ति और व्यतिरेकव्याप्तिमें उपयोगीभूत साध्य-
साधनके अन्वयसहचार और व्यतिरेकसहचारके भूयोदर्शन
(बार बारदर्शन) में सहायक होता हुआ ऐसा तर्क, जिसका
उत्तरवर्ती कोई प्रतिकूल तर्क न हो, वह तर्क ही विपक्षमें
बाधक होता है । वह तर्क आत्माश्रय, अन्योन्याश्रय, चक्रक,
अनवस्था और अनिष्टप्रसङ्गके भेदसे पाँच प्रकारका होता
हुआ कहींपर व्यभिचार शङ्काको हटाता हुआ तथा कहीं
व्यभिचारशङ्कामे हेतुभूत उपाधिका निराकरण करता हुआ
प्रकृत अनुमानमे सहायक होता है । इन सभी बाधकोंमें
अवान्तर विशेषता होनेपर भी व्यभिचार-निरासरूप इनके
फलमे कोई अन्तर नहीं है । यद्यपि आत्माश्रयादि चार
भी अनिष्टप्रसङ्गरूप ही हैं तथापि गोबलीवर्द न्याय-
से अलग-अलग उल्लेख किया जाता है। इन पाँचोंके
उदाहरण भी इसी ग्रन्थमें क्षणिकवाद, अपोहवाद तथा
विज्ञानवादादिमें यथास्थान देखने चाहिये ।
४१४ आत्मतत्त्वविवेके
व्यावर्त्तमाना सपक्षे विश्राम्यतीत्युभयमुखी प्रतिबन्धसिद्धिः ।
व्याप्तिस्वरूपनिरूपण
कः पुनरयं प्रतिबन्धः ? स्वाभाविकः सम्बन्धः । कः स्वा-
भाविकार्थः ? निरुपाधित्वम् । कः पुनरुपाधिः ? साध्यप्रयोजकं
निमित्तान्तरम् । किमस्य लक्षणम् ? साधनाव्यापकत्वे सति
साध्यव्यापकत्वम् । कथं पुनरेवंलक्षणकोऽर्थः प्रत्येतव्यो निरा-
ही उस विपक्षसे व्यावृत्त होती है । अर्थात् वह कर्तृविहीन वस्तु कार्य
नहीं होती किन्तु नित्य होती है, जिसका कोई कारण ही नहीं होता ।
इसलिये वह कारणवत्ता कर्तृविहीन नित्य वस्तुरूप विपक्षसे व्यावृत्त
होती हुई सकर्तृक वस्तुमे विश्रान्त हो जाती है । इस प्रकार उभयमुखी
(अन्वयमुखी और व्यतिरेकमुखी) व्याप्तिकी सिद्धि हो जाती है ।
अर्थात् जो जो कार्य होता है, वह वह सकर्तृक होता है तथा जो
सकर्तृक नहीं होता वह कार्य भी नहीं होता, जैसे नित्य आकाशादि ।
इस तरह अन्वयव्याप्ति और व्यतिरेकव्याप्तिकी सिद्धि हो जाती है ।
प्रश्न—ईश्वरकी सिद्धिमे व्याप्ति ही मूल है, अत वह व्याप्ति
क्या है ?
उत्तर—हेतुमें साध्यका स्वाभाविक सम्बन्ध व्याप्ति है ।
प्रश्न—स्वाभाविकका क्या अर्थ है ?
उत्तर—निरुपाधिक अर्थात् उपाधि रहित होना ।
प्रश्न—उपाधि क्या वस्तु है ?
उत्तर—साध्यका प्रयोजक कोई दूसरा निमित्त, जो साध्यका
समव्याप्य हो, वही उपाधि है । जैसे, "धूमवान् वह्नेः"
इस अनुमानमे आर्द्वेन्धनसंयोग उपाधि है ।
प्रश्न—उपाधिका लक्षण क्या है ?
उत्तर—साधनका अव्यापक होते हुए साध्यका व्यापक होना उपाधि
का लक्षण है । जैसे, आर्द्वेन्धनसंयोग वह्निरूप साधनका
अव्यापक होते हुए धूमात्मक साध्यका व्यापक होनेसे उपाधि
कहाता है ।
अनुपलम्भवादः ४१५
कर्तव्यो वा ? विपर्ययाविरोधबाधकाभ्याम् । किं बाधकम् ?
अन्वयव्यतिरेकभूयोदर्शनसाहायकमाचरन्नुत्तरस्तर्कः ।
स चाऽऽत्माश्रयेतरेतराश्रयचक्रकानवस्थानिष्टप्रसङ्गभेदेन
पञ्चविधोऽपि क्वचिद् व्यभिचारं निराकुर्वाणः क्वचित् तन्नि-
बन्धनमुपाधिमवधुन्वन् सहायोभवतीति फलतो न कश्चिद् विशेषः ।
तदुदाहरणानि चात्रैव यथायथं परिचेयानीति ।
प्रश्न—उक्त लक्षणवाले उपाधिका ज्ञान कैसे होगा ? अथवा उसका
निराकरण ( अभावज्ञान ) कैसे होगा ?
उत्तर—विपर्यय ( विपक्ष ) में अविरोध ( बाधकाभाव ) होनेसे
उपाधिका ज्ञान होता है तथा विपक्षमे बाधक होनेसे अनौ-
पाधिकत्वका ज्ञान होता है ।
प्रश्न—विपक्षमे जिसके होनेसे हेतुमे अनौपाधिकत्वका ज्ञान होता
है, वह बाधक क्या है ?
उत्तर—अन्वयव्याप्ति और व्यतिरेकव्या
४१६ आत्मतत्त्वविवेके
प्रतिबन्दीकरण
अथ न्यायदुर्बलस्य प्रतिबन्दीकरणम् , यदुतैवं शशविषाण-
स्यापि सिद्धिः स्यात्, दृश्यमात्रनियतत्वात् प्रत्यक्षबाधस्य । न च
दृश्यत्वनिवृत्तेरेव विषाणत्वनिवृत्तिः, अव्यापकनिवृत्तावव्याप्य
निवृत्तेरयोगात् , विषाणगतकार्यत्वप्रयुक्तत्वाच दृश्यत्वव्याप्तेः।
तेन तन्निवृत्तावपि नाकार्यस्य शृङ्गस्य निवृत्तिरिति ।
तच्च महार्थसिद्ध्या कृतकृत्यस्य न परिभ्रंशाय, निष्प्रयो-
जनविषयत्वात् । तथापि सम्भावितस्याकीर्तिभिया नोपेक्षामर्हति
इसके बाद पूर्वोपस्थापित प्रमाणोंसे दुर्बल हुए ( उत्तर दे सकनेमे
असमर्थ हुए ) प्रतिपक्षीकी तरफसे प्रतिबन्दी उपस्थित की जा रही है ।
जैसे—
यदि इस प्रकार अदृश्य चेतन ( ईश्वर ) सिद्ध हो तो अदृश्य शश-
शृङ्गकी भी सिद्धि हो जाय । यदि कहो कि शशको शृङ्ग प्रत्यक्षबाधित
है तो ऐसा नहीं हो सकता है । क्योंकि प्रत्यक्षबाध दृश्यमात्रसे नियत
है । अर्थात् जो दृश्य है वही प्रत्यक्षद्वारा बाधित हो सकता है । अतः
अदृश्य होनेके कारण शशशृङ्गमे प्रत्यक्षबाध नहीं दिखाया जा सकता
है । एवं शशशृङ्गमे दृश्यत्वकी निवृत्तिमात्रसे शृङ्गत्वकी निवृत्ति नहीं
हो सकती । क्योंकि अव्यापककी निवृत्तिसे अव्याप्यकी निवृत्ति नहीं
होती है। अर्थात् न दृश्यत्व शृङ्गत्वका व्यापक है और न शृङ्गत्व
दृश्यत्वका व्याप्य है। अत इन दोनोंमें व्याप्यव्यापकभाव नहीं होनेसे
दृश्यत्वकी निवृत्तिसे शशशृङ्गमे शृङ्गत्वकी निवृत्ति नहीं हो सकती है।
एव, दृश्यत्वकी व्याप्ति शृङ्गगतकार्यत्वके कारण है। अर्थात् उसी
शृङ्गमें दृश्यत्व होता है, जो कार्य ( उत्पन्न ) है । इसलिये दृश्यत्वकी
निवृत्ति होनेपर कार्यभूतशृङ्गकी भले ही निवृत्ति हो जाय किन्तु अकार्य-
भूत शशशृङ्ग या नरशृङ्गकी निवृत्ति नहीं हो सकती है।
( प्रतिबन्दिका निराकरण ) उक्त प्रतिबन्दि मेरी हानिके लिये नहीं
हो सकती है। क्योंकि ईश्वररूप महान् प्रयोजन के सिद्ध हो चुकने
से मैं कृतकृत्य हो चुका हूँ। एव प्रतिबन्दिका विषय निष्प्रयोजन भी
अनुपलम्भवादः ४१७
प्रतिबन्दिरिति चेत्, तर्हि मा भैषीरियमुन्मोच्यते । तथा
ह्यर्थतः स्वशिरःशृङ्गसाधनप्रवृत्त इदं प्रष्टव्यः—किं ते विषाण-
शब्देनान्यदेव किञ्चिदभिप्रेतं रोमादि ? विषाणजातीयं वा
द्रव्यम् ? प्रथमे सिद्धसाधनं लोकविरोधश्च । लोके तद्विपरीतस्यै-
वार्थस्य विषाणशब्देनाभिधानात् ।
द्वितीये त्वन्वयव्यतिरेकाभ्यां संस्थानविशेषकार्यत्वात् व्यव-
हारलक्षणायास्तदभिव्यक्तेः कथं तद्रहितेषु परमाण्वादिषु
तत्सम्भवः ? सम्भवे वा कथं न तत्र घटत्वादिकमपि ? ओमिति
होता है, क्योंकि उससे न स्वपक्षका साधन होता है और न परपक्षका
दूषण ही हो पाता है । फिर भी यदि कहो कि—प्रतिष्ठाको प्राप्त व्यक्ति
अपनी अकीर्तिके भयसे प्रतिबन्दिकी उपेक्षा नहीं कर सकता है, किन्तु
उसका भी समाधान उसे करना ही पड़ता है—तो भय न करो, प्रति-
बन्दिसे इसे भी हटा ही रहा हूँ । जैसे—
वस्तुके रूपमें अपने शिरपर शृङ्ग सिद्ध करनेके लिये तैयार हुए
तुमसे यह पूछना है कि—क्या तुझे विषाण ( शृङ्ग ) शब्दसे रोम आदि
कुछ और ही वस्तु अभिप्रेत है ? अथवा विषाणजातिका प्रसिद्ध द्रव्य
अभिप्रेत है ? यहाँ प्रथमपक्षमें सिद्धसाधनदोष है और लोकविरोध
भी होता है । अर्थात् सिरके बालको ही यदि विषाण समझ कर सिद्ध
करते हो तो सिरपर बाल तो सिद्ध ही है, अतः उसका साधन करना
व्यर्थ है । इसके अलावे विषाणशब्दसे बाल समझना लोकविरुद्ध भी
है । क्योंकि लोकमें रोम आदिसे विपरीत जो वस्तु है, उसीका विषाण-
शब्दसे अभिधान होता है ।
यदि द्वितीयपक्ष लो, अर्थात् विषाणशब्दसे विषाणत्वजातिसे युक्त
द्रव्य अभिप्रेत हो तो अन्वय और व्यतिरेकद्वारा वह विषाणत्वजाति
अवयव-सन्निवेशविशेषसे ही व्यङ्ग्य होती है तथा उसकी अभिव्यक्तिका
ज्ञान व्यवहाररूप लक्षणसे होता है । ऐसी स्थितिमें जहाँ ( शश या
नरके सिरमें ) विशेषप्रकारका अवयव-सन्निवेश (संघटन) नहीं है, वहाँ
अलीक शशशृङ्गमें विषाणत्व या शृङ्गत्वजातिकी अभिव्यक्ति कैसे होगी ?
२७
ब्रुवतः कथं न जातिसङ्करप्रसङ्गः ? कारणं बिना कार्यसम्भव-
प्रसङ्गो वा ? न वान्यक्यतिरेकौ कार्यकारणभावे प्रमाणमिति
सर्वं समाकुलमेवाकुलमतेः । तस्मादतीन्द्रियं नित्यं वा विषाण-
मेव न भवति, यच्च विषाणं तत् प्रत्यक्षबाधितमेव, कुतस्तदनु-
मानावकाशः ।
एवं तर्हि नित्यं ज्ञानमित्यपि व्याहतम् , इन्द्रियादिविकार-
मात्रव्यक्तिमात्रव्यङ्ग्यत्वात् ज्ञानत्वसामान्यस्येति चेत् , न, अत-
और उसमें शृङ्गत्वका व्यवहार भी कैसे होगा ? यदि उक्त प्रकारके
अवयव-सन्निवेशके अभावमें भी शृङ्गत्वजातिकी अभिव्यक्ति हो तो घटो-
चित अवयव-सन्निवेशसे रहित परमाणुओंमें भी घटत्वादि-जातिकी अभि-
व्यक्ति हो तथा परमाणुओंमें भी घटव्यवहार होवे । यदि 'ओम्' शब्दसे
उक्त प्रसङ्गके बारेमें अपनी स्वीकृति व्यक्त करो, अर्थात् विशेषप्रकारका
अवयव-सन्निवेश नहीं रहनेपर भी जातिकी अभिव्यक्ति मानो तो परस्पर
विरोधी जातियोंका भी एकत्र सङ्कर होने लगेगा । अथवा कारणके
बिना भी कार्यकी उत्पत्ति होने लगेगी । इसके अलावे कार्यकारणभाव-
का निश्चय करनेमे सर्वसम्मत अन्वय व्यतिरेक भी प्रमाण नहीं हो
सकेगा । इसप्रकार तुम्हारे जैसे आकुलमति व्यक्तिका सब नियम छिन्न
भिन्न हो जायगा ।
इसलिये अतीन्द्रिय ( अदृश्य ) या नित्य कोई विषाण ही नही
होता है । और जैसा विषाण लोकमें देखा जाता है, वह शश ( खरहे )
के या मानवके सिरमें प्रत्यक्ष प्रमाणसे बाधित है । अतः शशशृङ्गके
या नरशृङ्गके अनुमानका अवसर ही कहां है ?
यदि कहो कि—इसप्रकार तो शशविषाणके समान नित्यज्ञान भी
खण्डित हो गया । क्योंकि ज्ञानत्वजाति भी इन्द्रियादि विकारोंसे ही
अभिव्यक्त होती हुई देखी जाती है । अर्थात् ईश्वरमें इन्द्रियादिके नहीं
होनेसे ज्ञान ही नहीं होगा । यदि उसमें भी इन्द्रियादि विकार माने
जांय तो इन्द्रियादिसे जन्य होनेके कारण ईश्वरका ज्ञान नित्य नहीं हो
सकेगा—तो यह नहीं कह सकते । कारण, ज्ञानत्व न तो नित्यत्वा-
ऽभावत्वात् अतदाक्षेपकत्वाच्च । न हि मातृत्वस्य वन्ध्यात्ववत्
नित्यत्वस्याभावो ज्ञानत्वम्, अचेतनानामपि चेतनत्वप्रसङ्गात् ।
नापि नित्यत्वं ज्ञानत्वाभावमाक्षिपेत्, ज्ञानत्वेनाविरोधात्,
विरोधमूलस्य विपक्षे बाधकस्याभावात्, दर्शनादर्शनयोश्चार्थप्रव-
भावरूप है और न तो नित्यत्वाभावका आक्षेपक (उपस्थापक) है।
ऐसे ही नित्यत्व भी न तो ज्ञानत्वाभावरूप है और न तो ज्ञानत्वाभावका
आक्षेपक ही है। क्योंकि जिस प्रकार मातृत्व वन्ध्यात्वका अभावरूप
है, उस प्रकार ज्ञानत्व नित्यत्वका अभावरूप नहीं है। क्योंकि यदि वैसा
हो तो अचेतन वस्तु भी यदि अनित्य हो जैसे घटपटादि, तो उसमें
चेतनत्व (ज्ञानाधिकरणत्व) का प्रसङ्ग हो जायगा। क्योंकि चेतन
होनेके लिये अपेक्षित जो नित्यत्वाभाव, वह उसमें है।
एवं, नित्यत्व ज्ञानत्वाभावको या ज्ञानत्व नित्यत्वाभावको आक्षिप्त
भी नहीं कर सकता। क्योंकि न तो नित्यत्वको ज्ञानत्वके साथ विरोध
है और न ज्ञानत्वको नित्यत्वके साथ। कारण, विरोधका मूल है विपक्ष-
में बाधक होना, जिसका यहाँ अभाव है। अर्थात् "ज्ञान अनित्य ही
होता है, यह तुम्हारा पक्ष है। किन्तु "नित्य भी हो और ज्ञान भी हो"
इस विपक्षमें कोई बाधक नहीं होनेसे ज्ञानत्व और नित्यत्वमें कोई
विरोध नहीं है।
यह कहना कि—जो जो ज्ञान होता है, वह सब अनित्य ही देखा
जाता है तथा जो नित्य आकाशादि है, वह ज्ञानात्मक भी नहीं देखा
जाता, इसलिये ज्ञान होना और नित्य होना परस्पर विरोधी है—तो
इसप्रकारका दर्शन और अदर्शन अर्थप्रवणत्व और अर्थाप्रवणत्वरूप
उपाधिसे प्रयुक्त है। अर्थात् नित्य हो या अनित्य हो, जो सीधे अर्थ
(विषय) से सम्बद्ध है वह ज्ञान है, और जो सीधे विषयसे सम्बद्ध
नहीं है, वह ज्ञान नहीं है, जैसे इच्छा आदि। क्योंकि इच्छा
सीधे विषयसे सम्बद्ध न होकर ज्ञानके माध्यमसे ही विषयसम्बद्ध
होती है। इसीलिये यद्विषयक ज्ञान होता है, तद्विषयक ही इच्छा
होती है।
उक्त उपाधि उसी प्रकार है, जैसे रूपत्व और अनित्यत्वके सम्बन्ध-
४२० आत्मतत्त्वविवेके
णत्वाप्रवणत्वोपाधिग्रस्तत्वात्, रूपत्वानित्यत्वयोश्चक्षुर्मात्रग्राह्य-
व्यक्तिस्थवत् ।
न चेन्द्रियादिविकारो ज्ञानत्वाभिव्यक्तिहेतुः, अर्थप्रवण-
व्यक्तिमात्रस्यैव तन्निरपेक्षस्य तथाभावात् । एतदनपेक्षस्य तस्या-
तिप्रसञ्जकत्वादिति ।
अथ क्षुद्रोपद्रवाः—केवलस्य कर्तृत्वे विश्वस्य वैश्वरूप्य-
व्याघातः, सततोत्पत्तिप्रसङ्गश्च । अदृष्टापेक्षायां कल्पनागौरवम्,
मे चक्षुर्मात्रग्राह्यत्व उपाधि है । अर्थात् अनित्य होनेके कारण रूपत्व-
का व्यवहार नहीं होता किन्तु चक्षुर्मात्रग्राह्य होनेके कारण ही रूपत्वका
व्यवहार होता है । क्योंकि यदि अनित्य ही रूप हो तो नित्य होनेके
कारण जलपरमाणुका रूप भी असिद्ध हो जायगा । अतः चक्षुर्मात्रग्राह्य
जो रूपत्वजाति, उससे युक्त होनेके कारण ही जलीयपरमाणुका भी
रूप सिद्ध होता है । उसीप्रकार ज्ञानके बारेमे जानना चाहिये ।
और यह कहना कि—इन्द्रियादिविकार ही ज्ञानत्वकी अभिव्यक्ति-
का हेतु है—ठीक नहीं है। क्योंकि इन्द्रियादिविकारोंसे निरपेक्ष अर्थ-
प्रवणतामात्र ( साक्षात् विषयसम्बन्धमात्र ) ही ज्ञानत्वाभिव्यक्तिका
हेतु है। इसके विपरीत यदि अर्थप्रवणतासे निरपेक्ष इन्द्रियादिविकारों-
को ही ज्ञानत्वका अभिव्यञ्जक माना जाय तो सुखादिमें अतिव्याप्ति हो
जायगी । अर्थात् सुख भी मनरूप इन्द्रियसे सम्बद्ध है, अतः वह भी
ज्ञान कहलाने लगेगा । मेरे मतानुसार तो अर्थप्रवणताका अभाव होने
से ही सुखादिमें ज्ञानत्वकी प्रसक्ति नहीं हो सकेगी ।
ईश्वरसम्बन्धी कुछ क्षुद्र शङ्काओंका समाधान
इसके बाद ईश्वरसम्बन्धी कुछ क्षुद्र उपद्रवोंका वर्णन एव उनका
समाधान किया जा रहा है । जैसे, केवल ईश्वरको कर्त्ता माननेपर
सृष्टिमें विचित्रता नहीं हो सकेगी तथा ईश्वरके नित्य होनेसे प्रत्येक
वस्तुकी सदा उत्पत्ति होने लगेगी । अर्थात् ससारकी सब वस्तु एक जाति-
की हो जायगी तथा वस्तुओंकी उत्पत्तिमें कोई क्रम नहीं रह सकेगा ।
यदि उक्त दोषोंके परिहारके लिये कारणके रूपमें अदृष्टकी भी अपेक्षा
अनुपलम्भवादः ४२१
तत एव तदुत्पत्तेः । स्वार्थं प्रवृत्तावनीश्वरत्वप्रसङ्गः । परार्थ-
प्रवृत्तावदुःखमयसर्गप्रसङ्गः । एवमेव प्रवृत्तावचैतन्यम् । एकत्वे
प्रमाणाभावः । अनेकत्वे त्वमार्वज्ञ्यम्, प्रतिनियतसामग्रीविज्ञ-
त्वादित्येवमादयः ।
तत्र कारणचक्रस्यैकमुपादाय शेषवैयर्थ्यप्रमञ्जने सर्ववैयर्थ्य-
प्रसङ्गः । अन्वयव्यतिरेकाभ्यां सिद्धकारणभावस्य न वैयर्थ्य-
मिति चेत्, अनुमितकारणभावस्याप्येवम् , प्रमाणसिद्धत्वाविशेषात् ।
की जाय तो ईश्वरकी कल्पना करनेमें गौरव दोष है । क्योंकि उस अदृष्ट-
से ही सृष्टिकी उत्पत्ति मान लेनेमें लाघव है । एवं सृष्टि करनेमें ईश्वर-
का अपना कोई प्रयोजन हो तो अपूर्ण होनेके कारण उसका ईश्वरत्व ही
नहीं रह जायगा । अर्थात् वह हम लोगोंके समान संसारी हो जायगा ।
यदि दूसरे दूसरोंकी प्रयोजनसिद्धिके लिये सृष्टिमें ईश्वरकी प्रवृत्ति
हो तो उसे दुःखमय सृष्टि नहीं करनी चाहिये । किन्तु परहितकी
दृष्टिसे सबको सुखी ही उत्पन्न करना चाहिये । यदि अपने या
दूसरोंके किसी प्रयोजनके बिना ही सृष्टिमें उसकी प्रवृत्ति हो तो वह
जड़ या उन्मत्त हो जायगा । एवं उस ईश्वरके एक होनेमें कोई प्रमाण
नहीं है । अर्थात् ईश्वरको सिद्ध करनेवाले प्रमाण उसके एकत्व
को नहीं बताते हैं । अतः यदि ईश्वर अनेक हो तो सबके सब पृथक्
पृथक् नियत सामग्रीके ज्ञाता होनेके कारण असर्वज्ञ हो जायेंगे । अर्थात्
पृथिवीका निर्माता ईश्वर केवल पृथिवीके ही उपादानोंका ज्ञाता होगा
और अङ्कुरका निर्माता केवल अङ्कुरके ही उपादानोंका ज्ञाता होगा ।
इस प्रकार सभी ईश्वर अल्पज्ञ हो जायेंगे ।
यहाँ यदि कारणसमूहके अन्तर्गत किसी एक कारणको लेकर शेष-
कारणको व्यर्थ कहा जाय तो उसी न्यायसे सभी कारणोंमें वैयर्थ्यका प्रसङ्ग
हो जायगा । अर्थात् अदृष्टको लेकर ईश्वरमे वैयर्थ्यका आपादन यदि
उक्त प्रकारसे किया जाय तो कारणको लेकर कर्ममें और कर्मको लेकर
करणमें तथा इसीप्रकारसे और और कारकोंमें भी वैयर्थ्यका प्रसङ्ग हो
जायगा ।