आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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प्रतिबन्दीकरण
अथ न्यायदुर्बलस्य प्रतिबन्दीकरणम् , यदुतैवं शशविषाण-
स्यापि सिद्धिः स्यात्, दृश्यमात्रनियतत्वात् प्रत्यक्षबाधस्य । न च
दृश्यत्वनिवृत्तेरेव विषाणत्वनिवृत्तिः, अव्यापकनिवृत्तावव्याप्य
निवृत्तेरयोगात् , विषाणगतकार्यत्वप्रयुक्तत्वाच दृश्यत्वव्याप्तेः।
तेन तन्निवृत्तावपि नाकार्यस्य शृङ्गस्य निवृत्तिरिति ।
तच्च महार्थसिद्ध्या कृतकृत्यस्य न परिभ्रंशाय, निष्प्रयो-
जनविषयत्वात् । तथापि सम्भावितस्याकीर्तिभिया नोपेक्षामर्हति
इसके बाद पूर्वोपस्थापित प्रमाणोंसे दुर्बल हुए ( उत्तर दे सकनेमे
असमर्थ हुए ) प्रतिपक्षीकी तरफसे प्रतिबन्दी उपस्थित की जा रही है ।
जैसे—
यदि इस प्रकार अदृश्य चेतन ( ईश्वर ) सिद्ध हो तो अदृश्य शश-
शृङ्गकी भी सिद्धि हो जाय । यदि कहो कि शशको शृङ्ग प्रत्यक्षबाधित
है तो ऐसा नहीं हो सकता है । क्योंकि प्रत्यक्षबाध दृश्यमात्रसे नियत
है । अर्थात् जो दृश्य है वही प्रत्यक्षद्वारा बाधित हो सकता है । अतः
अदृश्य होनेके कारण शशशृङ्गमे प्रत्यक्षबाध नहीं दिखाया जा सकता
है । एवं शशशृङ्गमे दृश्यत्वकी निवृत्तिमात्रसे शृङ्गत्वकी निवृत्ति नहीं
हो सकती । क्योंकि अव्यापककी निवृत्तिसे अव्याप्यकी निवृत्ति नहीं
होती है। अर्थात् न दृश्यत्व शृङ्गत्वका व्यापक है और न शृङ्गत्व
दृश्यत्वका व्याप्य है। अत इन दोनोंमें व्याप्यव्यापकभाव नहीं होनेसे
दृश्यत्वकी निवृत्तिसे शशशृङ्गमे शृङ्गत्वकी निवृत्ति नहीं हो सकती है।
एव, दृश्यत्वकी व्याप्ति शृङ्गगतकार्यत्वके कारण है। अर्थात् उसी
शृङ्गमें दृश्यत्व होता है, जो कार्य ( उत्पन्न ) है । इसलिये दृश्यत्वकी
निवृत्ति होनेपर कार्यभूतशृङ्गकी भले ही निवृत्ति हो जाय किन्तु अकार्य-
भूत शशशृङ्ग या नरशृङ्गकी निवृत्ति नहीं हो सकती है।
( प्रतिबन्दिका निराकरण ) उक्त प्रतिबन्दि मेरी हानिके लिये नहीं
हो सकती है। क्योंकि ईश्वररूप महान् प्रयोजन के सिद्ध हो चुकने
से मैं कृतकृत्य हो चुका हूँ। एव प्रतिबन्दिका विषय निष्प्रयोजन भी