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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 470, कुल 530 में से

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पृष्ठ 470

४२० आत्मतत्त्वविवेके

णत्वाप्रवणत्वोपाधिग्रस्तत्वात्, रूपत्वानित्यत्वयोश्चक्षुर्मात्रग्राह्य-
व्यक्तिस्थवत् ।
न चेन्द्रियादिविकारो ज्ञानत्वाभिव्यक्तिहेतुः, अर्थप्रवण-
व्यक्तिमात्रस्यैव तन्निरपेक्षस्य तथाभावात् । एतदनपेक्षस्य तस्या-
तिप्रसञ्जकत्वादिति ।
अथ क्षुद्रोपद्रवाः—केवलस्य कर्तृत्वे विश्वस्य वैश्वरूप्य-
व्याघातः, सततोत्पत्तिप्रसङ्गश्च । अदृष्टापेक्षायां कल्पनागौरवम्,
मे चक्षुर्मात्रग्राह्यत्व उपाधि है । अर्थात् अनित्य होनेके कारण रूपत्व-
का व्यवहार नहीं होता किन्तु चक्षुर्मात्रग्राह्य होनेके कारण ही रूपत्वका
व्यवहार होता है । क्योंकि यदि अनित्य ही रूप हो तो नित्य होनेके
कारण जलपरमाणुका रूप भी असिद्ध हो जायगा । अतः चक्षुर्मात्रग्राह्य
जो रूपत्वजाति, उससे युक्त होनेके कारण ही जलीयपरमाणुका भी
रूप सिद्ध होता है । उसीप्रकार ज्ञानके बारेमे जानना चाहिये ।
और यह कहना कि—इन्द्रियादिविकार ही ज्ञानत्वकी अभिव्यक्ति-
का हेतु है—ठीक नहीं है। क्योंकि इन्द्रियादिविकारोंसे निरपेक्ष अर्थ-
प्रवणतामात्र ( साक्षात् विषयसम्बन्धमात्र ) ही ज्ञानत्वाभिव्यक्तिका
हेतु है। इसके विपरीत यदि अर्थप्रवणतासे निरपेक्ष इन्द्रियादिविकारों-
को ही ज्ञानत्वका अभिव्यञ्जक माना जाय तो सुखादिमें अतिव्याप्ति हो
जायगी । अर्थात् सुख भी मनरूप इन्द्रियसे सम्बद्ध है, अतः वह भी
ज्ञान कहलाने लगेगा । मेरे मतानुसार तो अर्थप्रवणताका अभाव होने
से ही सुखादिमें ज्ञानत्वकी प्रसक्ति नहीं हो सकेगी ।
ईश्वरसम्बन्धी कुछ क्षुद्र शङ्काओंका समाधान
इसके बाद ईश्वरसम्बन्धी कुछ क्षुद्र उपद्रवोंका वर्णन एव उनका
समाधान किया जा रहा है । जैसे, केवल ईश्वरको कर्त्ता माननेपर
सृष्टिमें विचित्रता नहीं हो सकेगी तथा ईश्वरके नित्य होनेसे प्रत्येक
वस्तुकी सदा उत्पत्ति होने लगेगी । अर्थात् ससारकी सब वस्तु एक जाति-
की हो जायगी तथा वस्तुओंकी उत्पत्तिमें कोई क्रम नहीं रह सकेगा ।
यदि उक्त दोषोंके परिहारके लिये कारणके रूपमें अदृष्टकी भी अपेक्षा