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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 468, कुल 530 में से

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पृष्ठ 468

ब्रुवतः कथं न जातिसङ्करप्रसङ्गः ? कारणं बिना कार्यसम्भव-
प्रसङ्गो वा ? न वान्यक्यतिरेकौ कार्यकारणभावे प्रमाणमिति
सर्वं समाकुलमेवाकुलमतेः । तस्मादतीन्द्रियं नित्यं वा विषाण-
मेव न भवति, यच्च विषाणं तत् प्रत्यक्षबाधितमेव, कुतस्तदनु-
मानावकाशः ।
एवं तर्हि नित्यं ज्ञानमित्यपि व्याहतम् , इन्द्रियादिविकार-
मात्रव्यक्तिमात्रव्यङ्ग्यत्वात् ज्ञानत्वसामान्यस्येति चेत् , न, अत-
और उसमें शृङ्गत्वका व्यवहार भी कैसे होगा ? यदि उक्त प्रकारके
अवयव-सन्निवेशके अभावमें भी शृङ्गत्वजातिकी अभिव्यक्ति हो तो घटो-
चित अवयव-सन्निवेशसे रहित परमाणुओंमें भी घटत्वादि-जातिकी अभि-
व्यक्ति हो तथा परमाणुओंमें भी घटव्यवहार होवे । यदि 'ओम्' शब्दसे
उक्त प्रसङ्गके बारेमें अपनी स्वीकृति व्यक्त करो, अर्थात् विशेषप्रकारका
अवयव-सन्निवेश नहीं रहनेपर भी जातिकी अभिव्यक्ति मानो तो परस्पर
विरोधी जातियोंका भी एकत्र सङ्कर होने लगेगा । अथवा कारणके
बिना भी कार्यकी उत्पत्ति होने लगेगी । इसके अलावे कार्यकारणभाव-
का निश्चय करनेमे सर्वसम्मत अन्वय व्यतिरेक भी प्रमाण नहीं हो
सकेगा । इसप्रकार तुम्हारे जैसे आकुलमति व्यक्तिका सब नियम छिन्न
भिन्न हो जायगा ।
इसलिये अतीन्द्रिय ( अदृश्य ) या नित्य कोई विषाण ही नही
होता है । और जैसा विषाण लोकमें देखा जाता है, वह शश ( खरहे )
के या मानवके सिरमें प्रत्यक्ष प्रमाणसे बाधित है । अतः शशशृङ्गके
या नरशृङ्गके अनुमानका अवसर ही कहां है ?
यदि कहो कि—इसप्रकार तो शशविषाणके समान नित्यज्ञान भी
खण्डित हो गया । क्योंकि ज्ञानत्वजाति भी इन्द्रियादि विकारोंसे ही
अभिव्यक्त होती हुई देखी जाती है । अर्थात् ईश्वरमें इन्द्रियादिके नहीं
होनेसे ज्ञान ही नहीं होगा । यदि उसमें भी इन्द्रियादि विकार माने
जांय तो इन्द्रियादिसे जन्य होनेके कारण ईश्वरका ज्ञान नित्य नहीं हो
सकेगा—तो यह नहीं कह सकते । कारण, ज्ञानत्व न तो नित्यत्वा-