आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअनुपलम्भवादः ४१७
प्रतिबन्दिरिति चेत्, तर्हि मा भैषीरियमुन्मोच्यते । तथा
ह्यर्थतः स्वशिरःशृङ्गसाधनप्रवृत्त इदं प्रष्टव्यः—किं ते विषाण-
शब्देनान्यदेव किञ्चिदभिप्रेतं रोमादि ? विषाणजातीयं वा
द्रव्यम् ? प्रथमे सिद्धसाधनं लोकविरोधश्च । लोके तद्विपरीतस्यै-
वार्थस्य विषाणशब्देनाभिधानात् ।
द्वितीये त्वन्वयव्यतिरेकाभ्यां संस्थानविशेषकार्यत्वात् व्यव-
हारलक्षणायास्तदभिव्यक्तेः कथं तद्रहितेषु परमाण्वादिषु
तत्सम्भवः ? सम्भवे वा कथं न तत्र घटत्वादिकमपि ? ओमिति
होता है, क्योंकि उससे न स्वपक्षका साधन होता है और न परपक्षका
दूषण ही हो पाता है । फिर भी यदि कहो कि—प्रतिष्ठाको प्राप्त व्यक्ति
अपनी अकीर्तिके भयसे प्रतिबन्दिकी उपेक्षा नहीं कर सकता है, किन्तु
उसका भी समाधान उसे करना ही पड़ता है—तो भय न करो, प्रति-
बन्दिसे इसे भी हटा ही रहा हूँ । जैसे—
वस्तुके रूपमें अपने शिरपर शृङ्ग सिद्ध करनेके लिये तैयार हुए
तुमसे यह पूछना है कि—क्या तुझे विषाण ( शृङ्ग ) शब्दसे रोम आदि
कुछ और ही वस्तु अभिप्रेत है ? अथवा विषाणजातिका प्रसिद्ध द्रव्य
अभिप्रेत है ? यहाँ प्रथमपक्षमें सिद्धसाधनदोष है और लोकविरोध
भी होता है । अर्थात् सिरके बालको ही यदि विषाण समझ कर सिद्ध
करते हो तो सिरपर बाल तो सिद्ध ही है, अतः उसका साधन करना
व्यर्थ है । इसके अलावे विषाणशब्दसे बाल समझना लोकविरुद्ध भी
है । क्योंकि लोकमें रोम आदिसे विपरीत जो वस्तु है, उसीका विषाण-
शब्दसे अभिधान होता है ।
यदि द्वितीयपक्ष लो, अर्थात् विषाणशब्दसे विषाणत्वजातिसे युक्त
द्रव्य अभिप्रेत हो तो अन्वय और व्यतिरेकद्वारा वह विषाणत्वजाति
अवयव-सन्निवेशविशेषसे ही व्यङ्ग्य होती है तथा उसकी अभिव्यक्तिका
ज्ञान व्यवहाररूप लक्षणसे होता है । ऐसी स्थितिमें जहाँ ( शश या
नरके सिरमें ) विशेषप्रकारका अवयव-सन्निवेश (संघटन) नहीं है, वहाँ
अलीक शशशृङ्गमें विषाणत्व या शृङ्गत्वजातिकी अभिव्यक्ति कैसे होगी ?
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