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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

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पृष्ठ 437

३८८ आत्मतत्त्वविवेके
असिद्धिपरिहारे विशेषणं समर्थमिति चेन्, न, एकाम-
सिद्धिं परिहरतो द्वितीयापत्तेः । अन्यथा विवादाध्यासितं
नादृष्टहेतुकं शरीराजन्यत्वादित्यनेनापि जन्यत्वस्य सत्प्रतिपक्ष-
प्रसङ्गानिति ।
तर्कापरिशुद्धिरस्तु दूषणम्, शरीरनिवृत्तौ बुद्धिनिवृत्तेः ।
बुद्धिनित्यत्वे शरीरानुपयोगवत्, प्रयत्ननित्यतायां ज्ञानेच्छा-
नुपयोगादिति चेत्, न, प्रयत्नस्य द्विधर्मकत्वात् । स हि
है व्यभिचारका वारण । किन्तु यहाँका शरीर विशेषण व्यभिचारवारक
नहीं होनेसे व्याप्यत्वासिद्धके अन्तर्गत आ जाता है । अत यह असिद्ध-
हेतु कर्तृसाधक पूर्वोक्त अनुमानके तुल्यबलवाला नहीं है। तुल्यबल
होनेपर ही सत्प्रतिपक्ष होता है ।
यदि कहो कि—केवल अजन्यत्वको हेतु बनानेमें यह हेतु स्वरूपा-
सिद्ध हो जायगा । क्योंकि क्षित्यादिक अजन्य नहीं है किन्तु जन्य है ।
अत स्वरूपासिद्धिका वारण करनेके कारण शरीर-विशेषण समर्थ
( सार्थक ) है । क्योंकि क्षित्यादिक शरीरसे तो अजन्य है ही—तो यह
भी नहीं कह सकते । क्योंकि एक असिद्धिका परिहार करनेमे पुनः
दूसरी असिद्धि ( व्याप्यत्वासिद्धि ) की आपत्ति हो जाती है । यदि
असमर्थ विशेषणकी दशामै भी सत्प्रतिपक्ष हो तो "क्षित्यादिकम् अदृष्ट-
हेतुक, जन्यत्वात्" यह अनुमान भी 'क्षित्यादिक न अदृष्टहेतुकम्,
शरीराजन्यत्वात्" इस प्रतिपक्षी अनुमानके द्वारा सत्प्रतिपक्षित होने
लगेगा ।
यदि कहो कि—ईश्वर साधक अनुमानमे विरुद्धत्वदोष या सत्प्रति-
पक्षत्वदोष भले न हो फिर भी तर्कापरिशुद्धिदोष होगा । अर्थात्
उक्त अनुमान प्रतिकूल तकोंसे उपहत हो जायगा । जैसे—जगतका
कर्ता यदि अशरीरी होगा तो शरीरके बिना उसमें बुद्धि भी नहीं हो
सकेगी । ईश्वरीयज्ञानके नित्य होनेसे उसके लिये यदि शरीरकी कोई
उपयोगिता न हो तो उसी तरह ईश्वरीय प्रयत्नके भी नित्य होनेसे उसके
लिये ज्ञान और इच्छाकी भी उपयोगिता समाप्त हो जायगी और ईश्वर