आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 444, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ेंचत्वारो जगति भावा भवन्ति—विरोधी, बहिर्वृत्तिः, सहवृत्ति-
रन्तर्वृत्तिश्चेति । न च पञ्चमः प्रकारः काङ्क्षितुमपि शक्यते,
विरोधाविरोधयोः साहित्यासाहित्ययोः आधिक्यानाधिक्ययोः
परस्परनिषेधरूपत्वात् । तत्र द्वयमत्र नोपाधित्वेन शङ्कनीयम्,
अकार्यस्यैवाकार्यस्यापि वा सकर्तृकत्वप्रसङ्गात् । न चेद-
मिष्टम्, अकार्यस्य कारणवत्तामात्रेण सहजविरोधे कारक-
विशेषस्य कर्तुरनवकाशात् ।
तीनों ही पक्ष युक्तियुक्त हैं। कारण, जगत्मे चार प्रकारके भाव
(धर्म) होते हैं। १—साधनविरोधी, २—साधनबहिर्वृत्ति (साधन-
व्यापक), ३—साधनसहवृत्ति (साधनसमनियत) तथा ४—साधना-
न्तर्वृत्ति (साधनव्याप्य)। इनसे अतिरिक्त पञ्चम प्रकारकी कामना भी
नहीं की जा सकती है। क्योंकि विरोध अविरोध, साहित्य-असाहित्य
और आधिक्य अनाधिक्य ये परस्परके निषेध स्वरूप हैं। इनमें
आधिक्यानाधिक्यके परस्पर विरोधका प्रदर्शन बहिर्वृत्ति और अन्तर्वृत्ति
पक्षके अभिप्रायसे है तथा शेष दो विरोधी और सहवृत्तिके अभिप्रायसे हैं।
इनमें साधनविरोधी और साधनबहिर्वृत्तिको उपाधिके रूपमे नहीं
माना जा सकता है। क्योंकि साधनका विरोधी यदि उपाधि हो तो
चूँकि प्रकृतमे कार्यत्व साधन (हेतु) है, इसलिये अकार्य ही सकर्तृक
होने लगेगा और कार्यमें अकर्तृकत्वका प्रसङ्ग हो जायगा। यदि साधन-
बहिर्वृत्ति अर्थात् साधनका व्यापक उपाधि हो तो कार्यके साथ साथ
अकार्य भी सकर्तृक होने लगेगा। अर्थात् उपाधि कार्यत्वसमानाधि-
करण होते हुए कार्यत्वाभावसमानाधिकरण भी होगा, तभी वह साधन-
व्यापक होगा। अतः उक्त उपाधिबलसे कार्य भी सकर्तृक होगा और
अकार्य (गगनादि) भी सकर्तृक होने लगेगा। इसमें इष्टापत्ति नहीं
कर सकते। क्योंकि जो अकार्य (नित्य) है, उसे तो कारणमात्रसे
स्वाभाविक विरोध है, अत कारणका ही एकभाग कर्ताका भी अवसर
कैसे आ सकेगा? अर्थात् अकार्यका तो कोई भी कारण नहीं होता, तो
कारणविशेषरूप कर्ता कैसे सिद्ध हो सकेगा? अत अकार्यमे सकर्तृ-
कत्वप्रसङ्गकी इष्टापत्ति नहीं कर सकते।