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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 439, कुल 530 में से

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पृष्ठ 439

३९० आत्मतत्त्वविवेके

बाधः। सर्वविषयत्वात्तस्य किं विषयनियमार्थेन ज्ञानेनेति-
चेत्, न, तस्य स्वरूपेणार्थप्रवणत्वाभावात्, भावे वा ज्ञानत्व-
प्रसङ्गादित्युक्तम्।
जीवनयोनिप्रयत्नवद् विषयव्यवस्था भविष्यतीति चेत्,
न, जात्यन्तरत्वात्। एकजातीयत्वे तस्यापीच्छापूर्वकत्वप्रस-
ङ्गात्। इच्छाया वा तत्कारणत्वं न स्यात्, तामन्तरेणापि
ज्ञान-इच्छा आदि भले ही सिद्ध न हो किन्तु प्रयत्नके अकारण हो
जानेसे कार्यत्व हेतुसे प्रयत्न-पूर्वकत्व भी नहीं सिद्ध हो सकेगा। और
ज्ञान इच्छाके साथ साथ प्रयत्न भी जगत्के मूलरूपसे बहिष्कृत
हो जायगा।
यदि कहो कि—प्रयत्न भी मत सिद्ध हो, क्या हानि है?—तो ऐसा
नहीं कह सकते। क्योंकि सृष्टिमे प्रयत्न-पूर्वकत्व सिद्ध करनेवाला
कार्यत्व-हेतु सर्वथा दोषरहित है। यदि उसे भी सदोष मानो तो फिर
वही बाध-दोष आ जाता है। अर्थात् कार्यवस्तुका बिना प्रयत्नके होना
प्रत्यक्षबाधित है। यदि कहो कि—ईश्वरीय प्रयत्नके सर्वविषयक होनेसे
उसमें विषय नियमार्थ ज्ञानकी सत्ता मानना व्यर्थ है—तो ऐसा नहीं
कह सकते। क्योंकि प्रयत्नमें स्वत (सीधे) विषय प्रवणता (विषयो-
न्मुखता) नहीं होती है। यदि हो तो विषयसे सीधा सम्बन्ध
होनेके कारण वह प्रयत्न न होकर ज्ञान हो जायगा। क्योंकि
ज्ञानका ही विषयसे सीधा सम्बन्ध होता है। यह बात पूर्वमे कही
जा चुकी है।
यदि कहो कि—जीवनयोनि प्रयत्नके समान ही अन्य प्रयत्नमें भी
विषयकी व्यवस्था हो जायगी। अर्थात् जीवनयोनि प्रयत्न बिना ज्ञानके
ही प्राणविषयक होता है और अचेतावस्थामें भी प्राणी उसीके कारण
श्वास प्रश्वास क्रिया करता रहता है, वैसे ही अन्य प्रयत्न भी बिना ज्ञान
के ही सविषयक होगा—तो यह नहीं हो सकता। क्योंकि जीवनयोनि-
प्रयत्न एक दूसरी ही जातिका प्रयत्न है। यदि एक ही जातिका हो तो
वह भी अन्य प्रयत्नोंके समान इच्छा पूर्वक होने लगेगा। अर्थात्
इच्छा होने