आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअनुपलब्धवादः ३९१
तज्जातीयस्योत्पत्तेः । तस्मात् कृतिजातीयस्य ज्ञानेच्छाभ्यामेव
सविषयव्यवस्था । स च साधयितुमिष्ट इति ।
तार्किकगर्ववाहस्त्वाह—ननु सपक्षविपक्षयोर्दर्शनादर्शन-
मात्रस्य शतशः प्रवृत्तावपि व्यभिचारोपलम्भात् , तल्लक्षणस्या-
नुपलब्धव्यभिचारस्यापि तथाभावसम्भावनाक्रान्तत्वात् लक्ष-
णान्तरं प्रतिबन्धस्य वक्तुमुचितम् । तच्चोपाधिविरहो वा
स्यात् , तदुत्पत्तिर्वा, विपक्षे बाधकं वेति संक्षेपः । तत्र न
प्रथमः, अदृश्योपाध्यभावनिश्चयोपायाभावात् । दृश्येनैवोपा-
धिना भवितव्यमिति च नियमानुपपत्तेः ।
प्रयत्न बिना इच्छाके होता है, वैसे ही अन्य प्रयत्नमें भी इच्छाकी
कारणता नहीं हो सकेगी । क्योंकि इच्छाके बिना भी उसी जातिका
दूसरा प्रयत्न ( जीवनयोनि प्रयत्न ) उत्पन्न होता है । इसलिये उस
प्रयत्नमे, जो इच्छाके अधीन उत्पन्न होता है, ज्ञान और इच्छाके
द्वारा ही सविषयत्वकी व्यवस्था होती है । और वही प्रयत्न यहाँ
सिद्ध करनेके लिये मेरा अभीष्ट भी है । अर्थात् कार्यत्व हेतुसे
क्षित्यादिके प्रति उक्त कृति ( प्रयत्न ) मान् कर्ता ही सिद्ध करना मेरा
अभीष्ट है ।
अपनी तार्किकताका अभिमान रखनेवाले बौद्धका पूर्वपक्ष—सपक्षमें
हेतुसत्त्वज्ञान तथा विपक्षमें हेतुव्यावृत्तत्वज्ञानकी सैकड़ों बार प्रवृत्ति
होनेपर भी व्यभिचार देखा जाता है । अत सपक्षसत्त्व-विपक्षव्यावृत्त-
त्त्वरूप व्याप्तिलक्षणमें तत्काल व्यभिचारकी उपलब्धि न होनेपर भी
उसमे व्यभिचारकी संभावना बनी रहती है । इसलिये व्याप्तिका
दूसरा लक्षण करना चाहिये । और वह लक्षण उपाधिका अभावरूप
है, या तदुत्पत्तिरूप है अथवा विपक्षमें बाधकरूप है—यही संक्षेपसे
कहा जाता है । इनमें प्रथम नहीं हो सकता । क्योंकि जो उपाधि
प्रत्यक्ष-योग्य नहीं है, उसके अभावके निश्चयका कोई उपाय नहीं है ।
तथा दृश्य ही उपाधि होगा, ऐसा नियम भी नहीं हो सकता ।