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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 438, कुल 530 में से

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पृष्ठ 438

अनुपलम्भवादः ३८९
ज्ञानकार्यं ज्ञानैकविषयञ्च कर्तृत्वम् । तत्र कार्यत्वनिवृत्तौ कारण-
तया ज्ञानं मा पेक्षिष्ट, विषयार्थं तु तदपेक्षा केन वार्यते ? न
चास्य स्वरूपेणैव विषयप्रवणत्व, ज्ञानत्वप्रसङ्गात् । अयमेव हि
ज्ञानात् प्रयत्नस्य भेदो यदयमर्थाप्रवण इति ।
न च निर्विषय एवास्त्विति वाच्यम्, अकारणत्वप्रस-
ङ्गात् । तथा च सोऽप्येकः कथं सिध्येत् ? मा सैत्सीदिति
चेत्, न, तत्र साधनस्य निर्दोषत्वात् । दोषे वा स एव
ज्ञानरहित भी सिद्ध हो जायगा। अर्थात् जैसे शरीरके बिना भी ईश्वरीय
ज्ञानकी सत्ता मानते हो उसी प्रकार ज्ञान और इच्छाके बिना भी
ईश्वरीय प्रयत्न मानना पडेगा, जो कि "जानाति, इच्छति, यतते" इस
नियमके विरुद्ध है—तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि प्रयत्नके दो धर्म
हैं—एक यह कि वह कर्तृत्वरूप प्रयत्न ज्ञानका कार्य है । दूसरा यह कि
वह प्रयत्न ज्ञानसमानविषयक होता है, अर्थात् यद्विषयक ज्ञान होता
है, तद्विषयक ही प्रयत्न भी होता है । अत ईश्वरीय प्रयत्नमे कार्यत्व-
धर्मका अभाव होनेसे कारणके रूपमे ज्ञानकी अपेक्षा भले ही न हो
फिर भी विषयके लिये प्रयत्नको ज्ञानकी अपेक्षा होगी, इसे कौन रोक
सकता है । अर्थात् ईश्वरके नित्य भी इच्छा और प्रयत्न विषयलाभके
लिये ज्ञानकी अपेक्षा करते हैं । प्रयत्नको बिना ज्ञानकी अपेक्षा किये
ही सीधे विषयोन्मुख नहीं माना जा सकता, क्योंकि तब वह प्रयत्न न
होकर ज्ञान हो जायगा । कारण, ज्ञानसे प्रयत्न का यही भेद है कि
प्रयत्न सीधे विषयोन्मुख नहीं होता किन्तु ज्ञानके द्वारा ही होता है ।
अर्थात् ज्ञानीय विषयमे ही प्रयत्न भी होता है ।
यहाँ यह नही कह सकते कि—प्रयत्नको सविषयक माननेमे
ही ज्ञानकी अपेक्षा होगी, अत प्रयत्न निर्विषयक ही माना जाय–क्योंकि
तब उसमें कारणता भी नहीं हो सकती है । क्योंकि प्रयत्न कारण इसी
लिये कहाता है कि वह विषयमे व्यापार उत्पन्न करता है । अत.
निर्विषयक होनेके कारण प्रयत्न जब कारण ही नहीं हो सकेगा तो केवल
[...]को कैसे सिद्धि हो सकेगा ? अर्थात् कार्यत्वहेतुके बलसे