आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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धारणचिन्मात्राविनिर्भागवृत्तिदृश्यदेहमात्रस्यैव प्रत्यक्षानुपल-
म्भाभ्यां कम्पं प्रति कारणत्वप्रतीतेः परचित्तस्यापि कारणत्वं
प्रतीयत इति ।
नापि तृतीयः, विपक्षेऽपि बाधकाभावात् । देशकालनिय-
मादीनां स्वकारणापातसन्निधिना कादाचित्केन प्रतिनियत-
शक्तिना कारणेनाचेतनेनाप्युपपत्तेरिति ।
उत्तानोल्लपितमेतत्—विकल्पत्रयस्याप्युपपत्तेः । तथाहि,
ही चेष्टाके प्रति स्वपरसन्तानसाधारण चित्तमात्रसे नियमतः सम्बद्ध
दृश्य देहमात्रकी ही कारणताकी प्रतीति सामान्यतः अन्वय व्यतिरेकग्रह
द्वारा होकर तदनन्तर सामान्यान्तःपाती परचित्तसन्तानमे भी परचेष्टाके
प्रति कारणताकी प्रतीति हो जाती है ।
एव विपक्षमें बाधकरूप तृतीयपक्ष भी नहीं हो सकता । अर्थात्
विपक्षमें बाधक भी व्याप्तिका लक्षण नहीं हो सकता है । क्योंकि विपक्ष
मे भी कोई बाधक नहीं है । अर्थात् क्षित्यादिके चेतनद्वारा निर्मित
नहीं होनेपर भी कार्यत्वमें कोई बाधक नहीं है । क्योंकि “यदि
चेतनकर्त्ता न हो तो यहाँ इस समय क्षिति अङ्कुरआदि कार्य भी नहीं हो
सकेगा” इस विपक्ष बाधकके द्वारा ही चेतनपूर्वकत्व और कार्यत्वमें
व्याप्य व्यापकभावका ग्रहण करना होगा । अर्थात् कार्यमे देशका,
कालका तथा कारणका नियम तबतक नहीं हो सकता जबतक कि कार्यका
कोई स्वतन्त्र बुद्धिमान् कर्त्ता न हो। किन्तु उक्त देश, काल और
कारणका नियम चेतन कर्त्ताको माने बिना ही अपने कारण कलापके
अधीन है उपस्थिति जिसकी, ऐसे कभी कभी होने वाले तथा कार्यके
अनुरूप नियत शक्तिको धारण करनेवाले अचेतन कारणसे भी हो सकता
है । अर्थात् चेतनकर्त्ताके अन्वयसे कार्यका अन्वय तथा उसके व्यतिरेक
से कार्यका व्यतिरेक नहीं होता, किन्तु कारणान्तरके अन्वय व्यतिरेकसे
ही कार्यका अन्वय व्यतिरेक होता है । अतः कार्यत्वहेतुसे चेतनकर्त्ता
(ईश्वर) की सिद्धि नहीं हो सकती है ।
(उत्तरपक्ष) पूर्वोक्त कथन गर्वोक्तिमात्र है। क्योंकि व्याप्तिग्रहके