आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअनुपलम्भवादः ३८३
निषेधानधिकाराच्च । जन्मजातिवयोवित्तसंस्काराद्युपग्रहेण
तत्प्रवृत्तेः ।
ततोऽनात्मन्यात्मग्रहो निदानं संसारस्य, मिथ्याज्ञानं च
तत्त्वज्ञानान्निवर्तते । तच्च श्रवणमननादिक्रमेणोत्पद्यते । कारण-
निवृत्तौ च कार्यं न जायते । उत्पन्नश्च धर्माधर्मप्रचयो भोगेन
क्षीयत इति न्याय्यार्थपारसंक्षेपः । आम्नायसारसंक्षेपस्त्वशरीरं
वाव सन्तमित्यादि ।
जन्म (शरीरग्रहण), ब्राह्मणत्वादि-जाति, दीर्घायुष्ट्वरूप वय, यज्ञसम्पादनके
लिये समुचित द्रव्य तथा उपनयन-संस्कार आदि होनेपर ही विधि-निषेध-
शास्त्रमें अधिकार होता है, अन्यथा नहीं । अर्थात् उक्त जन्म-जाति आदि
का उपग्रह वीतराग आत्मतत्त्वदर्शीको नहीं होनेसे उसका विधि-निषेधोंमे
अधिकार नहीं होता ।
अतः शरीर-इन्द्रियादि अनात्मवस्तुमे आत्मत्वका ग्रहणरूप मिथ्या-
ज्ञान ही संसारका हेतु है, और वह मिथ्याज्ञान तत्त्वज्ञानसे दूर होता
है । तथा वह तत्त्वज्ञान भी श्रवण मनन निदिध्यासनक्रमसे पैदा होता
है । इसप्रकार आत्मतत्त्वज्ञानसे मिथ्याज्ञानरूप संसारहेतुकी निवृत्ति
हो जानेसे संसाररूप कार्यकी भी निवृत्ति हो जाती है । अर्थात् मिथ्या-
ज्ञानकी निवृत्तिसे रागद्वेषरूप दोषकी निवृत्ति होती है । दोषकी निवृत्ति
से प्रवृत्तिकी निवृत्ति होती है । तथा प्रवृत्तिकी निवृत्तिसे जन्मकी
निवृत्ति हो जाती है । जन्मकी निवृत्ति हो जानेसे पुनः दुःखोत्पत्ति नहीं
होती है, यही अपवर्ग है ।¹
एवं पूर्वोत्पन्न धर्माधर्मका समूह भोगद्वारा क्षीण हो जाता है । अतः
उस कारणसे भी पुनः संसारकी संभावना नहीं रह जाती है । यही
न्यायसिद्धान्तके रहस्यका संक्षेप है । वेदिकरहस्यका संक्षेप तो "अशरीरं
वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः" इत्यादि है । अर्थात् शरीर-इन्द्रिय
आदि उपाधियोंका विगम होनेपर आत्मामें संसारकी निवृत्ति हो
जाती है ॥
१. 'दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः'
(न्या० द० १।१।२।)