आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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निःश्रेयससिद्धेः । किमस्योपादानम् ? विवेकः । कुतः ?
अनात्मनः शरीरादेः ।
किं पुनरत्र प्रमाणम् ? न्यायः, आम्नायश्च । शरीरमेव
हि तारतम्याभिषिक्तमनात्मान मन्यमानस्य तदुपादाय तदनुकूल-
त्रैलोक्यविषया तृष्णा विजृम्भते, तथा तत्प्रतिकूलविषयो द्वेषः ।
न चैतत् केवलात्मदर्शिनः सम्भवति, निरुपाधेः पुत्रवित्तलोभा-
भावात्, तैरनुपकार्यत्वात्, छेदक्लेददाहशोषाद्यनुपपत्तेः विधि-
मनन कर लेनेपर निदिध्यासनद्वारा शरीरादिसे भिन्न आत्मतत्त्वका
साक्षात्कार होनेसे मोक्षकी सिद्धि होगी । इसीलिये आत्मा उपादेय है ।
यदि पूछो कि-आत्माके उपादानका क्या अभिप्राय है ? तो उत्तर होगा-
विवेक अर्थात् भिन्नरूपमे ज्ञान । यदि पूछो—किससे ? तो कहूँगा,
अनात्मभूत शरीर इन्द्रिय आदिसे । अर्थात् शरीर, इन्द्रिय, मन तथा
विषय आदिसे भिन्नरूपमें आत्माका ज्ञान ही उसका उपादान है ।
यदि पूछो कि-शरीरादिसे भिन्नरूपमें आत्माका ज्ञान करना चाहिये,
इसमें क्या प्रमाण है ?—तो यही उत्तर है कि न्याय और आम्नाय (श्रुति)
दोनों ही प्रमाण हैं । क्योंकि शरीरको ही, जो सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं
पूर्णरूपसे अनात्मा है, आत्मा माननेवाले व्यक्तिको शरीर पाकर उसके
अनुकूल संसारविषयक तृष्णा जगती है तथा शरीरके प्रतिकूल विषयके
प्रति द्वेष जगता है । इसप्रकारकी तृष्णा और द्वेष निरुपाधिक आत्म-
ज्ञानीको नहीं हो सकता है । क्योंकि उपाधिविहीन आत्माको पुत्र धन
आदिका लोभ नहीं होता है । कारण, उपाधि हीन आत्माका पुत्रवित्तादि
से कोई उपकार नहीं है । एव निरुपाधि आत्माको छेदन, क्लेदन,
दाह या शोषण आदिका कुछ भी अनुभव नहीं होता है। इसलिये
छेदनादिके हेतुओंके प्रति द्वेष भी नहीं होता ।
एव विधि-निषेधोंमे निरुपाधि आत्माका अधिकार भी नहीं है ।
अर्थात् वैदिक यज्ञादि विधियोंमें तथा हिंसादि निषेधोंमें शरीरवान् आत्मा
ही अधिकारी है । अतः निरुपाधि आत्माको विहितानुष्ठान या निषिद्ध-
परित्यागकी दृष्टिसे भी तृष्णा या द्वेषकी सम्भावना नहीं है । क्योंकि