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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 442, कुल 530 में से

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पृष्ठ 442

अनुपलम्भवादः ३९३

न हि कुलालादिदृश्यव्यतिरेके तस्यावश्यं व्यतिरेको, विटपा-
दावपि तथाभावप्रसङ्गात् ।
तर्हि सन्तानान्तरानुमानमपि कथम् ? कुम्भकारव्यतिरेके
दृश्यादृश्यचिन्मात्रव्यतिरेकासिद्धिवत् स्वचित्तव्यतिरेकेऽपि
कम्पं प्रति चिन्मात्रव्यतिरेकासिद्धेरिति चेत्, न, वादान्तर-
त्वात् । यदापि तत्प्रस्तावः, तदापि स्वदेहे स्वपरसन्तानसा-
जाना चाहिये, पर ऐसा नहीं होता । क्योंकि कुम्भकार आदि दृश्यकर्त्ता-
का अभाव होनेपर अदृश्यकर्त्ताका भी अभाव नहीं होता । यदि वैसा
हो तो वृक्षादिमें भी अदृश्यकर्त्ताका अभाव होने लगेगा । अर्थात्
वृक्षादिकी उत्पत्तिकर्त्ताकेरूपमे कुम्भकारका अभाव होनेसे उसके अदृश्य-
कर्त्ता ( ईश्वर ) का भी अभाव नैयायिकको मानना पड़ जायगा । यदि
वैसा माने तो कार्यत्व-हेतु वहींपर सकर्तृकत्वका व्यभिचारी हो जायगा ।
अतः कार्यकारणभावका नियामक जो अन्वय व्यतिरेक है, उसे दृश्या-
दृश्यसाधारणचेतनमात्रमे वर्तमान नहीं मान सकते ।
यहाँ यदि नैयायिक यह प्रश्न करे कि—परचित्तसन्तानोँका अनुमान
बौद्ध कैसे कर सकेगा ? क्योंकि जैसे घटादिकार्यस्थलमे अन्वयके गृहीत
होनेपर भी कुम्भकारका व्यतिरेक होनेपर दृश्यादृश्यचेतन कर्त्तामात्रका
व्यतिरेक सिद्ध नहीं होनेसे व्यतिरेकसहचार नहीं सिद्ध हो पाता, वैसे
ही परशरीरमे होनेवाली चेष्टाके प्रति परचित्तसन्तानकी कारणता कैसे
सिद्ध होगी ? क्योंकि वहाँ अपने चित्तसन्तानका व्यतिरेक सिद्ध होनेपर
भी चिन्मात्रसन्तानका व्यतिरेक नहीं सिद्ध होनेसे चेष्टा और चित्त-
सन्तानमे अन्वय-सहचार होनेपर भी व्यतिरेक-सहचारकी सिद्धि नहीं
हो सकेगी—तो ऐसा प्रश्न नहीं किया जा सकता है । क्योंकि यह
अर्थान्तर हो जायगा । अर्थात् इस प्रश्नके उठानेसे नैयायिकके कार्यत्व
और सकर्तृकत्वके उभयविध सहचारमें कोई लाभ नहीं होता है । फिर
भी यदि इस अर्थान्तरविषयक प्रश्नको नैयायिक उठावे, क्योंकि परचेष्टा-
से परचित्तसन्तानकी अनुमिति करनेके लिये परचेष्टामें तदुत्पत्तिरूप
व्याप्तिका ग्रहण अवश्य अपेक्षित होगा तथा उक्त व्याप्तिग्रहके लिये उन
दोनोंका अन्वय-व्यतिरेकग्रह भी अपेक्षित होगा—तो भी अपने शरीरमें