आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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नापि द्वितीयः, सा ह्यन्वयव्यतिरेकाभ्यां निश्चीयते, तौ
च दृश्यशरीरवच्चेतननिष्ठौ वा स्याताम् ? उपाधिविधुरदृश्या-
दृश्यसाधारणचेतनमात्रनिष्ठौ वा ? न प्रथमः, विटपादौ
व्यभिचारात्, प्रकृतासिद्धेश्च।
न द्वितीय , घटादिकार्यव्यतिरेकममये तत्प्रयोजककुलाल-
व्यतिरेकवद् दृश्य¹चेतनमात्रव्यतिरेकस्य निश्चेतुमशक्यत्वात् ।
दूसरा तदुत्पत्तिपक्ष भी व्याप्तिके लक्षणके रूपमे नहीं माना जा
सकता है । क्योंकि जो जिससे उत्पन्न होता है, वह उसका व्याप्य होता
है—यही तदुत्पत्तिरूप व्याप्तिका अभिप्राय है । किन्तु तदुत्पत्तिका
निश्चय अन्वयव्यतिरेकसे होगा । अर्थात् 'तत्सत्त्वे तत्सत्त्वमन्वय,
तदभावे तदभावो व्यतिरेक " इसके अनुसार अग्निके रहनेपर धूम होता
है और अग्निके अभावमे धूम नही होता है, इसलिये अग्निद्वारा
धूमोत्पत्तिका निर्णय होता है तथा तदुत्पत्तिके कारण धूममें अग्निकी
व्याप्तिका निश्चय होता है । किन्तु प्रकृतमे वे अन्वय और व्यतिरेक
दृश्यशरीरसे युक्त चेतनमें स्थित होंगे ? या उपाधिसे रहित दृश्या
दृश्यसाधारण चेतनमात्रमे स्थित होंगे ? इसमें प्रथमपक्ष नहीं हो
सकता । क्योंकि वृक्षादिमे इसका व्यभिचार पाया जाता है । अर्थात्
शरीरी चेतनके बिना भी अङ्कुरादिकी उत्पत्ति होती है । अतः
अङ्कुरादिके साथ शरीरी चेतनमें अन्वय व्यतिरेक नहीं होनेसे व्यभि-
चार स्पष्ट है । एव अन्वय व्यतिरेकको दृश्यशरीरगत माननेपर
नैयायिकोंका अभीष्ट अशरीरी चेतन कर्ता भी सिद्ध नहीं हा पा रहा है ।
शरीर आदि उपाधिसे रहित दृश्य अदृश्य साधारण चेतन
मात्रवृत्तिरूप द्वितीयपक्ष भी अन्वय व्यतिरेकके लिये नहीं माना जा
सकता है । क्योंकि जैसे घटादिकार्यके अभावकालमें उसे उत्पन्न
करनेवाले कुम्भकारका अभाव माना जाता है वैसे चेतनमात्रके
अभावका निश्चय नहीं किया जा सकता । किन्तु जो दृश्यादृश्य सभी
चेतनके साथ घटादिकार्यका अन्वय व्यतिरेक निश्चय मानता है, उसके
मतानुसार कुम्भकारका अभावनिर्णय होनेपर चेतनमात्रका अभाव माना
१ दृश्यादृश्य इति पाठो युक्तो भाति ।