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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 436, कुल 530 में से

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पृष्ठ 436

आकाङ्क्षानुपपत्तिनियमभेदेन त्रिविधः सम्बन्धः। तत्रा-
काङ्क्षानियमाभ्यामन्वयी, अनुपपत्तिनियमाभ्यां व्यतिरेकीति
विभागः।
अस्तु तर्हि सत्प्रतिपक्षत्वं शरीराजन्यत्वादिति चेत्, न,
असमर्थविशेषणत्वेनासिद्धभेदस्यातुल्यबलत्वात्।
सहचार) और अनुपपत्ति (व्यतिरेक-सहचार) से ग्राह्य जो नियम
विशेष अर्थात् अन्वयव्याप्ति, व्यतिरेकव्याप्ति और अन्वय-व्यतिरेक
व्याप्ति है, तत्स्वरूप जो हेतुमें रहनेवाला तीन प्रकारका सम्बन्ध होता
है, वही अनुमानकी शक्ति है। इनमें अन्वयसहचार एव अन्वय-
व्याप्तिसे अन्वयी हेतु है, तथा व्यतिरेकसहचार एव व्यतिरेकव्याप्तिसे
व्यतिरेकी हेतु होता है, तथा अन्वय-व्यतिरेक उभय सहचारसे प्रतीत
होनेवाली व्याप्तिमे अन्वय व्यतिरेकी हेतु होता है। यह त्रिविध
हेतुओंका विभाग है। अर्थात् प्रतीतिके अपर्यवसानरूप आकाङ्क्षा तथा
प्रतीतवस्तुका अपर्यवसानरूप अनुपपत्ति इन दोनोंमेसे कोई एक अनु-
मितिमें अवश्य रहती है। अतः "क्षितिः सकर्तृका, कार्यत्वात् घटवत्"
यह अन्वयी अनुमान तबतक पर्यवसित नहीं हो सकता, जबतक कि
कर्तामे सर्वज्ञत्वका भान उस अनुमितिमे न हो। क्योंकि उपादानभूत
परमाण्वादिविषयक अपरोक्षज्ञानकी सत्ता ही कर्तृत्व है। तथा इसप्रकार-
का कर्तृत्व होनेके लिये कर्ताको परमाणु आदिका प्रत्यक्षज्ञान करनेवाला
सर्वज्ञ होना चाहिये। एवं, वह नित्य और अशरीरी भी इसीसे सिद्ध
हो जाता है।
यदि कहो कि—पूर्वोक्त दोष न होनेपर भी जन्यत्व हेतु शरीरा-
जन्यत्व हेतुके साथ सत्प्रतिपक्षित हो जाय। अर्थात् “क्षित्यादिकं
सकर्तृकं जन्यत्वात्" इस अनुमानका प्रतिपक्षी अनुमान होगा ‘क्षित्या-
दिक न सकर्तृकं, शरीराजन्यत्वात्”। अत शरीरसे उत्पन्न नहीं होनेके
कारण पृथिवी आदिका कोई कर्ता नहीं है—तो ऐसा नहीं कह सकते।
क्योंकि उक्त प्रतिपक्षी अनुमानके शरीराजन्यत्व हेतुमे शरीरविशेषण
असमर्थ है अर्थात् व्यभिचारका निवारक नहीं है। अतः शरीराजन्यत्व
हेतु व्याप्यत्वासिद्ध है। कारण, हेतुमें कोई भी विशेषण देनेका प्रयोजन