आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
मवश्यनिश्चेयमभ्युपेयते । अज्ञातप्रामाण्येन कथं परप्रामाण्य-
वेदनमिति चेत्, यथा विषयसंवेदनम् ।
अस्तु तर्हि धर्मिलिङ्गद्वारिका, ताभ्यामनिश्चिताभ्याम-
ननुमानात्, तन्निश्चयस्य च प्रामाण्यनिश्चयमन्तरेणानुपपत्तेः,
द्वारा वर्तमान ज्ञानमें प्रामाण्य निश्चय कर लेनेपर पुनः उस अनुमितिमे
प्रामाण्य-निश्चय करने के लिये अनुमानान्तर करना कोई आवश्यक
नहीं है ।
यदि कहो कि—उस अनुमितिमे प्रामाण्यका ज्ञान हुए बिना उसके
द्वारा वर्तमान ज्ञानमे प्रामाण्यका कैसे निश्चय हो सकता है ? क्योंकि
जो स्वयं अप्रमाण है वह दूसरेको प्रमाण कैसे सिद्ध कर सकता है ? तो
इसका उत्तर यह है कि जिस प्रकार 'अय घट " यह व्यवसायात्मक
ज्ञान अपना प्रामाण्य निश्चय हुए बिना ही घटवस्तुका निश्चय करा देता
है, वैसे ही अनुमिति भी अपना प्रामाण्य निश्चय हुए बिना ही पक्षभूत
ज्ञानमे प्रामाण्यका निश्चय करा देती है ।
यदि कहो कि—दृष्टान्तको या फलको लेकर भले ही अनवस्था न हो
किन्तु धर्मी और लिङ्ग (हेतु) कोलेकर तो अनवस्था होगी ही ।
क्योंकि धर्मी (पक्ष) का तथा लिङ्ग (हेतु) का निश्चय हुए बिना
प्रामाण्यानुमिति नहीं हो सकती है । एवं धर्मी और लिङ्गका निश्चय
तभी होगा जबकि धर्मिविषयक और लिङ्गविषयक ज्ञानमे भी प्रामाण्य
का निश्चय हो जाय । और वह प्रामाण्य निश्चय भी न्यायमतानुसार
स्वतः न होकर अनुमानान्तरसे होगा । तथा उस अनुमानान्तरमे भी
जो पक्ष और हेतु होगा, उसके निश्चयके लिये उसके ज्ञानमें भी
प्रामाण्यका निश्चय उसे अपेक्षित होगा तथा उस प्रामाण्यके निश्चयार्थ
भी नैयायिकको पुनः अनुमानान्तरकी शरण लेनी पडेगी । इस प्रकार
पक्ष और हेतुके निश्चयको ही लेकर अनवस्थादोष पहुँच जाता है—
यह आक्षेप नहीं दे सकते । क्योंकि प्रामाण्यानुमितिमे हर जगह ज्ञान ही
पक्ष और हेतु रहता है तथा उस ज्ञानका ज्ञान अनुव्यवसायरूप है और
अनुव्यवसायमें प्रामाण्य-अप्रामाण्यका द्वैत होता ही नहीं है । अर्थात्
अनुव्यवसाय सदा प्रमाण ही होता है । अत उस अनुव्यवसायमें
३१० आत्मतत्त्वविवेके
न, द्वैताभावात् । यत्र हि लिङ्गज्ञाने धर्मिज्ञाने वा तथ्यातथ्य-
भावेन द्वैतमुपलभ्यते तत्र तथात्वानिश्चये लिङ्गमाभासशङ्का-
क्रान्ततया न निश्चीयते । यत्र तु तज्ज्ञानं तदेकनियतं तत्र
तावतैव लिङ्गनिश्चयः, तदाभासशङ्कानुत्थानात् । एककोटि-
नियतो ह्यनुभवो निश्चयः । ज्ञानतद्धर्मग्राहिणि च ज्ञाने न
द्वैतमिति व्यवस्थितिरेव । प्रामाण्यनिश्चयस्तु तस्यापि परत
एवेति न्यायसंप्रदायः । इत एव विशेषात् तादृशस्य स्वतः
एवेति तात्पर्याचार्याः ।
अप्रामाण्यकी आशङ्का ही नहीं रहती है। इसीलिये उसमें न प्रामाण्य-
ग्रहकी अपेक्षा होती है और न उसके लिये अनुमानान्तर करनेकी
ही आवश्यकता पड़ती है। अतः अनवस्थादोष नहीं है।
जहाँपर लिङ्गज्ञान या धर्मिज्ञानमें प्रामाण्य-अप्रामाण्यका द्वैत होता
है, जैसे धूमादिज्ञानसे अग्निविषयक अनुमानस्थलमें, वहीं पर लिङ्गादि-
ज्ञानमें प्रामाण्यका निश्चय नहीं रहने पर अप्रामाण्यकी शङ्कासे ग्रस्त
होनेके कारण वहां लिङ्गका निश्चय नहीं हो पाता है। अतः वहां
लिङ्गादिके निश्चयार्थ प्रामाण्यानुमिति करनी पड़ेगी। किन्तु जहांपर
लिङ्गादिज्ञान नियतरूपसे प्रमाण ही रहता है, जैसे, ज्ञानपक्षक प्रामाण्या-
नुमिति स्थलमें ज्ञानविषयकज्ञानरूप अनुव्यवसाय सदा प्रमाण ही रहत
है, वहाँपर उस अनुव्यवसायसे ही लिङ्गका निश्चय हो जाता है,
क्योंकि वहाँपर अप्रामाण्यकी शङ्का ही नहीं उठती है। कारण, एक
कोटिसे नियत जो अनुभव, वही तो निश्चय है। ज्ञानको और उसके
धर्म (प्रत्यक्षत्व, अनुमितित्व, शाब्दत्व, स्मृतित्व आदि) को ग्रहण करने
वाले अनुव्यवसायात्मक ज्ञान (प्रत्यक्षयामि, अनुमिनोमि, शाब्दयामि,
स्मरामि इत्यादि) में प्रामाण्य-अप्रामाण्यरूप दो कोटियां नहीं होती हैं,
यह व्यवस्थिति ही है। यहाँ भी यदि हठात् प्रामाण्यका निश्चय करना
चाहें तो परतः ही अर्थात् अनुमानके द्वारा ही होगा न कि स्वतः, यह
न्यायका सिद्धान्त है। न्यायवार्तिकतात्पर्यटीकाकार श्रीवाचस्पतिमिश्र-
ने जो अनुमानको स्वतः प्रमाण कहा है, उसका भी यही आशय है कि
बाह्यार्थभङ्गवादः ३१९
स्यान्मतम्, एतदेव तु कथं निश्चेयं यदेवम्भूतमेक-
कोटिनियतमेव, यावता तत्राप्यनवस्थितिरिति चेन्न, व्याप्ति
ज्ञानस्य साक्षादात्मन्यप्रवृत्तावपि सर्वोपसंहारेण यमुपाधिमा-
दाय प्रवृत्तिस्तद्धर्मवत्त्वात्। तज्जातीयत्वं हि तत्रोपाधिस्तच्च
तत्राप्यविशिष्टमनुव्यवसायत्वात्।
जहाँ अप्रामाण्यकी आशङ्का ही न रहे, वहा प्रामाण्यानुमितिकी आव-
श्यकता नहीं है।
यदि कहो कि उक्त सिद्धान्त रहे, किन्तु यही कैसे निश्चय है कि
अनुव्यवसायमें एकमात्र प्रमाणकोटि ही नियत रूपसे है, उसमे अप्रा-
माण्य कभी नहीं रहता। इसलिए अनुव्यवसाय सदा प्रमाण ही होता
है, इस व्याप्तिकी सिद्धि भी किसी अन्य अनुमानसे ही करनी होगी।
तथा उस अनुमानके लिए पुन व्याप्तिज्ञान लिङ्गज्ञानादिकी आवश्यकता
पड़ेगी। एव उस व्याप्तिज्ञान आदिमे भी बिना प्रामाण्यानुमिति किये
काम नहीं चल सकता, इस प्रकार पुन अनवस्थादोष आ ही जाता है—
तो ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि व्याप्तिज्ञानकी साक्षात् (सीधे)
अपने बारेमे प्रवृत्ति नहीं होनेपर भी सबको संगृहीत करनेवाले जिस
धर्मको लेकर प्रवृत्ति होती है, वह धर्म स्वय उस व्याप्तिज्ञानमें भी है।
तज्जातीयत्व ही तो यहाँ उपाधि (धर्म) है और वह उसमे भी समान
ही है। क्योंकि अन्य अनुव्यवसायोम रहनेवाला अनुव्यवसायत्व धर्म
उस व्याप्तिज्ञानमे भी है। इस प्रकार अन्य अनुव्यवसायोमे नियतरूपसे
एकमात्र प्रामाण्यकोटिको सिद्ध कराता हुआ अनुव्यवसायत्व धर्म अनु-
व्यवसाय होनेने नाते अपनेमे भी वह नियम लागू कर लेगा। अर्थात्
जो जो अनुव्यवसाय होता है वह सब प्रमाण ही होता है, ऐसी व्याप्ति
अनुव्यवसायत्वावच्छेदेन१ गृहीत है। तथा वह अनुव्यवसायत्व जाति
स्वय इस व्याप्तिज्ञानमें भी है, अत अन्य अनुव्यवसायोँमें प्रामाण्यानुमिति
कराता हुआ अपनेमें भी प्रामाण्यग्रह करा ही लेगा, उसके लिए अति-
रिक्त अनुमितिकी आवश्यकता नहीं है। अत अनवस्थादोष नहीं आता।
१. अनुव्यवसायमात्र म ।
३१२ आत्मतत्त्वविवेके
न च सामान्यतो नियमनिश्चये तदालिङ्गिते विशेषे द्वैत-
शङ्कावकाशः । यथा वाचकः शब्द इति स्वात्मनो वाचकत्वं
न साक्षाद् विधत्ते वृत्तिविरोधात्, तथापि सामान्येन यमु-
पाधिमधिकृत्य प्रवृत्तः शब्दस्तद्वशात् शब्दशब्दो वाचको न
वेति शङ्कया न परिभूयते, नाप्यनवस्थेत्येवमिहापीति ।
तर्काश्चात्र भवन्ति—यदि धर्मिज्ञानं व्यभिचरेत्, निरा-
लम्बनमसद्धालम्बनं वा भवेत्, निषिद्धं च तत् । यद्यनुव्यव-
सायो व्यभिचरेत्, तदार्थककर्मकोऽपि न स्यात्, ज्ञानेतरस्यार्थ-
सामान्यरूपसे प्रामाण्यकी व्याप्तिका निश्चय हो जानेपर सामान्या-
न्तर्गत विशेषमे प्रामाण्य अप्रामाण्यरूप द्वैतकी शङ्काका अवसर ही नहीं
रहता है। जैसे, 'शब्द वाचक होता है' यह नियम अपने ('शब्द' इस
शब्दके) वाचकत्वके बारेमे साक्षात् विधान नहीं करता है, क्योंकि
अपनेमे अपनी वृत्ति (स्थिति) का होना विरुद्ध है। फिर भी सामान्य-
रूपसे जिस उपाधिको (शब्दत्वको) लेकर घटपटादिशब्द वाचक
होता है, वही शब्दत्वरूप उपाधि स्वयं शब्दशब्दमे भी है, इसलिये
"शब्दशब्द वाचक है या नहीं" यह शङ्का नहीं उठती और न अन-
वस्था ही आती है। वैसे ही सभी अनुव्यवसाय प्रमाण ही होता है, इस
नियममें भी अप्रामाण्य की शङ्का नहीं होगी तथा इस नियमकी सिद्धिके
लिये अलग व्याप्तिका और अनुमितिकी अपेक्षा नहीं होनेसे अनवस्था
भी नहीं होगी।
यहां उक्त व्याप्तियोंके पोषक तर्क भी हैं। अर्थात् धर्मिज्ञान
(ज्ञानरूप पक्षका ज्ञान) प्रमाण ही है, अनुव्यवसायात्मक ज्ञान प्रमाण
ही है तथा सजातीयज्ञान भी प्रमाण ही है, इन व्याप्तियोंके अनुकूल तर्क
भी हैं। जैसे, यदि धर्मिज्ञान व्यभिचारी (अप्रमाण) हो तो वह
निर्विषयक (बिना विषयका) होगा या असद्विषयक होगा। किन्तु ये
दोनों ही प्रकार पूर्वमें खण्डित हो चुके हैं। क्योंकि बिना विषयका
कोई ज्ञान होता ही नहीं है। तथा सर्वथा अलीकविषयक भी ज्ञान
नहीं होता। अन्यथा शशशृङ्गका भी ज्ञान होने लगेगा।
एवं, अनुव्यवसाय यदि व्यभिचारी (अप्रमाण) हो तो वह अर्थ- ।
बाह्यार्थभङ्गवादः ३१३
श्रावण्यभावात् । यदि तज्जातीयं व्यभिचरेत् , अव्यभिचारो
न क्वचिद् व्यवतिष्ठेत । तदव्यवस्थितौ व्यभिचारोऽपि न
स्यात् , अन्यथाख्यातिरूपत्वात्तस्य । तत्त्वस्थितौ च न्यथ त्वं
स्यात् , तदवधिकत्वात् ।
एतेन स्वप्नजागरावस्थयोरविशेष इति निरस्तम् । असत्-
ख्यातेश्च निराकृतत्वात्¹, अन्यथाख्यातेश्च तत्त्वख्यातिव्यव-
क॑र्मक भी नहीं हो सकेगा। अर्थात् वह घट आदि बाह्यविषयोंको
भासित नहीं कर सकेगा। क्योंकि अनुव्यवसायात्मक ज्ञान मानस है
और व्यवसायात्मक ज्ञानके विना मनकी सीधी पहुँच बाह्य विषयतक
नहीं है। अर्थात् इन्द्रियसन्निकर्षसे उत्पन्न व्यवसायात्मक ज्ञान अर्थको
विषय बनाता है और उस व्यवसायात्मक ज्ञानको विषय करनेके कारण
ही अनुव्यवसाय भी अर्थविषयक हो जाता है। अन्यथा अनुव्यवसाय
में अर्थभान होता ही नहीं। इससे सिद्ध हुआ कि अनुव्यवसाय ज्ञान
व्यवसायात्मक ज्ञानको अपना विषय बनानेके सम्बन्धमे सर्वथा अव्यभि-
चारी है। एवं, सजातीय ज्ञान भी यदि व्यभिचारी (अप्रमाण) हो जाय
तो अव्यभिचारनामकी वस्तु ही ससारसे उठ जायगी। और अव्यभि-
चारके अव्यवस्थित हो जाने पर व्यभिचार भी समाप्त हो जायगा।
क्योंकि अन्यथाख्याति ही तो व्यभिचार है। अतः जब तक कहीं
तात्त्विकता (अव्यभिचार) नहीं होगी, तब तक अन्यथात्वरूप व्यभि-
चारका भी व्यवहार नहीं हो सकता। क्योंकि अन्यथात्व तत्त्वसापेक्ष
होता है।
इस पूर्वोक्त तथ्यातथ्य विभागके व्यवस्थापनसे—स्वप्न और जागर
अवस्थाओंमें कोई भेद नहीं है—यह कथन भी खण्डित हो गया। अर्थात्
“जागरज्ञान भ्रान्त ज्ञानत्वात् स्वप्नज्ञानवत्” यह अनुमान भी खण्डित
हो गया। क्योंकि असत्ख्याति और आत्मख्याति का निराकरण किया
जा चुका है। अतः अन्यथाख्याति ही बच जाती है। तथा वह भी तत्त्व-
ख्यातिकी व्यवस्थाके बिना अनुपपन्न है। इसलिये तत्त्वख्याति (तथ्यज्ञान)
१. प्रतिषेधात् इति २ पु० पा०
३१४ आत्मतत्त्वविवेके
स्थानान्तरेणानुपपत्तेरिति । सा च यदि जागरेऽपि न स्यात्,
न स्यादेवेति ।
तथापि कथमनयोरवस्थयोर्विभागः कर्तव्य इति चेन्न,
लोकसिद्धत्वात् । किमनयोर्लक्षणमिति चेन्, कर्तृकर्मकरण-
कालप्रबन्धबाधः काकतालीयसंवादवान् स्वप्नस्य, प्रबन्धे
को भी मानना आवश्यक है । अत यदि वह तत्त्वख्याति जागर-अवस्था
में भी न हो तो वह कभी होगी ही नहीं । अर्थात् अन्यथाख्यातिकी
उपपत्तिके लिये जागरदशामें तत्त्वख्यातिको होना आवश्यक है । एवं
उक्त अनुमानके द्वारा क्या कुछ जागर-ज्ञानको भ्रान्त सिद्ध कर रहे
हो ? या सभी जागर ज्ञानको ? यदि कुछको भ्रान्त सिद्ध करो तो ऐसा
हम भी मानते हैं । अतः उक्त अनुमानमे सिद्धसाधनदोष आ जाता
है । यदि सभी जागर-ज्ञानोंको भ्रान्त सिद्ध करो तो स्वयं यह तुम्हारी
अनुमिति ही जागरकालीन होनेसे भ्रमात्मिका हो जायगी । ऐसी
स्थितिमे जो अनुमिति स्वयं भ्रमात्मक है, वह जागर-ज्ञानोंको भ्रान्त
कैसे सिद्ध कर सकेगी ?
यदि कहो कि—यह अनुमिति भ्रान्त नहीं है—तो भी तुम्हारी
यह प्रतिज्ञा कि "सभी जागर-ज्ञान भ्रान्त ही होते हैं" इसीसे समाप्त
हो गयी ।
फिर भी यदि पूछो कि—इन स्वप्न-जागर अवस्थाओंमे भेद कैसे
किया जा सकेगा ?—तो यह नहीं पूछ सकते । क्योंकि स्वप्न-जागरका
भेद तो लोकसे ही सिद्ध है । यदि पूछो कि—इन दोनोंका लक्षण क्या
है ?—तो सुनो, कर्ता कर्म करण देश-काल आदि प्रबन्धों (उपकरणों)
का बाध होना और काकतालीय न्यायसे कुछका सही हो जाना यह
स्वप्नका लक्षण है । यहा काकतालीय इसलिये कहा कि सबका बाध हो
जाय तो स्वप्नकालमें निर्विषयक ज्ञान कैसे होगा ? उसके लिये कोई
विषय चाहिये । अन्यथाख्याति कैसे होगी ? उसके लिये कोई तत्त्व
भी चाहिये, आरोप कैसे होगा ? कोई आधार चाहिये । तथा जागने
पर कहीं कुछ सही भी क्यों निकल आता है ? इसी आशयसे
काकतालीय कहा ।
बाह्यार्थभङ्गवादः ३१५
काकतालीयः कस्यचिदेव विषयस्य बाधो जागरस्येति ।
एतेन बाध्यप्रबन्धोऽवस्थाविशेषः स्वप्नः, प्रबन्धबाधका-
दिर्बाध्यमानप्रबन्धान्तो जागरितमित्यपि द्रष्टव्यमित्येषा दिक् ।
तस्मात् तथ्यमेव विश्वम्, मन्दप्रयोजनत्वात्तु सत्वरैर्मु-
मुक्षुभिरुपेक्षितमिति युक्तमुत्पश्यामः ।
तर्हि नैयायिकानां जगत्परिरक्षणे कोऽयमभिनिवेशाति-
शय इति चेत्, सहसैव तदुपेक्षायां न्यायाभासावकाशे प्रमाण-
एवं, प्रायः सभी कुछ सही होना और काकतालीयन्यायसे कर्त्ता-कर्म
आदि उपकरणोंमें किसीका कभी बाध हो जाना—यह जागर-अवस्थाका
लक्षण है। यहां भी काकतालीयपद शुक्ति-रजत रज्जु-सर्प आदि भ्रमों
के अभिप्रायसे कहा।
इसी प्रकार—जिसमे कर्त्ता-कर्म आदि प्रबन्ध बाधित हों, ऐसी
विशेष अवस्था स्वप्न है। और पूर्व स्वप्नोपकरणोंका बाधक है
आदिमें जिसके, तथा भावी स्वप्नोंका प्रबन्ध बाध्यमानरूपसे है अन्तमें
जिसके, ऐसी विशेष अवस्था जागरित है—यह भी लक्षण समझना
चाहिये। इस प्रकार यह दिग्मात्र निर्देश किया गया। (किसी
किसी के मतानुसार नाडी और मनके संयोगसे उत्पन्न ज्ञान स्वप्न है
तथा उससे भिन्न ज्ञान जागर है। अथवा स्वप्नत्व मानसत्व व्याप्य
एक जाति है, ऐसे ही जागरत्व भी एक जाति-विशेष है।)
इसलिये निष्कर्ष यही हुआ कि संसार तथ्य ही है। उपनिषदभ्यास-
के द्वारा जिन्हें आत्मतत्त्वका साक्षात्कार हो गया है, ऐसे वेदान्ती तो
मोक्षकी शीघ्रतामें प्रपञ्चविचारको मन्द-प्रयोजन मानते हुए उससे
उदासीन हो गये—यह हम उचित समझते हैं। यदि पूछो कि—
नैयायिक भी मोक्षाभिलाषी हैं, फिर उनका जगत्की वास्तविकता सिद्ध
करनेमें यह विशेष आग्रह क्यों है?—तो यह आग्रह इस भयसे है कि
एक द्य एक विश्वकी उपेक्षा कर देनेपर असत् न्यायोंको अवसर मिल
३१६ आत्मतत्त्वविवेके
मात्र¹विप्लवो भवेत् । तथा च न्यायरुचिः प्रेक्षावान् न
तत्त्वमधिगच्छेदिति भियेति ॥
॥ इति बाह्यार्थभङ्गवादः ॥
जायगा और मननका आधारभूत प्रमाणमात्र ही विलुप्त हो जायगा ।
तथा श्रवणके बाद मनन करनेकी इच्छावाले बुद्धिमान् जन तत्त्वज्ञानको
नहीं प्राप्त कर सकेंगे ।
। इति बाह्यार्थभङ्गवादनिरास ।
१ 'न्यायमार्गविप्लवो इति १ पु० पा०
अथ गुणगुणिभेदभङ्गवादः
अस्तु तर्हि गुणगुणिनोरभेदान्नैरात्म्यम्, क्षणिकज्ञान-
मात्रपरिशेषादिति चेत्, उच्यते । अस्ति तावदिह दर्शन-
स्पर्शनाभ्यामेकार्थानुसन्धानम् । तदिदमेकैकविषयं वा स्यात् १
गुणगुणिभेदभङ्गवाद खण्डन
पूर्वपक्ष—यदि क्षणभङ्गवादके आधारपर अथवा बाह्यार्थभङ्गवादके
आधारपर नैरात्म्य नहीं हो सकता तो गुण और गुणीमे अभेदके कारण
ही नैरात्म्यकी सिद्धि हो जायेगी। अर्थात् गुणसे अतिरिक्त गुणीकी
सत्ता ही नहीं है। अतः ज्ञानरूप गुणसे भिन्न कोई गुणी भूत आत्मा
नहीं है। यही नैरात्म्यवादका अभिप्राय है। एव, स्वयंप्रकाश क्षणिक
विज्ञानोंके अलावा वेदान्तियोंके नित्यविज्ञानमें भी कोई प्रमाण नहीं है।
इसलिये क्षणिकविज्ञानको ही आत्मा कह सकते हैं। उससे अतिरिक्त
ज्ञानादिका आधारभूत आत्मा नहीं है, यह पर्यवसित हुआ।
समाधान—दर्शनक्रिया और स्पर्शनक्रियाके द्वारा एक ही वस्तुकी
उपलब्धि होती है, यह बात हम व्यवहारमें पाते हैं। जैसे, पहले देखकर
हम कहते है "यह घट है" वैसे ही बादमें छू कर भी कहते हैं कि "यह
घट है"। इससे सिद्ध होता है कि ज्ञानरूप-गुणसे भिन्न दर्शन स्पर्शन-रूप
उभयविध ज्ञानोंका आश्रयभूत एक अतिरिक्त आत्मा है। क्योंकि यदि
ज्ञान ही आत्मा होता तो वहा दो प्रकारका ज्ञान होनेसे आत्मा भी दो
होता। क्योंकि वहां एक आत्माने देखा और दूसरेने स्पर्श किया। ऐसी
स्थितिमें दूसरेके देखनेका प्रतिसन्धान दूसरेको नहीं हो सकता। अत
"जिसे मैंने देखा उसे ही मैं छू रहा हूँ" इस प्रकारका वस्तुकी एकताका
भान यहां नहीं होता। अतिरिक्त आत्मा माननेपर तो ज्ञानोंमे भेद
होनेपर भी चूँकि स्थायी आत्मा एक है, इसलिये वही दर्शनकालमें भी
था और स्पर्शनकालमें भी है। अत उसे यह प्रतिसन्धान (प्रत्यभिज्ञा)
हो सकता है कि जिसे देखा था उमे अभी छू रहा हूँ।
यह जो दर्शन-स्पर्शनरूप भिन्न क्रियाओंके द्वारा एक वस्तुका ग्रहण
३१८ आत्मतत्त्वविवेके
समुदायविषयं वा ? तदतिरिक्तविषयं वा ? वस्त्वनुरोध्याकार-
विषयं वा ? अलीकविषयं वा ?
न तावदाद्यः, न हि यदेव रूपं तदेव स्पर्श इति । न
च रूप त्वगिन्द्रियग्राह्यम् , अन्धस्यापि नीलादिप्रत्ययप्रस-
ङ्गात् । न चैकमेव वस्तु करणभेदेनान्यथा प्रथत इति युक्तम् ,
अनात्मकत्वप्रसङ्गात् , भेदाभेदव्यवस्थानुपपत्तेश्च ।
होता है, उसके सम्बन्धमें पूछना है कि यह चाक्षुष और स्पार्शन प्रत्यक्ष
केवल रूपको या केवल स्पर्शको विषय बनाता है ? अथवा रूप और स्पर्श
दोनोंके समुदायको ? अथवा इन दोनोंसे अतिरिक्त अवयवी को ? अथवा
वस्तुसे रहित ज्ञानका आकारविशेष वहा भासित होता है ? या शश-
शृङ्गवत् अलीकको विषय बनाता है ?
इनमें प्रथम कल्प नहीं हो सकता है । क्योंकि जो ही रूप है, वही
स्पर्श नहीं है, जिससे कि चाक्षुष और स्पार्शन उभयविध प्रत्यक्षावस्था-
में केवलरूपका ही या केवल स्पर्शका ही भान हो सके ! क्योंकि रूप
त्वगिन्द्रियका विषय नहीं है और स्पर्श चक्षुरिन्द्रियको विषय नहीं है ।
यदि वैसा होता तो अन्धेको भी नीलपीतादिका ज्ञान हो जाता और
दूरसे किसी वस्तुके शुक्लादिरूपके ग्रहणकालमे बिना छुये नेत्रसे ही
उसके उष्णत्व आदि का भी ज्ञान हो जाता ।
यह भी ठीक नहीं है कि—एक ही वस्तु इन्द्रियभेदसे भिन्न स्वरूपमें
भासित होती है । अर्थात् एक ही वस्तु चक्षुरिन्द्रियके द्वारा रूपत्वेन
और त्वगिन्द्रियके द्वारा स्पर्शत्वेन भासित होती है—क्योंकि रूपत्व और
स्पर्शत्व परस्पर विरोधी धर्म हैं, वे एक वस्तुमें साथ रह नहीं सकते,
बारी बारीसे रहेंगे—इसका कोई नियामक नहीं है । इसप्रकार उभय-
स्वरूपसे रहित होकर वह वस्तु शून्यात्मक हो जायगी । एव, यदि
परस्पर विरोधी धर्म एक जगह रहे तो वह धर्मी भी भिन्न हो जायगा ।
फिर भी यदि धर्मी अभिन्न ही रहे तो ससारसे भेदमात्रका उच्छेद हो
जायगा और भेद-अभेदकी व्यवस्था ही समाप्त हो जायगी ।
गुणगुणिभेदभङ्गवादः ३१९
नापि द्वितीयः, स हि एकदेशतया वा ? एककालतया
वा ? एककार्यतया वा ? एककारणतया वेति ?
न तावदुपादानरूपैकदेशसंभव, तयोः प्रतिनियतोपादा-
नत्वात् । संभवे वा तदेव द्रव्यमिति पर्यवसितं विवादेन ।
नाप्यधिकरणीभूतभूतलाद्याधारतया तत्संभवः, चक्षुषा ह्युपल-
भ्यमाने भूतले रूपविशेषे घटोऽपि चक्षुषैवोपलभ्यमानो रूप-
विशेषस्तदाधार इति शक्यते निश्चेतुम्, तयोरधरोत्तरभावे-
यह भी नहीं हो सकता कि—उक्त दर्शन-स्पर्शन क्रियाद्वारा एक अर्थ
के ग्रहणका अभिप्राय है "रूप और स्पर्शके समुदायका ग्रहण" अर्थात्
उक्त प्रतीतियोंमें रूप और स्पर्शका समुदाय ही विषय बन रहा है-कारण,
यहाँ रूप और स्पर्शका समुदाय बन ही नहीं सकता है । क्योंकि वह
समुदाय उपादानरूप एकदेशके कारण होगा ? या एक कालके कारण ?
या उपादेयरूप एक कार्यके कारण होगा ? अथवा एक समुदाय इसलिये
होगा कि रूप और स्पर्श दोनोंका एक ही कारण है।
इन कल्पोंमें प्रथम कल्प कि—उपादानरूप एकदेशके कारण रूप-
स्पर्शका एक समूह बन जायगा--नहीं हो सकता । क्योंकि दोनोंके
भिन्न भिन्न उपादान नियत हैं । अर्थात् तुम्हारे मतमें रूपका रूप ही
और स्पर्शका स्पर्श ही उपादान होता है, अत दोनोंका एक उपादान
असंभव है । यदि दोनोंका एक उपादान मेरे ही समान तुम्हारे मतमें
भी हो तो फिर वही गुणी द्रव्य सिद्ध हो गया । इस प्रकार गुणातिरिक्त
गुणी होनेमे विवाद ही समाप्त हो गया ।
यदि कहो कि-एक उपादानके कारण नहीं, किन्तु भूतलादिस्वरूप
एक अधिकरणके कारण रूप और स्पर्शका एक समुदाय बन जायगा--तो
यह भी नहीं संभव है । क्योंकि तुम्हारे मतमें गुणातिरिक्त गुणी नहीं
होनेसे चक्षुद्वारा उपलभ्यमान भूतल पृथक् गुणी न होकर रूपविशेष है,
और उसपर चक्षुद्वारा उपलभ्यमान घट भी पृथक् गुणी न होकर रूप-
विशेष ही है । इसप्रकार "रूपविशेषात्मक भूतलमें रूपविशेषात्मक घट
आश्रित है" इसका निश्चय चक्षुद्वारा कर सकते है, क्योंकि आश्रयाश्रयि-
३२० आत्मतत्त्वविवेके
नैकज्ञानसंसर्गित्वात्, तदधिकरणाः स्पर्शादयोऽपीति तु कस्य
प्रमाणस्य विषयः ? न हि स्पर्शादयश्चाक्षुषे चेतसि चकासति ।
त्वचोऽय व्यापार इत्यपि नास्ति, तथापि भूतलघटस्पर्शयो
राधाराधेयभावप्रतीते ।
न च समुदाययोस्तत्संभवः, परस्पराश्रयत्वप्रसङ्गात् ।
एकाधारतायां हि समुदायानुसन्धान समुदायानुसन्धाने
चैकाधारतानुसन्धानसम्भव इति । अनवस्थाप्रसङ्गाच्च, भूतल
भावसे दोनों ही एक चाक्षुष ज्ञानमें संपृक्त हैं। किन्तु "उसी भूतल-
रूप अधिकरणमे स्पर्शादि भी है" यह किस प्रमाणसे जान सकोगे ?
क्योंकि चाक्षुषज्ञानमे स्पर्शादिका भान हो ही नहीं सकता है। अत
भूतलरूप एकाधिकरणको लेकर रूप स्पर्शका एक समुदाय नहीं बन
सकता है।
यदि कहो कि-स्पर्शका भान त्वचाका व्यापार है-तो इससे भी
काम नहीं चलेगा। क्योंकि त्वचाके द्वारा भी भूतल और घटके स्पर्श
का ही अर्थात् स्पर्शविशेषात्मक भूतल और स्पर्शविशेषात्मक घटका ही
परस्पर आधाराधेयभाव प्रतीत होगा, न कि उनके रूपोंका भी। क्योंकि
रूपग्रहणमे त्वचा असमर्थ है। इसप्रकार पुनरपि रूप स्पर्शका एक
समुदाय नहीं बन सका।
यदि कहो कि-रूप स्पर्शादिका समुदायात्मक भूतल एव रूप
स्पर्शादिका समुदायात्मक घटमें परस्पर आधाराधेयभाव बन जायगा-
तो यह भी सम्भव नहीं है। क्योंकि तब अन्योन्याश्रयदोषका प्रसङ्ग हो
जायगा। कारण, एकाधारताकी प्रतीति होनेपर ही रूप स्पर्शका समुदाय
ही प्रतीत सकेगा और उक्त कथनानुसार जब रूप स्पर्शका समुदाय प्रतीत
हो लेगा तभी एकाधारताकी प्रतीति होगी, इस प्रकार अन्योन्याश्रयदोष हो
जाता है। साथ ही अनवस्थादोषका भी प्रसङ्ग हो जाता है। क्योंकि
जिस प्रकार भूतलात्मक एक आधारके कारण आधेयभूत घटको रूप
स्पर्शादिका समुदायात्मक सिद्ध करते हो, उसी प्रकार भूतलको भी रूप
स्पर्शादिका एक समुदाय मानते हो, सो किस आधारको लेकर वह (भूतल)
[गुणगुणिभेदभङ्गवाद ३२१]
स्यापि समुदायत्वं किङ्कृतमित्यनुयोगानिवृत्तेः ।
अत एव नैककालतयाऽपि, तयोरेककालतायां प्रमाणा-
भावात् । भावे वा रासभकरभयोरप्येककालतया समुदायत्व-
प्रसङ्गः, भेदाग्रहस्य प्रकृतेऽप्यसंभवात् ।
अतएव नैककार्यतयाऽपि, उपादेयरूपस्यैककार्यस्याभा-
वात् । एकोदकाहरणलक्षणार्थक्रियेत्याद्यपि न युक्तम्, रूपा
समुदायात्मक बनेगा ? यह प्रश्न रह ही जाता है । इसी प्रकार उस
आधारको भी रूप स्पर्शादिका एक समुदाय होनेके लिये पुनः किसी अन्य
आधारकी अपेक्षा होगी । इस प्रकार आधार-कल्पनाका कहीं अन्त न
होनेसे अनवस्थादोष हो जायगा ।
इसीलिये एककाल होनेके कारण भी रूप-स्पर्शका समुदाय नहीं बन
सकेगा, क्योंकि रूप स्पर्शादिके एककालिक होनेमे कोई प्रमाण नहीं है ।
यदि वे कदाचित् एककालिक हों भी तथापि एककालिक होनेके कारण
समुदाय माननेपर रासभ और करभको भी एककालिक होनेके कारण
समुदायात्मक मानना पडेगा । यदि कहो कि—समुदायात्मक होनेके
लिये भेदाग्रह अपेक्षित है, परन्तु रासभ और करभमे भेदग्रह रहनेसे वे
समुदायात्मक नहीं हो सकते—तो रूप-रसादिमें भी भेदका अग्रह नहीं
है, इसलिये उनका भी समुदाय नहीं सिद्ध हो सक्ता । अर्थात् वे समु-
दायात्मक नहीं हो सक्ते हैं ।
इसीलिये एक कार्यताके कारण भी रूप रसादिका समुदाय असंभव
है । क्योंकि रूप-रस स्पर्शादिका कोई एक कार्य ( उपादेय ) तुम्हारे
या मेरे मतमे नहीं होता । अर्थात् रूपादिको उपादान मानकर इनसे
कोई एक उपादेय ( कार्य ) नहीं उत्पन्न होता है । यदि कहो कि—
रूपाद्दिका कोई एक उपादेयरूप कार्य भले ही न हो किन्तु घटके रूपमे
समुदित जो रूपरसादिक हैं, उनको निमित्त मानकर उनसे पानीका
लानारूप एक कार्य तो होता ही है—तो यह भी युक्त नहीं है । क्योंकि
तुम्हारे मतमें उदक ( पानी ) भी रूपादिसे अतिरिक्त कोई एक वस्तु
नहीं है । यदि कहो कि—इसीलिये रूप रस-गन्ध-स्पर्शात्मक जल ही
२१
१२२ आत्मतत्त्वविवेके
व्यतिरिक्तस्योदकस्यानभ्युपगमात्, एकैकस्यानेकाहार्यत्वे
प्रमाणाभावात्, समुदायस्य चासिद्धेः ।
अतएव नैककारणतयाऽपीति । निमित्तमन्तरेण तु समु-
दायव्यवहारेऽतिप्रसङ्गः । तृतीये न विवादः ।
नापि चतुर्थः, स हि विज्ञाननयमाश्रित्य वा स्यात् ?
द्विचन्द्रादिवद् विसंवादाद् वा ? आद्ये तु रूपादिषु कः
पक्षपातः ?
रूपाद्यात्मक घटके द्वारा लाया जाता है—तो यहाँ एक एक कर अर्थात्
केवलरूपात्मक जल या केवल रसात्मक, गन्धात्मक अथवा स्पर्शात्मक
जल रूप रस स्पर्शाद्यनेकात्मक घटका आहार्य ( आनेय ) नहीं हो सकता
है । क्योंकि जो रूपका कार्य है वह स्पर्शादिका कार्य कैसे हो सकता
है ? यदि कहो कि—एक एक कर नहीं किन्तु रूपादिसमुदायात्मक
जल रूपादिसमुदायात्मक घटका आहार्य होगा—तो यह भी नहीं हो
सकता । क्योंकि इसी समुदायकी सिद्धिके लिये तुम्हारा सारा प्रयास
चल रहा है और वह अभी सिद्ध ही नहीं हो सका है ।
इसीलिये एक कारणकी वजहसे भी रूपरसादिकोंका एक समुदाय
नहीं बन सकता है । क्योंकि रूप आदि चारोंका कोई एक कारण ही
नहीं है । उक्त परिस्थितियोंमें यदि बिना किसी निमित्तके ही रूपादिक।
समुदाय व्यवहार मानो तो अतिप्रसङ्गदोष हो जायगा । अर्थात् भिन्न-
कालीनों और भिन्नदेशीयोंमे भी समुदायव्यवहार होने लगेगा ।
यदि तृतीय पक्षका आश्रयण करते हुए दर्शन स्पर्शनके द्वारा रूपादि
गुणोंसे अतिरिक्त वस्तुका ग्रहण मानो तो उसमें मुझे कोई विवाद नहीं
है । क्योंकि वह वस्तु ही तो गुणातिरिक्त गुणी है ।
यदि चतुर्थ पक्षका आश्रयण करते हुए वस्तुरहित ज्ञानके आकार
विशेषको ही उक्त चाक्षुष एवं स्पार्शन प्रत्यक्षोंका विषय मानो तो वह
भी नहीं हो सकता है। क्योंकि वह भी क्या विज्ञानवादको लेकर होगा ?
या द्विचन्द्रादिके समान विसंवादी (अर्थशून्य) ज्ञान मानकर होगा ?
यदि प्रथम (विज्ञानवाद) को स्वीकार करो तो रूपादिगुणोंके प्रति
गुणगुणिभेदभङ्गवादः ३२३
प्राप्तेरर्थक्रियास्थितेश्च न द्वितीयोऽपि । ते द्वे रूपादीना-
मिति चेत्, न तेषाम्, किन्तु तस्यैवेति किं न स्यात् ? बाध-
कादिति चेत्, न तावत् क्रमयौगपद्यविरोधो रक्तारक्तविरोधो
वा बाधकम्, निषिद्धत्वात्, क्षणिकपरमाणुरूपद्रव्येणाक्रा-
न्तेश्च । सम्बन्धाभाव इति चेत्, असम्बन्धस्तावदस्तु । कथं
तद्वत् प्रतीयत इति चेत्, तेषां तथोत्पादादिति परिहारोऽस्तु,
तत्रैव यथा शरीरं चेतनावदिति ।
क्यों पक्षपात है ? अर्थात् जैसे गुणी कोई वस्तु नहीं है, वैसे रूपादि
गुण भी कोई वस्तु नहीं हैं । इस प्रकार गुणीके साथ-साथ गुणोंका भी
विलोप ही तुम्हें मानना पड़ेगा ।
वस्तुकी प्राप्ति और उससे अर्थक्रिया ( प्रयोजनसिद्धि ) के होनेके
कारण द्वितीय पक्ष भी नहीं हो सकता है । यदि कहो कि—प्राप्ति और
अर्थक्रिया रूपादिगुणोंकी ही होती है—तो यहाँ यही क्यों न माना
जाय कि प्राप्ति और अर्थक्रिया रूपादिगुणोंकी नहीं होती है, किन्तु गुणी
द्रव्यकी ही होती है । यदि कहो कि—बाधकके कारण प्राप्ति और अर्थक्रिया
द्रव्यकी नहीं हो सकती—तो वह बाधक क्रमयौगपद्यका विरोधरूप या
रक्त-अरक्तका विरोधरूप नहीं हो सकता । क्योंकि इन दोनों बाधकोंका
पहले ही खण्डन किया जा चुका है । साथ ही जो स्थिर है, उसमें
क्रमयौगपद्यका विरोध तथा जो अवयवी होगा, उसमें रक्त अरक्तका
विरोध भले ही सम्भव हो किन्तु क्षणिक और निरवयव रूपादिगुण
वान् परमाणुमें ये दोनों ही बाधक नहीं हो सकते हैं ।
यदि कहो कि—गुणी तभी होगा, जब कि उसमें रूपादिगुण सम-
वाय सम्बन्धसे रहे । किन्तु यहाँ समवाय सम्बन्धका अभाव है । अतः
यही गुणी-द्रव्य होनेमें बाधक है—तो यहाँ सम्बन्धाभाव भले ही रहे,
इससे कोई क्षति नहीं है । यदि कहो कि—सम्बन्धके अभावमे रूपादि-
विशिष्टकी प्रतीति कैसे होगी ?—तो इसका उत्तर यही होगा कि रूपादि
गुणोंकी वैसी ही उत्पत्ति होती है, जिसमें सम्बन्धके बिना ही रूपादि-
विशिष्ट बुद्धि हो जाती है । जैसे, तुम्हें ही शरीरमें चैतन्यका समवाय
नहीं रहनेपर भी "शरीर चेतनावत्" यह प्रतीति होती है ।
३२४ आत्मतत्त्वविवेके
रूपादिभिरेव समस्तार्थक्रियासिद्धेः किं तदतिरिक्तद्रव्य-
कल्पनयेति चेन्न, तन्मात्रेणैव समस्तार्थक्रियासिद्धेः किं
रूपादिकल्पनयेत्यस्यापि वाचालवचसोऽवकाशप्रसङ्गात् । प्रती-
यमानत्वादिति चेन्, तुल्यम् ।
एतेनालीकविषयतापि निरस्ता ।
अभेदसाधनं बाधकमिति चेन्, किं तत् ? सहोपलम्भ-
नियम इति चेन्न, समसहोपलम्भनियमस्यासिद्धेः, पीतशङ्खोप-
लम्भादौ शैत्यानुपलम्भेऽपि शङ्खोपलम्भात् ।
यदि कहो कि—रूपादिगुणोंसे ही सम्पूर्ण अर्थक्रियायें (प्रयोजन)
सिद्ध हो जायेंगी, अत उनसे अतिरिक्त गुणी द्रव्यकी कल्पनाकी क्या
आवश्यकता है ?—तो ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि गुणातिरिक्त
द्रव्यसे ही समस्त अर्थक्रियायें सिद्ध हो जायेंगी, अतः रूपादिगुणोंकी
कल्पनाकी क्या आवश्यकता है ? ऐसा भी किसी वाचालको कहनेका
अवसर मिलने लगेगा। अर्थात् रूपादिगुणोंकी सत्ता भी लुप्त हो जायगी।
यदि कहो कि-गुणोंकी सत्ता तो उनकी प्रतीति होनेके कारण सिद्ध है—
तो वैसे ही गुणी द्रव्यको भी प्रतीति होती ही है, इसलिए द्रव्यकी भी
सत्ता सिद्ध ही है।
इससे पूर्वोक्त पञ्चम पक्ष भी खण्डित हो गया। अर्थात् उक्त चाक्षुष
और स्पार्शन प्रत्यक्ष यदि शशशृङ्गके समान अलीक (अत्यन्तासत्)
को विषय करें तो द्रव्यके समान ही रूपादिगुण भी अलीक ही हो
जायेंगे और गुणीके साथ-साथ गुणोंकी भी सत्ता लुप्त हो जायगी।
यदि कहो कि—अभेदका साधन ही गुणगुणिभेदका बाधक है—
तो वह (अभेदसाधन) क्या वस्तु है ? यदि कहो—गुण और गुणीकी
नियमत एक साथ उपलब्धि ही उनके अभेदका साधन है—तो यह नहीं
कह सकते। कारण, समानरूपसे नियमतः सहोपलब्धि असिद्ध है।
क्योंकि दोषवशात् जब पीतके रूपमें शङ्खकी उपलब्धि होती है,
तो वहाँ श्वेतगुणकी अनुपलब्धि होनेपर भी शङ्खद्रव्यका उपलम्भ
गुणगुणिभेदभङ्गवादः ३९५
नासौ शङ्खः, किन्तु शङ्ख इव, तैमिरिककेशवदिति चेत् ,
-अहो गुणवद्विद्वेषः ! यत् तैमिरिककेशाः करतलपरामर्शनिय-
तार्थक्रिययोरपायान्न सम्भवन्तीति व्यवस्थापयति, इह तु
तत्सम्भवेऽपि शुभ्रतामात्रानुपलम्भादिति ।
व्यापकत्वादिति चेत्, वस्तुनोर्व्याप्तिः ? उपलम्भयोर्वा ?
आद्ये न विप्रतिपत्तिः । न च व्यापकानुपलब्धिमात्रेण व्याप्य-
तदुपलब्धी निवर्तेते, दहनानुपलब्धौ धूमतदुपलब्ध्योरपि
निवृत्तिप्रसङ्गात् । तत्रापि किं न परिकल्पयसि 'धूम इवासौ
होता है। इस प्रकार गुण और गुणीकी समनियत रूपसे सहोपलब्धिका
नियम कहाँ रहा ?
यदि कहो कि—पीतताकी प्रतीतिदशामे वह शङ्ख ही नहीं है, किन्तु
शङ्खजैसा है। जैसे कि तैमिरिक केश वास्तविक केश नहीं रहता है, किन्तु
तिमिर ही केशजैसा प्रतीत होता है—तो यह कैसा तुम्हारा गुणवान्से
विद्वेष है कि तैमिरिक केशोंकी सत्ता इसलिए नहीं है कि वे करतलसे
पकड़े नहीं जाते और केशों द्वारा होनेवाली प्रतिनियत अर्थक्रिया उनसे
नहीं होती है, ऐसी व्यवस्था तुम्हीं करते हो तथा यहाँपर उस शङ्खका
करतलसे परामर्श एवं उससे अर्थक्रियाके होनेपर भी केवल श्वेतताकी
उपलब्धि नहीं होनेके कारण शङ्खको असत् कह रहे हो।
यदि कहो—शुभ्रता शङ्खकी व्यापिका है। अर्थात् शङ्खमें शुभ्रता
अवश्य रहेगी, इसलिये दोषवशात् या जैसे भी हो शुभ्रताकी अनुपलब्धि
होनेपर शङ्खकी भी निवृत्ति हो जायगी, तो यहाँ व्याप्ति-सम्बन्ध शुभ्रता
-और शङ्ख इन दोनों वस्तुओं में मानते हो अथवा शुभ्रताकी उपलब्धि
और शङ्खकी उपलब्धिमे ? पहले पक्षमे तो हमे कोई विवाद नहीं है।
अतः व्यापककी निवृत्तिसे व्याप्यकी निवृत्ति भले ही हो किन्तु व्यापककी
अनुपलब्धि मात्रसे व्याप्यकी और उसकी उपलब्धिकी निवृत्ति नहीं हो
हो सकेगी। क्योंकि वैसा होनेपर अग्निकी अनुपलब्धि होनेपर धूमकी
और उसकी उपलब्धिकी निवृत्ति होने लगेगी। अथवा शङ्खके समान
वहां भी क्यों नहीं कल्पना करते हो कि अग्निके नहीं दीखनेपर भी जो
३६६ आत्मतत्त्व...
न धूम' इति, पावकवत्तानुपलब्धेरिति ।
तस्मान्न व्यापकानुपलब्धेर्व्याप्यनिवृत्तिः, किन्तु व्यापक-
निवृत्तेः। सा चात्रासिद्धेति वाच्यम् , तदेतत्तुल्यं प्रकृतेऽपि ।
उपलब्धेस्तु व्याप्तिरिहैव भग्ना, श्वैत्यानुपलम्भेऽपि शङ्खोप-
लम्भादित्युक्तम् ।
स्यादेतत्, पीत एव शङ्ख उत्पन्न इति चेन्न, पुरुषान्त-
रेण श्वेतस्यैवोपलब्धेः । नाप्यसम एव सहोपलम्भनियमो
धूम दिखाई पड़ता है, वह धूमजैसा है न कि वास्तविक धूम है।
क्योंकि वहां अग्निमत्ताकी उपलब्धि नहीं हो रही है।
इसलिये तुम्हें यही कहना होगा कि "व्यापककी अनुपलब्धि होनेसे
व्याप्यकी निवृत्ति नहीं हो जाती है, किन्तु व्यापककी निवृत्ति होनेसे ही
व्याप्यकी निवृत्ति हो सकती है। किन्तु यहां अग्निकी अनुपलब्धि भर
है, उसकी निवृत्ति (अभाव) तो असिद्ध है। अतः अग्निकी अनुप-
लब्धिमात्रसे धूमकी निवृत्ति नहीं होगी" तो यही बात शङ्खके सम्बन्धमें
भी समझो। अर्थात् श्वेतताकी अप्रतीतिमात्रसे शङ्खकी निवृत्ति नहीं हो
जायगी। यदि द्वितीय पक्षके अनुसार व्यापक और व्याप्यकी
उपलब्धियोंमें व्याप्ति सम्बन्ध कहो, तो यह व्याप्ति भी यहीं टूट गयी।
क्योंकि श्वेतताकी उपलब्धि नहीं होनेपर भी शङ्खकी उपलब्धि होती
है। यह बात पहले कही जा चुकी है।
यदि कहो कि—यही हो कि पाण्डुरोगकी दशामें श्वेत शङ्खकी
सचमुच ही निवृत्ति हो जाती है और वहीं नया ही पीला शङ्ख उत्पन्न
हो जाता है—तो यह नहीं हो सकता। क्योंकि दूसरे पुरुषको,
जिसे कि पाण्डुरोग नहीं हुआ है, वह उजला ही शङ्ख उपलब्ध
होता है।
यह भी नहीं हो सकता कि—गुण गुणीका समनियतरूपमें नहीं
किन्तु असमनियतरूपमें ही साथ साथ उपलब्धिका जो नियम है, वही
गुण गुणीमें अभेद-सिद्धिका हेतु है—क्योंकि यह नियम भी व्यभिचरित
हेतुः, अनैकान्तात् । अभास्वरं रूपं भास्वरेण सह नियमे-
नोपलभ्यते भिन्नं चेति ।
देशाविच्छेद इति चेन्न, असिद्धेः देहदेहिभ्यामनैका-
न्ताच्च । न तयोरविच्छेदस्तदनुपलम्भेऽप्युपलम्भादिति चेत् ,
तुल्यम्, रूपायनुपलम्भेऽपि तद्गतामुपलब्धेः ।
है । जैसे, घटका अभास्वर ( नहीं चमकनेवाला ) रूप आलोकके
भास्वर ( चमकनेवाले ) रूपके साथ ही नियमत उपलब्ध होता है,
फिर भी घटका रूप और आलोकका रूप परस्परमे अभिन्न नहीं बल्कि
भिन्न ही हैं ।
यदि कहो कि—सहोपलब्भ के साथ साथ देशका भी विच्छेद नहीं
होना चाहिये । इसलिये घटरूप और आलोकरूपका सहोपलम्भ होनेपर
भी उनका देश भिन्न भिन्न है । अर्थात् घटरूपका देश ( आश्रय ) घट
है और आलोकरूपका देश आलोक है । अत भिन्न देश होनेके कारण
सहोपलम्भ होनेपर भी घटरूप और आलोकरूप परस्पर अभिन्न नहीं
होंगे । गुण गुणीका तो सहोपलम्भके साथ साथ देश भी एक है, इस
लिये इनके अभेदमें कोई बाधा नहीं है—तो देशाविच्छेद भी यहाँ
असिद्ध है । क्योंकि गुणका देश ( आश्रय ) द्रव्य है और गुणीका
( द्रव्यका ) देश उसका अवयव है । इस प्रकार देशका विच्छेद (भेद)
होनेके कारण गुण गुणीमे अभेद नहीं सिद्ध हो सकेगा । एव, देशा-
विच्छेद हेतु भी देह देहीमे व्यभिचरित है । अर्थात् देह और देहीकी
एक देशमे प्रतीति होनेपर भी अप्रकाशात्मक देह भिन्न है और स्वप्रकाश-
ज्ञानात्मक देही भिन्न वस्तु है । इस प्रकार देशाविच्छेद होनेसे अभिन्न
होनेका नियम यहीं व्यभिचरित हो गया ।
यदि कहो कि—देह देहीको लेकर उक्त नियम व्यभिचरित नहीं
होगा, क्योंकि देह देहीमे अविच्छेद ही नहीं है । कारण, देहका
अनुपलम्भ होनेपर भी "अहम्" रूपमे स्वप्रकाशज्ञानात्मक देहीका
उपलब्ध होता रहता है, इसलिये इनमें भेद होनेपर भी हमारे पूर्वोक्त
नियममे व्यभिचार नहीं है—तो यह बात गुण गुणीके लिये भी तुल्य
है । क्योंकि रूपादिको अनुपलब्धि होनेपर भी आधारभूत गुणीकी
? No, it's डorइ! If it's इ: इhas a loop and tail at the bottom. Does this letter have a loop and tail? No! It just ends likeड! Wait, could it be ड र स े? -> डरसे! Wait, why डरसे? Wait! Look at the word before it: Is it दृष्ट्या? Wait! Look at the first letter of that word: Does IT have a vertical stem? Wait, look at: दृ? Wait, could the phrase be: दृष्टबाधाके डरसे? No, it's too short. Wait, what if the word is: दृष्टहानिके डरसे? No, it's: द ृ ष ्ट... wait, look at the letters: दृ ष्ट के डरसे? Look at the letters between अर्थात्andदेह`:
दृष्टया(orहा?वा?)
Wait, look at letter 3: it isयwithा? Orा`र