आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
३८८ आत्मतत्त्वविवेके
अस्तु तर्हि क्षणमात्रस्थायी स्थूलोऽर्थ इति चेन्न, भाग-
भागिनोर्युगपदुपलम्भबाधितत्वात्, घटपटादिभङ्गे तन्तुकपा-
लादीनामुत्पाद समानोपादानतया सप्रतिघत्वव्याघाताच्चेति ।
सोऽयमधिकरणसिद्धान्तन्यायेन स्थूलत्वसिद्धौ क्षण-
भङ्गभङ्गः ।
यदि कहो कि—प्रत्यक्षत्वकी उपपत्तिके लिये स्थूल वस्तु रहे किन्तु
यह भी क्षणिक ही होगी—तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि अवयव
और अवयवी दोनोंकी एककालमे उपलब्धि होनेसे क्षणिकत्वका बाध
हो जाता है । अर्थात् जिस कालमें स्थूल अवयवीका प्रत्यक्ष होगा,
उस काल तक उसका अवयव भी साथ साथ विद्यमान रहेगा, अतः दो
क्षणपर्यन्त उस अवयवके अनुवर्तमान रहनेके कारण क्षणिकवाद वहीं
खण्डित हो गया । एव उत्पत्तिके अग्रिम क्षणमे ही जो घटपटादि नष्ट
हो गया उसका उपादान कारण तन्तु और कपालादि है । तथा वही
तन्तुकपालादि घटपटादिकी भङ्गावस्था मे उत्पन्न तन्तुकपालादिका भी
उपादानकारण है, क्योंकि तुम्हारे मतमे विसदृश सन्तान और सदृश
सन्तान दोनों ही मान्य हैं। ऐसी स्थितिमें एक ही तन्तुकपालादिमाल
घटपटादिका और भङ्गावस्था में उत्पन्न होनेवाली तन्तुकपालादिमालका
भी उपादानकारण होगी, किन्तु यह अनुचित है । क्योंकि समानदेशमें
दो मूर्तोंका रहना व्याहत है ।
इस प्रकार स्थूलत्वकी सिद्धि हो जानेपर अधिकरणसिद्धान्तके
न्यायसे क्षणभङ्ग ( क्षणिकत्व ) का भी अनायास भङ्ग ( खण्डन ) हो
जाता है । अर्थात् स्थूलत्व सिद्ध होता हुआ स्थैर्यको लेकर ही सिद्ध
होता है । क्योंकि पूर्वोक्तरीतिसे अवयव और अवयवीकी एक साथ
उपलब्धिकी दशामे जो स्थूलत्वकी उपलब्धि है, वही स्थिरत्व सिद्धिमे
पर्यवसित हो जाती है । यद्यपि जहाँ अनुमानद्वारा किसी वस्तुकी
सिद्धि करते समय पक्षधर्मताब्रलसे अन्य वस्तुकी सिद्धि हो जाती
है, वहीं अधिकरणसिद्धान्त लागू होता है, यहाँपर तो स्थूलत्वका
प्रत्यक्षद्वारा व्यवस्थापन किया गया है, अतः यहाँ अधिकरणसिद्धान्त
नहीं लागू होगा । फिर भी उसके तुल्य तो इसे कहा ही जा सकता
बाह्यार्थभङ्गवाद २८९
एतेन यत् सत् तन्निरवयवं यथा विज्ञानम्, संश्च विवादा-
स्पदीभूतो घटादिरिति निरस्तम् । विपर्यये बाधकाभावेन
व्याप्त्यसिद्धेः । यत् सत् तत्सावयवं यथा घटः, सच विज्ञान-
मिति चार्वाकपरिवर्तस्याप्यवकाशाच्च । समो वा समाधिः ।
ननु निरवयवमेव विज्ञानं स्वसंविदितरूपम्, घटस्य च
सावयवतायामद्यापि विवाद एव, तत्कथं परिवर्त ? कथं वा
समः समाधिरिति चेत्, शुष्कविवादस्य विज्ञानेऽपि दुर्निवारत्वात् ।
न हि कश्चित् कण्ठौष्ठपार्श्वजठरादिपरिहीनं पिठरमनुभवति ।
है । इसीलिये आचार्यने मूलमे 'अधिकरणसिद्धान्तन्यायेन' यहाँ
न्यायशब्दका प्रयोग तुल्यता सूचित करनेके लिये किया है ।
इस स्थूलत्व व्यवस्थापनके द्वारा—जो सत् है वह निरवयव होता
है, जैसे विज्ञान, प्रकृतमे विवादका विषय घटादि भी सत् है इसलिये
वह भी निरवयव होगा । अर्थात् अवयवहीन होनेसे अवयवी नहीं हो
सकेगा—यह अनुमान भी खण्डित हो गया । क्योकि विपर्ययमें कोई
बाधक नहीं होनेसे “जो सत् है वह निरवयव है” यह व्याप्ति ही
असिद्ध है । अर्थात् सत् होते हुए भी निरवयव नहीं होगा किन्तु
सावयव हो सकता है, इसमे कोई बाधक नहीं है ।
एव, जो सत् है वह सावयव है, जैसे घट, विज्ञान भी सत् है,
इसलिये वह भी सावयव होगा—इस प्रकार चार्वाक भी परिवर्त
(करवट) बदल सकता है । यदि चार्वाक का यह अनुमान अनुकूल
तर्कके अभावमें असाधक है, तो तुम्हारा अनुमान भी अनुकूल तर्क
नहीं रहनेसे साधक नहीं होगा । इस प्रकार दोनों अनुमानोंकी
समान गति है ।
यदि कहो कि—स्वयंप्रकाशरूप विज्ञान तो निरवयव ही है, और
घटके सावयव होनेमे तो अभी भी विवाद ही है । अतः उक्त प्रकारका
चार्वाकका उलटा अनुमान कैसे हो सकेगा ? और दोनों अनुमानोंकी
समान गति कैसे होगी ?—इसपर मेरा कहना है कि उक्त प्रकारका शुष्क
विवाद विज्ञानके बारेमें भी बेरोक होगा । कोई भी कण्ठ, ओष्ठ पार्श्व
१० आत्मतत्त्वविवेके
ास्तु वा सत्त्वात् सप्रतिघत्वसिद्धिर्बुद्धावप्रतिघत्वं वा घटा-
दाविति ।
अपि च स्वतन्त्रसाधनमिदं प्रसङ्गो वा ? न प्रथमः,
घटादिशब्देन स्थूलेतराणां रूपादीना परमाणूनां वा पक्षीकरणे
सिद्धसाधनात्, स्थूलमेकमभ्युपगम्य पक्षविधौ कालात्यया-
पदेशात्, अनभ्युपगमे त्वाश्रयासिद्धेरिति ।
ननु प्रामाणिकेऽभ्युपगमे बाधः स्यात्, सर्वथाऽनभ्युप-
गमे च श्रयासिद्धिः स्यात् । नचैवमत्रेति चेत् , तदेतन्नभ स्थल-
कमलपरिमलसाधनस्यापि साश्रयतामापादयदाश्रयासिद्धिदोष-
मोषायेत्यलमनेन ।
( पसली ) तथा जठर आदि अवयवोंसे रहित पिठर ( देहपिण्ड ) का
अनुभव नहीं करता है। अर्थात् देहादिके समान घटादि भी सावयव
ही है, इसमें कोई भी विवाद नहीं है। अन्यथा उसी सत्त्व हेतुसे
बुद्धिमें ( विज्ञानमें ) मूर्तत्वकी सिद्धि या घटमें अमूर्तत्वकी सिद्धि
हो जाय ।
एवं 'घट निरवयव है, सत् होनेसे, जैसे विज्ञान' यह स्वतन्त्र अनु-
मान है ? अथवा 'घट यदि सत् होता तो निरवयव होता, जैसे विज्ञान"
इस प्रकारका तर्क है ? इसमें प्रथम पक्ष नहीं हो सकता है। क्योंकि घट
आदि शब्दोंसे यदि स्थूलसे इतर रूपादि गुण या परमाणुओंको पक्ष करो
तो सिद्धसाधन दोष हो जायगा। क्योंकि रूपादिको या परमाणुको हम
भी निरवयव मानते ही हैं। यदि घट शब्दसे किसी स्थूलका पक्ष
बनाओ तो बाध दोष हो जायगा। क्योंकि जो स्थूल होगा, उसमें
निरवयवत्व बाधित है। यदि घटरूप पक्षको स्थूल भी न मानो तो
इसका अर्थ होगा--वह कुछ नहीं है। ऐसी परिस्थितिमें आश्रयासिद्धि
( पक्षासिद्धि ) दोषसे आपका अनुमान ग्रस्त हो जायगा।
यदि कहो कि-घटादिकी स्थूलताको प्रामाणिक मानेंगे तभी बाध
होगा तथा घटादिको सर्वथा न मानें तभी आश्रयासिद्धि होगी। यहाँ
तो ऐसा मानते नहीं, अतः उक्त अनुमान निर्दोष है-तब तो इस
बाह्यार्थभङ्गवादः २९१
पर्वतादिवल्लोकप्रसिद्धिसिद्धान् घटादीनुपादाय निरवयव-
त्वानुमानं स्यात्, अन्यथा ब्रह्मविवर्तादिविप्रतिपत्तिविहततया
दहनानुमानमपि पर्वतादौ न स्यादिति चेन्, नैवम्, अवि-
रोधात् । न हि ब्रह्मविवर्तादिसिद्धावप्याश्रयादयोऽन्यप्रकाराः
सम्भवन्ति¹ ।
तथा हि, सर्वत्रैव स्वप्नपर्वते स्वप्नधूमेन स्वप्नवह्निरेव
साध्यते, केवलं सांवृतेऽपि व्यवहारे सत्यानृतव्यवस्थाऽस्तीति
तस्यां निर्भरः कर्तव्यः । इह तु घटादिव्यपदेशेन स्थूल एव
यदि पक्षीकृतः, कथं निरवयवत्वेन साध्येन न विरोधः ?
रीतिसे आकाशकमलमें सुगन्धका अनुमान भी साश्रय हो जायगा।
और संसारसे आश्रयासिद्धिनामक दोष ही उठ जायगा। अतः
ऐसा न कहो।
यदि कहो कि—जैसे, लोकव्यवहारसे सिद्ध पर्वतादिको लेकर उसमें
अग्निका अनुमान होता है, वैसे ही लोकव्यवहारसे सिद्ध घटादिको
लेकर उसमें निरवयवत्वका अनुमान होगा। नहीं तो ब्रह्मविवर्तवाद
आदि विभिन्न मान्यताओंसे प्रतिहत होनेके कारण पर्वत भी गगन कमलके
समान ही हो जायगा और उसमें अग्निका अनुमान भी न हो सकेगा—
तो ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि पर्वतादिके ब्रह्मविवर्तादिरूप होने-
पर भी अग्निरूप साध्यके साथ कोई विरोध नहीं है। कारण, ब्रह्म
विवर्त आदि पक्षमें भी आश्रय (पक्ष) दूसरे प्रकारका हो और साध्य
तथा साधनादि दूसरे प्रकारके हों, ऐसा नहीं होता। अर्थात् ब्रह्मविवर्त-
रूप पर्वतमें ब्रह्मविवर्तरूप ही अग्निका अनुमान किया जाता है। अतः
पक्ष और साध्यादिमें कोई विरोध नहीं है।
जैसे, स्वाप्न-पर्वतमें स्वाप्न-धूमसे स्वाप्न-अग्निका ही साधन किया
जाता है। इस प्रकार केवल सांवृत (काल्पनिक) व्यवहारमें भी सत्य
और अनृतकी व्यवस्था है ही। अतः उस व्यवस्थाका आश्रय लेना
ही चाहिए। तुम्हारे अनुमानमें तो यदि घटादि-शब्दसे स्थूल
१. सन्ति इति १ पु० पा०
अथ परमाणुरेव१, कथं न सिद्धसाधनम् ? विप्रतिपन्नं
प्रति न तथेति चेत्, न वै कश्चित् परमाणूनां निरवयवत्वे वि-
प्रतिपद्यते । लोकव्यामोहनिवर्हणाय साधनमिति चेत्, तथापि
यं लोकः स्थूलमेकमुपलब्धवान् तस्य पक्षत्वे विरोध एव,
ततोऽन्यस्य पक्षत्वे सिद्धसाधनमेव । एकः स्थूलोऽयमिति
मिथ्येति चेत्, एतदेव तर्हि साध्यताम्, किमनेनाजागलस्तन-
कल्पेन सत्त्वेन । न च तत्रेदं शक्यमुपसंहर्तुम्, व्यधिकरण
पक्ष करते हो तो निरवयवत्व साध्यके साथ क्यो न विरोध होगा ? यदि
घट शब्दसे परमाणु ही पक्ष हो तो सिद्धसाधन दोष क्यों न होगा ?
यदि कहो कि—घटपदवाच्य ( परमाणु ) के निरवयव होनेमे
जिसको विप्रतिपत्ति है, उसके प्रति सिद्धसाधन नहीं होगा—तो पर-
माणुओंके निरवयव होनेमें किसीको भी विप्रतिपत्ति नहीं है । अत
उन्हें निरवयव सिद्ध करनेमे सिद्धसाधन होगा ही । यदि कहो—
परिक्षकोंको भले ही विप्रतिपत्ति न हो, कि तु लौकिकोंको तो है ही ।
अत घटपदवाच्यके सावयव होनका जो व्यामोह लौकिकोंमे है, उसे
मिटानेके लिये यह निरवयवत्वका साधन किया जा रहा है । इसलिये
सिद्धसाधन नहीं होगा—तो भी लोकने जिसे ( घटको ) एक स्थूलके
रूपमें जाना है, उसे यदि पक्ष करो तो निरवयव सिद्ध करनेमे विरोध ही
( बाध ही ) होगा । यदि स्थूलसे भिन्न ( परमाणु ) को पक्ष करो तो
सिद्धसाधन होगा ही ।
यदि कहो— लौकिकोंका “एक स्थूलोऽयम्” यह ज्ञान भ्रम है। अत
प्रमात्मक नहीं होनेके कारण उसके द्वारा निरवयवत्वानुमान बाधित
नहीं होगा—तो उस लौकिकज्ञानका मिथ्यात्व ही सिद्ध करो । अर्थात्
मिथ्यात्वका साधक जो हेतु हो उसीका उपन्यास करो । अजागलस्तनके
तुल्य निरर्थक इस सत्त्व-हेतुसे क्या लाभ ? यदि कहो—' स्थूलप्रत्ययो
मिथ्या सत्त्वात्' इस अनुमानद्वारा लौकिक स्थूल प्रतीतिको मिथ्या
सिद्ध करनेमें ही सत्त्व हेतुका उपयोग कर लिया जा सकता है—तो यह
१ परमाण्वादिरैव इति १ पु० पा०
[वाह्यार्थभङ्गवादः २९३]
त्वात् । तस्माद् येन रूपेण यस्य पक्षत्वं विवक्षितम् तेन सिषा-
धयिषितधर्मविरोधविवादाभ्यां तत्रानुमानप्रवृत्तिर्नातोऽन्यथेति ।
नापि द्वितीयः, विपर्ययापर्यवसानात् । न च विवाद-
विषयो निरवयवस्तस्मान् सन्निति विपर्ययः, न चैवं सावय-
वत्वं पक्षस्यानिच्छता प्रवर्तयितुं शक्यते । न च तत् त्वयेष्यते ।
न च तस्येष्टौ तेनासत्त्वं शक्यसाधनम् , आश्रयासिद्धेर्विरो-
भी नहीं हो सकता । क्योंकि तुम्हारे द्वारा प्रमा माने गये निर्विकल्पक
ज्ञानमें भी सत्त्व-हेतुके रहनेसे यह हेतु व्यभिचारी है । इसलिये
जिस रूपसे जो पक्ष हो, उस रूपसे जहाँ सिषाधयिषित धर्म ( साध्य )
का बाध न हो तथा संशय हो, वहीं अनुमानकी प्रवृत्ति हो सकती है
अन्यथा नहीं ।
प्रसङ्गरूप ( तर्करूप ) द्वितीय पक्ष भी नहीं हो सकता है । क्योंकि
तर्कमें विपर्ययमें पर्यवसान होना आवश्यक है, किन्तु यहां विपर्ययमें पर्य-
वसान नहीं हो सकता है । जैसे, "घट यदि सत् हो तो निरवयव हो"
इस तर्कका पर्यवसान इसी विपर्ययमें होगा कि—विवादका विषय घट
निरवयव नहीं है, इसलिये सत् भी नहीं है । किन्तु जो बौद्ध घटरूप
पक्षको सावयव नहीं चाहता, वह इस प्रकारके विपर्ययको नहीं
प्रवृत्त कर सकता है । तुझे तो घटका सावयवत्व इष्ट नहीं है ।
यदि इष्ट भी हो तो उससे ( सावयवत्वके द्वारा ) उसमें ( घटमें )
असत्त्वका साधन भी नहीं हो सकता है । क्योंकि यहां आश्रयासिद्धि,
विरोध और असाधारण्य दोष उपस्थित हो जायेंगे ।
अर्थात् "घटः असन् सावयवत्वात्" इस विपर्ययसिद्धिमें सावयवत्व-
हेतुका आश्रय ही तुम्हारे मतसे असत् है, अतः आश्रयासिद्धि दोष हुआ ।
यदि उस दोषसे बचनेके लिये आश्रयको सत् मानो तो "असन्" इस
साध्यके साथ विरोध हो जाता है । साथ ही सावयवत्व-हेतुके असत्-
रूपमें प्रसिद्ध शशशृङ्गादिरूप सपक्ष और सत् रूपसे प्रसिद्ध विज्ञान,
परमाणु आदि विपक्ष, दोनों ही से व्यावृत्त होने तथा घटादिरूप पक्ष-
मात्रमें वर्तमान होनेके कारण असाधारण्य दोष हो जाता है । एवं,
[Page Header: २९४ आत्मतत्त्वविवेके]
घादसाधारण्याद्वा । न च विपर्ययोऽपि परेष्या प्रवर्तत इति ।
कः पुनरवयविनि न्यायः ? तत् किं प्रत्यक्षात्न्यायो
गरीयान् ? यद्येवम्, बुद्धावेव१ कोऽसौ ? तस्मादसारमेतत् ।
तथापि, यन्निरस्तसमस्तविरुद्धधर्माध्यासं तदेकमेव व्यव-
हर्तव्यं, यथा विज्ञानम् । तथा च विवादाध्यासित एकस्थूलो-
ऽनुभवगोचर इति स्वभावहेतुः, तन्मात्रानुबन्धित्वादेकता-
व्यवहारस्य । न ह्ययमेकव्यवहारो निर्निमित्तोऽनियमप्रस-
घटको मैं सावयव मानता हूँ, इस आधारपर भी तुम विपर्ययका उपन्यास
नहीं कर सकते । क्योंकि दूसरेकी मान्यताके आधारपर विपर्ययकी
प्रवृत्ति नहीं हुआ करती है ।
अवयवीकी सिद्धिमें न्यायप्रदर्शन
प्रश्न—अवयवीके सम्बन्धमें प्रत्यक्ष अनुभव प्रमाणके रहनेपर भी
उसमे अनुमान प्रमाण क्या है ? बताओ ।
उत्तर—क्या प्रत्यक्षसे अनुमान श्रेष्ठ है ? यदि है तो तुम्हारे
विज्ञानमें भी क्या अनुमान है ? क्योंकि विज्ञानको तुम अनुमानके
बिना ही स्वसंवेद्य मानते हो । अतः उक्त प्रश्न सारहीन है । अर्थात्
अवयवीके बारेमें प्रत्यक्ष-अनुभवको सर्वथा दोषरहित सिद्ध कर चुका
हूँ । साथ ही अनुमानका अङ्गभूत व्याप्तिका ग्राहक प्रत्यक्ष ही है ।
इसलिये अवयवीमे प्रत्यक्ष अनुभव प्रमाणके रहते अनुमान प्रमाणकी
जिज्ञासाका कोई महत्त्व नहीं है ।
तथापि इसमें अनुमान भी यह है कि—जो समस्त विरुद्ध धर्मोंके
अध्याससे रहित है वह एक ही है, ऐसा व्यवहार करना चाहिये, जैसे
तुम्हारा विज्ञान । वैसे ही विवादका विषय तथा एक स्थूलके रूपमे अनु-
भवका गोचर (विषय) घट भी विरुद्धधर्माध्याससे रहित है । इस प्रकार
घटमें विरुद्धधर्माध्यासरहितत्व हेतु स्वभावतः है । क्योंकि एकत्वका
व्यवहार विरुद्धधर्माध्यासराहित्यमात्रकी अपेक्षा करता है । कारण,
१. बुद्धावपि कोऽसौ इति १ पु० पा०
बाह्यार्थभङ्गवादः २९५
ङ्गात्। नाप्यन्यनिमित्तः, द्रवकठिनशीतोष्णादावपि तथाव्यव-
हारप्रसङ्गात्।
अस्तु तर्हि बाह्येष्वर्थेषु नित्यसन्देहः तथ्यातथ्यविभाग-
स्याशक्यत्वादिति चेत्, न तावत् सर्वस्य यथार्थत्वादेव
विभागोऽनुपपन्नः, उत्तरविरोधात्। तथाहि, विपरीतमवगतं
मयेति लौकिकी प्रतिपत्तिः, अन्यथाख्यातिरिति च वैनयिकी
यथार्था न१ वा ? उभयथाऽप्युत्तरेण न सर्वथाथार्थ्यसिद्धिः।
घटमे यह एकत्व व्यवहार बिना निमित्तका नहीं है। क्योंकि निर्निमित्त
होनेपर अनियमका प्रसङ्ग हो जायगा। अर्थात् सर्वत्र एकत्व-व्यवहार
होने लगेगा। साथ ही एकत्व व्यवहारमे विरुद्धधर्मराहित्यके सिवा
कोई दूसरा निमित्त हो भी नहीं सकता। क्योंकि तब परस्पर विरुद्ध
द्रव और कठिन तथा शीत और उष्ण आदिमे भी एकत्व व्यवहार होने
लगेगा। अर्थात् जब यह सिद्ध है कि घटादिमे एकव्यवहारका कारण
विरुद्धधर्मका राहित्य ही है, तो इसीसे यह भी सिद्ध हो गया कि घट
नाना परमाणुरूप नहीं है, किन्तु एक अवयवीरूप है।
यदि कहो कि—बाह्य विषयोंके बारेमे नित्य सन्देहात्मक ही ज्ञान
रहे। क्योंकि ज्ञानके प्रमात्व और अप्रमात्वका विभाग तथा विज्ञानके
प्रामाणिकत्व और अप्रामाणिकत्वका विभाग ही नहीं किया जा सकता
है—तो यहाँ यह नहीं कह सकते कि सभी ज्ञान यथार्थ ही होते हैं, इस-
लिये यथार्थ अयथार्थका विभाग अनुपपन्न है। क्योंकि मेरे प्रश्नका जो
उत्तर दोगे, उसीसे तुम्हारे इस कथनका विरोध हो जायगा। जैसे—
विपरीतमवगतं मया (मैंने विपरीत समझ लिया) यह लौकिकज्ञान
(अपने ज्ञानकी विपरीतताका ज्ञान) अन्यथाख्याति (भ्रम) रूप है?
अथवा शास्त्राध्ययनसे उत्पन्न जो विनय अर्थात् विवेक, उसपर व्यवस्थित
होनेसे यथार्थ है? इस प्रश्नका दोनोंमे कोई भी उत्तर दो तो उससे
सब ज्ञानकी यथार्थता नहीं सिद्ध हो सकेगी। अर्थात् "विपरीतमवगत
मया" यह ज्ञान यदि मिथ्या हो तो सुतरा सिद्ध हो गया कि सभी
ज्ञान यथार्थ नहीं है, यदि यह ज्ञान यथार्थ हो और पूर्ववाला ज्ञान
१. अथवा वा इति १ पु० पा०
२९६ आत्मतत्त्वविवेके
शब्दसंलापमात्रमेतन्न प्रतीतिरिति चेन्न, विवादानुपपत्तेः ।
न हि व्यवहारमात्रे परीक्षकाणां विवादः, न च नायम-
स्तीति । शब्दार्थे विवाद इति चेत्, एवं सत्यप्रतीतस्य
निषेद्धुमशक्यत्वात् पराभिप्रायनिषेधार्थत्वाच्च विवादस्य,
अभ्युपगन्तृप्रतिषेद्ध्रोः प्रतिषेध्यप्रतीतिः कथं नास्तीति ?
न चान्यज्ञानादन्यत्र प्रवृत्तिसम्भवोऽतिप्रसङ्गात् । न च
सचमुच ही विपरीत हो तो भी सुतरां सिद्ध हो गया कि अयथार्थ ज्ञान
भी होता है । ऐसी स्थितिमे सभी ज्ञानको यथार्थ मानकर तुम्हारा
तथ्यातथ्यके विभागको असम्भव बताना असंगत है ।
यदि कहो कि—"विपरीतमवगतं मया" यह वाङ्मात्र है, कोई
प्रतीति नहीं है । अतः उससे यथार्थत्व-अयथार्थत्वका विकल्प नहीं
किया जा सकता है । अर्थात् विपरीतावगति ( अन्यथाख्याति ) यह
शाब्दिक व्यवहारमात्र है न कि कोई प्रतीतिरूप है—तो ऐसा नहीं कह
सकते । क्योंकि तब ख्यातियोंके सम्बन्धमे वादियोंका परस्पर विवाद
ही अनुपपन्न हो जायगा । कारण, शाब्दिक व्यवहारमात्रमें तो
परीक्षकोंको कोई विवाद नहीं है । ऐसा भी नहीं है कि ख्यातिसम्बन्धी
विवाद परीक्षकोंमे है ही नहीं ।
यदि कहो—'अन्यथाख्याति' शब्दमें तो सचमुच ही कोई विवाद
नहीं है, केवल उसके अर्थमे विवाद है । अर्थात् कोई उसे विशिष्ट ज्ञान
( रजतत्वविशिष्ट शुक्तिज्ञान ) मानता हुआ भ्रमरूप बताता है, तथा कोई
अगृहीत है भेद जिसमें ऐसा दो ज्ञान मानता है, एक पुरोवर्तीका
( शुक्तिका ) अनुभवात्मक और दूसरा रजतका स्मरणात्मक तो ऐसी
स्थितिमे जिसकी प्रतीति नहीं होगी उसका निषेध नहीं किया जा सकता ।
और दूसरेके अभिप्रायका निषेध करना ही विवादका प्रयोजन है । अतः
भ्रमरूप विशिष्टज्ञानका समर्थन करनेवाले नैयायिक तथा प्रतिषेध करने
वाले मीमांसक, दोनोंको ही विशिष्टज्ञानकी प्रतीति क्यों नहीं है ?
अर्थात् बिना ज्ञान हुए उसका निषेध नहीं किया जा सकता । अतः
प्रतिषेध्यरूपमे भ्रमात्मक विशिष्टज्ञान मानना ही पड़ेगा ।
एवं, अन्यज्ञानसे अन्यमें प्रवृत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि वैसा होनेपर
बाह्यार्थभङ्गवादः २९७
तज्ज्ञानसान्निध्यं नियामकमतिप्रसङ्गादेव । न च तत्सहितो
भेदाग्रहः, अग्रहप्राधान्ये भेदाविवक्षायां निवृत्तेरपि प्रसङ्गात्,
तद्धेतोरभेदाग्रहस्यापि विद्यमानत्वात् । नासौ निवर्तकः,
अपि तु भेदग्रह इति चेन्न, रजत एव नेदं रजतमिति कृत्वा न
निवर्तेत, भेदग्रहस्य तत्कारणस्याभावात् । भावे वा विपरीत-
घटज्ञानसे पटमे प्रवृत्ति होने लगेगी । अतः प्रकृतमे रजतज्ञानसे
पुरोवर्ती शुक्तिमें होनेवाली प्रवृत्ति तभी उपपन्न होगी, जबकि यहां केवल
रजतज्ञान न मानकर रजतत्वविशिष्ट शुक्तिज्ञान माना जाय । इसप्रकार
अन्यथाख्याति ( भ्रम ) सिद्ध ही हो गयी । यदि कहो—वहा शुक्तिमे
प्रवृत्तिका कारण है रजतज्ञानका शुक्तिज्ञानके सन्निहित होना । अर्थात्
रजतार्थी व्यक्ति शुक्तिमे इस कारण प्रवृत्त हो जाता है कि वहाँ रजतज्ञान
शुक्तिज्ञानके सहित है—तो अतिप्रसङ्गदोष हो जायगा । क्योंकि
कदाचित् पटज्ञानके सहित घटज्ञान हो तो घटार्थी व्यक्तिकी पटमे प्रवृत्ति
होने लगेगी ।
यदि कहो कि—रजतज्ञानसे शुक्तिमे प्रवृत्तिका कारण केवल शुक्ति-
ज्ञानका सान्निध्य ही नहीं है, किन्तु उसके साथ साथ शुक्तिमे रजतका
भेदाग्रह भी नियामक है । इसीलिये पटमे घटका भेदग्रह रहनेसे
घटार्थी व्यक्ति पटमे नहीं प्रवृत्त होगा—तो भेदाग्रहमे यदि अग्रह ही
मुख्य हो और भेद गौण हो तो यहा भेदकी जगह अभेदका अग्रह
मानकर रजतार्थीकी वहासे निवृत्ति भी होने लगेगी । क्योकि निवृत्ति
का कारण है, शुक्तिमें रजतका अभेदाग्रह, सो वहा अभेदका भी
अग्रह है ही। इस प्रकार शुक्तिरजत स्थलमे भेदका अग्रह होनेसे
यदि प्रवृत्ति मानो तो अभेदका भी अग्रह होनेसे निवृत्ति भी माननी
पडेगी ।
यदि कहो कि—अभेदका अग्रह निवृत्तिका कारण नहीं है, किन्तु
भेदका ग्रह निवृत्तिका कारण है—तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि
रजतमे ही 'नेदं रजतम्' इस ज्ञानके कारण जो निवृत्ति होती है, वह
नहीं हो सकेगी । क्योंकि निवृत्तिका कारण जो रजतभेदग्रह, उसका
वहां अभाव है । यदि वहां रजतमें रजतभेदग्रहका भाव मानो तो
२९८ आत्मतत्त्वविवेके
ख्यातिरभिन्ने भेदप्रत्ययात् । तस्मात् प्रवर्त्तकवन्निवर्त्तकोऽप्य-
ग्रह एव तेषां स्वीकर्त्तुमुचितः । तथा च स दोषस्तदवस्थ एव ।
अथ भेदः प्रधानम्, अङ्गमग्रहः, तदा सत्यरजतज्ञानाद्
रजते न प्रवर्त्तेत, इदमंशरजतांशयोर्भेदाभावादिति स्वय-
मूहनीयम् ।
प्रवृत्तिवत् प्रतिपत्तावप्युभयाग्रहस्तुल्य इति चेन्न, अप्र-
हस्त्यान्विवक्षितत्वात्, सामग्रीविशेषादेव तत्सिद्धेः । तत्त्वे-
विपरीतख्याति आ ही गयी । क्योंकि अभिन्नमें भेदकी प्रतीति हुई है ।
इसलिये प्रवर्त्तकके समान निवर्त्तक भी अग्रहको ही मानना उचित है ।
अर्थात् जैसे, भेदके अग्रहको प्रवर्त्तक मानते हैं, वैसे ही अभेदके अग्रहको
निवर्त्तक भी मानना चाहिए । इस प्रकार शुक्ति रजतस्थलमे उक्त दोष
पूर्ववत् रह ही गया । अत भेदके अग्रहके साथ अभेदका भी अग्रह
होनेसे प्रवृत्तिके साथ ही निवृत्ति भी होने लगेगी ।
यदि कहो कि—भेदाग्रहमें भी भेद ही मुख्य है और उसका अग्रह
गौण है और ऐसा ही भेदाग्रह प्रवृत्तिका कारण है । अर्थात् जहां
वास्तविक भेद हो वहाँ उसके अग्रहसे प्रवृत्ति होगी, जैसे शुक्ति रजत
स्थलमे । अत पूर्वमें दिया गया निवृत्तिका प्रसङ्ग नहीं होगा, क्योंकि
अग्रहकी प्रधानता है नहीं—तो इस पक्षमें सत्य रजतज्ञानसे रजतमे
प्रवृत्ति नहीं होनी चाहिये । क्योंकि वहाँ इदमंश और रजतांशमें
वास्तविक भेद कहाँ है कि उसके अग्रहसे प्रवृत्ति हो सकेगी । यह तो
स्वयं विचार कर सकते हो ।
यदि कहो कि—भेदके अग्रहसे होनेवाली प्रवृत्तिके साथ ही जैसे
अभेदके अग्रहके कारण निवृत्तिका भो प्रसङ्ग दिया जा रहा है, वैसे ही
उक्त दोनों अग्रहोंके कारण परस्पर विरोधी आरोपात्मक ज्ञान भी एक
साथ होना चाहिये । अर्थात् जैसे भेदका अग्रह होनेसे शुक्ति रजतमे
अभेदका आरोप हो जाता है, वैसे ही उसी कालमें अभेदका भी अग्रह
होनेसे भेदारोप भी होने लगेगा और वहाँ प्रवृत्ति भी नहीं हो सकेगी—
तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि आरोपका कारण भेदका अग्रह नहीं
है किन्तु सामग्रीविशेषसे ही आरोप होता है । अर्थात् शुक्ति रजतमें
ऽपरिस्फुरतीति तु नियमः । न च क्वचिदपि भेदाभेदावुभावपि
तत्त्वं यतस्तथा स्यादित्येषा दिक् ।
नापि सर्वस्यायथार्थत्वात् , तद्ग्राहकस्य यथार्थत्वा-
यथार्थत्वाभ्यामुत्तरविरोधात् । तत् किञ्चित् प्रमाणं किञ्चिद-
प्रमाणमिति विभाग एव वस्तुगतिः । न चासौ प्रतीतिगति-
मनूद्य व्यवहारगोचरः ॥
अभेदारोपके प्रति दोष कारण है तथा उनमें भेदज्ञानके प्रति दोषाभाव
कारण है । अतः जब दोष और दोषाभावरूप कारण एक साथ नहीं
रह सकते तो अभेदारोप और भेदज्ञानरूप कार्य भी युगपत् कैसे होने
लगेंगे ? हा, आरोपके लिये यह नियम अवश्य है कि दोषके साथ साथ
वहाँ वस्तुतत्त्वका अस्फुरण भी रहना चाहिये । इसलिये जहाँ शुक्तित्व
का ज्ञान रहेगा, वहाँ चाकचिक्यादि-दोषके रहनेपर भी अभेदारोप नहीं
होगा । एव शुक्ति-रजतका भेद तात्त्विक है, इसलिये भेदका अस्फुरण
(अग्रह) भी अभेदारोपके लिये अपेक्षित है । किन्तु शुक्ति रजतका
अभेद तो अतात्त्विक है, इसलिये उसका अस्फुरण (अग्रह) भेदज्ञानके
लिये सर्वथा अनुपयोगी है । अतः अभेदका अग्रह होनेसे पूर्वोक्त भेद-
ज्ञान (भेदारोप) का प्रसङ्ग नहीं दे सकते । क्योंकि कहीं भी भेद
और अभेद दोनों तात्त्विक नहीं होते, जिससे कि वैसा प्रसङ्ग दिया जा
सके । इसका दिङ्मात्र निर्देश किया गया ।
“सभी ज्ञान अयथार्थ होते हैं, इसलिये तथ्यातथ्यका विभाग अनुपपन्न
है” यह भी नहीं कह सकते । क्योंकि अयथार्थत्वका ग्राहक जो ज्ञान
है, वह स्वयं यथार्थ है या अयथार्थ है ? इन प्रश्नोंका जो भी उत्तर दोगे
उससे तुम्हारे उक्त कथनका विरोध हो जायगा । अर्थात् अयथार्थत्वका
ग्राहक ज्ञान यदि स्वय यथार्थ हो तो वही एकज्ञान यथार्थ हो गया, फिर
सभी ज्ञान अयथार्थ कहाँ हुए ? यदि अयथार्थत्वका ग्राहक ज्ञान स्वय
अयथार्थ है तो उसका विषयभूत पूर्वज्ञात यथार्थ सिद्ध हो गया । इस
प्रकार सब ज्ञान अयथार्थ कहाँ हुए ? इसलिए कुछ ज्ञान प्रमाण (यथार्थ)
होते हैं और कुछ अप्रमाण (अयथार्थ) होते हैं, यही वस्तुस्थिति
है । साथ ही इस प्रकारका प्रमाण अप्रमाणका विभाग वैसी प्रतीतिके
३०० आत्मतत्त्वविवेके
कथन्ता तु निरूप्यते स्वतः परतो वेति । आद्ये स्वयं
स्वग्राहकेणेति¹ वा । तत्र न प्रथमः, स्वसंवेदनस्यासिद्धेः,
प्रकाशत्वस्यासाधारणत्वात् , शब्दसाम्येनानुमानाप्रवृत्तेः । न
बिना व्यवहारका विषय नहीं हो सकता । इसलिये यह पूर्वोक्त कथन
खण्डित हो गया कि—तथ्यातथ्य विभाग नहीं होनेसे बाह्यवस्तु नित्य
संदिग्ध है ।
ज्ञानप्रामाण्यका स्वतस्त्वनिराकरण
अब ज्ञानप्रामाण्यकी कथंताका विचार किया जाता है कि ज्ञानका
प्रामाण्य कैसे गृहीत होता है ? स्वतः या परतः । स्वतः पक्षमे भी
उस ज्ञानका प्रामाण्य स्वयं उस ज्ञानके द्वारा गृहीत होता है ? या उस
ज्ञानकी ग्राहिका सामग्रीके द्वारा ? उसमे प्रथम कल्प नहीं हो सकता ।
क्योंकि स्वका संवेदन ही असिद्ध है । अर्थात् ज्ञान अपना ही ग्रहण
नहीं कर सकता, स्वगत प्रामाण्यका ग्रहण तो दूरकी बात है । आशय
यह है कि धर्मिग्रहके बिना उसके धर्मका ग्रहण असम्भव है । यदि
अपना ग्रहण करे भी तथापि स्वधर्म ( प्रामाण्य ) का ग्रहण सर्वथा
असम्भव है । यदि स्वमें और स्वधर्ममें अभेद मानकर स्वग्रहणसे
स्वधर्मका भी ग्रहण हो तो प्रामाण्यके समान अप्रामाण्य भी स्वतःग्राह्य
होने लगेगा । किन्तु अप्रामाण्यको परतोग्राह्य मानते हो ।
यदि अनुमानसे सिद्ध करो कि—ज्ञान स्वप्रकाश प्रकाशत्वात्,
प्रदीपवत्—तो यहा प्रकाशत्व-हेतुका अर्थ तेजस्त्व मानो तो ज्ञानरूप
पक्षमें उसके नहीं होनेसे वह हेतु स्वरूपासिद्ध हो जायगा । यदि
प्रकाशत्वका अर्थ ज्ञानत्व लो तो वह पक्ष ( ज्ञान ) मात्रम रहनेके कारण
असाधारण हेत्वाभास हो जायगा । यदि प्रकाशत्वका अर्थ प्रकाशशब्द
वाच्यत्व लो तो उस न्यायसे गोपदवाच्य होनेके कारण गौके समान वाणी
भी विषाणी ( सींगवाली ) हो जायगी । इसलिए शब्दके साम्यके
आधारपर अनुमान नहीं हो सकेगा ।
यदि कहो कि—'ज्ञानवानह जानामि' इत्यादि प्रत्यक्ष अनुभव ही
ज्ञानके प्रकाश होनेमें प्रमाण है । क्योंकि उक्त अनुभवमें ज्ञान विषय
१ स्वग्राहकेण वेति १ पु० पा०
[पृष्ठ-शीर्षक: बाह्यार्थभङ्गवादः ३०१]
चाध्यक्षमेवात्र प्रमाणम्, सन्दिग्धभेदत्वात् ।
अप्रत्यक्षोपलम्भस्य नार्थदृष्टिः प्रसिध्यति, परेण परवेदने
ऽनवस्था स्यात् । न च क्रिया स्वसजातीयक्रियाकर्मभाव-
मश्नुते छिदावदिति तर्कपुरस्कारान्नैष दोष इति चेन्न—
उपलम्भापरपर्यायाया दृष्टेः सिद्धिर्निष्पत्तिर्वा स्यात् प्रती-
तिर्वा । आद्येऽनागतोपलम्भवेदनप्रसङ्गः, अनुपलब्धस्यानि-
रूपमें भासित होता है—तो उक्त अनुभव ग्राह्यज्ञानसे भिन्नरूप है ? या
ग्राह्यज्ञान ही है ? यह सन्दिग्ध होनेसे ज्ञानका स्वप्रकाशत्व भी सन्दिग्ध
ही है । अर्थात् "घटोऽयम्" इस ज्ञानसे उसका ग्राहक "जानामि"
यह ज्ञान भिन्न है, इसलिये "घटोऽयम्" इत्यादि ज्ञान स्वतोग्राह्य न
सिद्ध होकर परतोग्राह्य ही सिद्ध होता है ।
यदि कहो कि-ज्ञानका प्रत्यक्ष नहीं होनेसे अर्थदृष्टि ही (विषय-
ज्ञान ) असिद्ध हो जायगी और विषयमें प्रवृत्ति-निवृत्ति नहीं हो सकेगी ।
यदि दूसरे ज्ञानके द्वारा ज्ञानकी प्रतीति मानी जाय तो उस दूसरे ज्ञान-
की प्रतीति किसी तीसरे ज्ञानसे और तीसरेकी किसी चौथेसे, इस
प्रकार अनवस्था-दोष होनेसे वह प्रथम भी ज्ञान (घटोऽयम् इत्यादि )
सर्वथा असिद्ध हो जायगा और ज्ञानके बिना विषयकी ओर प्रवृत्ति नहीं
हो सकेगी । एवं कोई भी क्रिया अपनी सजातीय क्रियाका कर्म नहीं
होती है । जैसे, छिदाक्रियाका कर्म छिदा क्रिया नहीं होती किन्तु काष्ठ ही
कर्म होता है । क्योंकि "छिदां छिनत्ति" यह व्यवहार नहीं होता है ।
इस तर्कके आधारपर ज्ञानक्रिया भी किसी अन्य ज्ञानक्रियाका अर्थात्
अनुव्यवसायादिका कर्म नहीं हो सकेगी । इसलिये "जानामि" यह अनु-
भव ग्राह्यज्ञानसे अभिन्न ही है, ऐसा मानना चाहिये । अतः पूर्वमे जो
"जानामि" अनुभव तथा ग्राह्यज्ञानमें भेदको सन्दिग्ध बताकर दोष दिया
गया था, अर्थात् ज्ञानको परतोग्राह्य सिद्ध किया था, यह दोष नहीं है—
तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि अर्थदृष्टिका मानी है—अर्थका
उपलम्भ । अतः अर्थदृष्टिकी सिद्धिसे आपका क्या अभिप्राय है ?
अर्थोपलम्भकी उत्पत्ति या अर्थोपलम्भकी प्रतीति । प्रथम अभिप्राय
३०२ आत्मतत्त्वविवेके
ष्पत्तेः । न चाविद्यमानेनाविद्यमानस्योपलम्भ¹ इति स्वसंवि-
त्तावसंवित्तिरेवेति ।
द्वितीये तु सिद्धसाधनम् । न ह्यनुपलब्ध उपलब्धो
भवति । न चैवं सत्यर्थोऽपि नोपलभ्येत । न ह्युपलम्भप्रतीति-
रर्थवेदनमपि तूपलम्भनिष्पत्तिः । उपलम्भादृष्टावुपलम्भनिष्प-
लेनेपर जो उपलम्भ अभी अनागत हे (अभी उत्पन्न नहीं हुआ है),
उसका भी प्रत्यक्ष होने लगेगा । क्योंकि आपके अभिप्रायानुसार उप-
लम्भका प्रत्यक्ष हुए बिना उपलम्भकी उत्पत्ति ही नहीं हो सकती है।
अर्थात् विषयज्ञानकी उत्पत्तिके लिये पूर्वमें विषयज्ञानका प्रत्यक्ष होना
आवश्यक है, जो सर्वथा असंगत बात है । क्योंकि जो ज्ञान अभी पैदा
ही नहीं हुआ है, उसका पहले ही प्रत्यक्ष कैसे हो सकेगा ? कारण,
जिस ज्ञानका प्रत्यक्ष करना है, वह ज्ञान अभी अविद्यमान है तथा
स्वतोग्राह्यवादीके मतानुसार उस अविद्यमान ज्ञानका ग्राहक भी स्वयं
वही है । अतः अविद्यमान (स्वयं) से अविद्यमान (स्वयं) का ज्ञान
नहीं हो सकता है । इसलिए स्वतोग्राह्य माननेमे सर्वथा अग्राह्य हो जाने-
की स्थिति आ जाती है ।
द्वितीय अभिप्रायमें तो सिद्धसाधनदोष हो जायगा । अर्थात् अर्थ-
दृष्टिकी सिद्धिसे आपका अभिप्राय अर्थोपलम्भकी प्रतीतिसे हो तो
“अप्रत्यक्षोपलम्भस्य” इस कथनका यह अर्थ होगा कि - जब तक उप-
लम्भका प्रत्यक्ष (प्रतीति) नहीं होगा, तब तक अर्थोपलम्भकी प्रतीति
नहीं होगी—तो इसे मैं भी मानता ही हूँ । इस प्रकार सिद्धसाधनदोष
आ जाता है । क्योंकि अनुपलब्ध को हम भी उपलब्ध नहीं बताते हैं।
अर्थात् प्रतीतिकी दशामें ही हम भी प्रतीति मानते हैं, न कि अप्रतीति-
की दशा में । यहाँ यह नहीं कह सकते कि—अर्थज्ञानका ज्ञान हुए
बिना अर्थका भी ज्ञान नहीं हो सकेगा—क्योंकि ज्ञानका ज्ञान होना
अर्थज्ञान नहीं है, किन्तु ज्ञानकी निष्पत्ति (उत्पत्ति) होना अर्थज्ञान है ।
यदि कहो कि—ज्ञानका ज्ञान हुए बिना ज्ञानोत्पत्ति हुई है, यह
व्यवहार ही कैसे होगा ?—तो ज्ञानकी उत्पत्तिका जो व्यवहार होना है,
१. वेदनमिति अ. ...
वाह्यार्थभङ्गवादः २०३
स्तिरित्येव व्यवहारः कुत इति चेत्, मा भूत्, न ह्यव्यवहारा-
देव निष्पन्नस्य वस्तुनो निवृत्तिः । तथा च तन्निबन्धनोऽर्थ-
व्यवहारो दुर्वार एव१ ।
न चानवस्था, अवश्यवेद्यत्वानभ्युपगमात्, निश्चयवत् ।
अन्यथा त्वनिश्चितनिश्चयस्यार्थनिश्चयोऽपि न सिध्येत् । न
यह भले ही मत हो, उससे कोई हानि नहीं है। क्योंकि केवल अव्यव-
हारके कारण उत्पन्न वस्तुकी निवृत्ति नहीं हो जाती है। अर्थात् ज्ञानका
ज्ञान नहीं होनेसे उस ज्ञानकी उत्पत्तिमे कोई रुकावट नहीं आती तथा
अर्थज्ञान उत्पन्न होनेके बाद होनेवाले अर्थसम्बन्धी ग्रहण या परित्यागरूप
व्यवहारमें भी कोई रुकावट नहीं हो सकती है। अर्थात् अर्थसम्बन्धी
व्यवहारके लिए भी अर्थज्ञान ही अपेक्षित है न कि अर्थज्ञानकी प्रतीति ।
यदि ज्ञात ज्ञान ही अर्थसम्बन्धी व्यवहारके योग्य माना जाय तो भी
ईश्वरद्वारा ज्ञात होनेसे ही काम चल जायगा, हम लोगोंके द्वारा ज्ञानका
ज्ञात होना व्यवहारके लिये आवश्यक नहीं है।
ज्ञानको परतो ग्राह्य माननेमे जो अनवस्था दोष दिये हो, वह भी
दोष नहीं हो सकता है। क्योंकि "सभी ज्ञान अवश्य वेद्य ही हैं"
यह मैं नहीं मानता।२ एवं ज्ञानका ज्ञान हुए बिना यदि अर्थका ज्ञान
भी असिद्ध हो जाय तो निश्चयका निश्चय नहीं होनेसे अर्थका भी
निश्चय नहीं हो सकेगा। क्योंकि स्वप्रकाशवादीके मतमे भी निश्चया-
त्मक ज्ञान अपने निश्चयत्वका निश्चय नहीं करता है। अर्थात् स्थाणु-
पुरुषादिके सन्देहस्थलमे स्थाणुत्व सूचक विशेषका दर्शन होनेपर जो
निश्चयात्मक ज्ञान होता है, वह अपने निश्चयत्वका निश्चय नहीं कराता
१. इति इति २ पु०, पा०
२. यद्यपि स्वसंयुक्तसमवायरूप-प्रत्यासत्तिके रहनेसे ज्ञानके अवश्य वेद्य होनेमे
कोई बाधा नहीं है, फिर भी सुखादि-सामग्रीके बलवती होनेसे सदा
ज्ञानका ज्ञान नहीं हो सकेगा । यदि हो तो सुखादिका अनुभव ही
कभी न हो पायेगा । एव, जैसे रूपादि विशेषगुण उद्भूत और अनुद्भूत
दोनो होते हैं, वैसे ही ज्ञान भी विशेषगुण होनेके कारण उद्भूत (ज्ञात)
और अनुद्भूत (अज्ञात) दोनों ही होगा ।
३०४ आत्मतत्त्वविवेके
चासौ स्वात्मन्यपि निश्चय इति वधूमापमापनवृत्तान्त-
मनुहरति ।
छिदादिवदिति तु दृष्टान्तमात्रेण नास्मदवधानम् । "ज्ञानं
न ज्ञानान्तरकर्म, सजातीयक्रियात्वात्, या यज्जातीया क्रिया
नासौ तत्क्रियाकर्म, यथा छिदा छिदान्तरस्ये"ति तु न्याय-
विप्लवः । छिदावत् सर्वथा सजातीयाकर्मत्वे साध्ये बाधित-
विषयत्वात्, पुरुषान्तरज्ञानस्य च पुरुषान्तरज्ञानवेद्यत्वात्,
है, यह बात स्वप्रकाशवादी भी मानता है । ऐसी परिस्थितिमें यहाँ
ज्ञानके दृष्टान्तसे अर्थनिश्चय भी नहीं हो सकेगा। यह बात स्वतः
ग्राह्यत्ववादीको नहीं सूझती है । इस प्रकार यह उड़द मापनेवाली वधूके
वृत्तान्तके तुल्य है । अर्थात् जैसे उड़द तोलनेमें व्यग्र कोई वधू अपने
गुह्याङ्गको ढकने का ख्याल न रखे वैसे तुम भी ज्ञानको स्वप्रकाश सिद्ध
करनेकी व्यग्रतामे अपने ऊपर आनेवाले दोषाके समाधानका भी ख्याल
नहीं रखते हो।
जो तो छिदा क्रियाका दृष्टान्त दिये हो, उस दृष्टान्तमात्रसे हमें
सन्तोष नहीं हो सकता है । क्योंकि बिना हेतु दिये केवल दृष्टान्तमात्रसे
कुछ सिद्ध नहीं होता।
यदि कहो कि-ज्ञान अन्यज्ञानका कर्म नहीं हो सकता है, उसी
जातिकी क्रिया होनेके कारण, जो जिस जातिकी क्रिया होती वह उस
क्रियाका कर्म नहीं होती, जैसे छिदाक्रिया अन्य छिदाक्रियाका कर्म नहीं
होती है-तो यह न्याय नहीं है, न्यायाभास है। क्योंकि छिदाक्रियाके
दृष्टान्तसे ज्ञानमे भी सर्वथा सजातीय (ज्ञान) क्रियाका अकर्मत्व सिद्ध
करनेमे बाध नामक हेत्वाभास हो जाता है। क्योंकि अन्य पुरुषका
ज्ञान अन्यपुरुषीय ज्ञानका विषय होता है तथा अपना ज्ञान भी अपने
ही स्मरणात्मक आदि ज्ञानका विषय होता है। अर्थात् पूर्वमे उत्पन्न
अपने ही ज्ञानका बादमें अपनेको ही स्मरण आदि होता है। अत
ज्ञानके परतोग्राह्य होनेमें कोई अनुपपत्ति नहीं है।
यदि ज्ञानमे स्वकर्मत्व (स्वविषयत्व) सिद्ध करो तो छिदा आदि
सभी दृष्टान्तभूत क्रियायें स्वविषयत्वरूप साध्यसे बाधित हैं - - -
बाह्यार्थभङ्गवादः ३०५
स्वयमपि स्मृत्यादिगोचरत्वाच्च। स्वकर्मत्वे साध्ये दृष्टान्तस्य
साध्यविकलतया हेतोर्विरुद्धत्वादिति।
नापि स्वग्राहकेण, विवेचनानुपपत्तेः। न हि प्रमाण-
ग्रहणं यथार्थत्वैकनियतम्, अप्रमाणेऽपि प्रमाणाभिमानात्।
अन्यथा विपर्ययज्ञानादप्रवृत्तिप्रसङ्गाच्च।
ततो यदि प्रामाण्यमापाततः स्फुरेदपि, तथापि नियम-
हेतोरभावात् प्रमाणमेवेदमिति निश्चयः कुतः ? स च मृग्यते,
इसलिये वहाँका हेतु विरुद्धनामक हेत्वाभास हो जायगा। अर्थात् यह
ज्ञान उसी ज्ञानका विषय है, क्रिया होनेसे, छिदाके समान। इस
अनुमानमें दिया गया 'क्रियात्व' हेतु साध्यके विरुद्ध है। क्योंकि कोई
भी क्रिया अपना ही कर्म (विषय) नहीं होती है। जैसे, अपने ही
कन्धेपर कोई नहीं चढ़ सकता। इसलिये ज्ञान स्वप्रकाश (स्वतोग्राह्य)
नहीं हो सकता है।
यदि कहो कि—ज्ञानका ग्राहक जो अनुव्यवसाय या ज्ञाततारूप
लिङ्ग है, उसीके द्वारा ज्ञानगत प्रामाण्यका भी ग्रहण होता है—तो यह भी
नहीं कह सकते। क्योंकि अनुव्यवसायके द्वारा अथवा ज्ञाततारूप लिङ्ग
के द्वारा ज्ञानका ग्रहण होनेपर भी "वह ज्ञान प्रमाण ही है" ऐसा
निश्चयात्मक विवेचन नहीं हो सकता है। यदि कहो कि—अनुव्यवसाय
या ज्ञाततारूप हेतुसे उत्पन्न होनेवाली अनुमिति ही ज्ञानको प्रमाके रूपमें
भासित करायेगी—तो यह कोई नियम नहीं है कि जिस ज्ञानको हम प्रमा-
रूपमे समझेंगे, वह वस्तुतः यथार्थ ही हो, क्योंकि अप्रमामे भी प्रमाका
अभिमान हो जाया करता है। यदि ऐसा न होता तो भ्रमात्मक ज्ञानसे
कभी भी प्रवृत्ति नहीं होती। अर्थात् भ्रमात्मक ज्ञानमें जब प्रमात्वका
निश्चय हो जाता है तब वहाँ प्रवृत्ति देखी जाती है। यदि अप्रमामें
प्रमात्वका अभिमान असंभव होता तो उक्त भ्रमस्थलमें प्रवृत्ति होती ही
नहीं। अतः ज्ञानग्राहक सामग्रीके द्वारा प्रामाण्यका निश्चय नहीं हो
सकता है।
यदि ज्ञानग्राहक सामग्रीसे प्रामाण्यका आपाततः स्फुरण हो भी जाय
३०६ आत्मतत्त्वविवेके
पारलौकिकव्यवहाराङ्गत्वात्¹ । शङ्कानिवर्तनेन तदप्रत्यूहं
निश्चितमेवेति चेत्, तन्निवृत्तिरेव कुतः ? प्रमाणान्तरादिति
चेत्, तदपि निश्चयफलमन्यथा वेति । अन्यथात्वे न शङ्कावि-
च्छेदो निश्चयसाध्यत्वात्तस्य । निश्चयफलत्वे तु यो मृग्यते
नासौ स्वत इति ।
स्फुरणमात्रमपि तावदस्तु स्वत इति चेत्, किं तेन ?
न चैतदपि, अननुसंहितोपाधेरुपहितप्रत्ययायोगात् । न च
तो भी प्रामाण्य नियामक हेतुके बिना "यह प्रमात्मक ही है" यह निश्चय
कैसे होगा ? और प्रामाण्य निश्चयकी ही अपेक्षा है। क्योंकि प्रामाण्य-
निश्चय ही पारलौकिक व्यवहारोंका अङ्ग है। अर्थात् लौकिक प्रवृत्ति
जैसे तैसे (प्रामाण्य सन्देहमें भी) भले ही हो जाय, किन्तु पारलौकिक
प्रवृत्ति, जो बहुत व्यय और आयाससे साध्य है, प्रामाण्य निश्चयके बिना
कैसे हो सकेगी ?
यदि कहो कि-ज्ञानग्राहक सामग्रीसे ही प्रामाण्यका ज्ञान होगा, तथा
जिस किसी प्रकारसे अप्रामाण्यशङ्काकी भी निवृत्ति हो जानेसे निर्विघ्न-
रूपसे प्रामाण्य भी निश्चित ही हो जायगा-तो बताओ, अप्रामाण्य शङ्का
की निवृत्ति ही कैसे होगी ? यदि कहो-दूसरे प्रमाणसे-तो वह शङ्का-
निवर्तक प्रमाणान्तर प्रामाण्यका निश्चय करायेगा या नहीं ? यदि नहीं
कराये तो शङ्काकी निवृत्ति भी नहीं हो सकेगी। क्योंकि प्रामाण्य-
निश्चय होनेपर ही अप्रामाण्य शङ्का निवृत्त हो सकती है। यदि तो
वह प्रमाणान्तर ज्ञान प्रामाण्यका निश्चय कराये तो स्पष्ट ही है कि
जिस प्रामाण्य निश्चयकी अपेक्षा है, वह स्वतः (ज्ञानग्राहक सामग्री,
अनुव्यवसाय या ज्ञाततालिङ्गक अनुमानसे) न होकर प्रमाणान्तरसे
होता है।
यदि कहो कि-प्रामाण्यका निश्चय न हो सकनेपर भी प्रामाण्यका
स्फुरणमात्र भी स्वतः हुआ, उतनेसे ही प्रामाण्यमें स्वतःग्राह्यत्व सिद्ध हो
गया-तो उस प्रामाण्य स्फुरणसे क्या लाभ है ? जब कि उससे निष्कम्प
प्रवृत्ति नहीं होती है। साथ ही यह स्फुरण भी नहीं हो सकता है।
याथार्थ्यभङ्गवाद २०७
विषयोपधानमात्रं प्रामाण्यम्, तदाभाससाधारण्यात्, अपि
स्त्वनुभवस्य सतो भूतार्थानुसन्धानम् । न चार्थानुसन्धानेऽपि
तस्य भूतत्वमनुसन्धीयते, आरोपितत्वव्यावर्तकविशेषणाननु-
सन्धानात् , अननुसंहितस्य चारोपसाधारण्यात् ।
क्वचिद् विशेषोऽप्यनुसन्धीयत इति चेत् , न क्वापि प्राथ-
मिकेन । अन्यथाऽनभ्यासशायां तत्रापि संशयो न स्यात् ।
अभ्यासदशोल्पन्ने तु अनुसन्धानं व्याप्तिग्रहजनितसंस्कार-
क्योंकि ज्ञानके प्रमात्मक होनेमें विशेष्यावृत्त्यप्रकारकत्व ( विशेष्यमे
नहीं रहने वाला जो धर्म, उसका ज्ञानमें प्रकार नहीं होना ) उपाधि है ।
अतः उस उपाधिका भान हुए बिना प्रामाण्योपहित ज्ञानका भान नहीं
हो सकता है। केवल विषयका भान हो जाना ही प्रामाण्य नहीं है,
क्योंकि विषयके अभावमे भी विषयका भान हो जाया करता है।
किन्तु अनुभव होते हुए यथार्थभान होना ही प्रामाण्य है। केवल अर्थ
का (विषयका) भान होनेपर उसके वास्तविकत्वका भान तब तक
नहीं होता है, जब तक कि उसकी अवास्तविकताको दूर करने वाले
विशेषणों ( विशेष्यावृत्त्यप्रकारकत्व आदि ) का भान नहीं हो जाता ।
विशेषणका भान हुए बिना तो वह आरोपात्मक मिथ्याज्ञानके तुल्य है ।
यदि कहो कि - कहीं करतलादिज्ञानमे विशेष ( वास्तविकत्व ) भी
भासित ही हो जाता है - तो कहीं भी प्राथमिक ज्ञानके द्वारा अर्थात्
अनुव्यवसाय या ज्ञातता लिङ्गक अनुमानके द्वारा नहीं भासित होता ।
अन्यथा (प्राथमिकज्ञानसे ही यदि प्रामाण्यका भान हो तो ) अनभ्यास
दशामें ( पहले पहल ) उत्पन्न ज्ञानमें भी प्रामाण्यका संशय नहीं होना
चाहिये । अर्थात् जिस व्यक्तिको अग्निका परिचय बिल्कुल न है,
उसको किसीके कहनेपर जब अग्निज्ञान होता है, तब उसे उस ज्ञानके
प्रामाण्यका भी स्वयं ज्ञान हो जाना चाहिये । तथा उसे “यह ज्ञान
प्रमा है या अप्रमा है” ऐसा संशय नहीं होना चाहिये ।
यदि कहो कि - अभ्यासदशामें उत्पन्न जो करतलादि उसमे तो
प्रामाण्यका स्वतः ही निश्चय हो जाता है न कि प्रामाण्यका संशय होता