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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 338, कुल 530 में से

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पृष्ठ 338

बाह्यार्थभङ्गवाद २८९
एतेन यत् सत् तन्निरवयवं यथा विज्ञानम्, संश्च विवादा-
स्पदीभूतो घटादिरिति निरस्तम् । विपर्यये बाधकाभावेन
व्याप्त्यसिद्धेः । यत् सत् तत्सावयवं यथा घटः, सच विज्ञान-
मिति चार्वाकपरिवर्तस्याप्यवकाशाच्च । समो वा समाधिः ।
ननु निरवयवमेव विज्ञानं स्वसंविदितरूपम्, घटस्य च
सावयवतायामद्यापि विवाद एव, तत्कथं परिवर्त ? कथं वा
समः समाधिरिति चेत्, शुष्कविवादस्य विज्ञानेऽपि दुर्निवारत्वात् ।
न हि कश्चित् कण्ठौष्ठपार्श्वजठरादिपरिहीनं पिठरमनुभवति ।
है । इसीलिये आचार्यने मूलमे 'अधिकरणसिद्धान्तन्यायेन' यहाँ
न्यायशब्दका प्रयोग तुल्यता सूचित करनेके लिये किया है ।
इस स्थूलत्व व्यवस्थापनके द्वारा—जो सत् है वह निरवयव होता
है, जैसे विज्ञान, प्रकृतमे विवादका विषय घटादि भी सत् है इसलिये
वह भी निरवयव होगा । अर्थात् अवयवहीन होनेसे अवयवी नहीं हो
सकेगा—यह अनुमान भी खण्डित हो गया । क्योकि विपर्ययमें कोई
बाधक नहीं होनेसे “जो सत् है वह निरवयव है” यह व्याप्ति ही
असिद्ध है । अर्थात् सत् होते हुए भी निरवयव नहीं होगा किन्तु
सावयव हो सकता है, इसमे कोई बाधक नहीं है ।
एव, जो सत् है वह सावयव है, जैसे घट, विज्ञान भी सत् है,
इसलिये वह भी सावयव होगा—इस प्रकार चार्वाक भी परिवर्त
(करवट) बदल सकता है । यदि चार्वाक का यह अनुमान अनुकूल
तर्कके अभावमें असाधक है, तो तुम्हारा अनुमान भी अनुकूल तर्क
नहीं रहनेसे साधक नहीं होगा । इस प्रकार दोनों अनुमानोंकी
समान गति है ।
यदि कहो कि—स्वयंप्रकाशरूप विज्ञान तो निरवयव ही है, और
घटके सावयव होनेमे तो अभी भी विवाद ही है । अतः उक्त प्रकारका
चार्वाकका उलटा अनुमान कैसे हो सकेगा ? और दोनों अनुमानोंकी
समान गति कैसे होगी ?—इसपर मेरा कहना है कि उक्त प्रकारका शुष्क
विवाद विज्ञानके बारेमें भी बेरोक होगा । कोई भी कण्ठ, ओष्ठ पार्श्व