आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ परमाणुरेव१, कथं न सिद्धसाधनम् ? विप्रतिपन्नं
प्रति न तथेति चेत्, न वै कश्चित् परमाणूनां निरवयवत्वे वि-
प्रतिपद्यते । लोकव्यामोहनिवर्हणाय साधनमिति चेत्, तथापि
यं लोकः स्थूलमेकमुपलब्धवान् तस्य पक्षत्वे विरोध एव,
ततोऽन्यस्य पक्षत्वे सिद्धसाधनमेव । एकः स्थूलोऽयमिति
मिथ्येति चेत्, एतदेव तर्हि साध्यताम्, किमनेनाजागलस्तन-
कल्पेन सत्त्वेन । न च तत्रेदं शक्यमुपसंहर्तुम्, व्यधिकरण
पक्ष करते हो तो निरवयवत्व साध्यके साथ क्यो न विरोध होगा ? यदि
घट शब्दसे परमाणु ही पक्ष हो तो सिद्धसाधन दोष क्यों न होगा ?
यदि कहो कि—घटपदवाच्य ( परमाणु ) के निरवयव होनेमे
जिसको विप्रतिपत्ति है, उसके प्रति सिद्धसाधन नहीं होगा—तो पर-
माणुओंके निरवयव होनेमें किसीको भी विप्रतिपत्ति नहीं है । अत
उन्हें निरवयव सिद्ध करनेमे सिद्धसाधन होगा ही । यदि कहो—
परिक्षकोंको भले ही विप्रतिपत्ति न हो, कि तु लौकिकोंको तो है ही ।
अत घटपदवाच्यके सावयव होनका जो व्यामोह लौकिकोंमे है, उसे
मिटानेके लिये यह निरवयवत्वका साधन किया जा रहा है । इसलिये
सिद्धसाधन नहीं होगा—तो भी लोकने जिसे ( घटको ) एक स्थूलके
रूपमें जाना है, उसे यदि पक्ष करो तो निरवयव सिद्ध करनेमे विरोध ही
( बाध ही ) होगा । यदि स्थूलसे भिन्न ( परमाणु ) को पक्ष करो तो
सिद्धसाधन होगा ही ।
यदि कहो— लौकिकोंका “एक स्थूलोऽयम्” यह ज्ञान भ्रम है। अत
प्रमात्मक नहीं होनेके कारण उसके द्वारा निरवयवत्वानुमान बाधित
नहीं होगा—तो उस लौकिकज्ञानका मिथ्यात्व ही सिद्ध करो । अर्थात्
मिथ्यात्वका साधक जो हेतु हो उसीका उपन्यास करो । अजागलस्तनके
तुल्य निरर्थक इस सत्त्व-हेतुसे क्या लाभ ? यदि कहो—' स्थूलप्रत्ययो
मिथ्या सत्त्वात्' इस अनुमानद्वारा लौकिक स्थूल प्रतीतिको मिथ्या
सिद्ध करनेमें ही सत्त्व हेतुका उपयोग कर लिया जा सकता है—तो यह
१ परमाण्वादिरैव इति १ पु० पा०