आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबाह्यार्थभङ्गवादः २९७
तज्ज्ञानसान्निध्यं नियामकमतिप्रसङ्गादेव । न च तत्सहितो
भेदाग्रहः, अग्रहप्राधान्ये भेदाविवक्षायां निवृत्तेरपि प्रसङ्गात्,
तद्धेतोरभेदाग्रहस्यापि विद्यमानत्वात् । नासौ निवर्तकः,
अपि तु भेदग्रह इति चेन्न, रजत एव नेदं रजतमिति कृत्वा न
निवर्तेत, भेदग्रहस्य तत्कारणस्याभावात् । भावे वा विपरीत-
घटज्ञानसे पटमे प्रवृत्ति होने लगेगी । अतः प्रकृतमे रजतज्ञानसे
पुरोवर्ती शुक्तिमें होनेवाली प्रवृत्ति तभी उपपन्न होगी, जबकि यहां केवल
रजतज्ञान न मानकर रजतत्वविशिष्ट शुक्तिज्ञान माना जाय । इसप्रकार
अन्यथाख्याति ( भ्रम ) सिद्ध ही हो गयी । यदि कहो—वहा शुक्तिमे
प्रवृत्तिका कारण है रजतज्ञानका शुक्तिज्ञानके सन्निहित होना । अर्थात्
रजतार्थी व्यक्ति शुक्तिमे इस कारण प्रवृत्त हो जाता है कि वहाँ रजतज्ञान
शुक्तिज्ञानके सहित है—तो अतिप्रसङ्गदोष हो जायगा । क्योंकि
कदाचित् पटज्ञानके सहित घटज्ञान हो तो घटार्थी व्यक्तिकी पटमे प्रवृत्ति
होने लगेगी ।
यदि कहो कि—रजतज्ञानसे शुक्तिमे प्रवृत्तिका कारण केवल शुक्ति-
ज्ञानका सान्निध्य ही नहीं है, किन्तु उसके साथ साथ शुक्तिमे रजतका
भेदाग्रह भी नियामक है । इसीलिये पटमे घटका भेदग्रह रहनेसे
घटार्थी व्यक्ति पटमे नहीं प्रवृत्त होगा—तो भेदाग्रहमे यदि अग्रह ही
मुख्य हो और भेद गौण हो तो यहा भेदकी जगह अभेदका अग्रह
मानकर रजतार्थीकी वहासे निवृत्ति भी होने लगेगी । क्योकि निवृत्ति
का कारण है, शुक्तिमें रजतका अभेदाग्रह, सो वहा अभेदका भी
अग्रह है ही। इस प्रकार शुक्तिरजत स्थलमे भेदका अग्रह होनेसे
यदि प्रवृत्ति मानो तो अभेदका भी अग्रह होनेसे निवृत्ति भी माननी
पडेगी ।
यदि कहो कि—अभेदका अग्रह निवृत्तिका कारण नहीं है, किन्तु
भेदका ग्रह निवृत्तिका कारण है—तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि
रजतमे ही 'नेदं रजतम्' इस ज्ञानके कारण जो निवृत्ति होती है, वह
नहीं हो सकेगी । क्योंकि निवृत्तिका कारण जो रजतभेदग्रह, उसका
वहां अभाव है । यदि वहां रजतमें रजतभेदग्रहका भाव मानो तो