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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

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पृष्ठ 347

२९८ आत्मतत्त्वविवेके
ख्यातिरभिन्ने भेदप्रत्ययात् । तस्मात् प्रवर्त्तकवन्निवर्त्तकोऽप्य-
ग्रह एव तेषां स्वीकर्त्तुमुचितः । तथा च स दोषस्तदवस्थ एव ।
अथ भेदः प्रधानम्, अङ्गमग्रहः, तदा सत्यरजतज्ञानाद्
रजते न प्रवर्त्तेत, इदमंशरजतांशयोर्भेदाभावादिति स्वय-
मूहनीयम् ।
प्रवृत्तिवत् प्रतिपत्तावप्युभयाग्रहस्तुल्य इति चेन्न, अप्र-
हस्त्यान्विवक्षितत्वात्, सामग्रीविशेषादेव तत्सिद्धेः । तत्त्वे-
विपरीतख्याति आ ही गयी । क्योंकि अभिन्नमें भेदकी प्रतीति हुई है ।
इसलिये प्रवर्त्तकके समान निवर्त्तक भी अग्रहको ही मानना उचित है ।
अर्थात् जैसे, भेदके अग्रहको प्रवर्त्तक मानते हैं, वैसे ही अभेदके अग्रहको
निवर्त्तक भी मानना चाहिए । इस प्रकार शुक्ति रजतस्थलमे उक्त दोष
पूर्ववत् रह ही गया । अत भेदके अग्रहके साथ अभेदका भी अग्रह
होनेसे प्रवृत्तिके साथ ही निवृत्ति भी होने लगेगी ।
यदि कहो कि—भेदाग्रहमें भी भेद ही मुख्य है और उसका अग्रह
गौण है और ऐसा ही भेदाग्रह प्रवृत्तिका कारण है । अर्थात् जहां
वास्तविक भेद हो वहाँ उसके अग्रहसे प्रवृत्ति होगी, जैसे शुक्ति रजत
स्थलमे । अत पूर्वमें दिया गया निवृत्तिका प्रसङ्ग नहीं होगा, क्योंकि
अग्रहकी प्रधानता है नहीं—तो इस पक्षमें सत्य रजतज्ञानसे रजतमे
प्रवृत्ति नहीं होनी चाहिये । क्योंकि वहाँ इदमंश और रजतांशमें
वास्तविक भेद कहाँ है कि उसके अग्रहसे प्रवृत्ति हो सकेगी । यह तो
स्वयं विचार कर सकते हो ।
यदि कहो कि—भेदके अग्रहसे होनेवाली प्रवृत्तिके साथ ही जैसे
अभेदके अग्रहके कारण निवृत्तिका भो प्रसङ्ग दिया जा रहा है, वैसे ही
उक्त दोनों अग्रहोंके कारण परस्पर विरोधी आरोपात्मक ज्ञान भी एक
साथ होना चाहिये । अर्थात् जैसे भेदका अग्रह होनेसे शुक्ति रजतमे
अभेदका आरोप हो जाता है, वैसे ही उसी कालमें अभेदका भी अग्रह
होनेसे भेदारोप भी होने लगेगा और वहाँ प्रवृत्ति भी नहीं हो सकेगी—
तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि आरोपका कारण भेदका अग्रह नहीं
है किन्तु सामग्रीविशेषसे ही आरोप होता है । अर्थात् शुक्ति रजतमें