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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 340, कुल 530 में से

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पृष्ठ 340

बाह्यार्थभङ्गवादः २९१
पर्वतादिवल्लोकप्रसिद्धिसिद्धान् घटादीनुपादाय निरवयव-
त्वानुमानं स्यात्, अन्यथा ब्रह्मविवर्तादिविप्रतिपत्तिविहततया
दहनानुमानमपि पर्वतादौ न स्यादिति चेन्, नैवम्, अवि-
रोधात् । न हि ब्रह्मविवर्तादिसिद्धावप्याश्रयादयोऽन्यप्रकाराः
सम्भवन्ति¹ ।
तथा हि, सर्वत्रैव स्वप्नपर्वते स्वप्नधूमेन स्वप्नवह्निरेव
साध्यते, केवलं सांवृतेऽपि व्यवहारे सत्यानृतव्यवस्थाऽस्तीति
तस्यां निर्भरः कर्तव्यः । इह तु घटादिव्यपदेशेन स्थूल एव
यदि पक्षीकृतः, कथं निरवयवत्वेन साध्येन न विरोधः ?
रीतिसे आकाशकमलमें सुगन्धका अनुमान भी साश्रय हो जायगा।
और संसारसे आश्रयासिद्धिनामक दोष ही उठ जायगा। अतः
ऐसा न कहो।
यदि कहो कि—जैसे, लोकव्यवहारसे सिद्ध पर्वतादिको लेकर उसमें
अग्निका अनुमान होता है, वैसे ही लोकव्यवहारसे सिद्ध घटादिको
लेकर उसमें निरवयवत्वका अनुमान होगा। नहीं तो ब्रह्मविवर्तवाद
आदि विभिन्न मान्यताओंसे प्रतिहत होनेके कारण पर्वत भी गगन कमलके
समान ही हो जायगा और उसमें अग्निका अनुमान भी न हो सकेगा—
तो ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि पर्वतादिके ब्रह्मविवर्तादिरूप होने-
पर भी अग्निरूप साध्यके साथ कोई विरोध नहीं है। कारण, ब्रह्म
विवर्त आदि पक्षमें भी आश्रय (पक्ष) दूसरे प्रकारका हो और साध्य
तथा साधनादि दूसरे प्रकारके हों, ऐसा नहीं होता। अर्थात् ब्रह्मविवर्त-
रूप पर्वतमें ब्रह्मविवर्तरूप ही अग्निका अनुमान किया जाता है। अतः
पक्ष और साध्यादिमें कोई विरोध नहीं है।
जैसे, स्वाप्न-पर्वतमें स्वाप्न-धूमसे स्वाप्न-अग्निका ही साधन किया
जाता है। इस प्रकार केवल सांवृत (काल्पनिक) व्यवहारमें भी सत्य
और अनृतकी व्यवस्था है ही। अतः उस व्यवस्थाका आश्रय लेना
ही चाहिए। तुम्हारे अनुमानमें तो यदि घटादि-शब्दसे स्थूल
१. सन्ति इति १ पु० पा०