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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 349, कुल 530 में से

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पृष्ठ 349

३०० आत्मतत्त्वविवेके
कथन्ता तु निरूप्यते स्वतः परतो वेति । आद्ये स्वयं
स्वग्राहकेणेति¹ वा । तत्र न प्रथमः, स्वसंवेदनस्यासिद्धेः,
प्रकाशत्वस्यासाधारणत्वात् , शब्दसाम्येनानुमानाप्रवृत्तेः । न
बिना व्यवहारका विषय नहीं हो सकता । इसलिये यह पूर्वोक्त कथन
खण्डित हो गया कि—तथ्यातथ्य विभाग नहीं होनेसे बाह्यवस्तु नित्य
संदिग्ध है ।
ज्ञानप्रामाण्यका स्वतस्त्वनिराकरण
अब ज्ञानप्रामाण्यकी कथंताका विचार किया जाता है कि ज्ञानका
प्रामाण्य कैसे गृहीत होता है ? स्वतः या परतः । स्वतः पक्षमे भी
उस ज्ञानका प्रामाण्य स्वयं उस ज्ञानके द्वारा गृहीत होता है ? या उस
ज्ञानकी ग्राहिका सामग्रीके द्वारा ? उसमे प्रथम कल्प नहीं हो सकता ।
क्योंकि स्वका संवेदन ही असिद्ध है । अर्थात् ज्ञान अपना ही ग्रहण
नहीं कर सकता, स्वगत प्रामाण्यका ग्रहण तो दूरकी बात है । आशय
यह है कि धर्मिग्रहके बिना उसके धर्मका ग्रहण असम्भव है । यदि
अपना ग्रहण करे भी तथापि स्वधर्म ( प्रामाण्य ) का ग्रहण सर्वथा
असम्भव है । यदि स्वमें और स्वधर्ममें अभेद मानकर स्वग्रहणसे
स्वधर्मका भी ग्रहण हो तो प्रामाण्यके समान अप्रामाण्य भी स्वतःग्राह्य
होने लगेगा । किन्तु अप्रामाण्यको परतोग्राह्य मानते हो ।
यदि अनुमानसे सिद्ध करो कि—ज्ञान स्वप्रकाश प्रकाशत्वात्,
प्रदीपवत्—तो यहा प्रकाशत्व-हेतुका अर्थ तेजस्त्व मानो तो ज्ञानरूप
पक्षमें उसके नहीं होनेसे वह हेतु स्वरूपासिद्ध हो जायगा । यदि
प्रकाशत्वका अर्थ ज्ञानत्व लो तो वह पक्ष ( ज्ञान ) मात्रम रहनेके कारण
असाधारण हेत्वाभास हो जायगा । यदि प्रकाशत्वका अर्थ प्रकाशशब्द
वाच्यत्व लो तो उस न्यायसे गोपदवाच्य होनेके कारण गौके समान वाणी
भी विषाणी ( सींगवाली ) हो जायगी । इसलिए शब्दके साम्यके
आधारपर अनुमान नहीं हो सकेगा ।
यदि कहो कि—'ज्ञानवानह जानामि' इत्यादि प्रत्यक्ष अनुभव ही
ज्ञानके प्रकाश होनेमें प्रमाण है । क्योंकि उक्त अनुभवमें ज्ञान विषय
१ स्वग्राहकेण वेति १ पु० पा०