आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबाह्यार्थभङ्गवादः २९५
ङ्गात्। नाप्यन्यनिमित्तः, द्रवकठिनशीतोष्णादावपि तथाव्यव-
हारप्रसङ्गात्।
अस्तु तर्हि बाह्येष्वर्थेषु नित्यसन्देहः तथ्यातथ्यविभाग-
स्याशक्यत्वादिति चेत्, न तावत् सर्वस्य यथार्थत्वादेव
विभागोऽनुपपन्नः, उत्तरविरोधात्। तथाहि, विपरीतमवगतं
मयेति लौकिकी प्रतिपत्तिः, अन्यथाख्यातिरिति च वैनयिकी
यथार्था न१ वा ? उभयथाऽप्युत्तरेण न सर्वथाथार्थ्यसिद्धिः।
घटमे यह एकत्व व्यवहार बिना निमित्तका नहीं है। क्योंकि निर्निमित्त
होनेपर अनियमका प्रसङ्ग हो जायगा। अर्थात् सर्वत्र एकत्व-व्यवहार
होने लगेगा। साथ ही एकत्व व्यवहारमे विरुद्धधर्मराहित्यके सिवा
कोई दूसरा निमित्त हो भी नहीं सकता। क्योंकि तब परस्पर विरुद्ध
द्रव और कठिन तथा शीत और उष्ण आदिमे भी एकत्व व्यवहार होने
लगेगा। अर्थात् जब यह सिद्ध है कि घटादिमे एकव्यवहारका कारण
विरुद्धधर्मका राहित्य ही है, तो इसीसे यह भी सिद्ध हो गया कि घट
नाना परमाणुरूप नहीं है, किन्तु एक अवयवीरूप है।
यदि कहो कि—बाह्य विषयोंके बारेमे नित्य सन्देहात्मक ही ज्ञान
रहे। क्योंकि ज्ञानके प्रमात्व और अप्रमात्वका विभाग तथा विज्ञानके
प्रामाणिकत्व और अप्रामाणिकत्वका विभाग ही नहीं किया जा सकता
है—तो यहाँ यह नहीं कह सकते कि सभी ज्ञान यथार्थ ही होते हैं, इस-
लिये यथार्थ अयथार्थका विभाग अनुपपन्न है। क्योंकि मेरे प्रश्नका जो
उत्तर दोगे, उसीसे तुम्हारे इस कथनका विरोध हो जायगा। जैसे—
विपरीतमवगतं मया (मैंने विपरीत समझ लिया) यह लौकिकज्ञान
(अपने ज्ञानकी विपरीतताका ज्ञान) अन्यथाख्याति (भ्रम) रूप है?
अथवा शास्त्राध्ययनसे उत्पन्न जो विनय अर्थात् विवेक, उसपर व्यवस्थित
होनेसे यथार्थ है? इस प्रश्नका दोनोंमे कोई भी उत्तर दो तो उससे
सब ज्ञानकी यथार्थता नहीं सिद्ध हो सकेगी। अर्थात् "विपरीतमवगत
मया" यह ज्ञान यदि मिथ्या हो तो सुतरा सिद्ध हो गया कि सभी
ज्ञान यथार्थ नहीं है, यदि यह ज्ञान यथार्थ हो और पूर्ववाला ज्ञान
१. अथवा वा इति १ पु० पा०